मत: इस्लाम में सिर्फ जकात विचार आकर्षक लेकिन वो भी पक्षपाती:एक्स मुस्लिम साहिल

एक्स मुस्लिम साहिल का इंटरव्यू:मैं पक्का मुसलमान था, फिर इस्लाम छोड़ दिया क्योंकि कोई मौलवी मेरे सवालों का जवाब नहीं दे सका। मटुंगा रोड़ मुुंबई के 36 वर्षीय साहिल, अपने मुस्लिम जीवन में निसार अहमद शेख था और कट्टरपंथियों की धमकियों से अपनी पहचान छुपाये था लेकिन एक पाकिस्तानी मौलाना मुफ्ती फ़ज़ल हमदर्द ने उनकी फोटो सार्वजनिक कर उनकी जान खतरे में डाल दी। अपना वर्तमान निवास उन्होंने अभी भी सुरक्षा के लिए अज्ञात रखा हुआ है।

पैगंबर मोहम्मद पर BJP की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा की विवादित टिप्पणी पर हुए हंगामे के बाद देशभर में धर्म को लेकर नई बहस चल रही है। इस्लाम दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा धर्म है, हर चौथा व्यक्ति मुसलमान है। कई लोगों का दावा तो यह भी है कि 2075 तक इस्लाम दुनिया का सबसे बड़ा धर्म होगा। दूसरी तरफ कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस्लाम छोड़ रहे हैं, उसके आलोचक बन रहे हैं।

आज एक ऐसे ही युवा मुसलमान साहिल का टेलिफोनिक इंटरव्यू पढ़िए, जिसने दो साल पहले इस्लाम धर्म छोड़ दिया। अब वे इस्लाम छोड़ चुके लोगों की मदद के लिए संगठन भी चलाते हैं। तो चलिए शुरू करते हैं..

सवाल

– आपने इस्लाम धर्म कब और किन हालात में छोड़ा?

जवाब:

मैंने करीब दो साल पहले इस्लाम धर्म को छोड़ा। मुझे इस्लाम में कई बातें सही नहीं लग रही थीं। जब मैंने कुरान, हदीस और दूसरी किताबों के जरिए इस्लाम को पढ़ा तो उनमें खुदा और इंसानों को लेकर बताई गईं कई बुनियादी बातें सही नहीं लगीं। मैंने महसूस किया कि इस्लाम इंसानों को दो हिस्सों में बांटता है। एक मुसलमान और दूसरे काफिर।

मेरे मन में सवाल उठा कि किसी को उसकी आस्था के हिसाब से कैसे बांटा जा सकता है? अच्छे-बुरे काम के आधार पर लोगों में फर्क किया जाए, ये बात समझ में आती है, लेकिन कौन किसे पूजता है, इस आधार पर लोगों को बांटना, मेरी समझ में नहीं आया।

इस्लाम में बताए गए हिदायत और गुमराही के सिद्धांत पर भी मेरे मन में सवाल उठे। दावा किया जाता है कि कुरान को इंसानियत के लिए एक गाइडेंस के तौर पर खुदा की तरफ से भेजा गया है। मेरे मन में सवाल उठा- जो किताब इंसानियत के लिए भेजी गई है। सभी इंसानों के लिए भेजी गई है। वो बहुत सरल होनी चाहिए थी, लेकिन कुरान को पढ़ने के बाद लगा कि ये बहुत अस्पष्ट है।

बहुत सी आयतें अस्पष्ट हैं। इसी वजह से इस्लाम में कई फिरके यानी मत बनें। हर फिरका मानता हैं वो सही रास्ते पर है और बाकी गलत रास्ते हैं। लोग अपने हिसाब से आयतों के मतलब निकाल लेते हैं। आखिरकार मैंने इस्लाम छोड़ने का फैसला किया।

सवाल:

आपके परिवार में किसी और ने भी धर्म छोड़ा है? जब आप इस्लाम से अलग हुए तो परिवार का रिएक्शन क्या था?

जवाब:

मेरे परिवार में किसी और ने इस्लाम धर्म को नहीं छोड़ा है। जब मैंने इस्लाम छोड़ा तो घरवालों ने एक आलिम साहब को बुलाया। उनके जरिए मेरे सवालों के जवाब और कई तर्क देकर मुझे वापस इस्लाम में लाने की कोशिश हुई, लेकिन मैं माना नहीं। इसके बाद घरवालों ने कुछ दिनों के लिए मुझे छोड़ दिया। हालांकि बाद में वो वापस मेरे साथ आ गए।

सवाल:

आप इस्लाम धर्म से अलग हो चुके हैं, फिर उसकी आलोचना क्यों करते हैं?

जवाब:

इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसकी वजह से लोगों के भीतर कट्टरता आती है। मुझे लगता है कि मुसलमान भोले हैं और उन्हें वास्तविक इस्लाम का पता नहीं होता। उनके सामने मीठी चाशनी चढ़ा इस्लाम होता है। शिक्षा, विज्ञान और दूसरे क्षेत्रों में मुसलमान इस्लाम की वजह से पीछे रह गए हैं।

अब सोचता हूं कि मैं मुसलमानों को जागरूक करूं ताकि उनके भीतर से कट्टरता खत्म हो जाए। समाज में पीछे रह गए मुसलमान आगे बढ़ें। मुसलमान दूसरों को भी इंसान समझने लगें और उनके भीतर से ये विचार खत्म हो कि वो सर्वश्रेष्ठ हैं और बाकी इंसानों से बेहतर हैं। इसी वजह से मैं इस्लाम को लेकर अपने सवाल उठाता रहता हूं।

सवाल:

तौहीन-ए-रिसालत और ईशनिंदा पर क्या कहेंगे? क्या कभी ऐसा नहीं लगता कि आपकी बातों से दूसरों की भावनाएं आहत हो सकती हैं?

जवाब:

गुस्ताखी या तौहीन की कोई एक तय परिभाषा नहीं है। एक फिरके के मुसलमान कहते हैं कि दूसरे फिरके वाला मुसलमान गुस्ताख और गुमराह है। किसी भी बात पर किसी की भी भावना आहत हो जाती है। हमारा इरादा किसी की तौहीन या गुस्ताखी करना नहीं है, बल्कि सवाल उठाना है। हमारा तरीका बिलकुल साफ है। हम तथ्यों की रोशनी में सवाल उठाते हैं।

हम इस तरह से अपनी बात रखते हैं कि गुस्ताखी भी ना हो और हमारा ऐतराज भी दर्ज हो जाए। मैं इस बात को मानता हूं कि बहुत ज्यादा माननीय व्यक्तिव की अगर आलोचना करनी भी हो तो बहुत सम्मानजनक तरीके से करनी चाहिए।

सवाल

हमारा संविधान लोगों को अपने तरीके से अपने धर्म के पालन की आजादी देता है। आपको नहीं लगता कि इस्लाम की आलोचना करके आप उनके अधिकार में दखल दे रहे हैं?

जवाब:

मैंने कभी ये नहीं कहा कि इस्लाम खत्म कर देना चाहिए या इस्लाम पर पाबंदी लगा देनी चाहिए। मैं समझता हूं कि धर्म व्यक्तिगत आजादी का हिस्सा है। कोई हिंदू, मुसलमान या नास्तिक रहना चाहता है तो उससे किसी को दिक्कत नहीं होनी चाहिए।

दिक्कत तब होती है जब कोई मुसलमान अपना इस्लाम दूसरे पर थोपने की कोशिश करता है। भारत का संविधान तो सभी को अपने-अपने मजहब पर चलने की आजादी देता है, लेकिन इस्लाम में धर्म की स्वतंत्रता नहीं है। इस्लाम को पढ़ेंगे तो जानेंगे कि अगर कोई इस्लाम छोड़ देता है, तो उसके लिए सजा मौत है।

सवाल:

पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ है, इस पर आपकी राय क्या है?

जवाब:

पैगंबर साहब के बारे में नूपुर शर्मा ने जो कहा वो अपनी तरफ से नहीं, बल्कि इस्लामिक स्रोतों के हवाले से कहा। ऐसे में उनकी टिप्पणी पर इतना विवाद क्यों? अगर इस बात से समस्या है तो स्रोत को नकारा जाना चाहिए। जो लिखा है, उसके हवाले से कुछ बताना किस तरह से गुस्ताखी हो जाता है? ये पूरा मौलानाओं का खेल है, जिन्होंने आम मुसलमानों को बरगलाकर ये मुद्दा खड़ा किया।

गुस्ताखी का कोई पैमाना नहीं है। अगर कोई पैगंबर साहब को सिर्फ रसूल कह दे तो इसे भी वो गुस्ताखी मान सकते हैं। मुझे लगता है कि देश का माहौल खराब किया गया है। उन मौलानाओं को सजा दी जानी चाहिए, जिन्होंने तौहीन-ए-रिसालत के नाम पर लोगों को भड़काया। जिन्होंने तन सिर से जुदा का नारा दिया।

सवाल:

अपने सवालों के जवाब के लिए क्या आपने किसी इस्लामिक विद्वान से बात की, क्या वो जवाब दे सके?

जवाब:

मैंंने अपने सवालों के जवाब तलाशने के लिए यूट्यूब पर इस्लामिक विद्वानों के वीडियो देखे। जिन इस्लामिक विद्वानों को मैं जानता था, उनसे घंटों-घंटों बात की, लेकिन मुझे अपने सवालों के संतोषजनक जवाब नहीं मिले। जब मैंने इस्लाम छोड़ा, तो घरवालों ने देवबंद से नास्तिकता और धर्म के विशेषज्ञ एक मुफ्ति को बुलाया था। उनसे चार-पांच घंटे बात की, लेकिन उनके पास मेरे सवालों का कोई संतोषजनक जवाब नहीं था।

मैंंने एक ऐसे इस्लामिक विद्वान से बात की जिनके लाखों अनुयायी हैं। उनका टीवी चैनल भी है। वो आज तक मेरे सात-आठ सवालों के जवाब नहीं दे सके। उन्होंने कहा था कि वो रिसर्च करके जवाब देंगे।

मैं सोचता था कहीं मुझे ही गलतफहमी तो नहीं। शायद मेरी ही सोच गलत हो। पूरा इंटरनेट खंगाल लिया लेकिन कहीं भी जवाब नहीं मिले। आखिरकार मुझे इस्लाम छोड़ना पड़ा।

सवाल:

आप नास्तिक हैं या किसी धर्म को मानते हैं?

जवाब:

अब मैं किसी धर्म को नहीं मानता हूं। मैं धर्म के सिद्धांत को ही नकारने लगा हूं। मुझे लगता है कि धर्मों को इंसानों ने ही बनाया है। मैं कभी-कभी ये मानता हूं कि कोई खुदा नहीं है।

सवाल:

क्या आपने कोई और धर्म अपनाने के बारे में सोचा है, अगर हां, तो कौन सा धर्म और क्यों?

जवाब:

मेरे लिए इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। मैं इसे हर धर्म से ऊपर मानता हूं। कोशिश यही रहती है कि मेरी वजह से किसी को तकलीफ न हो। आगे मैं कभी कोई और धर्म स्वीकार नहीं करूंगा। अब तो धर्म का सिद्धांत ही गलत लगता है।

सवाल:

क्या इस्लाम छोड़ने की वजह से कभी कोई खतरा महसूस किया?

जवाब:

जब इस्लाम छोड़ा तब तो कोई समस्या नहीं हुई। कभी परिवार से कोई खतरा महसूस नहीं किया। जब मैंने एक्टिविज्म स्टार्ट किया तब धमकियां मिलने लगीं। टीवी बहस में हिस्सा लेता हूं तो लोग लाइव ही धमकियां दे देते हैं। वॉट्सऐप पर गालियां भेजते हैं। आजकल माहौल सही नहीं है।

मैं जो बातें कहता हूं वो मुसलमानों को बर्दाश्त नहीं होती हैं। ऐसे में हर समय खतरा बना रहता है। पूर्व-मुसलमानों का एक बेहद छोटा समुदाय उभर रहा है। मैं सरकार से गुजारिश करता हूं कि इस समुदाय को सुरक्षा दी जाए। हमारी सुरक्षा के लिए कानून लाया जाए।

सवाल:

हर धर्म की खूबसूरत और अच्छी बातें भी होती हैं, इस्लाम धर्म में आपको क्या कभी कुछ अच्छा लगा और क्यों?

जवाब:

इस्लाम भी एक धर्म है और उसमें भी बहुत सी अच्छाइयां हैं। इस्लाम में जकात यानी गरीबों के लिए दान का इंतजाम बहुत अच्छा है, लेकिन समस्या ये है कि जकात सिर्फ गरीब मुसलमानों को दी जा सकती है। इस्लाम में और भी कुछ चीजें बहुत अच्छी हैं। साथ ही कई चीजें बहुत खतरनाक भी हैं, उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

 

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