‘हिट एंड रन’ नये कानून के विरोध के पहले देखें सड़क पर मौतों के आंकड़े

Editorial:Look At The Number Of Deaths In Hit And Run Cases And You Will Also Say New Law For Road Accidents In Bns In Necessary
संपादकीयम:वो रौंदकर भाग जाते हैं और पता भी नहीं चलता! मौत के नंबर देख लीजिए, आप भी कहेंगे- हां, जरूरी है नया कानून

एक सवाल तो यह है कि सड़क दुर्घटनाओं में सजा के नए कानून का ट्रक ड्राइवर ही विरोध क्यों कर रहे हैं? भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के विशेष प्रावधान के विरोध के पीछे एक आंकड़ा है जो बताता है कि ज्यादातर हिट एंड रन केस में ट्रक और लॉरियां शामिल होती हैं।
मुख्य बिंदु
बीएनस की धारा 140 में सड़क दुर्घटना में सजा के प्रावधान का विरोध
ट्रक ड्राइवरों के तर्कों से सहमत हैं तो कुछ और बातें जाननी चाहिए
आंकड़े बताते हैं कि ज्यादातर हिट एंड रन के केस रात में सामने आते हैं
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में सड़क दुर्घटनाओं के लिए सजा के प्रावधान के खिलाफ ट्रक ड्राइवरों में रोष है। देशभर के ट्रक ड्राइवर बीएनएस की धारा 104 वापस लेने की मांग करते हुए हड़ताल पर चले गए थे। उनकी चिंता यह है कि सड़क दुर्घटना को 10 साल जेल की सजा का प्रावधान बहुत कठोर है जो ड्राइवरों का जीवन और उनके परिवार नष्ट कर देगा। हालांकि, सच्चाई कुछ और है। नया कानून कहता है कि अगर कोई ड्राइवर किसी को ठोकर मारकर भाग जाता है और घटना की रिपोर्टिंग नहीं करता है तब उसे 10 साल की सजा हो सकती है। अगर वह पुलिस को घटना की जानकारी खुद दे दे तो उसे 5 साल तक की ही सजा हो सकती है जिसका प्रावधान मौजूदा कानून में भी है। इस तथ्य को ध्यान में रखकर अगर नए कानून के प्रावधान परखें तो क्या आप कहेंगे कि यह गलत है?

पहले आंकड़े देखिए, फिर सोचिए

आइए, आपको इस सवाल का जवाब ढूंढने में थोड़ी और मदद करते हैं। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 में दिल्ली में सड़क दुर्घटनाओं से जितनी मौतें हुईं, उनमें 47% यानी करीब आधे मामलों में पता ही नहीं चल पाया है कि आखिर टक्कर किसने मारी? इसे ही हिट एंड रन केस कहते हैं- मारो और निकल लो। सोचिए, अगर ड्राइवर का जीवन और उसका परिवार है तो क्या दुर्घटना में जान गंवाने वालों के जीवन और परिवार का कोई महत्व नहीं? कानून सिर्फ यही कहता है कि अगर दुर्घटना हो गई है तो इसकी जानकारी पुलिस को दें ताकि पीड़ित के प्राण बचाने की कोशिश की जा सके। अगर ऐसा हुआ तो निश्चित रूप से सड़क दुर्घटना में मौतों की संख्या बहुत हद तक नीचे आ सकती है। तब कई जिंदगियां बच सकती हैं, कई परिवार एक झटके के बाद दोबारा उबर सकता है।

दिल्ली: सड़क दुर्घटना में 47% मौतें हिट एंड रन से!

आइए सड़क दुर्घटनाओं में मौतों पर थोड़ा विस्तार से बात करते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो 2002 में राजधानी दिल्ली में लगभग सड़क दुर्घटनाओं में आधी मौतों का कारण ऐसे वाहन होते हैं जिनका कभी पता ही नहीं चल पाता है। पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में दिल्ली में सड़क दुर्घटना में हुई मौतों में से 47% अज्ञात वाहनों से हुई थी। वहीं, कार या टैक्सी से 14% जबकि भारी वाहनों से दुर्घटनाओं में 12% मौतें हुई हैं। अज्ञात वाहनों ने उस साल 668 लोगों की जान ली और लगभग 1,104 को घायल कर दिया। 2023 के आंकड़े अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं, लेकिन माना जाता है कि वे लगभग समान स्तर पर हैं।

मैं पिछले 20 साल से सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में काम कर रहा हूं। मेरा मानना है कि यह नया कानून सड़क सुरक्षा की चिंताओं को कई तरह से प्रभावित करेगा। इससे निजी कंपनियां ज्यादा प्रशिक्षित और लाइसेंसधारी चालक रखेंगी और उनके लिए रिफ्रेशर कोर्स और स्वास्थ्य जांच की भी व्यवस्था करेंगी। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि अब चालक पीड़ित को सड़क पर नहीं छोड़ेंगे क्योंकि अगर वे दुर्घटना की सूचना देते हैं तो उन्हें कम सजा हो सकती है।
प्रिंस सिंघल, रोड सेफ्टी एक्सपर्ट

देश की स्थिति भी जान लीजिए
अब जरा पूरे देश का हाल देख लें। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2022 में सभी सड़क दुर्घटनाओं में टक्कर मारकर भागने के मामले करीब 15% थे। यानी हर 100 दुर्घटनाओं में से 15 में टक्कर मारने वाले वाहन का पता ही नहीं चला। हिट एंड रन केस में मौतों की बात करें तो यह आंकड़ा 18% है। आइए कुछ ऐसे सवालों के जवाब भी जान लें जो आपके मन में भी उठ सकते हैं।

क्या सड़क दुर्घटनाओं का ये सबसे बड़ा कारण है?


नहीं, भारत में सड़क दुर्घटनाओं के कई कारण होते हैं.। सामने से टक्कर, पीछे से टक्कर, साइड से टक्कर, ओवरस्पीडिंग, नशे में गाड़ी चलाना- ये सब भी बड़े कारण हैं। टक्कर मारकर भागना सड़क दुर्घटनाओं का पांचवां सबसे बड़ा कारण है और मौतों का दूसरा सबसे बड़ा कारण है।
लेकिन सड़क पर सबसे ज्यादा आतंक कौन फैलता है?
आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा डर ट्रक-लॉरी से लगाता है। सच भी यही है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दुर्घटनाओं में सबसे ज्यादा दोपहिया वाहन शामिल होते हैं। सबसे ज्यादा टक्कर दोपहिया वाहनों में ही होती है। ट्रक-लॉरी के ज्यादातर शिकार दोपहिया वाहन ही होते हैं।

क्या टक्कर मारकर भागने वालों को सजा नहीं मिलती?

अगर मामला अदालत तक पहुंचे तो मिलती है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि हिट एंड रन केस में जो ट्रायल पूरा हो जाते हैं, उनमें करीब 47.9% में सजा होती है। ये दर दूसरी दुर्घटनाओं से काफी ज्यादा है। हत्या और गैर-इरादतन हत्या जैसे गंभीर मामलों में सजा की दर क्रमशः 44% और 39% ही है। हालांकि ये भी जानना जरूरी है कि हिट एंड रन के 90% से ज्यादा केस सालभर तक कोर्ट में ही पेंडिंग रह जाते हैं। यही स्थिति दूसरे गंभीर अपराधों की भी है।
लेकिन टक्कर मारकर भागने के मामलों में पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने में क्यों ज्यादा दिक्कत होती है?
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2022 में हिट एंड रन को जो मामले पुलिस ने सुलझाए, उनमें से सिर्फ 66.4% में चार्जशीट दाखिल हो पाई। ये दर हत्या के मामलों में 81.5%, गैर-इरादतन हत्या में 84% और दूसरी दुर्घटनाओं में 79.6% से कम है। टक्कर मारकर भागने के मामलों में चार्जशीट ना बनने का सबसे बड़ा कारण सबूत ना मिलना है। पुलिस को भले ही लगे कि मामला सही है, लेकिन अगर सबूत ना हों तो वो चार्जशीट नहीं दाखिल कर सकती। 2022 में ऐसे मामलों का प्रतिशत 28% था, जो दूसरी दुर्घटनाओं के मुकाबले काफी ज्यादा है।

हिट एंड रन केस का पता लगाना बड़ी चुनौती

इसका मतलब ये हुआ कि टक्कर मारकर भागने वाले को पकड़ पाना, सबूत जुटाना और चार्जशीट बनाना पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती है। यही एक बड़ा कारण है जिसके चलते सरकार ने नया कानून बनाने का फैसला किया है। पुलिस का कहना है कि नंबर प्लेट खराब या धुंधला हो तो वाहन का पता लगाना भी मुश्किल हो जाता है। ऊपर से प्रत्यक्षदर्शी भी पुलिस को जानकारी देने से हिचकते हैं। वैसे भी, हिट एंड रन के ज्यादातर मामले रात में होते हैं जब प्रत्यक्षदर्शी कम ही होते हैं। सड़कों पर सीसीटीवी कैमरों की कमी से जांच और भी मुश्किल हो जाती है।

पुलिस की भारी कमी, फिर सही जांच कैसे हो?

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की जगह ले रही भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में दुर्घटनाओं के बाद भाग खड़े होने वाले ड्राइवरों को 10 साल तक की जेल और 7 लाख रुपये तक अर्थदंड हो सकता है। हालांकि, दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ रोड ट्रैफिक एजुकेशन के अध्यक्ष डॉक्टर रोहित बाजलुजा का मानना है कि इस कानून को पूरी तरह लागू करना मुश्किल होगा। उनका कहना है कि ‘बिना उचित तैयारी और साधनों के कानून बनाना खतरनाक है। यह किसी को हथियार देकर उसे अपनी मर्जी से इस्तेमाल करने की अनुमति जैसा है।’ वे कहते हैं, ‘दिल्ली में ही लगभग 80 हजार पुलिसकर्मी हैं, जिनमें से 5,000 ट्रैफिक पुलिस में हैं। अब इतने कम पुलिसकर्मियों से इतने सारे वाहनों और इतने बड़े क्षेत्र पर निगरानी रखना और सभी कानून तोड़ने वालों पर कार्रवाई करना लगभग असंभव है।’

नए कानून से चीजें सुधरने के आसार

लेकिन, सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ प्रिंस सिंघल का मानना है कि यह नया कानून सड़क सुरक्षा में बड़ा बदलाव लाएगा। वे कहते हैं, ‘ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब चालक पीड़ित को सड़क पर नहीं छोड़ेंगे क्योंकि अगर वे दुर्घटना की सूचना देते हैं तो उन्हें कम सजा हो सकती है।’

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