कालीदास? भाजपा छोड़ जायेंगें कहां वरुण, मानेका?

तब भी सोनिया-राहुल को नहीं समझ पाए! डाल तो काट दी, अब किस्मत के मोहताज ही हैं वरुण गांधी

नवीन कुमार पाण्डेय

Varun Gandhi News : वरुण गांधी 16 फरवरी, 2011 को 10 जनपथ पहुंचे। उनके हाथ में अपनी शादी का कार्ड था। परिवार को खुद अपनी शादी का निमंत्रण दिया लेकिन परिवार ने झांका तक नहीं।

हाइलाइट्स
1-भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोलकर कहां जाएंगे वरुण गांधी?
2-राहुल गांधी के ‘ना’ कहने पर वरुण लगभग विकल्पहीन हो गए हैं
3-बड़ा सवाल- जो भाजपा में नहीं मिला वो कौन सी पार्टी दे पाएगी?

वरुण गांधी सबको चौंका रहे हैं। शायद ही कोई समझ पा रहा हो कि आखिर वो ‘कालिदास’ क्यों बन गए? भारतीय जनता पार्टी (  भाजपा)  की छांव में उन्होंने राजनीति का ककहरा सीख फायरब्रैंड नेता की छवि बनाई, दिग्गजों का दुलार पाया, लेकिन अब राजनीति के इसी वटवृक्ष की डाल काटने लगे। भला दूसरी डाल पर पांव टिकाए बिना जिस डाल पर बैठे हों, उसी को काट डालना कहां की होशियारी है? संभवतः कालिदास ने भी ऐसा नहीं किया होगा। संभव है कि दंतकथाओं की श्रृंखला चली तो एक कड़ी कालिदास की भी जुड़ गई होगी। ये भी संभव है कि कालिदास पेड़ की वो टहनी सच में काट रहे होंगे, जिन पर वो बैठे थे। तो भी हम कालिदास की गलती से सीख तो सकते ही हैं। वैसे भी वरुण गांधी एक तेज-तर्रार जननेता हैं। ओजस्वी भाषणों से जनता के दिलों में गहरे पैठने की कला है उनमें। इसी से भाजपा में आते ही वो फर्राटे भरने लगे।

भाजपा ने वरुण को सर आंखों पर बिठाया

मां मानेका गांधी के साथ वरुण 2004 में भाजपा में शामिल हुए और 2009 के अगले लोकसभा चुनाव में ही उन्हें पार्टी का टिकट मिल गया। उत्तर प्रदेश की पीलीभीत लोकसभा सीट से चुनकर संसद पहुंच गए। तीन साल बाद वर्ष 2013 में पार्टी ने उन्हें अपना सबसे युवा महासचिव बना पश्चिम बंगाल जैसे प्रमुख राज्य का प्रभार भी सौंप दिया। कुल मिलाकर भाजपा ने वरुण गांधी को राजनीति की संकरी गली नहीं, लंबे-चौड़े एक्सप्रेसवे का फ्री पास दे दिया। वरुण गांधी भी तेज रफ्तार ड्राइविंग करते लगातार नई-नई मंजिल पा रहे थे। उधर, मां मानेका गांधी को 1998 और 1999 में भाजपा ने तब संसद पहुंचने में मदद की जब वो पार्टी में थी भी नहीं। दोनों ही बार भाजपा हाथ पकड़कर निर्दलीय मानेका को लोकसभा लाई। इतना ही नहीं, मानेका को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री पद भी दिया गया। कहते हैं, तब प्रमोद महाजन ने वरुण को ‘भाजपा का गांधी’  प्रॉजेक्ट किया। उन्हें लाल कृष्ण आडवाणी का भी साथ मिला ।

रफ्तार के आनंद में कंट्रोल खो गए वरुण?

वर्ष 2014 में जब भाजपा फिर से केंद्र की सत्ता में लौटी और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तब भी भाजपा में मां-बेटे की हनक बनी रही। मानेका गांधी को फिर मंत्री बनाया गया। उन्हें बेटे वरुण गांधी के साथ संगठन में भी जगह मिली। फिर ऐसा क्या हुआ कि वरुण ने रास्ता ही बदल लिया?

दरअसल, कई बार एक्सप्रेसवे पर सनसनाती रफ्तार में कुछ लोग ऐसे आनंदमग्न हो जाते हैं कि पता ही नहीं चलता, उन्होंने कब गाड़ी से नियंत्रण खो दिया। कंट्रोल छूटने पर तो सबकुछ भाग्य पर निर्भर होता है। किस्मत अच्छी रही तो गाड़ी पलटने पर भी आप बिल्कुल सुरक्षित बच जाते हैं या फिर हल्की-फुल्की चोटें आती हैं। लेकिन भाग्य का साथ नहीं मिला तो जान भी जा भी सकती है। कई बार जान बच तो जाती है, लेकिन चोट इतनी गंभीर होती है कि उबरने में सालों लगते हैं।

लगता है वरुण भी एक्सप्रेसवे पर तेज रफ्तार की सनक के शिकार हो गए। लगता है, वरुण एक्सप्रेसवे के नियम समझ ही नहीं पाए। उन्हें समझना था कि एक्सप्रेसवे बहुत लंबा होता है। इस पर गाड़ी चढ़ा दी तो फिर बहुत लंबी ड्राइविंग करनी पड़ती है। लंबी दूरी तय कर कहीं गाड़ी पार्किंग का मौका मिलता है। वहां आराम फरमा फ्रेश होते हैं, कुछ खाते-पीते हैं और फिर नई ताजगी से मंजिल की तरफ बढ़ते हैं। एक्सप्रेसवे का आनंद है तो लंबी दूरी तक धैर्य से गाड़ी चलाते रहने की चुनौती भी। लेकिन वरुण हड़बड़ी करने लगे। लगा, बहुत ड्राइविंग कर ली, अब तो पार्किंग होनी ही चाहिए। धैर्य खोते ही उन्होंने यह समझ खो दी कि एक्सप्रेसवे पर नियम तोड़ना कितना महंगा पड़ सकता है।

बदली भाजपा को समझ नहीं पाए वरुण?

वो वर्ष 2015 था जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हुआ। प्रदेश में वरुण गांधी को अगले मुख्यमंत्री बताते पोस्टर लगे। मानेका गांधी तो 2014 के लोकसभा चुनाव में ही जनसभाओं में वरुण को खुलकर भाजपा का मुख्यमंत्री कैंडिडेट बताने लगीं। उत्तर प्रदेश चुनाव तक केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बन चुकी थी। अमित शाह भाजपा अध्यक्ष बन चुके थे। वरुण और मानेका को मोदी-शाह की भाजपा का बदला स्वभाव समझ नहीं आया। समझ नहीं पाए कि भाजपा एक्सप्रेसवे है, हाइवे नहीं। यहां धैर्य का सिक्का चलता है, दबाव अक्सर दुत्कारा जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो वरुण और मानेका ने भाजपा नेतृत्व पर दबाव का रास्ता अपना भूल कर दी। लेकिन उससे भी बड़ी भूल यह हुई कि वो न सिर्फ पुरानी भूल दोहराते रहे बल्कि नई-नई भूल करने लगे। परिणाम सबके सामने है। मोदी मंत्रिमंडल से मानेका की छुट्टी ।

सोनिया-राहुल-प्रियंका की वो बात कैसे भूल गए वरुण!

वैसे भी कहा गया है, किसी को सारा जहां नहीं मिलता। फिर भी आशा टूटने पर निराशा तो होती ही है। वरुण की आस पूरी नहीं हुई तो भाजपा से रूष्ट होना कोई अपराध तो नहीं। लेकिन महत्व समय का होता है, बात समय अनुकूलता की होती है। वरुण ने हड़बड़ी में गड़बड़ी की। पिछले कुछ सालों से वरुण के व्यक्तित्व का विरोधाभास साफ-साफ दिखने लगा है। एक तरफ तेज-तर्रार नेता की छवि तो दूसरी तरफ बिना किसी नए ठौर भाजपा पर हमलों की आत्मघाती रणनीति! वरुण जैसे बहुमुखी प्रतिभा का धनी युवा जब बिना नई राह बनाए, पुराने रास्ते बंद कर देता है तो आश्चर्य होता है।

आखिर वो कैसे भूल गए कि उन्होंने खुद 10 जनपथ जाकर अपनी शादी का न्योता दिया था, फिर भी सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और राहुल गांधी में से कोई भी नहीं झांका। आज राहुल भले कह रहे हों कि वरुण को वो गले लगा सकते हैं लेकिन पार्टी में नहीं ले सकते, उन्होंने तो मौके पर हाथ भी नही मिलाया, गले लगाने की तो बात ही दूर है। आखिर वरुण कैसे नहीं समझ पाए कि शादी का न्योता ठुकराने वाले पार्टी में मिलाने का निवेदन स्वीकार करेंगें? बहुत संभव है, उनका पूरा परिवार उनकी और उनकी मां की दुर्गति देखने को व्यग्र हो।

किस पार्टी में वरुण के सपने पूरा करने का दम?

खैर, अगर कांग्रेस ने वरुण को साथ ले भी लिया होता या आगे चलकर वो कांग्रेसी बन भी जाएं तो उन्हें वहां भाजपा से ज्यादा क्या मिल जाएगा? क्या राहुल-प्रियंका के मुकाबले उन्हें खुलकर खेलने की अनुमति होगी ?

कहा जाता है कि प्रियंका गांधी चाहती हैं, वरुण कांग्रेस में आ जाएं। लेकिन अब राहुल के साफ इन्कार के बाद शायद प्रियंका ने भी अपना प्लान ठंडे बस्ते में डाल दिया । फिर वरुण के पास और क्या रास्ता बच जाता है? कांग्रेस समेत हर पार्टी किसी ना किसी परिवार संचालित है। भला कौन सा क्षेत्रीय क्षत्रप उन्हें खुलकर खेलने का खुला मैदान देगा? उत्तर प्रदेश में ही समाजवादी पार्टी (SP) से वरुण गांधी कितनी उम्मीद कर सकते हैं और अखिलेश यादव उनकी कौन सी आस पूरी कर सकते हैं? तो क्या वरुण गांधी नई पार्टी बनाएंगे? क्या वो निर्दलीय रहकर ‘एकला चलो रे’ की राह पकड़ेंगे? इनमें से कोई भी विकल्प भाजपा के मुकाबले बेहतर है, यह फिलहाल तो नहीं लग रहा। भविष्य में किसने झांका है? संभव है कि वरुण गांधी भाजपा बिना और बेहतर कर पाएं। फिर भी इतना तो जरूर है कि वो किस्मत से ही संभव है, वरुण ने भविष्य संवारने की कोई प्लानिंग की है, कम-से-कम अभी ऐसा तो नहीं दिख रहा।

Varun Gandhi Left Merely Any Good Option After Revolt From Bjp As Rahul Gandhi Denied Him Taking In Congress Party

 

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