ज्ञान: वेद में है समाज, राष्ट्र, संगतिकरण की महिमा

 

RV9.104 समरसता
6 पर्वतनारदौ काण्वौ, काश्यप्यौ शिखण्डिन्यावप्सरसौ वा । पवमान: सोम: । उष्णिक् ।

सामूहिक गायन सत्संग का महत्व

1.सखाय आ नि षीदत पुनानाय प्र गायत ।
शिशुं न यज्ञै: परि भूषत श्रिये ।। RV 9.104.1
व्यावहारिक अर्थ:-हे मित्रो ! आओ संगठित हो कर बैठो, सब के कल्याण के लिए पवित्र करने वाले ज्ञान को शिषु की तरह से बढ़ाने के लिए उत्तम गायन सत्संग करो.

2. समी वत्सं न मातृभि: सृजता गयसाधनम् ।
देवाव्यं1 मदमभि द्विशवसम् ।। RV 9.104.2
व्यावहारिक अर्थ:-जिस प्रकार बछड़े का गौ के साथ रह कर विकास होता है,उसी प्रकार दिव्यगुणों के रक्षक उल्लास, मानसिक और शारीरिक चेतना को बल देनेवाले (इस प्रकार सामूहिक सत्संग और गायन से ) मातृभूमि के प्रति जाग्रित होवो.

3. पुनाता दक्षसाधनं यथा शर्धाय वीतये ।
यथा मित्राय वरुणाय शन्तम: ।। RV 9.104.3
व्यावहारिक अर्थ:-सुख शांतिके लिए इस साधन से अपनी चेतना को पवित्र द्वारा सब स्थानों पर मैत्री पूर्ण वातावरण के बनाने की शक्ति और क्षमता प्राप्त करो

4. अस्मभ्यं त्वा वसुविदमभि वाणीरनूषत ।
गोभिष्टे वर्णमभि वासयामसि ।। RV 9.104.4
व्यावहारिक अर्थ:-हमारी स्तुतियां और वाणियों के प्रभाव से सब साधनों की प्राप्ति के लिए गौओं के प्रताप से सब के जीवन को समृद्ध करें

5. स नो मदानां पत इन्दो देवप्सरा असि ।
सखेव सख्ये गातुवित्तमो भव ।। RV 9.104.5
व्यावहारिक अर्थ:-इस (संगठन की) मानसिकता हमें शक्तिशाली, हमारे उत्साह और उल्लास की रक्षा करने वाली देवता स्वरूप है, सब लोग सब एक मित्र हो कर श्रेष्ठ मार्गदर्शन करते हैं जिससे सुरक्षा प्राप्त जीवन दिव्य गुणों वाला हो कर सब जनों को देवरूप बनाता है .

6. सनेमि कृध्यस्मदा रक्षसं कं चिदत्रिणम् ।
अपादेवं द्वयुमंहो युयोधि न: ।। RV 9.104.6
व्यावहारिक अर्थ:-इस प्रकार कुटिलता से दो भांति के व्यवहार करने वाले आसुरी राक्षसी वृत्ति द्वारा हमारा अहित ( देश को खा जाने वालों से ) करने वालों के सत्य असत्य व्यवहार को पृथक करने का सामर्थ्य स्थापित होता है.

AV1.15 देवता:- सिन्ध्वादयो मन्त्रोक्ता -ऐश्वर्यप्राप्त्युदेश
संगठित रूप से कार्य करने का महत्व
1. सं सं स्रवन्तु सिन्धवः सं वाताः सं पतत्रिणः ।
इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां संस्राव्येण हविषा जुहोमि । ।अथर्व 1.15.1 । ।
(सिन्धव: संसंस्रवन्तु) सब नदियां संगठित रूप से हमारे अनुकूल हो कर बहें अर्थात्‌ अनुकूल रूप से विशाल जल का स्रोत ही राष्ट्र की उन्नति में सहायक हो सकता है, यदि वह प्रतिकूल होगा तो राष्ट्र के लिए बाढ़ जैसे विध्वंश कारी परिणाम लाएगा । (वाता: सम्‌ पतत्रिण: सम्‌) विविध प्रकार के पवन और पक्षी भी सब बहुत संगठित रूप से अनुकूल हो कर बहें, अर्थात्‌ नौका आदि से समुद्र यात्रा और विमान अदि से वायुमण्डल मंह जाने वाले यान अनुकूल पवन का लाभ लें और पक्षी इत्यादि जीव भी अनुकूल रूप से राष्ट्र सुरक्षा में योगदान करें, जैसे एक टिड्डी दल प्रतिकूल रूप से वनस्पतियों को नष्ट कर देता है। (प्रदिव:इमम्‌ यज्ञम्‌) मेरे इस व्यावहारिक व्यापारिक सङ्गतिकरण यज्ञ में (संस्राव्येण हविषा) सब साधनों के प्रयोग से (उषन्ताम्‌ जुहोमि) हम लोग प्रीतिपूर्वक राष्ट्र की समृद्धि को प्राप्त करें ।

व्यापार और उद्योग संघ अधिवेशन Chamber of Commerce & Industry

2. इहैव हवं आ यात म इह संस्रावणा उतेमं वर्धयता गिरः ।
इहैतु सर्वो यः पशुरस्मिन्तिष्ठतु या रयिः । । अथर्व 1.15.2 । ।
हे व्यापारियो! (इह एव) इस संघ के अधिवेशन में (मे हवम आ यात ) हमारे अह्वान पर पधारो । (इह) इस अधिवेशन में (संस्रावणा:) प्रतिवेदन सब मिले हैं ( उत गिर: इमम्‌ वर्धयत इह एतु ) आप के आने पर उन्हें अपने अपने वक्तव्य से इस संघ के अनुमोदन से अपने लक्ष्य की ओर हम अग्रसर हों। (य: सर्वा: पशु: या रयि: अस्मिन्‌ तिष्ठतु) और व्यापार और उद्योग के सब श्रमिक इत्यादि कार्य कर्ता के प्रयत्न से बढ़ती लक्ष्मी हमारे राष्ट्र में स्थित रहे।

3. ये नदीनां संस्रवन्त्युत्सासः सदं अक्षिताः ।
तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि । । अथर्व 1.15.3 । ।
(नदीनाम्‌ ) नदियों को (संस्रावै:) प्रवाहों द्वारा जो (उत्सास:) उनके उद्‌गम के स्रोत (सदम्‌)सदा (अक्षिता:) बिना क्षीण हुए (संस्रवन्ति) प्रवाहित होती रहती हैं, (तेभिर्मे सर्वै:) उसी प्रकार मुझ व्यापाराध्यक्ष द्वारा सदैव (संस्रावै धनम्‌) राष्ट्र में स्मृद्धि के प्रवाह को ( सं संस्रावयामसि) हम मिल कर प्रवाहित करते हैं।

4. ये सर्पिषः संस्रवन्ति क्षीरस्य चोदकस्य च।
तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्रावयामसि । । अथर्व 1.15.4 । ।
(ये सर्पिष: क्षीरस्य च उदकस्य च संस्रवन्ति:) जैसे गौ के घी दूध राष्ट्र की प्रगति को बढ़ाते है और गौ के भूमि पर विचरण करने से वर्षा की भूमि से आर्द्रता पुन: ऊपर जाकर वर्षा बनती है, (तेभिर्मे सर्वै:) उसी प्रकार मुझ व्यापाराध्यक्ष द्वारा सदैव (संस्रावै धनम्‌) राष्ट्र में स्मृद्धि के प्रवाह को ( सं संस्रावयामसि) हम मिल कर प्रवाहित करते हैं।

✍🏻सुबोध कुमार

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