विवेचना: तीन मौलिक कानून बदलने से बदल जायेगा पूरा न्यायिक परिदृश्य

अंग्रेजों के बनाए पुराने IPC, CrPC-एविडेंस कानून बदलेंगे:मॉब लिंचिंग, नाबालिग से रेप पर मृत्यदंड, राजद्रोह अब देशद्रोह; लोकसभा में पेश

अमित शाह ने शुक्रवार को लोकसभा में IPC, CrPC-एविडेंस कानून में बदलाव वाले बिल पेश किए।
नई दिल्ली 12 अगस्त। अंग्रेजी काल के कानून खत्म होंगे। मानसून सेशन के आखिरी दिन 11 अगस्त को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह 163 साल पुराने 3 मौलिक कानूनों में बदलाव के बिल लोकसभा में ले आए। सबसे बड़ा बदलाव राजद्रोह कानून को लेकर है, जो नए स्वरूप में आयेगा।

ये बिल इंडियन पीनल कोड (IPC), कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर (CrPC) और एविडेंस एक्ट हैं।

कई धाराएं और प्रावधान अब बदल जाएंगे। IPC की 511 धाराओं में 356 बचेंगी। 175 धाराएं बदलेंगी। 8 नई जोड़ी जाएंगी,22 धाराएं खत्म होंगी। इसी तरह CrPC में 533 धाराएं बचेंगी। 160 धाराएं बदलेंगी,9 नई जुड़ेंगी,9 खत्म होंगी। पूछताछ से ट्रायल तक वीडियो कॉन्फ्रेंस से करने का प्रावधान होगा,जो पहले नहीं था।

सबसे बड़ा बदलाव यह है कि ट्रायल कोर्ट को हर फैसला अधिकतम 3 साल में देना होगा। देश में 5 करोड़ केस लंबित हैं। इनमें से 4.44 करोड़ केस ट्रायल कोर्ट में हैं। इसी तरह जिला अदालतों में जजों के 25,042 पदों में से 5,850 पद खाली हैं।

तीनों बिल जांच को संसदीय कमेटी के पास भेजे जाएगें। इसके बाद लोकसभा और राज्यसभा में पास होंगें।

पहले वें 3 कानून जिनमें बदलाव होना है

समझिए 3 बड़े बदलाव…

राजद्रोह नहीं अब देशद्रोह: ब्रिटिश काल के राजद्रोह को हटाकर देशद्रोह शब्द आएगा। प्रावधान और कड़े। अब धारा 150 में राष्ट्र के खिलाफ कोई भी कृत्य, चाहे बोला हो या लिखा हो, या संकेत या तस्वीर या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से किया हो, तो 7 साल से आजीवन कारावास तक सजा  होगी। देश की एकता एवं संप्रभुता को खतरा पहुंचाना अपराध होगा। आतंकवाद शब्द भी परिभाषित। अभी IPC की धारा 124ए में राजद्रोह में 3 साल से उम्रकैद तक होती है।
सामुदायिक सजा: पहली बार छोटे-मोटे अपराधों (नशे में हंगामा,5 हजार से कम की चोरी) के लिए 24 घंटे की सजा या एक हजार रुपए अर्थदंड या सामुदायिक सेवा की सजा होगी। अभी ऐसे अपराधों पर जेल भेजा जाता है। अमेरिका-UK में ऐसा कानून है।
मॉब लिन्चिंग: मौत की सजा का प्रावधान। 5 या अधिक लोग जाति,नस्ल या भाषा आधार पर हत्या करते हैं तो न्यूनतम 7 साल या फांसी की सजा होगी। अभी स्पष्ट कानून नहीं है। धारा 302, 147-148 में कार्रवाई होती है।

180 दिन में चार्जशीट,ट्रायल के बाद 30 दिन में फैसला
पुलिस को 90 दिन में आरोप पत्र दाखिल करना होगा। कोर्ट इसे 90 दिन बढ़ा सकेगा। लेकिन,अधिकतम 180 दिन में जांच कर ट्रायल शुरू होगा। ट्रायल के बाद कोर्ट को 30 दिन में फैसला देना होगा। फैसला एक सप्ताह के भीतर ऑनलाइन अपलोड होगा। 3 साल से कम सजा वाले मामलों में संक्षिप्त सुनवाई पर्याप्त होगी। इससे सेशन कोर्ट में 40% मुकदमे कम होंगे। सजा की दर 90% पहुचाने का लक्ष्य है।

सजा माफी का राजनीतिक दुरुपयोग सीमित: सरकारें सजा में छूट का राजनीतिक दुरुपयोग ना कर सकें,इसको नया प्रावधान है। मौत की सजा सिर्फ आजीवन कारावास और आजीवन कारावास 7 साल तक सजा में बदला जा सकेगा। यह सुनिश्चित करेगा कि राजनीतिक प्रभाव वाले लोग कानून से बच न सकें। सरकार पीड़ित को सुने बिना 7 साल कैद या अधिक सजा वाले केस वापस नहीं ले सकेगी।
जीरो FIR: देश में कहीं भी एफआईआर दर्ज करवा सकेंगें। इसमें धाराएं भी जुड़ेंगी। अब तक जीरो FIR में धाराएं नहीं जुड़ती थीं। 15 दिन में जीरो FIR संबंधित थाने भेजनी होगी। हर जिले में पुलिस अधिकारी गिरफ्तार लोगों के परिवार को प्रमाण पत्र देगा कि वे गिरफ्तार व्यक्ति के लिए जिम्मेदार हैं। जानकारी ऑनलाइन और व्यक्तिगत देनी होगी।
पहचान छिपाकर महिला से संबंध बनाने व शादी पर अब नई धारा: शादी, नौकरी, प्रमोशन का प्रलोभन देकर या पहचान छिपाकर महिला का यौन शोषण अपराध होगा।
FIR से फैसले तक स​ब ऑनलाइन: डिजिटल रिकॉर्ड्स को वैधता से लेकर FIR और कोर्ट के फैसले तक पूरा सिस्टम डिजिटल और पेपरलेस होगा। सर्च व जब्ती की वीडियोग्राफी होगी। जांच, अनुसंधान फोरेंसिक विज्ञान पर आधारित होगा। 7 साल या अधिक की सजा वाले अपराधों में फोरेंसिक टीम मौके पर जरूर जाएगी। सभी अदालतें 2027 तक कंप्यूटरीकृत होंगी।

ये भी बदलाव किए गए हैं…

चुनाव में मतदाता को रिश्वत देने पर एक साल की कैद होगी । पहली बार अपराध में कुल कारावास का एक-तिहाई समय जेल में बिताने पर जमानत होगी। फरार घोषित अपराधी बगैर भी मुकदमा चल सकेगा। दाऊद जैसे अपराधियों की ट्रायल संभव होगी। सिविल सर्वेंट्स पर मुकदमा चलाने को 120 दिन में अनुमति देनी होगी।

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  1. कानूनों में बदलाव क्यों जरूरी था
आजादी के बाद संविधान लागू होने पर भी अंग्रेजी जमाने के दो सदी पुराने कानूनों से आपराधिक न्याय प्रणाली की औपनिवेशिक गुलामी चल रही थी। आर्थिक मामलों से जुड़े कई मामले सरकार ने आपराधिक कानून की परिधि से बाहर रखने को जन विश्वास बिल पारित किया है। ऐसे में बदलाव को आजादी के 75वें वर्ष में यह बिल अच्छा है।

  2. मुकदमों के बोझ से मुक्ति मिलेगी

अभी पांच करोड़ से ज्यादा केस अदालतों में लंबित हैं। जिला स्तर पर लम्बित 4.44 करोड़ में से 3.33 करोड़ केस फौजदारी या क्रिमिनल के हैं। छोटे मामलों में सामुदायिक सेवा जैसे दंड प्रावधानों से मुकदमें घट सकते हैं।

 3. ये कानून कब और कैसे लागू होंगे

तीनों बिल संसद की स्थायी समिति को गये हैं। राजद्रोह जैसे प्रावधान की सुप्रीम कोर्ट आलोचना कर चुका। नए कानूनों में और कठोर प्रावधान हैं। ऐसे में समिति में मतभेद हो सकते हैं। शीत सत्र पूर्व समिति की रिपोर्ट नहीं आई तो लोकसभा कार्यकाल खत्म होने पर बिल निरस्त हो जाएंगे। हालांकि,सरकार चाहे तो इस पर सहमति बन सकती है।

 4. इन बदलावों पर सवाल क्यों उठे?

IPC और दूसरे कानूनों की धाराओं के क्रम परिवर्तन से वकीलों और जजों में कन्फयूजन बढ़ेगा। कुछ लोग प्रस्तावित कानून को पुरानी फाइल पर नया कवर बताते हैं। गलत मुकदमे और पुलिस ज्यादती रोकने के प्रभावी और व्यावहारिक प्रावधान नहीं। मुकदमों के जल्द फैसले को भी स्पष्ट रोडमैप नहीं। नए कानून के बाद पुलिस व न्यायपालिका में और मैनपॉवर जरूरी होगी। इन्फ्रास्ट्रक्चर भी बढ़ाना होगा।

राज्यों के लिए नए कानून कैसे हैं

सरकारी दावों के अनुसार बिल पेश करने से पहले व्यापक विचार विमर्श हुआ। संविधान की सातवीं अनुसूची में कानून-व्यवस्था और पुलिस राज्यों का विषय है। समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग राष्ट्रीय बहस करा रहा है,इसलिए आपराधिक कानून परिवर्तन पूर्व राज्यों से परामर्श और देश में सार्थक बहस जरूरी है।

सरकारी तैयारी: 4 साल चर्चा के बाद हुए हैं ये बदलाव

गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि 18 राज्यों,6 केंद्रशासित प्रदेशों,सुप्रीम कोर्ट,22 हाई कोर्ट,न्यायिक संस्थाओं,142 सांसदों और 270 विधायकों के अलावा जनता ने भी इन विधेयकों पर सुझाव दिए हैं। चार साल की चर्चा और इस बीच 158 बैठकों के बाद सरकार ने बिल पेश किया । बदलावों को पहली बैठक सितंबर 2019 में संसद भवन के पुस्तकालय के रूम नंबर जी-74 में हुई। कोरोना के एक साल इसमें कोई प्रगति नहीं हुई ।

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