काशी विश्वनाथ मंदिर गुप्तकाशी में लगा गैर हिंदुओं को निषेध पट

 

उत्तराखंड: गुप्तकाशी विश्वनाथ मंदिर में गैर हिंदुओं के प्रवेश पर रोक, जानिए आखिर क्यों लगाया गया प्रतिबंध
28 Aug 2021 10:55:46

केदारघाटी के गुप्तकाशी स्थित विश्वनाथ मंदिर में गैर हिंदू समाज के कुछ लोग मंदिर में धड़ल्ले से आते—जाते रहते हैं और घंटों मंदिर के अंदर रहकर परंंपरागत धार्मिक और सामाजिक वातावरण खराब करते हैं जिससे श्रद््धालुुओं की भावनाएं आहत होती हैं।

केदारघाटी के गुप्तकाशी स्थित विश्वनाथ मंदिर के आगे लगा एक साइन बोर्ड सबका ध्यान आकृष्ट कर रहा है। बोर्ड पर लिखा है कि मंदिर में गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है। जानकारी के मुताबिक कुछ दिन पूर्व मंदिर में संपन्न हुए अन्नकूट मेले के दौरान गैर हिंदू महिलाओं का मेले में आना लेकिन टीका लगाने के लिए मना करने के बाद स्थानीय लोगों द्वारा गैर हिंदू समाज के लोगों का बहिष्कार किया जा रहा है।
विश्व हिंदू परिषद के जिलाध्यक्ष श्रीराम गोस्वामी और गोसेवा रक्षक के जनपद प्रभारी सतीश पाल ने बताया कि यह  मंदिर पौराणिक मान्यताओं को समेटे हुए हिंदू धर्म का प्रबल स्तंभ है। ऐसे में गैर हिंदू समाज के कुछ लोग मंदिर में धड़ल्ले से आते—जाते रहते हैं और घंटों मंदिर के अंदर रहकर सामाजिक माहौल खराब करते हैं। उन्होंने कहा कि मंदिर में आने वाली महिलाओं तथा बेटियों पर तंज कसना, इनकी आदतों में शुमार हो गया है। उन्होंने कहा कि जब कोई हिंदू,मस्जिद में नहीं जा सकता है, तो गैर हिंदुओं का मंदिर में आना वर्जित होना चाहिए।

श्री पाल ने ये भी कहा कि कुछ गैर हिंदू जो कि मजदूरी करते हैं और खुले में शौच जाने के बाद हाथ को भी शीतल कुंड में धोते हैं। जो हिंदुओं की धार्मिक आस्था पर कुठाराघात है। उन्होंने कहा कि शीघ्र मंदिर के बाहर गैर हिंदू लोगों के लिए पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा। ताकि मंदिर और शीतल कुंड की पवित्रता और मर्यादा बनी रहे। इसके लिए देवस्थानम बोर्ड से भी निवेदन किया गया है कि वो हिंदू मन्दिरों की मर्यादाओं को बनाये रखने के लिए एक कार्ययोजना बनाये।

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Monday, October 30, 2017
तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा (भाग 3) : काशी विश्वनाथ मंदिर, गुप्तकाशी

तुंगनाथ-चंद्रशिला यात्रा के इस भाग में आईए हम आपको ले चलते हैं गुप्तकाशी में स्थित भगवान भोलेनाथ के प्रसिद्ध और पुरातन मंदिर में जिसका संबंध महाभारत काल से ही है। गुप्तकाशी कस्बा केदारनाथ यात्रा का मुख्य पड़ाव है। कहा जाता है कि पहले इसका नाम मण्डी था। जब पांडव भगवान् शंकर के दर्शन हेतु जा रहे थे तब इस स्थान पर शंकर भगवान् ने गुप्तवास किया था जिसके बाद पांडवों ने यहां काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण किया था। इस कारण इस स्थान का नाम गुप्तकाशी पड़ा। काशी विश्वनाथ के मंदिर में एक मणिकर्णिका नामक कुंड है जिसमे गंगा और यमुना नामक दो जलधाराएं बहती है। हमने भी अपनी तुंगनाथ यात्रा के दौरान इस मंदिर में महादेव के दर्शन किया तो आइए आप भी हमारे साथ इस मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करिए। कहा जाता है न कि जो होता है अच्छे के लिए होता है। अगर कल शाम को बरसात न हुई होती तो शायद हम गुप्तकाशी न आकर उखीमठ ही चले जाते और उखीमठ जाते तो ये यात्रा केवल तुंगनाथ तक ही सीमित रह जाती और हम गुप्तकाशी में स्थित भगवान भोलेनाथ के दर्शन के से वंचित रह जाते वो भी श्रावण महीने के पूर्णिमा के दिन। मेरे सबसे पहले जागने और नहा-धो कर तैयार होने का मुझे एक फायदा यह मिला कि जब तक हमारे सभी साथी स्नान-ध्यान में लगे तब तक हम पहाड़ों की खूबसरती का दीदार करने के लिए गेस्ट हाउस की छत पर चला गया। यहां जाकर जो पहाड़ों में बरसात का जो नजारा दिखा वो कभी न भूलने वाले पलों में शामिल हो गया। बहुत लोगों को कहते सुना है कि बरसात में पहाड़ों की घुमक्कड़ी करने से बचना चाहिए और ये बात बहुत हद तक सही भी है। पर इस बरसात में यहां आकर हमने पहाड़ों का जो सौंदर्य देखा उसके बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। जिस तरह शादी में नई दुल्हन सजी संवरी होती है ठीक वैसे ही पहाड़ भी इस मौसम में एक दुल्हन की तरह दिख रही थी। बरसात के कारण मुरझाए पेड़ों पर हरियाली छाई हुई थी। पिछले साल जब जून के महीने में हम यहां आए तो यही पहाड़ सूना-सूना लग रहा था पर बरसात में इन पहाड़ों का मुझे एक अलग ही रूप देखने को मिला। एक तो हरा-भरा पहाड़ उसके ऊपर से अठखेलियां करते बादल का आना और जाना मन को मुग्ध कर रहा था।

तो आइए अब आज की यात्रा की बात करते हैं। कल पूरे दिन की सफर के थकान के कारण जो नींद आई तो सुबह चार बजे अलार्म बजने के साथ ही खुली। कमरे का दरवाजा खोल कर देखा तो कल शाम को जो बरसात आरंभ हुई थी अभी तक जमकर बरस रही थी। कल रात तो हमने सोचा था कि क्या पता मौसम विभाग की भविष्यवाणी गलत हो और आज बरसात से हमारा पाला न पड़े पर मौसम विज्ञान की भविष्यवाणी आज 100 प्रतिशत से भी ज्यादा सच हो रही थी। कल रात से लगातार हो रही झमाझम बारिश ने हमारी चिंताएं बढ़ा दीं। जिस हिसाब से बरसात हो रही थी उसमें अपने आवास से निकल पाना भी मुश्किल लग रहा था और हमें तो पूरे दिन ही यात्रा करनी हैं। अब ये यात्रा कैसे पूरी होगी इसी चिंता में हमने अपना करीब 10 मिनट बर्बाद कर दिया। उसके बाद जो होगा सो होगा यही सोचते हुए सबसे पहले स्नान-ध्यान का सोचा और नहाने के लिए चल दिए। करीब 20 मिनट में हम नहा धो कर तैयार हो गए। हमने तो नहा लिया पर अभी तक हमारे सभी साथी सोए हुए ही थे तो हमने सबसे पहले बीरेंद्र भाई जी को जगाया और उसके बाद हम उन्होंने ही एक-एक करके सबको जगाया। साढ़े पांच बजते-बजते हम सभी लोग नहा-धो कर तैयार हो गए और बरसात बंद होने का इंतजार करने लगे।

हमने तो सोचा कि दिन निकलने के साथ क्या पता बरसात की रफ्तार कुछ कम हो जाए पर ऐसा नहीं हुआ और जो हुआ इसका उल्टा ही हुआ। बरसात कम होने के बजाय और बढ़ती जा रही थी। जैसे जैसे बरसात की रफ्तार बढ़ रही थी वैसे वैसे हमारी चिंताएं भी बढ़ती जा रही थी। हम तो यही सोचने में लगे थे कि अगर बरसात बंद नहीं हुई तो हमारा आज का पूरा दिन खराब होगा और जो कल का दिन बचेगा वो वापसी में ही चला जाएगा और हमारी ये यात्रा अधूरी रह जाएगी। बरसात कम नहीं होता देख हम सबने बरसात में ही भोलेनाथ के दर्शन करने का मन बना लिया कि यात्रा आगे जारी रहे न रहे पर जब यहां हैं तो पहले यहां के दर्शन कर लेते हैं उसके बाद आगे का सोचेंगे। मेरे बात का सभी साथियों ने समर्थन किया और हम चले पड़े दर्शन के लिए। गेस्ट हाउस से निकलते ही बरसात से भीगी ठंडी हवा ने जोरदार स्वागत किया। ये ठंडी हवाएं बिल्कुल तीर की चुभ रही थी। यहां तो ऐसे ही जून के महीने भी कंपकपाती ठंड रहती और ऊपर से बरसात ने ठंड को और ज्यादा ही बढ़ा दिया था। ठंड से कांपते हुए ही हम सब मंदिर की ओर चलते रहे। गुप्तकाशी में मंदिर जाने का रास्ता मुख्य बाजार में बस पड़ाव के पास ही है। मंदिर जाने के लिए करीब 100 सीढि़यां चढ़नी पड़ती है। रात से हो रही बरसात के कारण सीढि़यां भी फिसलन भरी हो गई थी। सीढि़यों के दोनों तरफ पानी निकलने के लिए बने नाले में पानी बहुत ही तेज रफ्तार से नीचे आ रहा था। उसकी रफ्तार इस समय एक नदी के जैसे लग रही थी। पानी को हाथ लगाकर देखा तो ऐसा प्रतीत हुआ जैसे हाथ जम जाएगा।

करीब 10 मिनट से भी कम समय में सीढि़यां चढ़ते हुए हम मंदिर के पास पहुंच गए। मंदिर के बाहर ही बेलपत्र और प्रसाद की कुछ दुकानें हैं। हम सबने भी बेलपत्र और प्रसाद खरीदा और मंदिर की तरफ चल दिए। मंदिर के पास जाते ही देखा कि यहां पहले से ही स्थानीय लोगों की भारी भीड़ जमा है। एक तो श्रावण का महीना, उसके ऊपर पूर्णिमा और उसमें भी सोमवार का दिन तो कुल मिलाकर कहा जाए तो आज भगवान भोलेनाथ का ही दिन था और अगर इस दिन भोलेनाथ के मंदिर में भीड़ नहीं होगी तो कब होगी। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही सबसे पहले हमारी नजर उस मणिकर्णिका कुंड पर पड़ी जिसमें गंगा और यमुना नाम की दो धाराएं बहती रहती हैं। हम सबने वहीं पास ही में पड़े बर्तनों में दोनों धाराओं से पानी भरा और मंदिर में प्रवेश के लिए पंक्ति में खड़े लोगों के पीछे खड़े हो गए। धीरे धीरे हमारी भी बारी आ गई और हम भी मंदिर में प्रवेश कर गए। मंदिर के गर्भगृह में बहुत ही ज्यादा भीड़ थी। पैर रखने तक की जगह नहीं थी फिर भी किसी तरह बेलपत्र और फूल आदि से भगवान भोलेनाथ की पूजा करने के पश्चात जलाभिषेक किया और वहीं कोने में खड़े हो गए और सोच लिया कि जब तक पुजारी जाने के लिए नहीं कहेगा जाएंगे नहीं। यहां मेरी ये मंशा अधूरी ही रह गई, करीब 10 मिनट तक मंदिर के गर्भगृह में एक कोने में खड़ा रहा फिर भी पुजारी ने एक बार भी बाहर जाने के लिए नहीं तो थक हार कर हम खुद ही मंदिर से बाहर निकल गए।

मंदिर परिसर के अंदर ही मुख्य मंदिर के बगल में ही एक छोटा मंदिर है जिसे अद्र्धनारीश्वर मन्दिर कहते हैं। इस अद्र्धनारीश्वर मन्दिर में भगवान शिव की मूर्ति आधे पुरुष और आधे स्त्री के रूप में स्थापित हैं। अद्र्धनारीश्वर मन्दिर में पूजा-अर्चना करने के बाद हम मंदिर परिसर में ही बने अन्य छोटे छोटे मंदिरों और मूर्तियों पर जलाभिषेक किया और फिर कुछ फोटो लेने की कोशिश करने लगे। इस समय मेरे लिए एक स्वर्णिम पल यह हुआ कि बरसात की फुहारें कुल मिनट के लिए बंद हो गई और हम फोटो लेने में व्यस्त हो गए। दो-चार मिनट ही हुआ कि एक बार फिर से बरसात ने हमारे ऊपर धावा बोल दिया और बरसात इतनी तेज थी कि फोटो लेना तो दूर कैमरा भी निकलना मुश्किल हो रहा था। एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ में कैमरा लेेकर फोटो लेते रहे और कुछ फोटो लेने के बाद वापसी की तैयारी शुरू कर दी। मंदिर से बाहर निकलकर जिस दुकान से प्रसाद और बेलपत्र लिया था उसे पैसे दिये और उसके थाल को वापस किया और और चल पड़े अपने गेस्ट हाउस की तरफ। बारिश ने भी जैसे सोच रखा था कि आज वो हम सबको परेशान करके ही रखेगा। जिन सीढि़यों से हम आए थे उन्हीं सीढि़यों से नीचे की तरफ जाने लगे और कहते हैं न कि जोश में होश खो देना यही हमारे साथ हुआ। एक हाथ में छाता दूसरे हाथ में कैमरा लेकर फोटो खींचते हुए सीढि़यों से उतर रहे थे और एक बंदर के दिखते ही उसकी फोटो लेने की कोशिश में कुछ ध्यान नहीं रहा और पीछे हटते हटते सीढि़यों के बिल्कुल किनारे आ गए और पैर फिसल गया और वहीं गिर गए। ये तो अच्छा हुआ कि जो भी हल्की-फुल्की चोट का असर हुआ वो मेरे ऊपर ही हुआ और कैमरे को कुछ नहीं हुआ। अपनी चोट तो मैं मुस्कुराते हुए सह गया पर अगर कैमरे को चोट आती तो उस चोट को सहना मेरे लिए मुश्किल होता क्योंकि उसमें हमारी यात्रा की यादें बसी हुई थी और आगे भी बसने वाली थी। ऐसी ही एक घटना कन्याकुमारी में मेरे साथ घट चुकी है जब समुद्र की लहरों ने मेरे साथ साथ कैमरे को भी अपने खारे पानी से स्नान करवा चुका था।

मेरे गिरते ही बंदर तो अपने रास्ते निकल लिया और मैं देखता ही रह गया। फोटो लेने का सुख तो मिल नहीं सका, उल्टे चोट का दर्द जरूर मिल गया। मैं किसी तरह उठा और झूठी मुस्कुराहट के साथ साथियों से कहा कि कुछ नहीं हुआ और सीढि़यां उतरने लगे।

सीढि़या उतरने के बाद जब नीचे आए तो सबसे पहले हम लोगों ने कालीमठ जाने के लिए गाड़ी के बारे में पता किया तो इस सीजन में वहां कोई भी गाड़ी वाला जाने के लिए तैयार नहीं हुआ। सबका एक ही कथन था कि जिस हिसाब से बरसात हो रही है उसे देखकर तो यही लगता है कि अगर हम उधर गए और भू-स्खलन हो गया तो न जाने कितने देर उधर ही रहना पड़ेगा।

 

 

 

 

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