ज्ञान: दो प्रतिशत मामलों में हो पाया है सिद्ध राजद्रोह का आरोप

राजद्रोह पर हरिनायक 360°:भाजपा शासित राज्यों में केस बढ़े, कांग्रेस सरकार में एकसाथ सबसे ज्यादा लोगों पर लगा राजद्रोह
2012 में कुडनकुलम परमाणु संयंत्र का विरोध कर रहे लोगों पर भी राजद्रोह का मामला लगा था।
कानून का दुरुपयोग रोकने को विधि आयोग ने की है अनुशंसा,भारत की शिक्षा नीति बनाने वाले मैकाले ने ही तैयार किया था ड्राफ्ट

नई दिल्ली 21 फरवरी। कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के आंदोलन के बीच IPC की धारा-124 (ए) यानी राजद्रोह कानून एक बार फिर से चर्चा में है। बीते मंगलवार को ही दिल्ली की एक अदालत ने किसान आंदोलन में सोशल मीडिया पर फेक वीडियो पोस्ट कर अफवाह फैलाने और राजद्रोह के मामले के दो आरोपितों को जमानत देते हुए इस कानून को लेकर टिप्पणी की है।

अदालत ने कहा है कि उपद्रवियों का मुंह बंद कराने के बहाने असंतुष्टों को खामोश करने को राजद्रोह का कानून नहीं लगाया जा सकता। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं है,जब कोर्ट ने इस कानून के दुरुपयोग को लेकर कोई टिप्पणी की हो। सुप्रीम कोर्ट और विधि आयोग भी इसके दुरुपयोग को लेकर टिप्पणी कर चुके हैं।

150 साल पहले कानून लागू हुआ

दरअसल, 1870 में जब से यह कानून प्रभाव में आया, तभी से इसके दुरुपयोग के आरोप लगने शुरू हो गए थे। अंग्रेजों ने अपने खिलाफ उठने वाली आवाजें दबाने को इस कानून का इस्तेमाल किया। इस धारा में सबसे ताजा मामला किसान आंदोलन टूलकिट मामले में पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि पर दर्ज हुआ है।

आजादी के बाद केंद्र और राज्य की सरकारों पर भी इसके दुरुपयोग के आरोप लगते रहे। भाजपा की सरकार आने के बाद से राजद्रोह के मामलों पर चर्चा बढ़ गई है। हालांकि इसके पहले की सरकारों में भी राजद्रोह के मामले चर्चित रहे हैं। साल 2012 में तमिलनाडु के कुडनकुलम में परमाणु संयंत्र का विरोध करने पर 23,000 लोगों पर मामला दर्ज किया गया,जिनमें से 9000 लोगों पर एक साथ राजद्रोह की धारा लगाई गई।
गौर करने वाली बात यह है कि केंद्र में भाजपा सरकार आने के बाद से ही NCERB ने 2014 से राजद्रोह के मामलों का अलग से रिकॉर्ड रखना प्रारंभ किया। खास बात यह कि देश में ब्रिटिश दौर का यह कानून जारी है पर ब्रिटेन ने 2009 में इसे अपने देश से खत्म कर दिया।

क्या है राजद्रोह?

कोई भी व्यक्ति देश-विरोधी सामग्री लिखता,बोलता है या ऐसी सामग्री का समर्थन करता है या राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करने के साथ संविधान को नीचा दिखाने की कोशिश करता है,तो उसे आजीवन कारावास या तीन साल की सजा हो सकती है।- आईपीसी 124-ए

सर्वाधिक मामलों वाले 5 राज्यों में जिनमें 3 भाजपा के

10 साल में राजद्रोह के सर्वाधिक मामले जिन पांच राज्यों में दर्ज हुए उनमें बिहार,झारखंड और कर्नाटक में अधिकांश समय भाजपा या भाजपा समर्थित सरकार रही। इन राज्यों में 2010 से 2014 की तुलना में 2014 से 2020 के बीच हर वर्ष 28% की बढ़ोतरी दर्ज की गई।

पहले अंग्रेजों ने दुरुपयोग किया, फिर सरकारों पर लगे आरोप

1891 राजद्रोह में पहला मामला दर्ज किया गया। बंगोबासी नामक समाचार पत्र के संपादक के खिलाफ ‘एज ऑफ कंसेंट बिल’ की आलोचना करते हुए एक लेख प्रकाशित करने पर मामला दर्ज हुआ।
1947 के बाद आरएसएस की पत्रिका ऑर्गनाइजर में आपत्तिजनक सामग्री के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। सरकार की आलोचना पर क्रॉस रोड्स नामक पत्रिका पर भी केस दर्ज हुआ था। सरकार विरोधी आवाजों और वामपंथियों के खिलाफ भी इसका इस्तेमाल होता रहा।
2012 में इस कानून में सबसे बड़ी गिरफ्तारी हुई। केंद्र में कांग्रेस सरकार थी। तमिलनाडु के कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र का विरोध करने वालों में से 9000 पर धारा लगाई गई।

कानून कैसे बना, कितना बदला, अब आगे क्या?

कब से शुरू हुआ, किसने बनाया- ब्रिटिश काल में 1860 में आईपीसी लागू हुई। इसमें 1870 में विद्वेष भड़काने की 124ए धारा जोड़ी गई। भारत के शिक्षा नीतिकार थॉमस बबिंगटन मैकाले ने पहला ड्राफ्ट तैयार किया।
क्यों बनाया- 1870 के दशक में अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देते वहाबी आंदोलन को रोकने को बनाया गया ।
पहली बार राजद्रोह कब जुड़ा- बालगंगाधर तिलक पर 1897 में इसमें मुकदमा दर्ज हुआ। इस मामले में ट्रॉयल बाद सन 1898 में संशोधन से धारा 124-ए को राजद्रोह के अपराध की संज्ञा दी गई।
आजादी के बाद क्या हुआ- आजादी के बाद भी यह IPC में बनी रही। हालांकि इसमें से 1948 में ब्रिटिश बर्मा (म्यांमार) और 1950 में ‘महारानी’ और ब्रिटिश राज’ शब्द हटाये गये।
सजा में क्या बदलाव हुआ- 1955 में कालापानी की सजा आजीवन कारावास में बदल गई।
विरोध का क्या हुआ-1958 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया। पर 1962 में सुप्रीम कोर्ट ने वैध ठहराते हुए इसके दुरुपयोग को रोकने को शर्तें लगा दीं। 2018 में विधि आयोग ने भी इसका दुरुपयोग रोकने को कई प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की। सुप्रीम कोर्ट के फैसले और विधि आयोग की अनुशंसा लागू करने को संसद से कानून में बदलाव करना होगा।

भाजपा सरकार कानून खत्म करने के मूड में नहीं

लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में एक घोषणा ये भी की थी कि इस कानून को ख़त्म किया जायेगा. हालाँकि कांग्रेस मात्र 52 सीटों पर सिमट गयी और अब कांग्रेस अपने इस वादे को पूरा नही कर सकती है.

लेकिन तीन/चार जुलाई 2019 को केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में कहा कि राष्ट्र-विरोधी, पृथकतावादी, व आतंकवादी तत्वों से प्रभावकारी ढंग से निपटने को इस कानून की ज़रूरत है. और ये भी कि मौजूदा सरकार की कोई भी योजना ऐसी नही है जिसमे इस कानून को खत्म किया जायेगा.
जवाब राय ने टीआरएस के बंदा प्रकाश के लिखित सवाल पर दिया. प्रकाश ने जानना चाहा कि क्या सरकार आजाद भारत के लोगों पर लागू औपनिवेशिक युग के कानून ख़त्म करने पर विचार कर रही है?
जवाब में केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि “देशद्रोह के अपराधों से निपटने वाले भारतीय दंड संहिता के इस प्रावधान को रद्द करने का कोई प्रस्ताव नही है.”

क्या है राजद्रोह कानून

राजद्रोह कानून को IPC की धारा 124 A में परिभाषित किया गया है. इसके अनुसार ”कोई जो भी बोले या लिखे गए शब्दों से, संकेतों से, दृश्य निरूपण से या दूसरों तरीकों से घृणा या अवमानना पैदा करता है या करने की कोशिश करता है या भारत में कानून सम्मत सरकार के प्रति वैमनस्य को उकसाता है या उकसाने की कोशिश करता है, तो सजा का भागी होगा.”

वैसे तो 2014 से 2016 तक इस धारा में सिर्फ 2 लोगों के खिलाफ ही दोष को साबित किया जा सका है.

चार देश जहां राजद्रोह जैसे कानून पर हुए विवाद, दो ने इसे खत्म किया

ब्रिटेन : अभिव्यक्ति पर दमनकारी प्रभाव और लोकतंत्र के मूल्यों पर आघात की वजह से 2009 में इसे खत्म कर दिया गया।

न्यूजीलैंड : लोकतांत्रिक मूल्यों को आघात पहुंचाने और विपक्ष का मुंह बंद कराने का औजार बनने के चलते 2007 में यह कानून समाप्त।

अमेरिका : कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी पर राजद्रोह कानून के दमनकारी प्रभाव की आलोचना की है। राजनीतिक भाषणों को व्यापक संरक्षण है।

आस्ट्रेलिया : कई राज्यों में राजद्रोह कानून मौजूद। 1985 के बाद से इस कानून का दायरा सीमित हुआ है। जेल की जगह जुर्माने का दंड है।

( विराग गुप्ता: अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट)

कांग्रेस राजद्रोह के जिस कानून को हटाने का वादा कर रही थी, उसका खुद दुरुपयोग कर चुकी थी


असीम त्रिवेदी का कार्टून

2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने मेनिफेस्टो निकाला. इसकी कई सारी चीजों में से एक है- IPC का सेक्शन 124ए. मतलब, राजद्रोह का अपराध परिभाषित करने की धारा. कांग्रेस ने मेनिफेस्टो में वादा किया है-
हम भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 124ए को खत्म करेंगे. इसका बेज़ा इस्तेमाल हुआ है. वैसे भी ये धारा अब गैरज़रूरी रह गई है क्योंकि इस बारे में नए कानून आ गए हैं.

खुद कांग्रेस के राज में गलत इस्तेमाल हो चुका है इस कानून को

कांग्रेस ने बेज़ा इस्तेमाल को कारण गिनाकर जिस सेक्शन 124 ए को खत्म करने का वादा किया है, उसका ग़लत इस्तेमाल UPA के कार्यकाल में हो चुका है. वो भी तब, जब 2011-12 में कांग्रेस की आलोचना चरम पर थी. ये केस था कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी का. 2012 में यही सेक्शन लगाकर मुंबई पुलिस ने असीम को अरेस्ट किया. असीम के जिस कार्टून पर हंगामा हुआ, उसमें अशोक स्तंभ की कॉपी की गई थी. उसमें ‘सत्यमेव जयते’ की जगह ‘भ्रष्टमेव जयते’ लिखा था. ऊपर भेड़िये बने थे तीन, जिनके मुंह से खून की बूंदें टपक रही थीं. कार्टून पर एक किनारे लिखा था- नैशनल एम्ब्लेम, वुल्फ्स विद द साइन ऑफ डेंजर.
कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में IPC के सेक्शन 124ए को हटाने का वादा किया है. लिखा है कि राजद्रोह को परिभाषित करने वाले इस कानून का ग़लत इस्तेमाल हुआ है. इसका बेज़ा इस्तेमाल UPA की सरकार के टाइम भी हुआ था. दाहिनी तरफ जो कार्टून है, उसकी वजह से कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी पर राजद्रोह लगा दिया गया था.
और भी कुछ कार्टून थे. ये आए थे अन्ना हज़ारे के जन लोकपाल आंदोलन के दौरान, नवंबर 2011 में. पॉलिटिक्स के लोगों में पैठे करप्शन पर व्यंग्य किया गया था. उस समय केंद्र और महाराष्ट्र, दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी. केंद्र में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री, राज्य में पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री. UPA सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे. असीम का कार्टून सरकार के खिलाफ माना गया.
असीम त्रिवेदी पर उनके बनाए कुछ कार्टून्स की वजह से राजद्रोह लगा दिया गया था. उन्हें अरेस्ट करके जेल भी भेजा गया.

असीम को जेल भी हुई

असीम के खिलाफ पुलिस में शिकायत लिखवाई थी अमित कतरनेय नाम के शख्स ने. अमित का कहना था कि असीम के कार्टून्स से भारतीयों की भावनाएं आहत हुई हैं. मगर इंडिया अगेन्स्ट करप्शन के लोगों का दावा था कि इस केस के पीछे खुद सरकार का हाथ है. क्योंकि वो अपने खिलाफ चल रही भ्रष्टाचार-विरोधी मुहिम को कुचलना चाहती है. ये आरोप सही हों या न हों, लेकिन ये सच तो है कि कांग्रेस की सत्ता में ही कार्टून से व्यंग्य करने वाले एक आर्टिस्ट पर राजद्रोह का केस बना. और उसे जेल भी भेजा गया.
ये ब्रिटेन के अखबार ‘द गार्डियन’ के एक खबर का स्क्रीनशॉट है.इसमें असीम की गिरफ़्तारी वाले न्यूज को रिपोर्ट किया गया है.असीम का वाकया दुनियाभर में रिपोर्ट हुआ.

देश-विदेश, सब जगह इसकी खूब आलोचना हुई

असीम पर राजद्रोह का केस दर्ज़ होने और उनकी गिरफ़्तारी दुनिया भर में खबर बनी. मनमोहन सिंह सरकार की बहुत आलोचना हुई. उस पर आरोप लगे कि अंग्रेज़ों के जमाने में बने इस औपनिवेशिक माइंडसेट के कानून का ग़लत इस्तेमाल कर वो खुद की आलोचना को दबा रही है. अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉडर्स’ ने भी असीम को रिहा करने की मांग की थी. उस समय सूचना और प्रसारण मंत्री थीं अंबिका सोनी. उन्होंने पत्रकारों से कहा था-

कार्टूनिस्ट्स को संवैधानिक मापदंडों की हद में रहना चाहिए. वो राष्ट्रीय प्रतीकों को अपने कार्टून का विषय नहीं बना सकते.

बाद में कांग्रेस ने बतौर पार्टी खुद को इस मामले से दूर कर लिया. पार्टी की तरफ से बोलते हुए मनीष तिवारी ने कहा-

मुझे ये कहने में कोई हिचक नहीं कि अरेस्ट किए जाने का फैसला बहुत ज्यादा कड़ी कार्रवाई थी.हम गिरफ़्तारी के पक्ष में नहीं.ऐसा समाज जो खुद पर हंस न सके,खुद का मज़ाक न उड़ा सके,वो कमज़ोर होने के जोखिम पर होता है.

मनीष तिवारी ने भले पार्टी का ये स्टैंड रखा, मगर कैच यहीं पर था. UPA की ही तो सरकार थी.कांग्रेस विपक्ष में तो थी नहीं कि उसकी राय धूल खा रही हो.

असीम के केस का क्या हुआ?

शुरुआत में असीम ने खुद पर लगे राजद्रोह के मामले का विरोध करते हुए जमानत लेने से इनकार कर दिया था. उन्हें तब दो हफ़्ते जेल की सज़ा हुई. बाद में जमानत भी मिली. आगे चलकर बंबई हाई कोर्ट ने असीम को बरी कर दिया. अदालत ने कहा था कि एक नागरिक को सरकार और उसके फैसलों की आलोचना करने का हक है. शर्त यही है कि वो सरकार के खिलाफ हिंसा न भड़काए. सरकार और प्रशासन की आलोचना करना राजद्रोह नहीं माना जा सकता. तब ही ये हुआ था कि किसी पर राजद्रोह का मामला दर्ज़ करने से पहले महाराष्ट्र में पुलिस को जिला लॉ अफसर से कानूनी सलाह लेनी होगी. महाराष्ट्र सरकार ने भी बंबई हाई कोर्ट को आश्वासन दिया कि वो इस सिलसिले में गाइडलाइन्स जारी करेगी.

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