विश्व वन्य जीव दिवस: उत्तरांखड के वनों पर है अनुपम जीव-जंतुओं का राज

World Wildlife Day 2022: अपने समृद्ध वन्यजीवों के लिए उत्तराखंड है मशहूर

देहरादून 03 मार्च। प्रकृति की गोद में बैठा उत्तराखंड वन्यजीवों के लिए स्वर्ग से कम नहीं है। उत्तराखंड अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए प्रदेश पूरे देश में एक विशिष्ट पहचान लिए हुए है। यहाँ संरक्षित और गैर-संरक्षित वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की हजारों प्रजातियाँ निवास कर रही हैं, जो ना केवल पर्यावरणीय संतुलन प्रदान करती हैं, बल्कि लोगों में उत्साह और रोमांच पैदा करती हैं। इस राज्य में मौजूद उद्यान, अभ्यारण और संरक्षित क्षेत्र देशभर में मशहूर हैं। ऐसे में आज यानी गुरुवार को मनाए जाने वाले विश्व वन्यजीव दिवस (World Wildlife Day) के मौके पर उत्तराखंड का नाम लेना लाजमी हो जाता है।

विश्व वन्यजीव दिवस 2022 की थीम- पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के लिए प्रमुख प्रजातियों को ठीक करना (Recovering Key Species For Ecosystem Restoration) रखी गई है। इसके चलते अपने खुशहाल वन्य जीवन को अरसों से बेहतर बनाए रखने वाले उत्तराखंड टूरिज्म ने स्वदेशी सोशल मीडिया मंच, कू ऐप पर अपने ऑफिशियल हैंडल के जरिये एक के बाद एक कई पोस्ट करके कई महत्वपूर्ण बातें साझा की हैं ।

उत्तराखंड पर्यटन विभाग ने कू ऐप पर विश्व वन्यजीव दिवस की शुभकामनाएँ देने के साथ ही राज्य के समस्त राजसी जीवों की बेहद खूबसूरत झलकियों से रूबरू कराया है। अपनी एक पोस्ट में पर्यटन विभाग ने लिखा-

विश्व वन्यजीव दिवस की शुभकामनाएँ! और इस विशेष अवसर को मनाने के लिए उत्तराखंड के सभी राजसी जानवरों की एक झलक देखने से बेहतर क्या हो सकता है! राज्य एक वन्यजीव-आश्रय है, जो देश के कुछ सबसे आकर्षक, सुंदर जीवों से भरा हुआ है। यहां एक पूर्वावलोकन है…

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एक अन्य पोस्ट में पर्यटन विभाग ने लिखा-

यह सुंदर, भेड़िये जैसा जानवर वास्तव में जंगली हिमालयी सियार है, जिसे उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में देखा जा सकता है। यह प्रजाति जल निकायों के पास, तलहटी और निचले पहाड़ों में निवास करना पसंद करती है। अगली बार जब आप हमसे मिलें, तो नज़र रखें, और, कौन जानता है, शायद आप भी भाग्यशाली हों!

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विभाग ने इसके आगे और जानकारी देते हुए लिखा-

इसे समझें: उत्तराखंड का राज्य पक्षी क्या है। एक संकेत: आप इसे देख रहे हैं। यह सही है, यह हिमालयन मोनाल है! यह खूबसूरत प्रजाति एक उच्च ऊंचाई वाला पक्षी है, हालांकि यह गर्मियों में निचले स्तर तक उतरता है- और विशाल शंकुधारी जंगलों में रहना पसंद करता है!

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प्रदेश में मौजूद पर्यटन स्थलों की जानकारी देते हुए पर्यटन विभाग ने बताया-

क्या आप जानते हैं, उत्तराखंड- प्राकृतिक चमत्कारों की भूमि- देश के कुछ सबसे शानदार वन्यजीव अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों का भी घर है? उनमें से एक पिथौरागढ़ में अस्कोट कस्तूरी मृग अभयारण्य है। लगभग 600 वर्ग किमी के विशाल क्षेत्र में फैला हुआ है।

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देश के प्रमुख नेशनल पार्क की जानकारी देते हुए उत्तराखंड पर्यटन विभाग ने बताया-

उत्तराखंड के घने जंगल और हरे भरे जंगल भी कुछ विदेशी वनस्पतियों और जीवों के घर के रूप में दोगुने हैं। यहां के कई राष्ट्रीय उद्यानों में से एक- जिम कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान, भारत का पहला और सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान, गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान, बिनसर, अस्कोट कस्तूरी मृग अभयारण्य, नैना देवी पक्षी अभ्यारण्य आदि- वन्यजीवों के साथ घूमने के लिए!

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साफ तौर पर उत्तराखंड के घने और हरे-भरे जंगल वन्य जीवों को बेहतर और सुखद जीवन देने के पूरक हैं। 71 प्रतिशत वन क्षेत्र वाले उत्तराखंड में बाघ, चीतल, सांभर, तेंदुआ और सरीसृपों के साथ एशियाई हाथी यहां की शान में चार-चांद लगाते हैं। इसके अलावा सैकड़ों प्रजाति के पक्षी और कीट भी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।

इसलिए मनाया जाता है विश्व वन्यजीव दिवस?

विश्व वन्यजीव दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य विश्वभर में वन्यजीवों की सुरक्षा तथा वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के प्रति लोगों को जागरूक करना है। पूरे विश्व के सभी देशों के साथ इस दिन भारत में भी वन्य जीवों हेतु जागरूकता फैलाई जाती है और प्रकृति और मानव के संबंधों को दर्शाया जाता है।

जैव विविधता की समृद्धि ही धरती को रहने व जीवनयापन के योग्य बनाती है, लेकिन समस्या यह है कि लगातार बढ़ता प्रदूषण, वातावरण पर इतना खतरनाक प्रभाव डाल रहा है कि जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियाँ धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं। भारत में इस समय 900 से भी ज्यादा दुर्लभ प्रजातियाँ खतरे में बताई जा रही हैं। यही नहीं, विश्व धरोहर को गंवाने वाले देशों की लिस्ट में दुनियाभर में भारत का 7वां स्थान है।

कुछ ऐसा है इतिहास

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 20 दिसंबर 2013 को 68वें सत्र में 03 मार्च को विश्व वन्यजीव दिवस की घोषणा की थी। इसी दिन विलुप्तप्राय वन्यजीव और वनस्पति के व्यापार पर प्रतिबंध  अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में स्वीकृत किया गया था। वन्य जीवों को विलुप्त होने से रोकने हेतु सर्वप्रथम साल 1872 में जंगली हाथी संरक्षण अधिनियम (वाइल्ड एलीफेंट प्रिजर्वेशन एक्ट) पारित हुआ था।

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