नागा शांति समझौताः जो मोदी को इतिहास में हमेशा को दर्ज कर सकता हैं

हॉर्नबिल फेस्टिवल में भाग लेता एक नागा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. दोनों को नागा शांति समझौते से बहुत उम्मीदें हैं.

समझौते में बाधा है सीमा और झंडे की जिद ! भारत सरकार और नागा गुटों (खासतौर पर NSCN (IM)) के बीच शांति समझौता बस होने को है. इस समझौते को लेकर पूर्वोत्तर में लोग उत्साहित भी हैं और थोड़े नर्वस भी. सब ठीक रहा तो ये दुनिया की सबसे लंबे समय से चली आ रही इंसरजेंसी का अंत कर देगा. हम नागा आंदोलन का पूरा इतिहास टटोलकर इस समझौते की अहमियत समझने की कोशिश कर रहे हैं.

‘इंसरजेंसी’ या ‘उग्रवाद’ शब्द सुनते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले कश्मीर का नाम आता है. सेना वहां दिन-रात अभियान चलाती है, लेकिन मुसीबत जड़ से खत्म नहीं हो रही. लेकिन अगर आपको ये बताया जाए कि हिंदुस्तान की सबसे पुरानी और खूंखार इंसरजेंसी कश्मीर में नहीं, वहां से 2000 किलोमीटर दूर नागलैंड में है, तो? नागा इंसरजेंसी भारत ही नहीं, दुनिया की सबसे पुरानी इंसरजेंसी है. जो भारत के आज़ाद होने से पहले से चली आ रही है. एक ‘आज़ाद नागालैंड’ की मांग के साथ शुरू हुई नागा इंसरजेंसी से बड़ी और स्पष्ट चुनौती की मिसाल आज़ाद भारत के इतिहास में कहीं नहीं मिलती. लेकिन हो सकता है कि अब ये सब बदले. केंद्र सरकार और नागा गुटों के बीच समझौता बस होने को है. उम्मीद की जा रही है कि मॉनसून से पहले दोनों पक्ष इसपर राज़ी हो जाएंगे. आम भाषा में इसे नागा अकॉर्ड या नागा पीस अकॉर्ड कहा जा रहा है – माने नागा शांति समझौता.

इस समझौते की अहमियत का अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि अगर ये हो जाता है, तो लाखों लोगों की ज़िंदगी पटरी पर लौट आएगी. ये मॉडल उन जगहों के लिए नज़ीर बन जाएगा, जहां अलगाववाद के लक्षण हैं. ऐसा हो गया, तो नरेंद्र मोदी देश के इतिहास में हमेशा के लिए अपनी एक जगह बना लेंगे. इसलिए नागा अकॉर्ड को लेकर बहुत उत्सुकता है. नागा अकॉर्ड को समझने के लिए ज़रूरी है कि हम पहले नागा इंसरजेंसी को समझें. और नागा इंसरजेंसी समझने के लिए हमें घड़ी पीछे घुमानी पड़ेगी. बहुत पीछे.

नागा जनजातियां लड़ाका थीं. इसलिए अंग्रेज़ों को इनसे जीतने में पसीना आ गया. (हॉर्नबिल फेस्टिवल, इंडिया टुडे आर्काइव)

नागाः जो अंग्रेज़ों का सर उतार लेना चाहते थे

अंग्रेज़ हिंदुस्तान आए, तो पहले मैदान पर चले. फिर वो पूरब में पहाड़ों की तरफ बढ़े. 1826 में वो पहुंचे असम. लेकिन उनको चैन नहीं आया. वो संसाधनों को हथियाने के चक्कर में और आगे गए, जंगलों-पहाड़ों की तरफ. और इस तरह वो पहुंचे उस इलाके में, जिसे नागा हिल्स कहा जाता है. इलाके का नाम पड़ा था उन जनजातियों के नाम पर, जो उस इलाके में बसती थीं. नागा एक अकेली कौम का नाम नहीं है. ये जनजातियों का एक समूह है. हर जनजाति अपने-आप में अनोखी होती है, लेकिन कुछ चीज़ें इन्हें ‘नागा’ पहचान में बांधती हैं. मिसाल के लिए एक वक्त था जब कई नागा कबीलों में सिर उतार लेने की परंपरा थी. एक नागा के लिए अपने दुश्मन का सिर उतार लेने से ज़्यादा वीरता वाली कोई और बात नहीं होती थी. इस परंपरा से अंग्रेज़ बहुत खौफ खाते थे. इलाके को काबू में लाने के लिए ही कोहिमा में अंग्रेज़ों ने छावनी बनाई थी. कोहिमा आज नागालैंड की राजधानी है. 1881 में नागा हिल्स आधिकारिक रूप से गुलाम भारत का हिस्सा बन गए थे.

लेकिन अंग्रेज़ों के दावे को नागाओं ने कभी माना नहीं. बड़ी लड़ाइयां छिट-पुट झड़पों में बदलीं, लेकिन बंद नहीं हुईं. 1918 में नागा क्लब बना, जिसने 1929 में आए साइमन कमीशन से कहा,

‘हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया जाए. हम पुराने वक्त में जैसे रहते आए थे, वैसे ही रहना चाहते हैं’

नेहरू के साथ रानी गाइदिनलू. रानी ने अंग्रेज़ों के खिलाफ नागा संघर्ष का नेतृत्व किया था (फोटो: ओरिएंटल पोस्ट)

आज़ाद भारत में इंसरजेंसी की शुरुआत
1946 में नागा नेता अंगामी ज़ापू फिज़ो ने नागा नेशनल काउंसिल (NNC) बनाया. पहले NNC की मांग ये थी कि नागा हिल्स भारत में रहें, लेकिन उन्हें स्वायत्ता दे दी जाए. लेकिन जब अंग्रेज़ भारत से जाने को हुआ, तब देश की और रियासतों की तरह ही नागा गुटों ने भी आज़ाद भारत से अलग रहने की ख्वाहिश जता दी. उन दिनों नागा मुद्दों पर ज़्यादा बात होती नहीं थी. सबका ध्यान पाकिस्तान बनने पर था. एक बात और थी. कांग्रेस चाहती थी कि अंग्रेज़ पूरा इलाका आज़ाद भारत की सरकार के सुपुर्द करके जाएं. वो पूरा इलाका, जो उनके पास था. इसमें नागा इलाके भी आते थे. बावजूद इसके, नागा अपनी मांग पर अड़े रहे. 14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान ने खुद को हिंदुस्तान से अलग मुल्क घोषित कर दिया. पाकिस्तान बनने के शोर में ये बात दब गई कि इसी दिन NNC ने भी नागलैंड को एक आज़ाद मुल्क घोषित कर दिया था. भारत ने पाकिस्तान को बतौर मुल्क मान्यता दी. नागालैंड को न मान्यता मिली, न ज़्यादा ध्यान दिया गया.

लेकिन NNC ध्यान खींचने वाले काम लगातार कर रहा था. अंग्रेज़ों के वक्त शुरू हुई छिट-पुट हिंसा दिन-ब-दिन बढ़ रही थी. तो असम सरकार ने उन नागा गुटों से बात करनी शुरू की, जिन्हें बंदूक चलाने के अलावा बातचीत करने में भी रुचि थी. 29 जून, 1947 को असम के गवर्नर और नागा नेता टी सखरी और अलीबा इम्ति के बीच एक समझौता हुआ. इस समझौते में 9 बिंदु थे. फिज़ो इस समझौते का हिस्सा नहीं बने और उन्होंने 9 के 9 बिंदुओं को शिफ्ट डिलीट कर दिया. माने खारिज.

अंगामी ज़ापू फिज़ो आधुनिक नागा आंदोलन के जनक थे.

इसके बाद फिज़ो अपने काम में लग गए. भारत के गणतंत्र घोषित होने के एक साल बाद और पहले आम चुनाव से एक साल पहले, यानी 1951 में नागा गुटों ने (जिनमें NNC सबसे आगे था) नागालैंड में एक रेफरेंडम करवा लिया. माने रायशुमारी. राय ये कि ‘हम हिंदुस्तान से अलग एक आज़ाद मुल्क बने रहना चाहते हैं.’ नागा गुट कहते हैं कि इस रेफरेंडम में 99 फीसद लोगों ने ‘आज़ाद नागालैंड’ के पक्ष में वोट डाला था. भारत सरकार (माने नेहरू जी) ने इस रेफरेंडम को मानने से इनकार कर दिया. आधिकारिक तौर पर नागा इलाके असम का हिस्सा थे.

तो फिज़ो एक कदम और आगे बढ़े. 22 मार्च, 1956 को उन्होंने नागा फेडरल गवर्नमेंट (NFG)बनाई. ये नागाओं की अंडरग्राउंड सरकार थी. अंडरग्राउंड इसलिए कि ग्राउंड के ऊपर तो भारत सरकार थी और एक ग्राउंड पर एक ही सरकार चल सकती है. लेकिन भारत को NFG से समस्या नहीं थी. समस्या थी नागा फेडरल आर्मी (NFA) से, जो NFG को रिपोर्ट करती थी. और NFA का ज़िंदगी में एक्कै मकसद था – नागालैंड को भारत से तोड़कर अलग मुल्क बनाना. वो भी बंदूक के दम पर. लेकिन बंदूकें तो भारत के पास भी थीं. इसीलिए NFA से निपटने का काम मिला भारत की फौज को. अप्रैल 1956 में फौज ने नागालैंड में कार्रवाई शुरू कर दी. NFA पर दबाव बना. फिज़ो को साल खत्म होने से पहले जान बचाकर पूर्वी पाकिस्तान में छिपना पड़ा.

नागा फेडरल गवमेंट के अधिकारियों के साथ नागा आर्मी के लड़ाके. (फोटोः एनएनसी)

नागाओं के चुत्सपा का जवाब आफ्सपा
जब फौज नागालैंड गई, तो ये किसी ने नहीं सोचा था कि नागा गुट कुछ महीनों या फिर साल-दो साल से ज़्यादा टिक पाएंगे. आखिर ये वही फौज थी, जो कुछ ही साल पहले दूसरे महायुद्ध में दुनियाभर में लड़कर लौटी थी. ब्रिटेन कभी न जीत पाता अगर उसके पास हिंदुस्तान की फौज न होती. लेकिन नागा गुट और NFA टिके. नागा इलाकों के पहाड़ों और जंगलों में छापामार लड़ाई जीतना बेहद मुश्किल था. कई इलाकों के तो नक्शे भी नहीं थे. फौज भेजने के दो साल बीतने के बाद भारत सरकार का धीरज कुछ टूटा और ये तय पाया गया कि फौज को नागा गुटों के चुत्सपा (भयंकर दुस्साहस) से निपटने के लिए ज़्यादा अधिकारों की ज़रूरत है. तो 1958 में आया चुत्सपा का जवाब AFSPA – आर्म्ड फोर्सेस (स्पेशल पावर्स) ऐक्ट. जी हां, AFSPA कश्मीर नहीं, नागा हिल्स (नागालैंड) के लिए लाया गया था. AFSPA के आने के बाद नागा गुटों पर दबाव बढ़ा, तो फिज़ो 1960 में पूर्वी पाकिस्तान छोड़कर लंदन चले गए.

लेकिन सेना इस मुश्किल का हल नहीं निकाल पाई. इसी वजह से इलाके के लोगों को और ज्यादा हक देकर शांत करने की कोशिश हुई. 1963 में नागा हिल्स (जो तब असम राज्य का एक ज़िला थे) और त्यूएनसांग (जो तब नेफा का हिस्सा था) को मिलाकर नागालैंड राज्य बना दिया गया. 1964 में नागालैंड विधानसभा के लिए चुनाव भी करा लिए गए. नागा जनजातियों का दिल जीतने के लिए केंद्र ने नागालैंड को कई मामलों में छूट दी. देश के संविधान में संशोधन करके आर्टिकल 371 A जोड़ा गया. इसके मुताबिक केंद्र का बनाया कोई भी कानून अगर नागा परंपराओं (माने नागाओं के धार्मिक-सामाजिक नियम, उनके रहन-सहन और पारंपरिक कानून) से संबंधित हुआ, तो वो राज्य में तभी लागू होगा जब नागालैंड की विधानसभा बहुमत से उसे पास कर देगी (इसी व्यवस्था के चलते नागालैंड में नगरीय निकाय चुनावों में औरतों को 33 % आरक्षण देने में समस्या आ रही है. नागा जनजातियों में औरतों का राजनीति में उतरना ठीक नहीं समझा जाता).

नागालैंड राज्य के पहले मुख्यमंत्री पी शिलू ओ.

नागाओं में भारत के प्रति भरोसे का माहौल तैयार करने के लिए 1964 के अप्रैल में जयप्रकाश नारायण, असम के तब के मुख्यमंत्री रहे बिमला प्रसाद चलिहा और रेवरेंड माइकल स्कॉट का एक ‘शांति मिशन’ नागालैंड भेजा गया. एक ईसाई धर्मगुरु (रेवरेंड) इस मिशन का हिस्सा इसलिए थे कि नागा जनजातियों ने बड़े पैमाने पर मिशनरियों के प्रभाव में आकर ईसाई धर्म अपना लिया था. खैर, 1964 के सितंबर में ये शांति मिशन किसी तरह NNC और सरकार के बीच समझौता करवाने में कामयाब हो गया. समझौता ये कि दोनों पक्ष अपने-अपने बंदूक संदूक में पटक देंगे. NNC ने हथियार संदूक में रखे तो सही, लेकिन उन पर ताला नहीं मारा. संदूकों की चिटकनी कभी भी खोल दी जाती और बंदूकें बाहर आ जातीं. और बंदूक से जब गोली बाहर आती, वो लगती हमारी फौज के सीने पर.

तीन साल तक फौज ने इसकी शिकायत सरकार से की. सरकार ने ये शिकायत NNC से की. छह दौर की बातचीत हुई. लेकिन NNC के पास कहने को यही था – ‘लड़के हैं, गलती हो जाती है’. आजिज़ आकर भारत सरकार ने भी NNC से वो कह दिया, जो कभी परशुराम ने लक्ष्मण से कहा था- ‘बाल बिलोकि बहुत मैं बांचा.’ इस लाइन का मतलब है कि बच्चा समझकर मैंने बहुत छोड़ दिया तुमको, अब बताता हूं. भारत सरकार ने अपने संदूक का ताला खोला. हथियार बाहर निकालकर संदूक में पीस मिशन को डाल दिया गया. 1967 में भारतीय सेना ने नागा गुटों के खिलाफ ज़बरदस्त कार्रवाई शुरू कर दी. फोकस रहा NNC, NFG और NFA पर.

1973 में नागालैंड गवर्नर बीके नेहरू के सामने आत्मसमर्पण करते नागा लड़ाके. (फोटोः पीआईबी)

इस ज़बरदस्त कार्रवाई से NNC का नुकसान तो हुआ, लेकिन खून के छींटे भारत सरकार की कमीज़ पर भी पड़े. आम नागाओं ने बंदूक पकड़े फौजी को ही भारत सरकार समझ लिया. छवि के स्तर पर ये एक बहुत बड़ा नुकसान था. कार्रवाई में जो नागा मारे गए, उनके परिजनों के लिए खुद को भारतीय कहना मुश्किल होता गया. इसीलिए भारत सरकार ने अपने संदूक को दोबारा खोला और शांति समझौता करने की कोशिशें शुरू कीं. इंदिरा गांधी के ज़माने में ये कोशिशें रंग लाईं 11 नवंबर, 1975 को. इस दिन शिलॉन्ग में भारत सरकार ने NNC और NFG के साथ एक समझौता कर लिया. समझौता पिछली बार जैसा ही था. बंदूक संदूक के अंदर, टोटल शांति. शांति के बदले में नागा गुटों को भारत के संविधान को बिना शर्त मानना था. भारत का संविधान माने भारत की अखंडता. फिज़ो शांत रहे, कुछ बोले नहीं. लेकिन NNC और NFG का एक धड़ा इस समझौते से साफ दूर हो गया. तकरीबन 2,775 किलोमीटर. ये शिलॉन्ग से पेइचिंग की दूरी है. NNC के मेंबर थुइनगालेंग मुइवा समझौते के वक्त चीन में थे. इन्होंने NNC और NFG के तकरीबन 140 सदस्यों के साथ शिलॉन्ग अकॉर्ड को ठेंगा दिखा दिया. चीन की सरकार उस वक्त नागा गुटों को भारत से अलग होने में मदद करती थी. पैसे से, हथियार से और बाकी मोटिवेशन.

थुइनगालेंग मुइवा. एनएससीएन के दो बड़े नेताओं में से एक. (फोटोःपीटीआई)

इसी चाइना मेड धड़े ने 1980 में नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड NSCN बनाया. नाम में ‘सोशलिस्ट’ रखने वाला ये गुट सोशलिज़म से ज़्यादा हिंसक तरीके से ‘आज़ादी’ हथियाने में विश्वास रखता था. इसी गुट में इसाक चिसी स्वु और एसएस खापलांग (जिन्होंने 1974 में ही ईस्टर्न नागा रेवॉल्यूश्नरी काउंसिल नाम का अपना उग्रवादी संगठन NNC में मिलाया था) भी जा मिले. NSCN के आने के बाद नागालैंड में इंसरजेंसी को नई धार मिली. बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हुई. लेकिन इस धार ने आठ साल में NSCN को ही काट दिया. खापलांग ने NSCN से अलग होकर NSCN (K) बना लिया. ‘K’ फॉर खापलांग. खापलांग के जाने के बाद जो NSCN बचा, वो कहलाया NSCN (IM). ‘I’ फॉर इसाक और ‘M’ फॉर मुइवा. NSCN के बनने के बाद NNC नेपथ्य में चला गया. फिज़ो 1991 में जब मरे, तो अपने देस से बहुत दूर, लंदन में थे.

NSCN (IM) ने ‘ग्रेटर नागालिम’ की मांग को ज़ोर-शोर से उठाया. ग्रेटर नागालिम माने वो पूरी ज़मीन, जिसपर नागा बसते हों. इसमें आज के नागालैंड सहित अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, असम और म्यांमार के इलाके आते हैं. इस मांग के लिए NSCN (IM) ने नागा इंसरजेंसी इतनी शिद्दत से लड़ी कि पूरे पूर्वोत्तर में वो उग्रवाद का दूसरा नाम बन गया.

इसाक चिशी स्वु, एनएससीएन का दूसरा बड़ा नाम. (फोटोः इंडिया टुडे आर्काइव)

इसलिए भारत सरकार जब भी नागा गुटों से बात करती, उसकी कोशिश रहती कि NSCN (IM) ज़रूर उसमें शामिल हो. इसमें पहली कामयाबी मिली तब, जब एमएम थॉमस नागालैंड के गवर्नर बनाए गए. थॉमस केरल से थे और ईसाई चर्च से जुड़े हुए थे. इसलिए नागा गुटों ने उनपर भरोसा किया. अब तक इसाक चिसी स्वु और थुइनगालेंग मुइवा विदेश निकल लिए थे. तो नरसिम्हा राव 1995 में इनसे पैरिस में मिले. दो साल बाद ज़्यूरिक में ये दोनों एचडी देवगौड़ा से मिले. लेकिन NSCN (IM) की किसी भारतीय प्रधानमंत्री से सबसे ज़्यादा पटी, तो वो थे अटल बिहारी वाजपेयी, जिनसे इसाक चिसी स्वु और थुइनगालेंग मुइवा 1998 में पैरिस में मिले थे. अटल वो पहले नेता थे, जिन्होंने बतौर ‘भारत संघ के प्रधानमंत्री’ नागाओं की अलहदा पहचान और इतिहास का ज़िक्र किया. साथ ही अटल ने ये माना कि इंसरजेंसी कुचलने में फौज से कुछ गलतियां भी हुईं. अपनी पहचान को लेकर भावुक और लंबे समय से बंदूक के साये में जी रहे नागाओं को ये बात बहुत पसंद आई.

अटल बिहारी वाजपेयी नागा गुटों के पसंदीदा भारतीय प्रधानमंत्री रहे. (फोटोः टेलिग्राफ)

NSCN (IM) ने भारत सरकार के साथ पहला सीज़फायर समझौता किया था 1997 में. ये नागा इंसरजेंसी के इतिहास के सबसे बड़े पड़ावों में से एक था. इसी के बाद कैंप हेब्रॉन बना. लेकिन उसकी बात बाद में. 1997 के बाद से NSCN (IM) ने लगातार सरकार से बातचीत की है. बातचीत के लगभग हर राउंड के बाद सीज़फायर की मियाद बढ़ी. जुलाई 2007 में NSCN (IM) ने भारत सरकार के साथ सीज़फायर को बेमियादी तौर पर बढ़ा दिया. बंदूकें शांत पड़ने के बाद सबसे बड़ा समझौता हुआ 3 अगस्त 2015 में. ये नागा पीस अकॉर्ड (नागा शांति समझौता) का फ्रेमवर्क ऑफ अग्रीमेंट था. माने समझौता किन शर्तों पर होगा, उसका मोटा-माटी ब्योरा. ढाई साल पहले हुए इस समझौते की ज़्यादातर जानकारी गोपनीय रखी गई क्योंकि कुछ मुद्दों पर सरकार और NSCN (IM) में पट नहीं रही थी. और बात सिर्फ NSCN (IM) की भी नहीं थी. NSCN (IM)के अलावा नागालैंड में कम से कम छह और हथियारबंद उग्रवादी संगठन हैं, जिन्हें सरकार पीस अकॉर्ड का हिस्सा बनाना चाहती है. इन छह संगठनों के प्रतिनिधि संगठन हैं, जो नागा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स (NNPG)कहलाते हैं. लेकिन अब, जब समझौते की ज़्यादातर बातों पर सभी पक्षों में एक राय हो चली है, तो कुछ बातें साफ होने लगी हैं –

* सरकार NSCN (IM) समेत सात गुटों से बात कर रही है, लेकिन समझौता वो एक ही करेगी. इसका एक पक्ष भारत सरकार होगा और दूसरा, सारे नागा गुट.
* भारत के संविधान में निहित संप्रभुता के भाव को सभी पक्ष मान्यता देंगे. माने भारत से अलग होने की मांग का दी एंड. नागा मानें लेंगे कि वो भारतीय हैं.
* नागा गुट अपने हथियार संदूक में डालेंगे. वंस ऐंड फॉर ऑल. हथियार चाहने वाले लड़ाकों के लिए सेना और पुलिस में जाने का विकल्प रहेगा. जो इनके योग्य नहीं होंगे, उनके पुनर्वास के लिए कुछ और जुगाड़ किया जाएगा. पुनर्वास का एक मतलब ये भी है कि सरकार इन लड़ाकों से मिल्ली कर लेगी. माने सरकार इनकी बगावत और उसके चलते हुई हिंसा को बड़ा दिल करके माफ कर देगी.

समझौते के बाद नागालैंड विधानसभा का स्वरूप भी कुछ बदलेगा. (फोटोः कांग्ला ऑनलाइन)

* नागा गुट हथियार डालेंगे, तो भारत की फौज भी अपनी छावनियों में लौट जाएगी. AFSPA हटा लिया जाएगा. सेना ज़रूरी होने पर ही दखल देगी और उसी तरह जैसे वो गुजरात या उत्तर प्रदेश में देती है. माने ऑन डिमांड ओनली.
* नागालैंड राज्य की सीमाओं में कोई बदलाव नहीं होगा. ये नागा अकॉर्ड का वो हिस्सा है, जिसे लेकर पड़ोसी राज्य थोड़े नर्वस हैं. खास तौर पर मणिपुर.
* मणिपुर और अरुणाचल के नागा बहुल इलाकों में नागा टेरेटोरियल काउंसिल बनाए जाएंगे. ये काउंसिल स्वायत्त होंगे, माने राज्य सरकार के अधीन नहीं होंगे. लेकिन काउंसिल की शक्तियां राज्य सरकार के अधिकारों से समझौता करने वाली नहीं होंगी. असम के नागा बहुल इलाकों में ये काउंसिल नहीं बनेंगी.
* एक ऐसी संस्था भी बनाई जाएगी जो अलग-अलग राज्य में बसे नागाओं के सांस्कृतिक प्लेटफॉर्म का काम करेगी. इस संस्था में नागा जनजातियों के प्रतिनिधि बैठेंगे और ये राजनीति से दूर रहेगी.
* नागालैंड विधानसभा में दूसरा सदन बनाया जाएगा. माने उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार की तरह विधान परिषद जैसा कुछ. विधानसभा में सीटों की संख्या भी बढ़ाई जाएंगी.
* अभी नागालैंड से सिर्फ एक-एक सांसद लोकसभा और राज्यसभा भेजा जाता है. इसे बढ़ाया जाएगा. कहां और कितना, ये फिलहाल साफ नहीं है.
* भारत के संघीय ढांचे के तहत राज्य की ताकत बढ़ाने पर काम होगा. केंद्र नागालैंड को ध्यान में रखकर खासतौर पर योजनाएं और संस्थाएं बनाएगा.

नागा गुट अलग झंडे की मांग आसानी से नहीं छोड़ेंगे (फोटोः नॉर्थईस्ट टुडे)

ये सब तो मीठी-मीठी बातें हैं, एक मुद्दा अब भी ऐसा है, जिसपर दोनों पक्ष फिलहाल एक राय नहीं है. वो है अलग झंडा. नागा गुट राज्य के लिए अलग झंडा चाहते हैं. जैसा जम्मू-कश्मीर का है (और कर्नाटक का हो सकता है). झंडा पहचान का सबसे प्रत्यक्ष प्रमाण होता है. इसलिए नागा गुट अलग झंडे की मांग को आसानी से नहीं छोड़ेंगे. केंद्र के नज़रिए से देखें तो ये पहचान का खेल ही टंटे की जड़ है. इसलिए केंद्र इस मांग को टाल जाना चाहता है.

अब तक अटका रहा शांति समझौता अब कैसे हो रहा है?
NSCN (IM) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वाजपेयी के वारिस की तरह देखता है. मोदी वाजपेयी की तरह ही संघ से आते हैं और संघ दशकों से पूर्वोत्तर को ‘मुख्यधारा’ से जोड़ने के ज़मीनी कामों लगा हुआ है. पीबी आचार्य (जो नागालैंड के हालिया गवर्नर हैं) संघ के लिए पूर्वोत्तर में ही काम करते थे. नागालैंड में फिलहाल टीआर ज़ीलियांग की नागा पीपल्स फ्रंट (NPF) सरकार है, जो एनडीए का हिस्सा है. एनडीए माने भाजपा. माने वो पार्टी जो मणिपुर और अरुणाचल में सरकार चला रही है और केंद्र में भी है. नागा वार्ता में यही सारे पक्ष हैं. इन सब जगहों पर एक ही पार्टी की मौजूदगी नागा गुटों को बातचीत को लेकर कुछ आश्वस्त करती है. एक बात और है. फौज के लगातार चले अभियानों ने नागालैंड में रहकर इंसरजेंसी जारी रखना पहले से कहीं मुश्किल कर दिया है. सीमाएं सील हैं या तेज़ी से की जा रही हैं. तो विदेशी मदद मिलने के रास्ते कम हो रहे हैं. NSCN(K) म्यांमार के जंगलों से अब भी इंसरजेसी चला रहा है. मगर इस बात ने उसे भारतीय फौज के साथ ही म्यांमार की सरकार का भी दुश्मन बना दिया है. म्यांमार की सरकार भारत से बैर रखने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती है. इसीलिए नागा गुट चाहते हैं कि भारत सरकार से समझौता कर ही लिया जाए. बस ज़ोर इस बात पर रहे कि ज़्यादा से ज़्यादा बातें मनवा ली जाएं.

सेना के म्यांमार के भीतर जाकर नागा गुटों पर कार्रवाई करने से नागा उग्रवाद की कमर टूट गई है.

कब तक फाइनल होगा मामला?
तारीख देना मुश्किल है, लेकिन समझौता होगा जल्द ही. मॉनसून सत्र से पहले ही. इसलिए कि समझौते के जिन हिस्सों के लिए संविधान संशोधन की ज़रूरत पड़नी है, वो आम चुनाव से पहले सदन में पास करा लिए जाएं. आम चुनाव से पहले इसलिए कि नागालैंड में चुनाव आने पर माहौल गड़बड़ा जाता है. चुनाव प्रक्रिया को ऐसे देखा जाता है, जैसे उसके ज़रिए भारत नागाओं पर अपनी पकड़ मज़बूत करना चाहता हो. वहां ‘इलेक्शन’ और ‘सॉल्यूशन’ की बात होती है. इलेक्शन भारत की गुलामी है और सॉल्यूशन ‘नागा आज़ादी’ का रास्ता. फरवरी 2018 में हुए विधानसभा चुनाव के वक्त नागा गुटों ने चुनाव के बहिष्कार का ऐलान कर दिया था. इस बहिष्कार में सबसे आगे था NSCN(IM). किसी तरह चुनाव करवाए गए थे. तो केंद्र नागाओं को भारत के संविधान के मुताबिक सॉल्यूशन दे देना चाहती है. ताकि इलेक्शन बिना किसी समस्या के हो जाएं. अकॉर्ड साइन होने के बाद हुआ एक भी निष्पक्ष चुनाव पूरी दुनिया की नज़र में भारत का पक्ष मज़बूत कर देगा.

मणिपुर में क्यों शंका का माहौल है?
पूर्वोत्तर में जिस तरह ज़मीन पर लकीरें खींचकर राज्य बना दिए गए हैं, वो कई जगह इलाके की डेमोग्रैफी से मेल नहीं खाता. पूर्वोत्तर में जनजातियां बस अपने नाम से बने राज्यों में नहीं रहतीं. जैसे मध्य प्रदेश में भी मराठी रहते हैं, उसी तरह मणिपुर में भी नागा जनजातियों के लोग रहते हैं. खासकर मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में.

नागा गुट खुलेआम फौज बनाकर घूमते हैं. इससे पड़ोसी राज्यों की शांति पर असर पड़ता है.

नागा गुट लंबे समय से इन इलाकों को ‘ग्रेटर नागालैंड’ का हिस्सा मानते आए हैं. दूसरी तरफ इंफाल घाटी में मैतेई जनजाति के लोग ज़्यादा रहते हैं, जो मणिपुर राज्य में बहुसंख्या में हैं. इंफाल घाटी और पहाड़ी जिलों में लंबे समय से वर्चस्व की लड़ाई जारी है. इसी के चलते 1981, 1992, 1996 और 1998 में नागा गुटों और मणिपुर सरकार के बीच मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (एमओयू) साइन हुए थे. इनमें ‘नागा लोगों की एक इंच भी ज़मीन को हाथ न लगाने की बात की गई थी’.

पूर्वोत्तर की सभी जनजातियां (माने नागा और मैतेई भी) अपनी संस्कृति और ज़मीन को लेकर बहुत भावुक हैं. ये भावुकता कई बार टकराव और हिंसा में तब्दील हो जाती है. हाल में इस टकराव की मिसाल हमने तब देखी, जब 2016 के अंत में मणिपुर की ओकराम इबोबी सिंह ने इन पहाड़ी इलाकों में 7 नए ज़िले बनाए थे. तब नागा गुटों ने बाकायदा धमकी देकर मणिपुर बंद करवा दिया था. इस दौरान मणिपुर में जमकर हिंसा हुई और राज्य एक महीने से ज़्यादा समय तक देश से कटा हुआ था.

नागा गुटों से सीज़फायर के जवाब में मणिपुर विधानसभा में हुई आगज़नी.

इसीलिए नागा गुटों के साथ केंद्र की किसी भी डील पर मणिपुर की बेहद बारीक नज़र रहती है. मणिपुर को समझौते से बाहर रखने का नतीजा कितना घातक हो सकता है, इसका उदाहरण 18 जून, 2001 को देखने को मिला था. वाजपेयी सरकार ने तब NSCN (IM) के साथ हुए शांति समझौते को मणिपुर के इलाकों तक बढ़ा दिया था. मणिपुर घाटी इस बात पर इतना नाराज़ हुई थी कि लोगों के हुजूम ने मणिपुर विधानसभा समेत कई विधायकों के घरों को आग के हवाले कर दिया था. हिंसा में मणिपुर विधानसभा के स्पीकर धननजॉय सिंह समेत कई विधायक भीड़ के हाथों ज़ख्मी हो गए थे. इसीलिए नागा अकॉर्ड के सार्वजनिक होने का समय पास आते देख मणिपुर में तगड़े सुरक्षा प्रबंध किए जा रहे हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नागा अकॉर्ड लाने के साथ ही मणिपुर में भी एक नया कानून बना दिया जाएगा. ताकि मैतेई लोगों की ज़मीनें सुरक्षित रहें. माने बाहरी लोग इंफाल घाटी की ज़मीन नहीं खरीद पाएंगे. इसे बेहद मुश्किल बना दिया जाएगा. ऐसा एक कानून मणिपुर के नागा बहुल पहाड़ी इलाकों में लागू भी है. हिमाचल और जम्मू-कश्मीर में भी ऐसा ही कानून है.

नागा गुटों के साथ फ्रेमवर्क ऑफ अंडरस्टैंडिंग पर दस्तखत के बाद प्रधानमंत्री मोदी. (फोटोःपीटीआई)

कोई नागा गुट खिलाफ भी है अकॉर्ड के?
नागालैंड में ढेर सारे नागा गुट हैं. सरकार सात गुटों से बात कर रही है. जिनसे नहीं कर रही है, उनमें सबसे बड़ा नाम है NSCN (K). इस गुट ने 2001 में भारत सरकार के साथ शांति समझौता किया था, लेकिन 2015 में उसने इसे तोड़ दिया. भारत सरकार ने इस गुट को प्रतिबंधित घोषित कर दिया है. पूरी संभावना इसी बात की है कि NSCN (K)अकॉर्ड को खारिज कर दे. लेकिन जून 2017 में खापलांग का निधन हो गया. अब NSCN (K) उतना ताकतवर बचा नहीं है. फिर भी सरकार इस गुट को लेकर सतर्क बनी हुई है.

क्या आम लोगों की ज़िंदगी पर भी कोई फर्क पड़ेगा?
कई बार राजनीति और क्रांति वगैरह किसी दूसरे ही स्तर पर चल रही होती है और लोग कहीं दूर छिटके रहते हैं. पब्लिक से पूछो तो वो कहती है – ‘कोहू नृप होय…’. मतलब कोई भी राजा बन जाए, हमें क्या? लेकिन नागालैंड में नागा शांति समझौता और लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी आपस में मथी हुई है. पहले आम लोग उग्रवादियों और फौज की गोलीबारी के बीच फंसे. फिर NSCN (IM) जब बंदूकें एक तरफ रखकर 1997 में जंगल से बाहर आया, तो सरकार ने उसके लड़ाकों को दीमापुर से 35 किलोमीटर दूर वन विभाग की कुछ पुरानी इमारतें दे दीं. NSCN (IM) ने यहां Government of the People’s Republic of Nagalim Council Headquarters बसाया. इस जगह को नाम दे दिया कैंप हेब्रॉन. यहां से NSCN (IM) अपनी समानांतर सरकार चलाता है. कोहिमा वाली नागालैंड सरकार को धता बताते हुए. भारत सरकार की नाक के ठीक नीचे. दुनिया के किसी भी देश की सरकार में जो-जो मंत्रालय होते हैं, वो हेब्रॉन से चल रही सरकार में भी हैं- वित्त से लेकर रक्षा तक. इस सरकार का अपना झंडा. ये अपना खर्च चलाने के लिए टैक्स भी वसूलती है! जी हां, मुखर्जी ‘शहीद’ ही रहे, लेकिन देश से ‘दो निशान’ खत्म नहीं हुआ.

नागा गुट नागालैंड में समानांतर सरकार चला रहे हैं. NSCN का जारी किया हुआ टैक्सी पर्मिट. (फोटोः इंडिया टुडे आर्काइव)

अब दिक्कत ये है कि NSCN (IM) नागालैंड में चल रही अकेली समानांतर सरकार नहीं है. वहां NNC और NSCN के जितने धड़े हैं, और उन धड़ों के जितने धड़े हैं, उनमें से कई अपनी-अपनी ‘सरकारें’ चला रहे हैं. और हर ‘सरकार’ टैक्स वसूलती है. यही कारण रहा कि नागालैंड में अगेंस्ट करप्शन ऐंड अनअबेटेड टैक्सेशन (ACUT)जैसे संगठन बने. इनकी मांग है कि सभी नागा गुट साथ आ जाएं, ताकि टैक्स वसूली का गोरखधंधा बंद हो. टैक्स सिर्फ एक उदाहरण मात्र है. अनेक ‘सरकारों’ के होने से नागाओं की ज़िंदगी नरक बनी हुई है. कई बार उनके लिए तय करना मुश्किल हो जाता है कि किसका नियम मानें, किसका नहीं.

नागालैंड में लगभग एक सदी से चली आ रही लड़ाई ने इस तरह का माहौल तैयार कर दिया है. वहां की आधिकारिक सरकार (जो भारत के संविधान की कसम खाती है) को भी विधानसभा में ‘ग्रेटर नागलिम’ बनाने के पक्ष में 5 बार प्रस्ताव पारित करना पड़ा है (ये प्रस्ताव भारत के संविधान के खिलाफ जाता है). लेकिन अब नागा गुट इतिहास को पीछे छोड़ने के लिए राज़ी नज़र आ रहे हैं. इतिहास पीछे छूट ही जाए, तो बेहतर है. नागा अकॉर्ड यदि सचमुच एक आम नागा की ज़िंदगी को बेहतर कर देता है, तो ‘आज़ादी’, ‘संप्रभुता’ और ‘आत्मनिर्णय’ जैसे शब्दों के नाम पर बहा खून थोड़ा कम सालेगा आने वाली पीढ़ियों को.

इस समझौते के साथ ही खत्म हो सकता है नागालैंड में केंद्र सरकार का विरोध…

हाल ही में हुए चुनावों में अब नागालैंड में केंद्र सरकार समर्थित पार्टी की सरकार बन चुकी है. इसीलिए मानसून सत्र में नागालैंड समझौते का रास्ता साफ लग रहा है. इस समझौते के साथ ही खत्म हो सकता है नागालैंड में केंद्र सरकार का विरोध...

नागालैंड समझौता जल्द ही हो सकता है
भारत सरकार और नागालैंड की सेनाओं के बीच होने वाला समझौता अब लगभग तय है. यह एक शांति समझौता होगा, जिसके बाद पूर्वोत्तर में होने वाले केंद्र सरकार के विरोध को रोक मिलेगी. उम्मीद की जा रही है कि यह समझौता भारत के इस सबसे पुराने विद्रोह को शांत करेगा. लेकिन अभी भी रास्ते में एक बड़ी चुनौती है. नागालैंड अपने प्रदेश के लिए एक अलग झंडे की मांग कर रहा है. यहीं बात अटकी हुई है, लेकिन उम्मीद की जा सकती है कि संसद के मानसून सत्र में इस समझौते पर मुहर लग जाएगी. सरकार इस स्थिति के लिए भी तैयार है कि इस समझौते के बाद मणिपुर घाटी में हिंसा भड़क सकती है.
द इंडियन एक्सप्रेस के सूत्रों के मुताबिक इस समझौते से उत्तर पूर्वी प्रदेशों की सीमाओं को बदला नहीं जाएगा. साथ ही एक स्वायत नागालैंड काउंसिल का गठन किया जाएगा जो अरुणाचल और मणिपुर राज्यों के लिए भी होगी. नागा जाति के लोगों के लिए एक सार्वजानिक सांस्कृतिक संस्था बनाई जाएगी, प्रदेश के विकास के लिए खास संस्थाएं गठित होंगी. साथ ही नागालैंड से बाहर विस्थापित हो चुके नागा जाति के लोगों को फिर से प्रदेश में स्थापित किया जाएगा. अफ्स्पा को हटाए जाने की मांग भी की गई है.
क्या है वजह नागालैंड के इस विद्रोह की:
साल 1824 से पहले नागालैंड का पड़ोसी प्रदेश असम म्यांमार (उस वक्त बर्मा) के अधिकार में था. उस वक्त भारत में ब्रिटिश राज था. 1824 में पहली बार ब्रिटिश हुकूमत ने म्यांमार पर हमला किया. 1825 में अंग्रेजों ने म्यांमार की सेना को असम से बाहर खदेड़ दिया था. असम से साथ उस वक्त नागालैंड का हिस्सा भी अंग्रेजी हुकूमत के कब्जे में आ गया था.
शांति की तलाश में नगालैंड: अधर में लटका नगा समझौता
चार साल पहले केंद्र सरकार और नगा समूहों के बीच हुए ऐतिहासिक नगा फ्रेमवर्क समझौते (Naga Framework Agreement) के बावजूद नगालैंड में स्थायी शांति एक सपना जैसी बनी हुई है। केंद्र सरकार ने यह समझौता नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (National Socialist Council of Nagaland-NSCN) के नेता इसाक-मुइवा के साथ किया था, जिसमें अन्य विद्रोही गुटों का प्रतिनिधित्व भी था। लेकिन ऐसी कई वज़हें हैं, जिनसे इस समझौते से केवल निराशा हाथ लगी है।

नगालैंड में उग्रवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • 1826 में अंग्रेज़ों ने असम को ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य में मिला लिया तथा 1881 में नगा हिल्स भी इसका हिस्सा बन गया।
  • 1946 में अंगामी ज़ापू फिज़ो के नेतृत्व में नगा नेशनल काउंसिल (NNC) का गठन किया गया, जिसने 14 अगस्त, 1947 को नगालैंड को ‘एक स्वतंत्र राज्य’ घोषित किया।
  • 22 मार्च, 1952 को फ़िज़ो ने ‘भूमिगत नगा फेडरल गवर्नमेंट’ (NFG) और ‘नगा फेडरल आर्मी’ (NFA) का गठन किया।
  • उग्रवाद से निपटने के लिये भारत सरकार ने सेना के अंतर्गत 1958 में सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) बनाकर वहां लागू किया।
  • 1963 में असम के नगा हिल्स ज़िले को अलग कर नगालैंड राज्य बनाया गया।
  • 11 नवंबर, 1975 को शिलॉन्ग समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिये NNC नेताओं का एक गुट सरकार से मिला, जिसमें हथियार छोड़ने पर सहमति जताई गई।
  • थिंजलेंग मुइवा (जो उस समय चीन में थे) की अगुवाई में लगभग 140 सदस्यों के एक गुट ने शिलॉन्ग समझौते को मानने से इनकार कर दिया। इस गुट ने 1980 में नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (NSCN) का गठन किया।
  • 1988 में एक हिंसक टकराव के बाद NSCN का विभाजन हो गया तथा यह इसाक-मुइवा और खपलांग गुटों में बँट गई।
  • कालांतर में खपलांग की मौत हो गई और उसका गुट कमज़ोर पड़ गया तथा अधिकांश विद्रोही समूह इसाक-मुइवा गुट में शामिल हो गए।

क्या कमियाँ रहीं नगा शांति समझौते में?

  • नगा शांति समझौते की एक सबसे बड़ी चुनौती इसका उद्देश्य रहित होना है और यह स्थानीय लोगों की समझ से बाहर है।
  • इस समझौते को नगालैंड में भी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन ’विशेष व्यवस्था’ को लेकर चर्चा होती रहती है, जिसकी वज़ह से सरकार एवं विद्रोहियों के बीच संशय की स्थिति बनी हुई है।
  • नगाओं से संबंधित मुद्दे न केवल नगालैंड में रहने वाले नगाओं को, बल्कि म्याँमार में बसे हुए नगाओं सहित समस्त नगा क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं।
  • मणिपुर, असम और अरुणाचल प्रदेश के नगा-बहुल क्षेत्रों का एकीकरण कर ग्रेटर नगालिम बनाने की मांग से हिंसक झड़पों को बढ़ावा मिलेगा।
  • पूर्वी नगालैंड पब्लिक ऑर्गनाइज़ेशन (Eastern Nagaland Public Organization-ENPO) के तहत एक अलग फ्रंटियर नगालैंड या पूर्वी नगालैंड बनाने की मांग की जा रही है, जो ग्रेटर नगालिम बनाने के प्रयास को कमज़ोर करेगा।
  • नगालैंड में शांति प्रक्रिया की राह में एक और बड़ी बाधा यहाँ अनेक संगठनों का मौज़ूद होना है, जो सभी नगाओं का प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं।

विद्रोहियों की मांग

वर्तमान में NSCN (IM) ने पूर्ण संप्रभुता की अपनी मांग छोड़ दी है और यह भारतीय संवैधानिक ढाँचे के तहत अधिक स्वायत्त क्षेत्र चाहता है, जो नगा इतिहास और परंपराओं की विशिष्टता से जुड़ा है। यह गुट ‘ग्रेटर नगालिम’ की बात करता है, जिसमें नगालैंड के साथ निकटवर्ती नगा क्षेत्र में बसे हुए लोग भी शामिल हों। इसमें असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के कई ज़िले तथा म्याँमार का एक बड़ा भाग भी शामिल है।

क्यों नहीं लागू हो पाता कोई भी समझौता?

  • लगभग सभी विद्रोही समूहों का सशस्त्र ढाँचा है, जो संघर्ष विराम के बाद भी बरकरार है। इन समूहों के खिलाफ कोई कार्रवाई न होने के बावजूद हिंसा में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई है और न ही उनके संसाधन कम हो रहे हैं। इस वज़ह से शांति व्यवस्था के लिये खतरा लगातार बना रहता है।
  • विद्रोही समूहों ने राज्य में अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र स्थापित कर लिये हैं, जिनमें प्रत्येक समूह अपनी समानांतर सरकार चला रहा है और नगाओं के साथ-साथ गैर-नगाओं से भी भारी मात्रा में ज़बरन धन उगाही कर रहा है।
  • इसाक-मुइवा और खपलांग गुटों के बीच गंभीर मतभेद हैं, जो शांति स्थापित करने वाले किसी भी समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा है।
  • इस क्षेत्र को अस्थिर करने में राजनीति ने भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। राजनीतिक दलों द्वारा विद्रोही समूहों का इस्तेमाल चुनाव प्रक्रिया में लाभ उठाकर सत्ता में आने के लिये किया जाता है।
  • नगा आंदोलन जिस उद्देश्य के लिये चलाया गया था, वह अपने मूल लक्ष्यों और वैचारिक रुख से भटक चुका है। ऐसे में प्रमुख विद्रोही गुटों के नेता सफलता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं।
  • नगा गुटों के नेता एवं कैडर अब भौतिक लाभों की वज़ह से संघर्ष को जारी रखे हुए हैं, जो ज़बरन वसूली तथा संगठित अपराध से ज़्यादा और कुछ नहीं है।
  • संसाधनों के दोहन के लिये प्रायः सरकारें स्थानीय लोगों की अनुमति के बिना उनकी भूमि का इस्तेमाल करती हैं। यही कारण है कि सरकारी परियोजनाओं पर जनजातीय समूहों का विश्वास कम होता जा रहा है।
  • संसाधन संपन्न होने के बावजूद क्षेत्र में विकास, रोज़गार एवं बुनियादी सुविधाएँ आज भी यहाँ के जनजातीय समूहों के लिये दूर का सपना बनी हुई है।

किस राह पर आगे बढ़ा जाए?

  • नगा संघर्ष के इतिहास से पता चलता है कि विभिन्न दलों द्वारा अपनी सुविधानुसार की गई भिन्न-भिन्न व्याख्याओं के कारण अब तक हुए अधिकतर समझौते विफल रहे हैं।
  • सरकारों को मिल-बैठकर इस समस्या का समग्र हल तलाशने का प्रयास करना चाहिये, अन्यथा बार-बार विफलता ही हाथ लगेगी। इसके परिणामस्वरूप नए विद्रोही नगा गुट जन्म लेंगे, जो समस्या को बढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं करेंगे।
  • विद्रोह को बनाए रखने के लिये विदेशों से संसाधनों (हथियारों तथा धन) की उपलब्धता पर प्रभावी रोक लगाने के हरसंभव प्रयास करने की ज़रूरत है।
  • नगा समस्या पर व्यापक समझ कायम करते हुए जनजातीय समूहों तथा अन्य लोगों की बदलती आकांक्षाओं के मद्देनज़र स्वीकार्य एवं व्यापक समाधान तलाशने की आवश्यकता है।
  • इस मुद्दे से निपटने का एक अन्य मार्ग जनजातीय समूहों में शक्तियों का अधिकतम विकेंद्रीकरण और शीर्ष स्तर पर न्यूनतम केंद्रीयकरण हो सकता है। इससे शासन को जनोन्मुख बनाने और वृहद् विकास परियोजनाओं को शुरू करने की दिशा में आसानी होगी।

पूर्वोत्तर भारत में नगालैंड को उग्रवाद का केंद्रबिंदु कहा जाता है, जहाँ 1950 के दशक के बाद से उग्रवाद ने अपने पैर पसार रखे हैं। बेशक राज्य में शांति स्थापित होना एक बड़ी चुनौती है, लेकिन किसी भी नगा शांति पहल को लागू करते समय असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश राज्यों की वर्तमान क्षेत्रीय सीमाओं को खतरा उत्पन्न नहीं होना चाहिये, जो कि इन राज्यों को हर्गिज़ स्वीकार्य नहीं होगा। इन राज्यों में नगा आबादी वाले क्षेत्रों को अधिक स्वायत्तता प्रदान की जा सकती है और इन क्षेत्रों के लिये उनकी संस्कृति एवं विकास हेतु अलग से बजट आवंटन भी किया किया जा सकता है। संभव हो तो एक नए निकाय का गठन किया जाना चाहिये, जो नगालैंड के अलावा अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में नगाओं के अधिकारों की निगरानी करेगा।

इन सबके अलावा, किसी भी समझौते को लागू करते समय खपलांग गुट को भी साथ लेना ज़रूरी है, तभी पूर्वोत्तर भारत में नगावासियों के इलाकों में दशकों की अशांति और हिंसा के बाद सही मायने में शांति स्थापित हो सकेगी। यदि नगाओं के साथ किया गया कोई भी समझौता पूर्वोत्तर के इस सबसे पुराने सशस्त्र जातीय संघर्ष का शमन करने में सफल होता है तो पूर्वोत्तर के अन्य जातीय संघर्षों को हल करने की राह खुल सकती है, जिनमें कुकी, मैती, बोडो, दिमासा, हमार और कर्बी आदि शामिल हैं।

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