आरबीआई को मोदी सरकार की किस बात का डर है

आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता पर संकट की आशंका जताई हैआरबीआई बनाम मोदी सरकार

भारत के केंद्रीय बैंक रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार के बीच की कड़वाहट अब सतह पर आ गई है. दोनों के बीच टकराव की स्थिति ऐसे समय में पैदा हुई है जब भारत की अर्थव्यवस्था हिचकोले खा रही है.

पिछले हफ़्ते शुक्रवार को आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपने भाषण में अर्जेंटीना के 2010 के आर्थिक संकट का ज़िक्र करते हुए चेताया था. कहा जा रहा है कि विरल काफ़ी ग़ुस्से में थे और उनका भाषण दर्शकों को हैरान करने वाला था.अर्जेंटीना के केंद्रीय बैंक के गवर्नर को जमा पूंजी सरकार को देने के लिए मज़बूर किया गया था. अर्जेंटीना को डिफ़ॉल्टर तक होना पड़ा था. विरल आचार्य ने कहा कि अर्जेंटीना को सरकार के हस्तक्षेप की भारी क़ीमत चुकानी पड़ी थी.आचार्य ने कहा था, ”जो सरकारें केंद्रीय बैंकों की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती हैं वहां के बाज़ार तत्काल या बाद में भारी संकट में फंस जाते हैं. अर्थव्यवस्था सुलगने लगती है और अहम संस्थाओं की भूमिका खोखली हो जाती है.” अर्जेंटीना में 2010 में ठीक ऐसा ही हुआ था.

उर्जित पटेल और मोदी सरकार

मतभेद के मुद्दे

आज यानी मंगलवार को इस तनाव के बीच आरबीआई गवर्नर और वित्त मंत्री अरुण जेटली की मुलाक़ात होने वाली है. पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने सरकार से आग्रह किया है कि इस टकराव को जल्दी ख़त्म करे. चिदंबरम ने कहा है कि आरबीआई और सरकार दोनों को बैठकर बात करनी चाहिए.

आरबीआई के वर्तमान नेतृत्व और मोदी सरकार के बीच कई मुद्दों पर मतभेद है. पिछले हफ़्ते आरबीआई बोर्ड की एक अधूरी और कलहपूर्ण बैठक हूई थी. आरबीआई बोर्ड में एस गुरुमूर्ति को मोदी सरकार ने नामित निदेशक बनाया है.

गुरुमूर्ति आरएसएस से जुड़े रहे हैं. कहा जा रहा है कि पिछले हफ़्ते आरबीआई बोर्ड की जो बैठक हुई थी उसमें गुरुमूर्ति उर्जित पटेल और उनकी टीम पर भड़क गए थे.

आरबीआई सिस्टम में पैसे डाल रहा है क्योंकि निवेशक डरे हुए हैं. रुपए में जारी गिरावट को थामने के लिए भी डॉलर मार्केट में लगाए गए हैं. ऐसे कई मुद्दे हैं जिन पर मोदी सरकार और आरबीआई में विवाद है.

ब्याज दरों में कटौती को लेकर भी आरीबीआई और सरकार में एक राय नहीं है. उर्जित पटेल के तीन साल के गवर्नर का कार्यकाल अगले साल सितंबर में ख़त्म हो रहा है.कहा जा रहा है कि वो अपने पूर्ववर्ती रघुराम राजन की तरह एक ही कार्यकाल के बाद इस्तीफ़ा दे देंगे. टाइम्स ऑफ़ इंडिया का कहना है कि वो शायद ये कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाएं.

केंद्रीय बैंकों और सरकारों के बीच टकराव केवल भारत की बात नहीं है. अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप भी फ़ेडरल रिज़र्व पर निशाना साधते रहते हैं.कहा जा रहा है कि आरबीआई पर बैंकिंग सिस्टम के कारण भारी दबाव है. कई विश्लेषकों का कहना है कि आरबीआई क़र्ज़ देने में काफ़ी सख़्ती दिखा रहा है. दूसरी तरफ़ मोदी सरकार मुद्रा योजना के तहत क़र्ज़ दिलाने में कोई बाधा नहीं देखना चाहती है.कई लोगों का कहना है कि मुद्रा योजना से भारत के बैंक नए क़र्ज़ संकट में फँस रहे हैं.

गुरुमूर्ति की नियुक्ति

आरबीआई को स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक एस गुरुमूर्ति की नियुक्ति भी रास नहीं आई थी. हालांकि आरबीआई ने इसका विरोध नहीं किया था.

गुरुमूर्तिमोदी सरकार ने गुरुमूर्ति को आरबीआई बोर्ड में निदेशक बनाया है

जब नवंबर 2016 में पीएम मोदी ने नोटबंदी का फ़ैसला किया था तो इसके पीछे गुरुमूर्ति की अहम भूमिका मानी गई थी.गुरुमूर्ति की नियुक्ति को विदेशी मीडिया ने भी तवज्जो दी थी. फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने लिखा था कि हिन्दू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी पर बैंकों की स्वायत्तता को कमज़ोर करने के आरोप लग रहे हैं.वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता का कहना है कि गुरुमूर्ति को उनकी हिन्दूवादी विचारधारा के कारण ही नियुक्त किया गया है.गुहा ने  कहा, ”गुरुमूर्ति ख़ुद को चार्टड अकाउंटेंट कहते हैं. इसके अलावा उनकी कोई विशेषज्ञता नहीं है. उन्होंने ही मोदी जी को नोटबंदी और मुद्रा योजना का आइडिया दिया था और उसे स्वीकार भी किया गया. वो आरएसएस और स्वदेशी जागरण मंच से जुड़े रहे हैं इसलिए ये इनाम मिला है.”

इससे पहले गुरुमूर्ति आरबीआई की नीतियों को लेकर बोलते रहे हैं. वो रघुराम राजन के प्रमुख आलोचकों में रहे हैं. राजन आईएमएफ़ में अर्थशास्त्री थे और उन्हें यूपीए सरकार के समय वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम ने आरबीआई का गवर्नर बनाया था.

नोटबंदी के बारे में क्या कहते हैं रघुराम राजन?

साल की शुरुआत में गुरुमूर्ति ने एक ट्वीट किया था, “भारत केंद्रित समाधान तलाशने की बजाय आरबीआई वैश्विक विचारों के अधीन काम कर रहा है. ऐसा करके रघुराम राजन ने आरबीआई की स्वायत्तता को नुक़सान पहुंचाया है. आरबीआई अब इस लाइन से हट नहीं सकेगा, क्योंकि उसे वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा से अलग होने का डर रहेगा. आरबीआई ने भारत के लिए सोचने की अपनी क्षमता खो दी है.”

अर्थव्यवस्था की चिंता

आरबीआई के साथ यह विवाद तब ज़ोर पकड़ रहा है, जब रुपया एशिया की सबसे कमज़ोर मुद्रा बनता जा रहा है.

विदेशी निवेशक भारतीय बाज़ार से पैसे निकाल रहे हैं. जानकारों का मानना है कि अगर आरबीआई और सरकार के बीच टकराव ऐसे बना रहा तो अर्थव्यवस्था की स्थिति और बुरी हो सकती है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स का कहना है कि सरकार इस विवाद के सार्वजनिक होने से काफ़ी असहज है. रॉयटर्स के अनुसार इस टकराव का असर निवेशकों पर पड़ेगा. प्रधानमंत्री कार्यालय ने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण बताया है.

रॉयटर्स से सरकार के अधिकारियों ने कहा है, ”सरकार आरबीआई की स्वायत्तता का सम्मान करती है, लेकिन उसे भी अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी.”

इस टकराव के बीच आरबीआई के कर्मचारियों ने अपने बॉस पर भरोसा जताया है और कहा है कि सरकार केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता को भंग ना करे. ऑल इंडिया एम्पलॉई एसोसिएशन ने इस पर एक बयान जारी कर इस टकराव के लिए सरकार की आलोचना की है.सरकार चाहती है कि आरबीआई कुछ बैंकों को क़र्ज़ देने के मामले में उदारता दिखाए. आरबीआई के पास भुगतान सिस्टम के मामले में जो नियामक तंत्र है उसे सरकार शायद वापस लेना चाहती है.

नरेंद्र मोदी

सरकार इसके लिए कोई नया नियामक तंत्र बनाना चाहती है. विरल आचार्य ने कहा है कि केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता के साथ खिलवाड़ किया गया तो यह विनाशकारी साबित होगा.

वित्त मंत्रालय के प्रवक्ता डीएस मलिक ने कहा है कि उन्होंने आचार्य की टिप्पणी सुनी है, लेकिन वो इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देंगे.आरबीआई ने ऐसे 11 बैंकों को चिह्नित किया है जिनका एनपीए बेशुमार बढ़ गया है. इन बैंकों को आरबीआई ने क़र्ज देने पर भी पाबंदी लगा दी है.पिछले हफ़्ते आरबीआई ने अप्रत्याशित रूप से एक नोट प्रकाशित किया था, जिसमें पेमेंट सिस्टम के लिए अलग से नियामक संस्था बनाए जाने का विरोध किया गया है. अभी ये काम आरबीआई करता है, लेकिन जानकारों के मुताबिक मोदी सरकार ये काम आरबीआई से शायद वापस लेना चाहती है.

भारतीय रिज़र्व बैंक बैंकिंग सिस्टम को क्यों देगा 40 हज़ार करोड़ रुपये

भारतीय रिज़र्व बैंक

पंजाब नेशनल बैंक में नीरव मोदी का हज़ारों करोड़ का चर्चित फ़र्जीवाड़ा, आईएलएंडएफएस का कथित डिफॉल्ट, कई गैर बैंकिंग फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन यानी एनबीएफ़सी पर डिफॉल्ट का ख़तरा, वित्तीय घाटे में बढ़ोतरी, डॉलर के मुक़ाबले रुपये की कमज़ोरी और महंगाई का बढ़ना.साल 2018 में अब तक फाइनेंस से जुड़ी ख़बरों ने निवेशकों और आम नागरिकों को परेशान किए रखा. दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं की बुरी ख़बरों की परवाह न करते हुए साल 2013 से 2017 के आखिर तक भारतीय शेयर बाज़ार सरपट भाग रहे थे, लेकिन फिर एक के बाद एक ऐसी खबरें आने लगी जो निवेशकों में घबराहट की वजह बनीं.

विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफ़आईआई) का भारतीय बाज़ारों पर भरोसा डिगने लगा और हाल ये है कि इस साल जनवरी से अब तक एफआईआई शेयर बाज़ारों में 75 हज़ार करोड़ रुपये से अधिक की बिकवाली कर पैसा अपने देश ले जा चुके हैं.अक्टूबर में ही विदेशी संस्थागत निवेशकों ने तकरीबन 25 हज़ार करोड़ रुपये की शेयर बिकवाली की. अप्रैल के बाद ये सबसे बड़ी बिकवाली थी, इससे पहले अप्रैल में लगभग साढ़े 12 हज़ार करोड़ रुपये के शेयर विदेशी संस्थागत निवेशकों ने बेचे थे.

इस बीच, पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी ने अपना असर दिखाया और महंगाई सिर उठाने लगी है. सितंबर में खुदरा महंगाई दर 3.77 फीसदी थी. अगस्त में महंगाई दर 3.69 फीसदी थी. औद्योगिक उत्पादन के आंकड़ों में भी गिरावट आई है. जुलाई 2018 में औद्योगिक उत्पादन 6.6 फीसदी से घटकर में अगस्त में 4.3 फ़ीसदी रही.रिज़र्व बैंक ने महंगाई दर का लक्ष्य चार फ़ीसदी रखा है और इस लक्ष्य को बनाए रखने के लिए उसने दो बार ब्याज दरें भी बढ़ाईं, लेकिन फिर रिज़र्व बैंक ने एलान किया कि वो नवंबर में ओपन मार्केट ऑपरेशन यानी ओएमओ के ज़रिये बैंकिंग सिस्टम में 40 हज़ार रुपये डालेगा. आख़िर क्या हैं इसके मायने और रिज़र्व बैंक ने ऐसा क्यों करने जा रहा है?

क्या हैं मायने?

उर्जित पटेल

बैंकिंग सिस्टम में जब भी नकदी की कमी होती है यानी उपभोक्ताओं की रुपये की मांग बैंकिंग सिस्टम में मौजूद कुल नकदी से अधिक होती है तो ऐसे में रिज़र्व बैंक ओपन मार्केट ऑपरेशन यानी ओएमओ का रास्ता अपनाता है.बैंकिंग सिस्टम में पिछले तीन हफ्ते से कैश की कमी थी. इंडिया रेटिंग के अनुसार सिस्टम में तकरीबन एक लाख करोड़ रुपये की कमी थी.ओएमओ के ज़रिये आरबीआई सरकारी बॉन्ड्स की ख़रीदारी करता है. इस तरह सिस्टम में नकदी आ जाती है. यानी रिज़र्व बैंक 40 हज़ार करोड़ रुपये के सरकारी बॉण्ड्स ख़रीदेगा. इससे पहले, रिज़र्व बैंक ने 17 मई को 10 हज़ार करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में डाले थे.

त्योहारी सीज़न है वजह?

दिवाली (फ़ाइल फोटो)दशहरा, दिवाली के कारण बाज़ार में नकदी की मांग बढ़ी है. रिज़र्व बैंक के इस कदम के पीछे इसे ही सबसे बड़ी वजह बताया जा रहा है.अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा कहते हैं, “आम तौर पर लोग त्योहारों में अधिक ख़रीदारी करते हैं. ज़ाहिर है इससे बैंकिंग सिस्टम में नकदी की मांग बढ़ जाती है. इस कमी को दूर करने के लिए ही आरबीआई ने ये कदम उठाया है.”इसके लिए एक्साइज़ और जीएसटी की देनदारी की वजह से भी नकदी में कमी हुई.

रुपये को संभालने में हुआ कैश क्रंच

रुपया (फ़ाइल फोटो)

डॉलर के मुक़ाबले रुपये में लगातार गिरावट को संभालने के लिए रिज़र्व बैंक उपाय करता है.बाज़ार के जानकार आसिफ़ इक़बाल कहते हैं, “डॉलर लगातार गिर रहा था और रिज़र्व बैंक पर ये दबाव था कि इस गिरावट को थामा जाए. इन उपायों के तहत रिज़र्व बैंक डॉलर बेचकर बैंकिंग सिस्टम से रुपया ले लेता है. इस वजह से भी सिस्टम में रुपये की कमी होती है.”

शेयर बाज़ार के लिए

बीएसई

कई दिनों से बिकवाली की मार झेल रहे भारतीय शेयर बाज़ारों में सोमवार को भारी उछाल देखने को मिला. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज यानी बीएसई का 30 शेयरों का संवेदी सूचकांक 718 अंकों की बड़ी तेज़ी के साथ बंद हुआ. नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के निफ्टी में 220 अंकों की तेज़ी रही.

हालाँकि बाज़ार के जानकारों का मानना है कि इस तेज़ी में रिज़र्व बैंक के फ़ैसले का सीधे-सीधे कोई असर नहीं है. अर्थशास्त्री सुनील सिन्हा कहते हैं, “बैंकिंग सिस्टम में कैश की कमी थी और इसे देखते हुए रिज़र्व बैंक ने ये फ़ैसला किया है. आरबीआई समय-समय पर ऐसे फ़ैसले करता रहता है, लेकिन शेयर बाज़ार ने इसे पॉजीटिव सेंटिमेंट के रूप में लिया है.”

बाज़ार में दिग्गज कंपनियों आईसीआईसीआई बैंक, रिलायंस इंडस्ट्रीज, लार्सन एंड टूब्रो, स्टेट बैंक, टाटा कंसल्टेंसी और ऐक्सिस बैंकों के शेयरों में ज़ोरदार ख़रीदारी को इस तेज़ी से जोड़ा जा रहा है.दिल्ली स्थित एक ब्रोकरेज फर्म में रिसर्च एनालिस्ट आसिफ़ इक़बाल कहते हैं, “जिस तरह से आईएलएंडएफएस और दूसरे एनबीएफसी का मामला सामने आया और लोगों में अफरातफरी फैली, ख़ासकर म्यूचुअल फंड निवेशकों में कि कहीं उसका पैसा न डूब जाए. हालाँकि सरकार की दखलंदाज़ी से ये अफ़रातफ़री बड़ी घबराहट में नहीं बदली और पैसों की निकासी का बड़ा ख़तरा टल गया.”

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