ज्ञान:क्या नहीं है संस्कृत में? क्या नहीं है संस्कृत से?

श्रावणी संकल्प का पर्व है। संस्कृत दिवस भी है। श्रवण होने से सुनने की क्षमता बढ़ाने का प्रेरक पर्व भी। इस अवसर पर समयबद्ध संस्कृत के स्वाध्याय का संकल्प लेना चाहिए। हमारा यह एक संकल्प विवेक के उदय, चिंतन की प्रतिष्ठा और चेतना के संचलन में सहायक हो सकता है।

संस्कृत में क्या नहीं है? संस्कृत से क्या नहीं है? दुनिया भर के ज्ञानियों ने संस्कृत से बहुत कुछ पाया है और हमने? यह बड़ा सच है कि बढ़ती आयु के साथ खेद होगा कि हम भारतीय होकर संस्कृत नहीं पढ़े! यह भी सच है कि संस्कृत स्वयं और सहज सीखी जा सकती हैं। बस, कोई भी संस्कृत ग्रन्थ पढ़ना आरम्भ कीजिए ( व्याकरण से शुरू किया तो भाग छूटेंगे, वह बाद में ) ! मैं भी एक उदाहरण हो सकता हूं!

विलम्ब क्यों? हिचक क्यों?
ज्ञानान्मुक्ति:।
बन्धो विपर्ययात् । (सांख्य• 3.23, 24)
ज्ञान द्वारा ही उलझनों से मुक्ति सम्भव है अज्ञान से बन्धन ही होता है।
पाणिनि का एक संकल्प उन्हें वैयाकरण बना गया!
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सावन पूर्णिमा श्रावणी पर्व पर संस्‍कृत दिवस भी है। सभी भाषा प्रेमियों, संस्‍कृत अनुरागियों और संस्‍कृति के प्रहरियों को बधाई।…. यह सभी भाषाओं की जननी है। नियमित भाषा, व्‍याकरण को देने वाली भाषा। संस्‍कृत इसलिए है कि यह संस्‍कारित है। एकदम संस्‍कारों से ओतप्रोत। टकसाली। कल्‍चर्ड। प्‍योर। गुणवाली। इसलिए इसको देवभाषा भी कहा गया है- गीर्वाणवाणी।

भारत के साथ इसका संबंध कभी टूट नहीं सकता। 1835 में जब मैकाले ने आंग्‍लभाषा को देश में उतारा तब कलिकाता संस्‍कृत विद्यालय के श्री जयगोपाल तर्कालंकारजी ने उक्‍त विद्यालय के संस्‍थापक प्रोफेसर एच. एच. विल्‍सन (कालिदास के नाटकों के अनुवादक, विष्‍णुपुराण, मत्‍स्‍यपुराण के संपादक, अनुवादक) को लिखा : मैकाले रूपी शिकारी आ गया है, वह हम भाषा के मानसरोवर में विचरण करने वाले हंस रूपी संस्‍कृतजीवियों पर धनुष ताने हुए हैं और हमें समाप्‍त कर देने का संकल्‍प किए हुए है। हे रक्षक! इन व्याधों से इन अध्यापक रूपी हंसों की यदि आप रक्षा करें तो आपकी कीर्ति चिरायु होगी :

अस्मिनसंस्कृत पाठसद्मसरसित्वत्स्थापिता ये सुधी
हंसा: कालवशेन पक्षरहिता दूरं गते ते त्वयि।
तत्तीरे निवसन्ति संहितशरा व्याधास्तदुच्छित्तये
तेभ्यस्त्वं यदि पासि पालक तदा कीर्तिश्चिरं स्थास्यति।।

इस पर प्रोफेसर विल्‍सन ने जो पत्र लिखा, वह आज भी भारतीयों के लिए एक आदर्श है –

विधाता विश्वनिर्माता हंसास्तत्प्रिय वाहनम्।
अतः प्रियतरत्वेन रक्षिष्यति स एव तान्।।

अमृतं मधुरं सम्यक् संस्कृतं हि ततोSधिकम्।
देवभोग्यमिदं यस्माद्देवभाषेति कथ्यते।।

न जाने विद्यते किन्तन्माधुर्यमत्र संस्कृते।
सर्वदैव समुन्नत्ता येन वैदेशिका वयम्।।

पंडितों की चिंता दूर करते हुए विल्सन ने यह भी लिखा :

“हमें घबराने की जरूरत नहीं है.. संस्‍कृत भारत के रक्‍त में बसी है… बकरियों के पांव तले रौंदाने से कभी घास के बीज खत्‍म नहीं हो जाते- “दूर्वा न म्रियते कृशापि सततं धातुर्दया दुर्बले।” जब तक गंगा का प्रवाह इस भूमितल पर रहेगा, जन-जन में देश प्रेम प्रवाहित होता रहेगा, संस्‍कृत का महत्‍व बना रहेगा। वह कभी समाप्‍त नहीं होगी बल्कि मौका पाकर फलेगी, फूलेगी।”

मेरा मानना है कि संस्कृत सबसे बड़ी और सबसे पुरानी तकनीकी शब्दावली की व्यवहार्य भाषा है। इसके शब्द यथा रूप विश्व ने स्वीकारे हैं। जब तक संसार में पारिभाविक और पारिभाषिक शब्दों की जरूरत होती रहेगी, संस्कृत के कीर्ति कलश उनकी पूर्ति करते रहेंगे। संसार की कोई भी भाषा हो, उसके नियम संस्कृत से अनुप्राणित रहेंगे। ( राग, रंग, शृंगार : श्रीकृष्ण)

प्रोफेसर विल्‍सन ने तब जैसा कहा, वैसा आज तक कोई नहीं कह पाया। संस्‍कृत साहित्‍य का संपादन, अनुवाद का जो कार्य विल्‍सन ने किया, वह आज तक दुनिया की 234 यूनिवर्सिटीज के स्‍कोलर्स के लिए मानक और अनुकरण के योग्य बना हुआ है। और हाँ, उनके बाद दुनियाभर में 134 विदेशियों ने संस्कृत के लिये जो काम किया, उसकी बदौलत संस्कृत के अधिकांश ग्रन्थ और उसकी जानकारी विदेशी भाषाओं में पहले मिलती है। और, हम उन मान्यताओं को दोहराते रहे!

संस्कृत दिवस हमारी संस्कृत की संस्कृति को धारण करने के संकल्प का अवसर है, यह संभाषण और अध्यापन ही नहीं हमारा कालजयी दायित्व तय करने का भी अनूठा अवसर है।
✍🏻श्रीकृष्ण “जुगनू”

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