पुण्य स्मरण: 27 साल अंग्रेजों की जेल में रहे गणेश घोष

………………………………………………… चरित्र-निर्माण, समाज-सुधार तथा राष्ट्रवादी जन-चेतना के लिए समर्पित *मातृभूमि सेवा संस्था* (राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत) आज देश के ज्ञात व अज्ञात राष्ट्रभक्तों को उनके अवतरण, स्वर्गारोहण व बलिदान दिवस पर कोटि कोटि नमन करती है। 🙏🙏🌹🌹🌹🌹
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🌹🙏 *गणेश घोष * 🙏🌹

आज हम जिस महान क्रांतिकारी के बारे में चर्चा कर रहे हैं उनका जीवन भी अनेक कष्टों के साथ गुज़रा और उन्होंने ग़ुलाम भारत व आज़ाद भारत को जीवंत महसूस किया। जीवन के अंतिम क्षणो में आज़ाद भारत की दुर्दशा से भी खिन्न थे। राजनेता बनने के बावजूद भी अपने आप को असहाय महसूस करते थे। प्रसिद्ध *‘मानिकतल्ला बम कांड’* के सिलसिले में इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। सन् 1928 में वे जेल से बाहर निकले और कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में भाग लिया। सन् 1946 में गणेश घोष कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए थे। वे 1952 में बंगाल विधान सभा और 1967 में लोकसभा के सदस्य चुने गए। भारत के एक अनेक स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले क्रांतिकारियों गणेश घोष और अपने जीवन के लगभग 27 वर्ष जेलों मे बिताए। गणेश घोष का जन्म 22 जून, सन् 1900 में ब्रिटिशकालीन भारत में बंगाल में हुआ था। विद्यार्थी जीवन में ही वे स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित हो गए थे। सन् 1922 की गया कांग्रेस में जब बहिष्कार का प्रस्ताव स्वीकार हो गया तो गणेश घोष और उनके साथी अनंत सिंह ने नगर का सबसे बड़ा विद्यालय बंद करा दिया था। इन दोनों युवकों ने चटगाँव की सबसे बड़ी मज़दूर हड़ताल की भी अगुवाई की। गणेश घोष क्रांतिकारी समूहों के सदस्य थे, जिन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से भारत की स्वतंत्रता हासिल करने के साधनों के रूप में सशस्त्र विद्रोह का पक्ष लिया था।

📝 गणेश घोष आयरलैंड के सन् 1916 ईस्टर राइजिंग से प्रेरित थे और सूर्य सेन के नेतृत्व में थे। हालांकि,वे सोवियत रूस के कम्युनिस्ट विचारधारा से भी प्रभावित थे। बाद में इनमें से कई क्रांतिकारी कम्युनिस्ट बन गए। इस समूह में गणेश घोष,लोकेनाथ बाल,अंबिका चक्रवर्ती,हरिगोपाल बाल (तेग्रा),अनंत सिंह,आनंद प्रसाद गुप्ता,त्रिपुरा सेन,बिधुभूषण भट्टाचार्य,प्रीतिलता वद्देदार,कल्पना दत्ता,हिमांशु सेन,बिनोद बिहारी चौधरी,सुबोध रॉय और मोनोरंजन भट्टाचार्य आदि शामिल थे। सूर्य सेन ने चटगाँव के दो मुख्य शस्त्रागार लूटने, टेलीग्राफ और टेलीफोन कार्यालय को नष्ट करने और यूरोपीय क्लब के सदस्यों,जिनमें से अधिकांश सरकारी या सैन्य अधिकारी थे जो भारत में ब्रिटिश राज को बनाए रखने में शामिल थे,को बंधक बनाने की योजना बनाई थी। आग्नेयास्त्रों के खुदरा विक्रेताओं पर भी हमले की योजना थी, इसके अलावा कलकत्ता से चटगांव को अलग करने के लिए रेल और संचार लाइनों को काटना था। चटगाँव के सरकारी बैंकों को लूटकर आगे के विद्रोह के लिए धन इकट्ठा किया जाना था और विभिन्न जेल में बन्द क्रांतिकारियों को मुक्त कराना था। 18 अप्रैल 1930, 10 बजे रात को योजना क्रियान्वित की गई। गणेश घोष की अगुआई में क्रांतिकारियों के एक समूह ने पुलिस शस्त्रागार (दंपारा में पुलिस लाइन में) कब्जा कर लिया, जबकि लोकेनाथ बाल के नेतृत्व में दस पुरुषों के एक समूह ने सहायक बल सेना (अब पुराना सर्किट हाउस) कब्जे में ले लिया।

📝 भारतीय रिपब्लिकन सेना,चटगाँव शाखा के नाम पर किए गए इस हमले में करीब 65 लोगों ने हिस्सा लिया था। इन लोगो ने गोला बारूद का पता लगाने में असफल रहे, हालांकि टेलीफोन और टेलीग्राफ तारों को काटने और ट्रेन की गतिविधियों में बाधा डालने में सफल रहे। लगभग 16 लोगों के एक समूह ने यूरोपीय क्लब के मुख्यालय (पहाड़ली में, अब शाहजहां फील्ड के बगल में रेलवे कार्यालय) पर कब्जा कर लिया,लेकिन गुड फ्राइडे होने के कारण,वहाँ केवल कुछ सदस्य ही मौजूद थे। स्थिति भांपते हुए,यूरोपियनों ने अलार्म बजा कर सैनिकों को सूचित कर दिया,जिसकी क्रांतिकारियों ने भी अपेक्षा नहीं की थी। छापे के बाद,सभी क्रांतिकारी पुलिस शस्त्रागार के बाहर इकट्ठा हुए,जहां सूर्य सेन ने सैन्य सलाम लिया और राष्ट्रीय ध्वज फहराया और एक अस्थायी क्रांतिकारी सरकार की घोषणा की। क्रांतिकारियों ने तड़के ही चटगांव शहर छोड़ दिया और छिपने के लिए एक सुरक्षित जगह की तलाश में चटगाँव पहाड़ी श्रृंखला की ओर बढ़ गये। गणेश घोष,अनंत सिंह,किशोर आनंद गुप्ता और जीबन घोषाल सहित कुछ अन्य सदस्य दूसरी ओर निकल गये और फेनी रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार होने वाले थे लेकिन वे भागने में कामयाब रहे। बाद में वे चंदनगर के एक घर में छिप कर रहने लगे। कुछ दिनों की सरगर्मी के बाद,पुलिस ने कुछ क्रांतिकारियों का पता लगा लिया। 22 अप्रैल 1930 की दोपहर को चटगाँव छावनी के पास जलालाबाद पहाड़ियों में आश्रय लिये हुए क्रांतिकारियों को कई हज़ार सैनिकों ने घेर लिया।

📝जलालाबाद पहाड़ियों में हुई गोलीबारी में 80 से ज्यादा सैनिक और 12 क्रांतिकारियों की मौत हो गई। सेन ने अपने लोगों को छोटे समूहों में बाट कर पड़ोसी गांवों में फैला दिया और उनमें से कुछ बच निकले। कुछ कलकत्ता चले गए जबकि कुछ गिरफ्तार कर लिए गए। इस घटना के प्रतिरोध पर क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिये एक तीव्र छापेमारी शुरू हुई। अनंत सिंह चन्दननगर में अपने छिपे हुए स्थान से कलकत्ता आकर आत्मसमर्पण कर दिया ताकि वे चटगाँव विद्रोह में पकड़े गये युवा किशोरों के साथ रह सके। कुछ महीने बाद,पुलिस आयुक्त चार्ल्स टेगार्ट ने छुपे हुए क्रांतिकारियो के स्थान को घेर लिया और गोलीबारी की। जनवरी 1932 में विद्रोह के दौरान और बाद में गिरफ्तार किए गए लोगों पर बड़े पैमाने पर मुकदमा चलाया गया और 1 मार्च 1932 को निर्णय दिया गया। प्रतिवादियों में से 12 लोगों को आजीवन निर्वासन की सजा सुनाई गई, दो को तीन साल की जेल की सजा मिली और शेष 32 व्यक्तियों को बरी कर दिया गया। 12 आजीवन निर्वासन दिये गये क्रांतिकारियों को अंडमान भेज दिया गया,उनमें गणेश घोष,लोकनाथ बाल, (1932 में) 16 वर्षीय आनन्द गुप्ता और अनन्त सिंह आदि शामिल थे। सन् 1946 में जेल से छूटने के बाद उन्होंने अधिकांश अपना जीवन राजनेता के रूप में व्यतीत किया। 16 अक्टूबर 1994 में कोलकाता में गणेश घोष का निधन हुआ। ऐसे महान योद्धाओं को भारत की मातृभूमि सेवा संस्था नमन करती है व आशा करती है की हम सभी की कोशिशों से हम भावी पीढ़ी को सम्वेदनशील व राष्ट्रहितेषी बनाने का संकल्प पूरा कर पाएँगे। 🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹

✍️ उर्वशी कश्यप, जिलाध्यक्ष, नई दिल्ली
🇮🇳 *मातृभूमि सेवा संस्था 9873473143* 🇮🇳

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