1932 से अब तक कश्मीर की पूरी कहानी

नवनीत गुर्जर

कश्मीर देश के लिए एक दुखती रग रहा और आज भी बना हुआ है? कौन इसके लिए, किस हद तक जिम्मेदार है? किसने, किस हद तक इस मसले पर क्या- क्या कोशिशें कीं? सरदार पटेल के सचिव वीशंकर की किताब ‘सरदार पटेल का चुना हुआ पत्र व्यवहार’ के आधार पर…

नेहरू जी के भावुकतापूर्ण अविवेक से नाराज़ थे सरदार पटेल  
महाराजा हरिसिंह के शासनकाल में जम्मू- कश्मीर का प्रशासन ठीक था। पहले पॉलिटिकल डिपार्टमेंट द्वारा चुने गए अधिकारियों के मातहत और बाद में गोपाल स्वामी अय्यंगार, महाराज सिंह और बीएन राव जैसे सुयोग्य भारतीय प्रशासकों के कारण। हालांकि, महाराजा खुद भी कार्यक्षम और परिश्रमशील शासक थे, परंतु उनके चरित्र में अनिर्णय अथवा असमंजस का भारी दोष था। 1932 में शेख अब्दुल्ला ने जो लोकप्रिय आंदोलन चलाया, उसके कारण शासन को उदार बनाने का पहला कदम उठाया गया। शुरुआत में यह कौमी आंदोलन था, जो मुसलमानों के हित की लड़ाई लड़ने के लिए खड़ा किया गया था।1939 में आंदोलन का कौमी स्वरूप खत्म कर दिया गया और पहले कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के नाम से पहचाने जाने वाली उनकी संस्था अब नेशनल कांन्फ्रेंस हो गई। आगे चलकर इसे देसी राज्य प्रजा परिषद से जोड़ दिया गया।

नेशनल कॉन्फ्रेंस महाराजा हरिसिंह के खिलाफ आंदोलन चलाती रही और 1946 में कांग्रेस आंदोलन से प्रेरणा लेकर शेख अब्दुल्ला ने ‘महाराजा कश्मीर छोड़ो’ आंदोलन छेड़ दिया। शेख गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें तीन साल की सजा हुई। पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वयं एक कश्मीरी थे और राज्य के प्रति उनका रवैया निहायत भावुकतापूर्ण था। वे जून 1946 में अपने गिरफ्तार मित्रों (खासकर शेख अब्दुल्ला) को प्रोत्साहित करना चाहते थे, लेकिन राजनीतिक आंदोलन के भय से राज्य सरकार ने नेहरूजी के प्रवेश पर रोक लगा दी। फिर भी नेहरूजी नहीं माने और गिरफ्तार कर लिए गए। कांग्रेस वर्किंग कमेटी इसके पक्ष में नहीं थी कि नेहरूजी राज्य का कानून तोड़ें और वहां गिरफ्तार कर लिए जाएं।

शेख अब्दुल्ला से मित्रता के पीछे नेहरूजी की इस दीवानगी से सरदार पटेल बेहद गुस्सा थे। सरदार पटेल द्वारा 11 जुलाई 1946 को डीपी मिश्र (मध्यप्रांत, जो अब मध्यप्रदेश है) को लिखे पत्र में नेहरूजी के इस कार्य का उल्लेख मिलता है। इस पत्र में पटेल ने लिखा है, “अभी- अभी उन्होंने (नेहरूजी ने) ऐसी अनेक नादानियां की हैं जिनकी वजह से हमें बड़ी परेशानियां हुई हैं। कश्मीर में उठाया गया उनका कदम, संविधान सभा के लिए किए गए सिख चुनाव में उनका हस्तक्षेप और कांग्रेस महासमिति की बैठक के तुरंत बाद उनकी अखबारी परिषद, ये सब भावुकतापूर्ण अविवेक के कृत्य हैं। इनकी वजह से परिस्थितियों को सही मार्ग पर ले जाने में हमें जबर्दस्त तनाव से गुजरना पड़ता है। परंतु इस सारे अविवेक के बावजूद जवाहरलाल में स्वाधीनता के लिए अनुपम उत्साह और उत्कट लगन है…।”

बाद में नेहरूजी को बेरिस्टर की हैसियत से शेख अब्दुल्ला के वकील के नाते कश्मीर की छोटी सी मुलाकात की इजाजत मिली थी। उस मौके पर उन्होंने  सरदार पटेल को 20 जुलाई 1946 को पत्र लिखकर कहा था कि मैं 24 जुलाई को कश्मीर जाऊंगा और वहां अपनी प्रवृत्तियों को बेरिस्टर के कार्य तक ही मर्यादित रखूंगा। इस प्रकार जब कश्मीर के प्रधानमंत्री रामचंद्र कॉक थे, तभी नेहरूजी ने राज्य सरकार और महाराजा के साथ खुले मुकाबले में उतरने का मन बना लिया था।

जून 1947 में देश की विभाजन योजना घोषित हुई। इसके साथ ही राज्य यानी कश्मीर की परिस्थितियों में एक नाटकीय मोड़ आया। लॉर्ड माउण्टबेटन ने महाराजा से कहा कि सत्ता के हस्तांतरण के लिए निश्चित हुई तारीख 15 अगस्त 1947 से पहले आपको संबंधित परिस्थितियों के प्रकाश में एक उपनिवेश या दूसरे उपनिवेश से जुड़ने का निर्णय कर लेना चाहिए। परंतु महाराजा के अनुसार इन परिस्थितियों के स्पष्टीकरण में वाइसराय का झुकाव पाकिस्तान की तरफ था। वाइसराय ने महाराजा को आश्वासन भी दिया कि यदि आप पाकिस्तान में मिलना पसंद करेंगे तो भारत कोई कठिनाई खड़ी नहीं करेगा। उधर, सरदार पटेल ने तीन जुलाई 1947 को कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री रामचंद्र कॉक और महाराजा को लिखे अलग- अलग पत्रों में स्पष्ट कर दिया था कि जम्मू- कश्मीर राज्य का हित बिना विलंब किए भारत से जुड़ने में ही है।

जिन्ना समझते थे कश्मीर पके सेब की तरह उनके हाथ में आ जाएगा
भारत और पाकिस्तान में से किसी एक के साथ कश्मीर के जुड़ने का सवाल था। महाराजा दुविधा में थे। उनके सामने कई परेशानियां थीं। पाकिस्तान के साथ जुड़ने का अर्थ होता- घोषित सांप्रदायिक राष्ट्र के साथ जुड़ना और न केवल महाराजा और उनके वंश के लिए, बल्कि उनकी प्रजा के अल्पसंख्यक लोगों के लिए भी तत्काल पैदा होने वाला भय। ये अल्पसंख्यक वर्ग अनेक थे- जम्मू क्षेत्र के कश्मीरी पंडित, कश्मीर घाटी के हिन्दू और लद्दाख के बौद्ध। इसके अलावा कश्मीर घाटी के मुसलमान, जिनका राज्य की आबादी में तो बहुमत था, पर वे जातीय तथा भाषा की दृष्टि से पंजाबी और बाकी पाकिस्तान के अपने धर्म बंधुओं से भिन्न थे।

दूसरी ओर यह संभावना भी थी कि भारत के साथ जम्मू- कश्मीर राज्य के जुड़ने से अलग तरह की उलझनें पैदा होतीं। बहरहाल, राज्य हर तरह से उलझन में था। स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर महाराजा ने प्रधानमंत्री रामचंद्र कॉक को बर्खास्त कर दिया। सरदार पटेल की मदद से महाराजा को मेहरचंद महाजन की सेवाएं प्राप्त हुईं, जो उस समय पंजाब उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। 15 अगस्त 1947 को देश का विभाजन हो गया। पाकिस्तानी आतंकवाद जो आज भी कश्मीर को चैन नहीं लेने दे रहा है, यह पाकिस्तान की पैदाइश के साथ ही शुरू हो गया था। सीमा पार से कबाइलियों को कश्मीर पर आक्रमण के लिए उकसाया जाने लगा। पाकिस्तानी सरकार ने उन्हें हथियार दिए और घुसपैठ की गुंजाइश भी बनाई गई। जम्मू- कश्मीर राज्य भौगोलिक हिसाब से पाकिस्तान की अपेक्षा भारत से ज्यादा अलग और कटा हुआ था और महाराजा तथा उनकी फौज बेहद कमजोर।

जिन्ना ने संभवत: यह मान लिया था कि कश्मीर की सत्ता को बिना किसी कठिनाई के उखाड़कर फेंक दिया जाएगा और राज्य पके सेब की तरह उनके हाथ में आ जाएगा। इस समय शेख अब्दुल्ला ने कूटनीतिक समझदारी दिखाई। उन्होंने 26 सितंबर,1947 को महाराजा को जेल से पत्र भेजा और अडिग वफादारी का वचन दिया। डरे- सहमे महाराजा ने इसका उत्तर अनुकूल दिया और बदले में सभी राजनैतिक कैदियों के लिए क्षमादान की घोषणा कर दी। 2 अक्टूबर, 1947 को सरदार पटेल द्वारा महाराजा को लिखे गए पत्र से भनक मिलती है कि इस तारीख के एक दिन पहले ही शेख अब्दुल्ला और उनके साथियों को जेल से रिहा कर दिया गया था। पाकिस्तान से किए गए कबाइली आक्रमण का वेग अक्टूबर, 1947 में बढ़ने लगा। महाराजा की फौज अनिवार्य रूप से इस ज्वार को रोकने में असमर्थ थी, क्योंकि फौज से भारी संख्या में मुसलमान सैनिक भाग गए थे और वह बेहद कमजोर हो चुकी थी। राज्य का काफी बड़ा भाग, जिसमें पहले गिलगित नाम से पुकारा जाने वाला सीमा स्थित भू- भाग भी था, शत्रु के हाथ में चला गया था। राजधानी तथा कश्मीर घाटी के लिए गंभीर संकट की आशंका खड़ी हो गई थी। महाराजा ने इस संकटपूर्ण स्थिति में भारत उपनिवेश से जुड़ने का प्रस्ताव रखा और सैनिक मदद की मांग की। भारत सरकार ने राज्य के सम्मिलन को स्वीकार किया और इस तरह बाद में कश्मीर, भारत का अभिन्न अंग हो गया। लेकिन यह सब नियम- कायदे में बांधने का तब वक़्त नहीं था। यह काम बाद पर छोड़ दिया गया और तुरंत विमान और सैनिक मदद भिजवाई गई।

दिल्ली में एक बैठक हुई जिसमें पंडित नेहरू, सरदार पटेल, प्रतिरक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह, प्रमुख सेनापति जनरल बुकर, थल सेना प्रमुख जनरल रसैल और बख्शी गुलाम मुहम्मद शेख (शेख अब्दुल्ला के प्रमुख सहयोगी) शामिल थे। बैठक की अध्यक्षता लॉर्ड माउण्टबेटन ने की। चर्चा के बाद सेनापति जीत के प्रति सशंकित लगे। लंबी चुप्पी के बाद कोने से भारी आवाज़ में सरदार पटेल बोले- सेनापतियों, सुन लीजिए- साधन- सामग्री हो या न हो, भारत सरकार से जो बन पड़ेगा, आपकी मदद करेगी लेकिन कश्मीर किसी भी कीमत पर हाथ से जाना नहीं चाहिए। सेनापति आपत्ति रखना चाहते थे, लेकिन सरदार ने वक्त नहीं दिया। वे खड़े हो गए और चलते- चलते बोले- सुबह रसद समेत विमान आपको तैयार मिलेंगे। एक मिनट का भी विलंब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अंत में भारतीय सेना की जीत हुई और पाकिस्तानियों को मार भगाया गया।

महाराजा हरिसिंह का लॉर्ड माउण्टबेटन को पत्र
तारीख
26 अक्टूबर 1947

मैं परमश्रेष्ठ से यह निवेदन करता हूं कि मेरे राज्य में एक गंभीर संकट पैदा हो गया है। मैं आपकी सरकार से तत्काल सहायता की प्रार्थना करता हूं। परमश्रेष्ठ जानते ही हैं कि जम्मू-कश्मीर राज्य अब तक भारत या पाकिस्तान किसी भी उपनिवेश के साथ जुड़ा नहीं है। भौगोलिक दृष्टि से मेरा राज्य इन दोनों के साथ जुड़ा हुआ है। इसके साथ मेरे राज्य की सोवियत संघ तथा चीन के साथ समान सीमा है। भारत और पाकिस्तान अपने बाह्य संबंधों में इस सत्य की उपेक्षा नहीं कर सकते। यह निर्णय लेने के लिए पहले मैंने समय चाहा था कि किस उपनिवेश के साथ जुड़ूं, अथवा क्या यह दोनों उपनिवेशों और मेरे राज्य के हित में नहीं होगा कि मैं स्वतंत्र रहूं और बेशक, दोनों उपनिवेशों के साथ मेरे मैत्रीपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण संबंध रहें। इसके अनुसार, मैंने भारत और पाकिस्तान से विनती की कि वे मेरे राज्य के साथ यथावत स्थिति का करार कर लें। पाकिस्तान सरकार ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। भारत ने मेरी सरकार के प्रतिनिधियों से अधिक चर्चा करनी चाही। नीचे बताई जा रही घटनाओं की वजह से मैं इसकी व्यवस्था नहीं कर सका। सच पूछा जाए तो पाकिस्तान सरकार यथावत स्थिति के करार के मातहत राज्य के भीतर डाक-तार व्यवस्था का संचालन कर रही है। यद्यपि पाकिस्तान के साथ हमने यथास्थिति का करार किया है, फिर भी उसने मेरे राज्य में पाकिस्तान होकर आने वाले अनाज, नमक तथा पेट्रोल जैसी वस्तुओं को अधिकाधिक मात्रा में रोकने की इजाजत अपने अधिकारियों को दे दी है। अफ्रीदियों को, सादी पोषाक पहने सैनिकों को तथा आतताइयों को आधुनिक शस्त्रास्त्रों के साथ राज्य के भीतर घुसने दिया गया है- सबसे पहले पुंछ क्षेत्र में, फिर सियालकोट से और अंत में भारी तादाद में रामकोट की ओर हजारा जिले से जुड़े हुए क्षेत्रों से। नतीजा यह हुआ कि राज्य के पास मर्यादित संख्या में जो सेना थी उसे अनेक मोर्चों पर बिखेर देना पड़ा है और उसे अनेक स्थानों पर साथ- साथ शत्रुओं का सामना करना पड़ रहा है। इससे जान माल की भयंकर बर्बादी को रोकना कठिन हो गया है। महूरा पॉवर हाउस की लूट को भी नहीं रोका जा सका, जो समस्त श्रीनगर को बिजली मुहैया कराता है और जिसे जला दिया गया है।

भारी संख्या में किया गया स्त्रियों का अपहरण और उनपर किया गया बलात्कार मेरे ह्रदय को चूर- चूर किए दे रहा है। इस प्रकार जिन जंगली शक्तियों को पाकिस्तान ने मेरे राज्य में घुसने दिया है, वे पहले क़दम के रूप में मेरी सरकार की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर पर अधिकार करने और फिर सारे राज्य को रौंद देने और तहस- नहस कर डालने का लक्ष्य सामने रखकर आगे बढ़ रही हैं। उत्तर- पश्चिमी सीमा प्रांत के दूर- दूर के क्षेत्रों से आए हुए कबाइलियों की- जो नियमित मोटर- ट्रकों से आ रहे हैं, मशेनरा- मुज़फ़्फ़राबाद मार्ग का उपयोग कर रहे हैं और अद्यतन शस्त्रों से सज्ज होते हैं। ऐसी सामूहिक घुसपैठ सीमा प्रांत की प्रांतीय सरकार और पाकिस्तान सरकार की जानकारी के बिना संभव नहीं हो सकती। मेरी सरकार ने इन दोनों सरकारों से बार- बार अपील की है, परन्तु इन आक्रमणकारियों को रोकने का या मेरे राज्य में न आने देने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया है। सच पूछा जाए तो पाकिस्तानी रेडियो और अख़बारों ने इन घटनाओं के समाचार दिए हैं। पाकिस्तानी रेडियो ने तो यह बात भी ज़ाहिर की कि कश्मीर में एक अस्थाई सरकार स्थापित कर दी गई है। मेरे राज्य की जनता ने, मुसलमानों और हिन्दुओं दोनों ने, सामान्यतः इस गड़बड़ी में कोई हिस्सा नहीं लिया है।

मेरे राज्य की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, आज के घोर संकट को देखते हुए मेरे पास भारतीय उपनिवेश से सहायता माँगने के सिवाय दूसरा कोई विकल्प नहीं रह गया है। स्वाभाविक रूप से ही जब तक मेरा राज्य भारतीय उपनिवेश के साथ जुड़े नहीं, तब तक वह मेरी माँगी हुई सहायता नहीं भेज सकता। इसलिए मैंने भारत के साथ जुड़ने का निर्णय किया है और मैं इस पत्र के साथ आपकी सरकार की स्वीकृति के लिए सम्मिलन का एक दस्तावेज़ भेज रहा हूँ। दूसरा विकल्प है मेरे राज्य और मेरी प्रजा को लुटेरों और हत्यारों के हाथ में छोड़ देना। इस आधार पर कोई सभ्य सरकार टिक नहीं सकती या काम नहीं कर सकती। जब तक मैं इस राज्य का शासक हूँ और मुझमें इस राज्य की रक्षा करने की शक्ति है, तब तक मैं यह विकल्प कभी स्वीकार नहीं सकता।

मैं परमश्रेष्ठ की सरकार को यह भी बता दूँ कि मेरा इरादा तुरंत अंतरिम सरकार स्थापित करने का तथा इस संकट में मेरे प्रधानमंत्री के साथ शासन की ज़िम्मेदारियाँ संभालने की बात शेख़ अब्दुल्ला से कहने का है। मेरे राज्य को यदि बचाना है तो उसे श्रीनगर में तत्काल भारत की मदद मिलनी चाहिए। श्री वीपी मेनन परिस्थिति की गंभीरता को पूरी तरह जानते हैं, और इस संबंध में अधिक स्पष्टीकरण ज़रूरी हो, तो वे आपको यहाँ की स्थिति समझा देंगे।
धन्यवाद!

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माउण्टबेटन का पत्र महाराजा को
तारीख
27 अक्टूबर,1947

महाराजा का 26 अक्टूबर 1947 का पत्र मुझे मिस्टर वीपी मेनन ने दिया है। आपने अपने पत्र में जिन परिस्थितियों का उल्लेख किया है, उन्हें देखते हुए मेरी सरकार ने भारतीय उपनिवेश के साथ कश्मीर राज्य के सम्मिलन को स्वीकार करने का निर्णय किया है। मेरी सरकार की नीति किसी राज्य के सम्मिलन के संबंध में यह है कि जिस राज्य के बारे में सम्मिलन का प्रश्न विवाद का विषय हो, वहाँ यह प्रश्न जनता की इच्छा से निर्णीत होना चाहिए। अपनी इस नीति के साथ सुसंगत रहकर मेरी सरकार चाहती है कि ज्यों ही कश्मीर में शांति और व्यवस्था पुन:  स्थापित हो और उसकी भूमि से आक्रमणकारी हटा दिए जाएँ, त्यों ही राज्य के भारत के साथ सम्मिलन का प्रश्न जनता का मत जानकर तय किया जाए।
इस बीच सैनिक सहायता के लिए आपकी अपील के उत्तर में आज भारतीय सेना की टुकड़ियाँ कश्मीर भेजने की कार्रवाई कर दी गई है, ताकि वे आपकी, जान- माल की तथा आपकी प्रजा के सम्मान की रक्षा में आपकी सेना की सहायता करें। मुझे और मेरी सरकार को यह जानकर संतोष हुआ कि आपने शेख़ अब्दुल्ला को, अपने प्रधानमंत्री के साथ काम करने की दृष्टि से, अंतरिम सरकार रचने का निमंत्रण दिया है।
धन्यवाद!

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मेहरचंद महाजन का पत्र सरदार को
तारीख़
27 अक्टूबर,1947

कल आपने कश्मीर के लिए जो कुछ किया उसके लिए महाराजा और मैं ह्रदय से आपके कृतज्ञ हैं। महाराजा ने मुझे आदेश दिया है कि आपने समय पर इतनी जल्दी जो सहायता दी, उसके लिए व्यक्तिगत रूप से उनकी आंतरिक कृतज्ञता की भावना आप तक पहुँचाऊँ। मैं केवल आपके बहुमूल्य परामर्श और मार्गदर्शन पर निर्भर करता हूँ। मैंने जो मूर्खतापूर्ण शब्द कहे हों, उनके लिए मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ। अब तो सारी बाज़ी आपके हाथ में है। कृपया मैसूर का नमूना मुझे भिजवा दें। उसे देखकर मैं अपने विचार बताऊँगा कि कश्मीर जैसे पिछड़े हुए राज्य में उसे कहाँ तक अपनाया जा सकता है। आप स्वयं बख़्शी (बक्शी टेकचंद) के साथ उसे अंतिम रूप दे देंगे। मुझे बुलाएँगे तब मैं चर्चा के लिए दिल्ली आ जाऊँगा।
एक बार फिर मेरा हार्दिक सम्मान और धन्यवाद स्वीकार करें। कश्मीर संबंधी निर्णय भारत के राजनीतिज्ञों द्वारा किसी भी समय किया गया अत्यन्त महत्वपूर्ण और त्वरित निर्णय है।

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कश्मीर मामला सरदार के हाथ से नेहरूजी के अधीन चला गया
पाकिस्तान का तात्कालिक आक्रमण जब विफल हो गया तो लॉर्ड माउण्टबेटन ने मोहम्मद अली जिन्ना के सामने एक फ़ार्मूला रखा जिसमें कहा गया था कि ” जिस राज्य का राजा अपनी प्रजा की बहुसंख्यक जाति का न हो और वह राज्य ऐसे उपनिवेश के साथ न जुड़ा हो, जिसकी बहुसंख्यक जाति वही हो जो राज्य की हो, तो वह राज्य किस उपनिवेश के साथ जुड़े, यह प्रश्न निष्पक्ष मतदान द्वारा जानी गई वहाँ की प्रजा की इच्छा से निर्णीत होगा।” भारत सरकार ऐसा वचन देने को राज़ी हो गई। शर्त यह थी कि जनता का मत जानने के लिए मतदान संयुक्त राष्ट्र संघ के मार्गदर्शन में होगा, लेकिन जिन्ना इस फ़ार्मूले पर भी राज़ी नहीं हुए। जब जिन्ना नहीं पसीजे तो भारत सरकार को पाकिस्तान के निंदनीय आक्रमण से लंबे समय तक जूझना पड़ा। अंत में लॉर्ड माउण्टबेटन के अनुरोध पर इस मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ की मध्यस्थता की विनती का निर्णय लिया गया और 1 जनवरी 1948 को विधिवत शिकायत की गई। सरदार वल्लभ भाई पटेल व्यक्तिगत रूप से इससे सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि राष्ट्र संघ मामले को लंबा खींचेगा और फिर भी शिकायत रखनी ही है तो भारत वादी की बजाय प्रतिवादी बने। लेकिन बाद में यह मामला नेहरूजी के अधीन विदेश मंत्रालय में चला गया। गोपाल स्वामी अय्यंगार उनके परामर्शदाता थे। सरदार बाक़ी मामलों की तरह इस बार भी नेहरूजी का सम्मान करते हुए चुप हो गए। 

बाद में पाकिस्तान ने इस बात से साफ़ इनकार कर दिया कि कश्मीर पर हुए आक्रमण में उसका सीधा हाथ था। हालांकि राष्ट्र संघ के कमीशन ने पाकिस्तान की पोल खोल दी और कश्मीर में बचे पाक सैनिकों को तुरंत हटाने का प्रस्ताव रखा। परंतु तत्पश्चात भारत सरकार नेहरूजी की अगुआई में झुक गई। युद्ध विराम, युद्ध विराम रेखा और 5 जनवरी 1949 का वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया जिसमें पाकिस्तान के प्रति झुकाव था। इससे भारत- पाकिस्तान बराबरी के दर्जे पर खड़े हो गए। राष्ट्र संघ कमीशन का 13 अगस्त 1948 का वह प्रस्ताव जो पाकिस्तान को अपराधी बता रहा था, मंद पड़ गया। कश्मीर पर पाकिस्तान के सीधे आक्रमण का मूलभूत प्रश्न धुँधला हो गया और जनमत संग्रह की बात पर अधिक भार दे दिया गया।

इसके पूर्व की एक महत्वपूर्ण बात यह भी थी कि एक बार भारतीय मंडल ने निर्णय लिया कि जब तक पाकिस्तान महत्वपूर्ण समझौतों को नहीं मान लेता, रोकड़ बाक़ी का उसका हिस्सा रुपए 55 करोड़ उसे लौटाया नहीं जाएगा। लेकिन बाद में कुछ हस्तक्षेपों की वजह से यह रक़म भी उसे जनवरी 1948 में ही लौटा दी गई। सरदार पटेल का मत था कि यह रक़म मिलते ही पाकिस्तान अपनी रक्षा शक्ति बढ़ाएगा, और वही हुआ भी।

खैर, पाक आक्रमण का मामला जब तात्कालिक रूप से विफल हो गया, संभवत: नेहरूजी की पहल पर कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी के नेता शेख़ अब्दुल्ला को आपातकालीन प्रशासन का मुखिया बना दिया गया। सैन्य सहायता के लिए महाराजा हरिसिंह द्वारा माउण्टबेटन को लिखे गए पत्र के निचले पैरा में महाराजा द्वारा शेख़ अब्दुल्ला को सरकार में जगह देने की पहल भी उन्हें अन्य माध्यमों से नेहरूजी द्वारा किए गए इशारों को इंगित करती हैं।  बहरहाल, अब एक तरह से शेख़ अब्दुल्ला सरकार के सर्वेसर्वा हो गए। महाराजा और उनके वैधानिक सलाहकार अथवा सरकार के प्रमुख मेहरचंद महाजन पृष्ठभूमि में चले गए। यह निर्णय किया गया कि मैसूर की तरह कश्मीर में भी व्यवस्था की जाएगी। शेख अब्दुल्ला को सरकार और विधि- विधान मुखिया बना दिया जाएगा और मैसूर के दीवान की तर्ज़ पर मेहरचंद महाजन महाराजा के प्रतिनिधि के रूप में मंत्रिमंडल की बैठक की अध्यक्षता किया करेंगे। इस वक़्त तक शेख़ अब्दुल्ला इस ‘मैसूर कॉपी’ से पूरी तरह सहमत थे। इस बीच माउण्टबेटन और नेहरूजी के अनुरोध पर भारत सरकार ने घोषणा की कि कश्मीर के सम्मिलन की स्वीकृति इस शर्त के अधीन है कि राज्य के भारत में सम्मिलन का प्रश्न जनता की इच्छा से बाद में हल कर लिया जाएगा।

सत्ता पाते ही तानाशाह हो गए थे शेख़ अब्दुल्ला
आख़िरकार, शेख़ अब्दुल्ला कश्मीर के शासक हो गए। 24 दिसंबर 1947 को मेहरचंद महाजन द्वारा सरदार पटेल को लिखा गया पत्र (देखिए अनुवाद) बताता है कि आपातकालीन प्रशासन के मुखिया बनते ही शेख़ अब्दुल्ला किस तरह तानाशाही पर उतर आए थे। कुछ ही दिन बाद शेख़ सरकारी ही नहीं, व्यक्तिगत तौर पर भी महाराजा का तीव्र विरोध करने लगे। शेख़ ने मैसूर योजना की यह शर्त मानने से साफ़ इनकार कर दिया कि दीवान की हैसियत से महाराजा का प्रतिनिधि, मंत्रिमंडल की बैठक की अध्यक्षता करेगा। केंद्रीय सरकार के मंत्री और नेहरूजी के विश्वस्त गोपाल स्वामी अय्यंगार पर महाराजा और शेख अब्दुल्ला के बीच दोनों पक्षों को स्वीकार्य समझौता करवाने की ज़िम्मेदारी डाली गई। उसी तरह जैसे नरसिंहराव सरकार में आंतरिक सुरक्षा मंत्री राजेश पायलट को कश्मीर का प्रभारी बनाया गया था। परिणाम यह हुआ था कि केंद्रीय गृहमंत्री और पायलट में अन बन हो गई। नेहरूजी और अय्यंगार की जोड़ी से तब सरदार पटेल भी असहमत थे, लेकिन  सरदार ने मतभेदों को उजागर नहीं होने दिया। अय्यंगार ने जब महाराजा और शेख़ के बीच समझौते की कोशिश की तो उन्हें लगा कि शेख़ अब महाराजा की शर्तों को मानने वाले नहीं हैं। इसलिए उन्होंने उल्टे, महाराजा को ही झुकाने पर अपने सारे प्रयास केंद्रित कर दिए। अय्यंगार ने सारे काम शेख़ की पसंद के किए।

अय्यंगार ने फ़ार्मूला रखा कि शेख़ के प्रधानमंत्रित्व में एक संयुक्त अंतरिम सरकार की रचना की जाए और उसके अन्य मंत्री शेख़ की सलाह से ही पसंद किए जाएँ तथा संपूर्ण सत्ता और अधिकार इस सरकार को सौंप दिए जाएँ। चूँकि इस व्यवस्था में भी शेख़, महाराजा के वैधानिक सलाहकार मेहरचंद महाजन को बर्दाश्त करने पर राज़ी नहीं थे, इसलिये अय्यंगार ने महाजन की सेवाएं समाप्त करने का भी प्रस्ताव रख दिया। भारत सरकार द्वारा सुझाई गई मैसूर योजना का बिलकुल उल्टा यह प्रस्ताव महाराजा को नहीं भाया। उन्होंने इसका विरोध किया। ख़ासकर, महाजन को हटाने के प्रस्ताव का। महाराजा, महाजन को अपना विश्वस्त मानते थे, लेकिन अय्यंगार ने महाराजा से कहा कि हर दृष्टिकोण से उनके द्वारा सुझाया गया प्रस्ताव ठीक है और इसमें यह अत्यावश्यक है कि उस अंतरिम सरकार के प्रति आप राज्य के वैधानिक मुखिया (मात्र) के रूप में व्यवहार करें और उसकी सलाह से ही कार्य करें। सरदार पटेल चूँकि देसी राज्य मामलों के प्रभारी थे और इसका असर बाक़ी राज्यों के राजा- महाराजाओं पर पड़ना लाज़िमी था, इसलिए वे कश्मीर के महाराजा हरिसिंह की इस छीछालेदर से बेहद ख़फ़ा थे। लेकिन वे फिर भी चुप रहे। विवाद को बढ़ाना नहीं चाहते थे पटेल।

मेहरचंद महाजन का पत्र पटेल को
तारीख़
24 दिसंबर 1947

मैंने आपको शेख़ अब्दुल्ला के उस पत्र की एक प्रति भेजी थी, जो उन्होंने 20 सितंबर 1947 के दिन महाराजा के लिखा था। यह नम्र व्यक्ति, जिसने महाराजा को अडिग वफ़ादारी का वचन दिया था, अब जनता के न्यायालय के समक्ष, महाराजा पर मुकदमा चलाना चाहता है और उनके राज्य त्याग की माँग करता है। शेख़ अब्दुल्ला का ताज़ा से ताज़ा प्रस्ताव यह है कि महाराजा जम्मू, कठुआ और उधमपुर जिले अपने अधिकार में रख सकते हैं और राज्य का बाक़ी भाग पाकिस्तान के जैसे एक मुस्लिम गणतंत्र के लिए छोड़ सकते हैं। वे मुस्लिम कांन्फ्रेंस के नेता अब्बास का, जो जेल में बंद है, समर्थन प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं और उनके साथ मुलाक़ातें ले रहे हैं।
लगभग हर बात में शेख़ अब्दुल्ला महाराजा की उपेक्षा और अवगणना करते हैं और प्रतिदिन बढ़ती हुई क़ौमी मनोवृत्तियों का प्रदर्शन कर रहे हैं।  यदि आप इजाज़त दें तो मैं आपको शेख अब्दुल्ला की प्रशासनिक कुशलता और ज्ञान के तथा क़ौमी मनोवृत्ति के नमूने भेजूँगा और यह भी बताऊँगा कि नेशनल गार्डों की मदद से शेख ने श्रीनगर में कहाँ- कहाँ महाराजा की उपेक्षा की है। वे मानते हैं कि वे मनचाहा काम कर सकते हैं। आपकी इजाज़त मिलने के बाद मैं शेख अब्दुल्ला के फ़ासिस्ट पद्धति से  चलाए जाने वाले कुशासन तथा दुर्व्यवस्था के कुछ उदाहरण आपको भेजूँगा। मैं आजकल अत्यन्त उद्विग्न और बेचैन हूँ। मैं चाहता हूँ कि आप किसी तरह इस स्थिति से मुझे बाहर निकाल दें। मैंने इसके लिए प्रयत्न किया लेकिन सफलता नहीं मिली। महाराजा मुझे वर्तमान स्थिति से निकलने नहीं देंगे।

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शेख ने हिन्दू अधिकारियों को जेल दी और मुस्लिमों को पदोन्नति
शेख अब्दुल्ला के शासन में किस तरह सांप्रदायिकता फैली? ख़ुद शेख कितने सांप्रदायिक थे? उन्होंने किस तरह राज्य के हिन्दुओं पर अत्याचार और मुस्लिमों को प्रश्रय दिया, इसका कच्चा चिट्ठा महाराजा के वैधानिक सलाहकार मेहरचंद महाजन द्वारा सरदार पटेल को लिखे गए उस पत्र में मिलता है जिसमें अब्दुल्ला के शासन की ख़ामियाँ बिन्दुवार गिनाई गई हैं।महाजन के पत्र का अनुवाद यहाँ जैसा का तैसा दिया जा रहा है-
1. महाराजा से परामर्श किए बिना प्रजासभा के अध्यक्ष को हटा दिया गया है, यद्यपि क़ानून के अनुसार उन्हें केवल महाराजा ही हटा सकते हैं।
2. राज्य का हाईकोर्ट काम नहीं कर रहा है। महाराजा अथवा मुख्य न्यायाधीश ही ऐसे हैं, जिनकी सत्ता हाईकोर्ट से ऊपर है। परन्तु महाराजा की आज्ञा होते हुए भी हाईकोर्ट को जम्मू नहीं आने दिया जाता। हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश मुसलमान हैं और चूँकि ये न्यायाधीश जम्मू नहीं आना चाहते, इसलिए दो माह से ऊपर हो गए, राज्य में हाईकोर्ट जैसी कोई चीज़ ही नहीं रह गई है। महाराजा ने इस तथ्य की ओर शेख अब्दुल्ला का ध्यान खींचा, परन्तु उन्होंने महाराजा के आदेश की उपेक्षा की। मुख्य न्यायाधीश कलकत्ता में हैं, एक न्यायाधीश यहाँ जम्मू में है और एक श्रीनगर में।
3. जम्मू के गवर्नर को श्रीनगर बदल दिया गया है। तबादले के बाद उन्हें बिना किसी निश्चित अभियोग या जाँच के अथवा महाराजा से पूर्व परामर्श लिए बिना सस्पेंड कर दिया गया और नजरबंद रख दिया गया है। एक बार महाराजा की सलाह ली गई थी और उसके आधार पर कोई निर्णय किया गया था, लेकिन फिर उसकी उपेक्षा की गई।
4. जे एन जुत्सी को, जिन्हें जाँच के बाद भ्रष्टाचार के कारण बर्खास्त कर दिया गया था, एक ज़िम्मेदार पद पर नियुक्त कर दिया गया है।
5. एक हिसाब अधिकारी को मुख्य सचिव बना दिया गया है, यद्यपि मुख्य सचिव का पद सेवा की कार्यकारिणी तथा न्याय शाखा के लिए सुरक्षित रखा गया है। काफ़ी संख्या में अधिकारियों को पीछे छोड़ दिया गया है।
6. कोर्ट के एक इंन्स्पेक्टर को तहसीलदार बना दिया गया है, यद्यपि उसने प्रबंध विषयक कोई प्रशिक्षण नहीं लिया है। एक पुलिस सब इंस्पेक्टर को इंस्पेक्टर बने बिना ही असिस्टेंट पुलिस सुपरिन्टेन्डेंट बना दिया गया है- केवल क़ौमी विचार से। एक इनकम टैक्स अधिकारी को वज़ीर नियुक्त कर दिया गया है। केवल सांप्रदायिक आधार पर, एक धंधे के लोगों को सेवा की विभिन्न शाखाओं में नियुक्त कर दिया गया है।
7. बड़ी संख्या में अधिकारी और अन्य लोग बिना किसी अभियोग और मुक़दमे के हिरासत में ले लिए गए हैं।
8. नेशनल कान्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। वे यातायात के लाइसेंस बेचते फिर रहे हैं। लोगों को व्यापार की रियायतें भी बाँट रहे हैं।
9. गजेटेड और नॉन गजेटेड अधिकारियों को बर्ख़ास्तगी या गिरफ़्तारी की धमकी देकर स्वयं सेवकों के हुक्म मानने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
10. संकटकालीन अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है, जो सरकारी नौकर नहीं हैं। न तो उनके हाथ में कोई सत्ता है और न ही उनका कोई फ़र्ज़ है। कहा जाता है कि वे लोगों को सलाह देते हैं, परन्तु वस्तुत: वे सच्ची सत्ता भोग रहे हैं। इस प्रकार संपूर्ण प्रशासन में अव्यवस्था और अराजकता का साम्राज्य है।

11. मैं यहाँ आया, उसके पहले महाराजा ने राजद्रोह के आधार पर शाहमीरी, अदालत खान और धर को सेवानिवृत्त कर दिया था। परन्तु महाराजा के स्पष्ट आदेश के विरुद्ध उन्हें फिर से नौकरी पर लगा दिया गया है।

महाराजा को कश्मीर छोड़ने पर विवश कर दिया गया
रोकड़- बाक़ी का जो धन पाकिस्तान को दिया जाना था, उससे पाकिस्तान तुरंत अपनी रक्षा शक्ति न बढ़ा सके, इसलिए उसे रक़म के भुगतान में देरी करने के लिए सरदार पटेल किस तरह प्रयासरत थे, इसका अंदाज़ा उनके द्वारा 12 दिसंबर 1947 को तब के वित्त मामलों के मंत्री (अंतरिम सरकार) आरके षणनुखम चेट्टी को लिखे गए पत्र (देखें चेट्टी को सरदार का पत्र ) से लगाया जा सकता है। लेकिन सरदार के पत्र और अन्य पत्र जो उपलब्ध हैं, से लगता है कि नेहरूजी ने अन्य मंत्रियों के सहयोग से सरदार के मत के ख़िलाफ़ मामलों में भी अपने ही मत को चलाया और उस मत को चलन में लाने के लिए बार- बार पटेल की लोकप्रियता, दृढ़ता और वर्चस्व का दोहन किया। विवाद न बढ़े और नेहरूजी के सम्मान में कमी न आए इसलिए पटेल न चाहते हुए भी चुपचाप नेहरूजी के इंगित कार्यों को मौन स्वीकृति देते गए। जब कश्मीर के बारे में शेख अब्दुल्ला का एकतरफ़ा समर्थन करने वाली गोपालस्वामी अय्यंगार की योजना को मानने से महाराजा हरिसिंह ने इनकार कर दिया और स्वयं अय्यंगार तथा नेहरूजी भी महाराजा को न मना पाए तो वे मदद के लिए पटेल के पास आए। पटेल ने न चाहते हुए भी अपने निजी सचिव बी शंकर को कश्मीर भेजकर महाराजा को अय्यंगार प्रस्ताव मानने के लिए राज़ी कर लिया। फलस्वरूप 5 मार्च 1948 की घोषणा द्वारा अब्दुल्ला मंत्रिमंडल को जम्मू- कश्मीर राज्य की अधिकृत सरकार के रूप में स्वीकार कर लिया गया और महाराजा के वैधानिक सलाहकार मेहरचंद महाजन की छुट्टी कर दी गई।

शेख की महत्वाकांक्षा देखिए कि इससे भी उन्हें संतोष नहीं हुआ और उन्होंने महाराजा पर आरोप लगाया कि वे मुसलमानों की हत्या को प्रोत्साहन देते हैं।  महाराजा के खिलाफ जांच बैठा दी गई। हालांकि भारत सरकार के आग्रह पर जांच बाद में उठा ली गई, लेकिन शेख ने महाराजा का विरोध जारी रखा। शेख की महत्वाकांक्षा बढ़ती जा रही थी। सरदार पटेल ने कहा कि एक जीत के बाद शेख दूसरी जीत पर अड़ गए हैं, यह ठीक नहीं है। नेहरूजी शेख की हर महत्वाकांक्षा पूरी करते गए और पंडित नेहरू तथा गोपाल स्वामी अय्यंगार को अचानक यह प्रतीति हुई कि वर्तमान नाजुक और संकटपूर्ण स्थिति में महाराजा राज्य में न रहें तो चलेगा (बहुसंख्यक मुस्लिमों की दृष्टि से) पर शेख अब्दुल्ला की राज्य में उपस्थिति और उनका निर्बाध शासन अनिवार्य है। इस बात पर नेहरूजी के मत से सरदार पटेल कतई सहमत नहीं थे और काफी हद तक पटेल गुस्सा हो गए। फिर भी नेहरूजी ने अपनी वही नीति अपनाई। पटेल को, महाराजा को राज्य छोड़ने के लिए मनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। पटेल ने एक बार फिर अपने निजी सचिव को कश्मीर भेजा और महाराजा मान गए। महाराजा ने बंबई में एक कोठी बनवाई और राज्य छोड़कर वहीं रहने तथा अपने पुत्र, युवराज कर्णसिंह को राज्य प्रतिनिधि बनाना स्वीकार कर लिया।

सरदार का पत्र षणमुखम चेट्टी को
तारीख
12 दिसंबर,1947

मैं कल सुबह कटक जा रहा हूं और 16 दिसंबर तक नहीं लौट सकूंगा। इसके बाद मैं 17 तारीख को जयपुर जाऊंगा और संभवत: 19 तारीख को सुबह लौटूंगा। इस अरसे में संभव है कि पाकिस्तान को देने के लिए हमने रोकड़ बाकी की जो रकम तय की है, उसके एक अंश का या संपूर्ण रकम का भुगतान करने की विनती आपके पास आए। इस भुगतान को आप इस आधार पर टाल सकते हैं कि पाकिस्तान को दी जाने वाली कुल रकम का निर्णय करने से पूर्व दूसरे खर्च का मेल बैठाना अभी बाकी है अथवा इस आधार पर टाल सकते हैं कि मैं अभी दिल्ली से बाहर हूं और आगे का कदम उठाने से पहले आप मुझसे विचार- विमर्श करना चाहेंगे। किसी भी स्थिति में आप निश्चित रूप से यह देखें कि मेरे दौरे से लौटने के बाद इस विषय में हमारी चर्चा होने तक पाकिस्तान को कोई भुगतान न किया जाए।
धन्यवाद!

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संविधान सभा में कांग्रेस ने धारा 370 का कड़ा विरोध किया 
जब महाराजा हरिसिंह ने कश्मीर छोड़ दिया तो नेहरूजी के समर्थन से और शेख अब्दुल्ला के मंत्रिमंडल से विचार- विमर्श के बाद गोपाल स्वामी अय्यंगार ने अनुच्छेद 370 की योजना बनवाई, जो भारत के साथ कश्मीर राज्य के संबंध की व्याख्या करता है। भारत के साथ कश्मीर राज्य के संबंध से कुछ विद्वान यह तात्पर्य निकालते हैं कि यदि इस अनुच्छेद को हटाया जाता है तो कश्मीर स्वयं ही भारत से अलग हो जाएगा। खैर, जब इस अनुच्छेद को संविधान सभा में रखा गया तब नेहरूजी अमेरिका में थे लेकिन फार्मूले के मसौदे पर पहले ही उनकी स्वीकृति ले ली गई थी। सरदार पटेल के पत्र बताते हैं कि इस संबंध में उनसे कोई परामर्श नहीं किया गया। संविधान सभा में इस अनुच्छेद का खुद कांग्रेस ने ही जोरदार, बल्कि हिंसक ढंग से विरोध किया था क्योंकि यह अनुच्छेद कश्मीर राज्य को एक विशेष दर्जा प्रदान करता है। सैद्धांतिक रूप से कांग्रेस पार्टी की यह राय थी कि कश्मीर भी उन्ही मूलभूत व्यवस्थाओं अर्थात शर्तों के आधार पर संविधान को स्वीकार करे, जिन शर्तों पर अन्य राज्यों ने उसे स्वीकार किया है। पार्टी ने इस शर्त का विशेष रूप से जबर्दस्त विरोध किया कि संविधानगत मूलभूत धाराएं यानी बुनियादी अधिकारों संबंधी धाराएं कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होंगी। गोपाल स्वामी अय्यंगार इस संबंध में पार्टी के अन्य नेताओं को समझा नहीं सके थे या उन्हें इस पृष्ठभूमि की प्रतीति नहीं करा सके थे। हमेशा की तरह उन्होंने फिर सरदार पटेल के हस्तक्षेप की मांग की।

पटेल चाहते थे कि नेहरूजी की अनुपस्थिति में ऐसा कुछ न किया जाए जो उन्हें नीचा दिखाने वाला प्रतीत हो, इसलिए नेहरूजी की अनुपस्थिति में पटेल ने कांग्रेस पार्टी को अपना रवैया बदलने के लिए समझाने का कार्य हाथ में लिया। उनके हस्तक्षेप के बाद संविधान सभा में इस अनुच्छेद की बहुत ज्यादा चर्चा नहीं हुई, न इसका विरोध हुआ। यह कार्य सरदार ने अपने स्वभाव के कितने विरुद्ध जाकर किया, यह इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि एक समय जब गोपाल स्वामी अय्यंगार ने पार्टी द्वारा स्वीकृत अनुच्छेद के मसौदे में कुछ फेरबदल करना चाहा तो पटेल ने 16 अक्टूबर 1949 को अय्यंगार को एक कड़ा पत्र लिखा और कहा- (उन्हीं के शब्दों में) ‘ मैं देखता हूं कि मूल मसौदे में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन हो गए हैं। खासकर, बुनियादी अधिकारों तथा राज्य के नीति- निदेशक सिद्धांतों की व्यवहार्यता के संबंध में। आप स्वयं भी इस असंगति को समझ सकते हैं कि एक ओर तो जम्मू- कश्मीर राज्य भारत का एक भाग बनता है और दूसरी ओर वह इनमें से किसी भी व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता। हमारी पार्टी ने जब स्वयं शेख साहब की उपस्थिति में संपूर्ण व्यवस्था कर ली है, तब मैं इसमें किसी परिवर्तन को बिलकुल पसंद नहीं करता। जब कभी शेख साहब उत्तरदायित्व से भागना चाहते हैं, तब वे हमेशा जनता के प्रति अपने कर्तव्य के नाम पर हमारे प्रतिकूल हो जाते हैं। बेशक, भारत के प्रति या भारत सरकार के प्रति उनका कोई कर्तव्य नहीं है, अथवा व्यक्तिगत आधार पर आपके प्रति और प्रधानमंत्री के प्रति भी उनका कोई कर्तव्य नहीं है, जो उन्हें अनुकूल बताने के लिए सीमा से सर्वथा बाहर चले गए हैं और अब भी जा रहे हैं। बहरहाल, इन परिस्थितियों में मेरी किसी स्वीकृति का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। यदि आपको लगता है कि ऐसा करना ठीक है तो आप इसके साथ आगे बढ़ सकते हैं।

जब शेख स्वतंत्र कश्मीर का सपना देखने लगे
1949 के अंत तक शेख स्वतंत्र कश्मीर का सपना देखने लगे थे। ऐसा कश्मीर जो न भारत से जुड़ा हो, न पाकिस्तान से। पटेल और अय्यंगार का पत्र व्यवहार बताता है कि इन दोनों ने एक विदेशी प्रतिनिधि से मुलाकात के लिए अब्दुल्ला को फटकारा था। इस मुलाकात में शेख ने ऐसे स्वतंत्र कश्मीर की हिमायत की थी जो राजनीतिक दृष्टि से न तो भारत के साथ जुड़ा हो, न पाकिस्तान के साथ, लेकिन जिसकी गारंटी भारत, पाकिस्तान, ब्रिटेन, अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र संघ भी दे और जो भारत तथा पाकिस्तान दोनों से आर्थिक सहायता प्राप्त करता हो।

सरदार वल्लभ भाई पटेल और तब के अन्य नेताओं के पत्र व्यवहार का अध्ययन करें तो कभी- कभी बड़ी विचित्र और पेचीदा स्थिति सामने आती है। पंडित नेहरू बौद्धिक दृष्टि से श्रेष्ठ थे और यक़ीनन सर्वमान्य नेता थे लेकिन तस्वीर यह बनती है कि समस्याओं से निपटने की कला में नेहरूजी, सरदार पटेल को अपने से ज़्यादा श्रेष्ठ समझते थे। उनके मन में सरदार की ज़बर्दस्त सूझबूझ, व्यावहारिकता, देशभक्ति और संगठन क्षमता के बारे में बड़ा आदर था। परंतु ऐसे किसी प्रश्न पर, जिसके संबंध में वे तीव्र भावना रखते हों, दोनों के बीच मतभेद खड़ा होते ही नेहरूजी दूसरों के समर्थन से अपने मत की पुष्टि करते थे। मुख्यत: इसी कारण से वे गोपाल स्वामी अय्यंगार को जम्मू- कश्मीर राज्य से संबंधित मामलों में, विदेशी मामलों में और पाकिस्तान संबंधी बातों में अपनी सहायता की अपेक्षा से केन्द्रीय मंत्रिमंडल में लाये थे। अय्यंगार के बाद नेहरूजी सहायता के लिए मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की ओर झुके। उसके बाद इसी उद्देश्य से वे गोविंद वल्लभ पंत की ओर झुके। इसके परिणाम स्वरूप कश्मीर संबंधी प्रकरण का संचालन मुख्यत: नेहरूजी ने और अय्यंगार ने किया। बीच- बीच में हारी हुई बाज़ी जीतने के लिए सरदार तस्वीर में आ जाया करते थे। ज़िम्मेदारी का यह अतिव्यापन उस समय अधिक स्पष्ट हो गया, जब कश्मीर का प्रश्न संयुक्त राष्ट्र संघ में रखा गया। उसके बाद राज्य से संबंधित हर महत्वपूर्ण घरेलू प्रश्न बाह्य संबंधों के साथ मिल गया। इस संबंध में एक और तथ्य ध्यान में रखा जाना चाहिए।

प्रधानमंत्री पं. नेहरू के लिए कश्मीर का भावना का प्रश्न था। गोपाल स्वामी अय्यंगार का अपना अतीत भी कश्मीर के साथ जुड़ा हुआ था। केवल सरदार पटेल, कश्मीर के प्रश्न पर बाहरी दृष्टि से अथवा निष्पक्षता से विचार कर सकते थे। लेकिन कश्मीर मामलों से सरदार को दूर रखा गया। स्वयं सरदार भी विवाद की स्थिति पैदा न करने की गरज से या नेहरूजी का सम्मान बनाए रखने के लिए अपनी ही असहमति के बावजूद मुद्दों को सुलझाते गए और नेहरूजी के मत को हरी झंडी देते गए। इस स्थिति में कश्मीर में होना क्या था, और हुआ क्या? इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है? इसके निर्णय पर पहुँचना आज अतिचेष्टा होगी।

आख़िर अनुच्छेद 370 क्या है…?
अनुच्छेद 370 में जम्मू- कश्मीर राज्य संबंधी अस्थाई उपबंध किए गए हैं। ये अब तक के सर्वाधिक विवादित उपबंध रहे हैं। इस अनुच्छेद के ज़रिए कश्मीर के संबंध में भारतीय संसद को काफ़ी हद तक लगाम दी गई है। वे कुछ मामले जो कश्मीर के भारत में विलय के समय भारत डोमिनियन (उपनिवेश) के तहत आ गए थे या जिनका संविलियन पत्र में हवाला है, उन्हें छोड़कर अन्य किसी भी मामले में संसद अपना क़ानून या आदेश इस राज्य पर लागू नहीं कर सकती। यह राष्ट्रपति द्वारा उस राज्य के सत्ता प्रमुख से चर्चा के बाद ( महाराजा की 5 मार्च 1948 की उद्घोषणा के अधीन) उसकी सहमति पर ही संभव है। पहले यह सहमति कश्मीर मंत्रिपरिषद की सलाह पर काम करने वाले महाराजा, फिर सदरे रियासत से ली जाती थी। अब संशोधन कर संदरे रियासत की जगह राज्यपाल कर दिया गया है। इस अनुच्छेद का वह प्रावधान हमेशा विवादास्पद रहा, जिसमें कश्मीर के बहुसंख्यक मुसलमानों के हमेशा बहुसंख्यक ही बने रहने का इंतज़ाम है।

प्रावधान यह है कि भारत के किसी भी क्षेत्र का नागरिक कश्मीर में जाकर न तो स्थाई तौर पर रह सकता, न कोई अचल संपत्ति ख़रीद सकता और न ही स्थाई तौर पर कोई व्यापार कर सकता। जबकि देश के बाक़ी हिस्सों में ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। है भी तो केवल ज़मीन ख़रीदी के मामले में। समय- समय पर यह सुझाव आता रहा कि कश्मीर के मुस्लिमों को देश के बाक़ी राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में भेजकर वहाँ हिन्दुओं या अन्य को बसा दिया जाए अथवा कश्मीरी लोगों के वहीं रहते हुए भी राज्य को हिन्दू बहुल बना दिया जाए तो पाकिस्तान की तरफ़ से खड़ी होने वाली समस्याओं का हमेशा के लिए निदान हो जाएगा और जनमत वाला मुद्दा भी हमें नहीं डरा सकेगा। भारतीय जनता पार्टी हमेशा से इस सुझाव की पक्षधर रही है, लेकिन इस अनुच्छेद को अब तक कोई नहीं छेड़ पाया। कभी शेष राज्यों के मुस्लिम वोटों की वजह से, तो कभी अन्य राजनीतिक दबाव की वजह से। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 के पक्षपाती प्रावधानों को हटाने के लिए आंदोलन छेड़ा था। उन्होंने नारा दिया था- एक देश में दो प्रधान, दो विधान, दो निशान, नहीं चलेंगे। कश्मीर में प्रवेश के लिए शेष देश के लोगों को पहले परमिट की ज़रूरत होती थी। इस परमिट व्यवस्था को डॉ. मुखर्जी ने ही तोड़ा था। डॉ. मुखर्जी के निधन के बाद भाजपा ने भी धारा 370 को हटाने के लिए समय- समय पर आंदोलन किए, लेकिन स्थिति अब तक जस की तस है। स्वयं भाजपा केंद्र की सत्ता पर क़ाबिज़ होकर भी अब से पहले यह सब नहीं कर पायी। यहाँ यह उल्लेख ज़रूरी है कि भारत में कुछ अन्य राज्य भी हैं जो अपने जनजातीय स्वरूप और प्रथाओं को बनाए रखने के लिए संसद की शक्ति को सीमित करते हैं। धारा 371 (क) में प्रावधान है कि जब तक निम्नलिखित मुद्दों पर नगालैण्ड विधानसभा अपनी ओर से कोई संकल्प पारित नहीं करती, तब तक इस संबंध में संसद का कोई भी नियम नगालैण्ड राज्य पर लागू नहीं होगा।
ये मुद्दे हैं-
(क) नगाओं की धार्मिक या सामाजिक प्रथाएँ।
(ख) नगा रूढ़िजन्य विधि और प्रक्रिया
(ग) सिविल और दांडिक न्याय प्रशासन, जहाँ विनिश्चय नगा रूढ़िजन्य विधि के अनुसार होना है।
(घ) भूमि और उसके संपत्ति स्रोतों का स्वामित्व और अंतरण।
इस संबंध में अनुच्छेद 371(ख) के तहत राज्य के राज्यपाल को विशेष उत्तरदायित्व दिए गए हैं जो विधि और व्यवस्था के संबंध में हैं। राज्य के त्युनसांग जिले का प्रशासन राज्यपाल द्वारा ही चलाए जाने का प्रावधान है। त्युनसांग जिले का ही प्रतिनिधित्व करने वाले एक विधायक को त्युनसांग कार्यमंत्री बनाने का प्रावधान है। अनुच्छेद 371 से 371 (झ) तक कई विशेष उपबंध हैं और उनका संबंध नगालैण्ड के उक्त प्रावधानों के साथ ही असम, मणिपुर, आंध्र, सिक्किम, मिज़ोरम, अरुणाचल, गोवा, हिमाचल, और अब झारखंड जैसे राज्यों से है। प्रत्येक दशा में विचार यह है कि प्रादेशिक, जनजातीय या अन्य भावनाओं की तुष्टि की जाए और स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा की जाए।

जिन्ना की जान गुरदासपुर में क्यों अटकी थी?
बात जब कश्मीर की चल रही हो और मामला भारत- पाकिस्तान के बीच का हो, तो विभाजन का ज़िक्र किए बिना रहा नहीं जा सकता। विभाजन संबंधी प्रशासनिक प्रबंध करने में पटेल की भूमिका महत्वपूर्ण रही। पटेल और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद विभाजन कमेटी के और बाद में इसका स्थान लेने वाली विभाजन परिषद के भारतीय प्रतिनिधि थे। पटेल ने प्रशासनिक व्यवस्थाओं में गहरी व्यक्तिगत रुचि ली और स्टीयरिंग कमेटी (कर्णधार समिति) का, ख़ास तौर पर एचएम पटेल का मार्गदर्शन किया। पटेल ने विभाजन परिषद के काम को काफ़ी आसान बना दिया था, जिसके नतीजे के तौर पर परिषद अपने सामने आए सभी प्रश्नों का निपटारा सहमति और सर्वसम्मति से कर सकी थी।

सेना के विभाजन के बारे में सरदार का रवैया दृढ़ था। यह कार्य एक संयुक्त प्रतिरक्षा परिषद (ज्वायंट डिफ़ेंस काउंसिल) को सौंपा गया था, जिसके अध्यक्ष लॉर्ड माउण्टबेटन थे और मुख्य प्रशासनिक अधिकारी भूतपूर्व कमाण्डर इन चीफ़ आंचिलनेक थे। पटेल को लगा कि आंचिलनेक की व्यवस्था उतनी निष्पक्ष नहीं है, जितनी वह होनी चाहिए और मुख्यत: पटेल के ही आग्रह से 1 दिसम्बर, 1947  को सुप्रीम कमाण्डर का पद समाप्त कर दिया गया। भारत और पाकिस्तान के बीच निश्चित सीमा निर्धारण के लिए दो सीमा आयोगों की नियुक्ति की गई थी। दोनों के सभापति सर सिरिल (बाद में लॉर्ड) रेडक्लिफ थे। इन आयोगों ने अपनी रिपोर्ट 13 अगस्त, 1947 को प्रस्तुत की। इन आयोगों के निर्णयों ने हिन्दुओं, सिखों और मुसलमानों में काफ़ी द्वेष- ईर्ष्या और मनस्ताप पैदा किया। पंजाब के हिन्दू और सिख, लाहौर और रावी तथा चिनाब के बीच का नहरी क्षेत्र पाकिस्तान में चले जाने से दुखी हुए। सिख अपने महत्वपूर्ण गुरुद्वारों को खोकर क्रुद्ध थे। मुसलमानों का क्वादियानी सम्प्रदाय अपने पैग़म्बर का स्थान भारत के गुरदासपुर में चले जाने से ख़फ़ा था। बंगाल के हिन्दुओं को खुलना ज़िले का आधा भाग पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में चले जाने का अफ़सोस था। पाक मुसलमानों को कलकत्ता खोने का रंज था। चिटगाँव पहाड़ी के बौद्ध लोग अपना क्षेत्र पूर्वी बंगाल में शामिल कर दिए जाने से खिन्न थे।

जिन्ना की जान गुरदासपुर में अटकी थी। वे गुरदासपुर को भारतीय पंजाब में शामिल किए जाने के विरुद्ध गरज रहे थे क्योंकि उससे भारत को जम्मू में प्रवेश मिलता था। सीमा आयोगों के निर्णयों की घोषणा ने हर तरफ़ एक उपनिवेश से दूसरे उपनिवेश में जोड़ने की अल्पसंख्यकों की हलचल को उत्तेजित कर दिया। स्थानांतरण करने वाले जनसमूह इतने विशाल होते थे कि सुरक्षा- सैन्य दलों द्वारा उनकी व्यवस्था करना असंभव हो गया था। फिर ये सैन्य दल स्वयं भी साम्प्रदायिक मनोवृत्ति से प्रभावित होकर अस्थिर बन गए थे। इसके अतिरिक्त दो पंजाबों के विभाजित प्रशासन की समस्या भी थी- विशेष रूप से पूर्व पंजाब की, जिसकी राजधानी के लिए नया स्थान और नया नामकरण निश्चित करना था।

बख़्शी के झूठ को नेहरूजी ने सच मान लिया
शेख अब्दुल्ला और बख़्शी ग़ुलाम मुहम्मद, नेहरूजी को भ्रम में रखते थे और नेहरूजी इन दोनों की बात को बिना किसी जाँच- पड़ताल के सच मान लेते थे। नेहरूजी को अब्दुल्ला और बख़्शी में कोई खोट नज़र ही नहीं आती थी। इसका एक उदाहरण देखिए… । दरअसल, मेहरचंद महाजन (महाराजा के सलाहकार) के आर्य समाजी होने की वजह से शेख और बख़्शी दोनों उनसे बेहद नफ़रत करते थे। इन दोनों के मत से नेहरूजी भी लगभग सहमत थे। उदाहरण देखिए- नेहरूजी ने पटेल को 30 दिसम्बर 1947 को पत्र लिखा जिसमें कहा गया (उन्हीं के शब्दों में) – “मैंने बख़्शी ग़ुलाम मुहम्मद से फ़ोन पर एक बड़ी बेचैन बनाने वाली ख़बर सुनी है। यह ख़बर उन हथियारों के बारे में है, जो हमने बख़्शी के लिए भेजे थे और जिन्हें रोककर आरएसएस को बांट दिया गया है। जब ख़तरा जम्मू के निकट आकर खड़ा हो गया है तब हथियारों का बहुत बड़ा जत्था रोक लिया गया है और बख़्शी के स्वयं सेवक अक्सर बिना बंदूक़ों के लड़ते-लड़ते मर रहे हैं। मुझे कई रिपोर्ट मिली हैं। उनसे मालूम होता है कि बख़्शी के होमगार्डों को नुक़सान पहुँचाकर आरएसएस का समर्थन किया जाता है और उसे शस्त्रसज्ज किया जा रहा है और पोस्टरों और अन्य साधनों के द्वारा शेख अब्दुल्ला के ख़िलाफ़ खुला प्रचार किया जा रहा है। राज्य के कुछ दूर के भागों में, जहाँ कोई आक्रमणकारी नहीं है, आरएसएस अपने दूतों को भेजकर गड़बड़ी पैदा कर रहा है। मेरा मन कहता है कि महाजन इन प्रवृत्तियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं और शायद इनमें मदद भी करते हैं। यही नहीं, स्वयं महाराजा भी अतिशय अदूरदर्शी हैं और ग़लत काम करने का उनका एक तरीक़ा है। इसके एवज़ में उन्होंने कई कष्ट भी भोगे पर बाज़ नहीं आ रहे।”

बख़्शी द्वारा दी गई उक्त जानकारी और उस पर नेहरू जी का पत्र सच था या नहीं, यह उक्त आरोपों की जाँच से पता चला। जाँच के बाद जब ये तमाम बातें असत्य साबित हो गईं, तो इस संबंध में पटेल ने नेहरूजी को एक पत्र लिखा।

8 जनवरी, 1948 को भेजा गया सरदार का पत्र- “मैं आसाम रवाना हुआ, उसके पहले आपने मुझे बख़्शी की इस शिकायत के बारे में लिखा था कि उनके होमगार्डों को हमारे द्वारा भेजे हुए हथियार मिलते नहीं और इन हथियारों को आरएसएस के हाथों में सौंप दिया जाता है। पत्र में यह संकेत था कि इसके लिए महाराजा और महाजन दोषी हैं।”

सरदार ने आगे लिखा ” मैंने महाजन से इस संबंध में कड़ी पूछताछ की और सारी स्थिति की निष्पक्ष जाँच पड़ताल करवाई जिससे पता चला कि इन हथियारों की पूर्ति के बारे में न तो महाराजा को, न महाजन को और न राज्य के सैन्य सलाहकार को कुछ बताया गया था। उन्हें इस बात की भी जानकारी नहीं है कि भेजे गए हथियार किसे मिले और किसने इन्हें बाँटा। निष्पक्ष जांच से पता चला है कि ये हथियार मेजर जनरल कुलवंत सिंह को भेजे गए थे और वे बख़्शी को हथियार देते रहे हैं। यह सच है कि कुलवंत सिंह ने होमगार्डों को हल्की मशीनगन और मोर्टार गन देने की बख़्शी की विनती स्वीकार नहीं की, क्योंकि ऐसा कोई होमगार्ड नहीं था, जो इन हथियारों का प्रयोग जानता हो। यह भी मालूम हुआ है कि बख़्शी ने महाराजा या महाजन से पूछे बिना ही होमगार्डों के लिए इन हथियारों का ऑर्डर दे दिया था। जहाँ तक आरएसएस के स्वयं सेवकों को शस्त्रसज्ज करने की शिकायत का संबंध है, महाराजा ने और महाजन ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऐसा कोई आदेश नहीं दिया कि इन लोगों को कोई हथियार दिए जाएं। आरएसएस के कुछ लोगों के बारे में ऐसी शिकायत हुई थी कि वे राज्य के मुसलमानों को सता रहे हैं। महाजन ने संघ के सभी नेताओं को बुलाकर उनसे कह दिया था कि इस बात को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

इनको कोई हथियार नहीं दिए गए थे। सच्ची स्थिति तो यह है कि राज्य की सेनाओं को देने के लिए भी काफी हथियार नहीं थे। आरएसएस के कुछ आदमी राज्य द्वारा खड़ी की गई नागरिक सेना में भर्ती हो गए थे, परन्तु वे सैनिक अनुशासन के मातहत थे और उन्होंने राज्य की सीमा पर अमुक लड़ाइयों में हिस्सा लिया था। यह सारी व्यवस्था शेख अब्दुल्ला के ही हाथ में थी। महाजन का इस प्रक्रिया से कोई नाता नहीं था। अर्थात आपके पत्र में जाहिर की गई तमाम शिकायतें बेबुनियाद और आशंकाएं निर्मूल हैं तथा बख्शी की बात सफेद झूठ। अचरज तो यह है कि आपकी फोनवार्ता के एक  दिवस पूर्व, बख्शी पूरे दिन मेरे साथ थे पर उन्होंने मुझसे ऐसा कोई जिक्र नहीं किया। महाराजा द्वारा नियुक्त राहत कमेटी के बारे में मालूम हुआ है कि महाराजा ने मीरपुर और अन्य स्थानों के निराश्रितों के लिए 30,000 रु. का दान दिया था और इस रकम की व्यवस्था करने के लिए एक कमेटी बनाई थी। इस कमेटी में तीन व्यक्ति हैं- पहले कर्नल बलेव सिंह पठानिया (कमेटी अध्यक्ष) जो जम्मू के चीफ इमर्जेंसी अधिकारी हैं; दूसरे सदस्य हैं लाला दीनानाथ जो राज्य की प्रजासभा के सदस्य हैं और तीसरे हैं एक सुविख्यात स्थानीय नागरिक, जो आरएसएस के प्रमुख भी हैं। जहां तक मैं समझता हूं- महाराजा को अपने निजी फ़ंड की रक़म का बँटवारा करने के लिए अपनी कमेटी नियुक्त करने का पूरा- पूरा अधिकार है।”

माउण्टबेटन को कश्मीर के पाक में विलय की चाह थी
कश्मीर के प्रश्न का निपटारा करने में लॉर्ड माउंटबेटन की स्थिति वैधानिक गवर्नर जनरल के नाते बड़ी विकट थी। उनके भीतर एक से अधिक दर्जे और पद मिले हुए थे। वे ऐसे अंग्रेज़ थे, जो अपने पद की दृष्टि से भारत के हितों की देखभाल और रक्षा के कर्तव्य से बँधे हुए थे। साथ ही उन्हें ऐसा दृष्टिकोण भी बनाए रखना था, जिसका आधार निष्पक्षता, न्याय और तटस्थता हो। भारत और पाकिस्तान दोनों उपनिवेशों में ब्रिटिश अधिकारी थे और माउंटबेटन को इसे निश्चित बना देना था कि कम से कम वे भारत के गवर्नर जनरल रहें, उस अवधि में तो ये दोनों देश खुले युद्ध की स्थिति में न आएँ। वैसे वे कम- अधिक दोनों देशों को युद्ध से रोकने की ज़िम्मेदारी से बँधे हुए थे। पंडित नेहरू ने लंदन से सरदार पटेल को जो समुद्री तार और पत्र भेजे थे, उनसे स्पष्ट हो जाता है कि मज़दूर- दल का मंत्रिमंडल ( ब्रिटिश), विशेषत: राष्ट्र मंडलीय संबंधों के मंत्री फ़िलिप नोएल निश्चित ही पाकिस्तान से सहानुभूति रखते थे। महाराजा हरिसिंह ने कई मौक़ों पर कहा कि माउंटबेटन ने उन पर कई बार पाकिस्तान के साथ सम्मिलन का दबाव डाला, लगभग धमकाने की स्थिति तक।

माउंटबेटन ने स्वीकारा भी कि वे कश्मीर के पाकिस्तान में सम्मिलन की तीव्र इच्छा रखते थे, लेकिन यह तीव्र भावना स्वार्थी या बदला चुकाने की इच्छा से प्रेरित नहीं थी बल्कि इसके सुसंगत कारण थे- मसलन भौगोलिक स्थिति, सामाजिक रूप आदि। केवल माउंटबेटन ही नहीं, कश्मीर के सम्मिलन के विषय में अधिकतर अंग्रेज़ों का मानस जनसंख्या के क़ौमी स्वरूप, भौगोलिक संलग्नता और पाकिस्तान में प्रवेश की सुगमता से प्रभावित रहता था। लेकिन इतना सच है कि इन अंग्रेज़ों के मन में पाकिस्तान के इस दृष्टिकोण के प्रति पूर्वाग्रह था। यही वजह थी कि वे इस सत्य को स्वीकार करने के लिए कभी तैयार नहीं हुए कि भारत ने कश्मीर को अपने साथ जुड़ने के लिए विवश नहीं किया बल्कि यक़ीनन पाकिस्तान ने ही उसे इसके लिए मजबूर किया। जम्मू- कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान के उच्चाधिकारियों से हुई चर्चा में एक से अधिक बार वी शंकर (पटेल के सचिव) ने कहा था कि पाकिस्तान ने जिस ढंग से इस मुद्दे पर ज़ोर दिया वैसा उसने यदि नहीं किया होता तो भारत या पाकिस्तान से किसी प्रकार संबंध रखे बिना बहुत संभव है कि जम्मू- कश्मीर के लोग स्वयं ही राज्य का भविष्य निर्धारित कर देते।

माउंटबेटन के संबंध ब्रिटेन के अनुदार दल के नेताओं के साथ भी थे और विन्स्टन चर्चिल के साथ उनकी व्यक्तिगत मित्रता थी। माउंटबेटन के स्टॉफ में चर्चिल के अति निकट माने जाने वाले इस्मे (बाद में लॉर्ड) की उपस्थिति भी इसमें सहयोग देती थी। चर्चिल  भारत और भारत की आजादी के घोर विरोधी थे। वे लंदन में बैठकर भारत और भारत के लोगों को सिर्फ़ कोसते रहते थे। इस संबंध में सरदार पटेल ने चर्चिल को लताड़ते हुए एक पत्र 19  दिसम्बर, 1947 को इस्मे को भेजा था ( पढ़िए वह पत्र)। केम्पबेल जॉन्सन ने अपनी पुस्तक ‘ मिशन विद् माउंटबेटन’ में जो विवरण दिया है, उससे स्पष्ट होता है कि माउंटबेटन कश्मीर की सहायता की विनती स्वीकार करके वहाँ भारतीय सेना भेजने के विरुद्ध थे ( संभवत: उनका यह रुख़ उन पर भारत के लिए दुष्टात्मा कहे जाने वाले चर्चिल के प्रभाव को ही कहता है)। कुल मिलाकर, इस सब के बावजूद माउंटबेटन ऐसी नीति अपना सके, जिसमें उन्हें बहुत लोगों को कष्ट नहीं पहुँचाना पड़ा। और जहाँ उन्होंने ऐसा किया भी, वहाँ संबंधित पक्षों ने उसके परिणामस्वरूप होने वाले कष्ट को मौन स्वीकृति के भाव से सह लिया। लेकिन यह महानता भारतीय नेताओं की थी, माउंटबेटन की नहीं।

19 दिसम्बर, 1947 का सरदार का पत्र
चर्चिल के भारत विरोधी बयान पर बरस पड़े पटेल

चर्चिल के भारत विरोधी बयानों की प्रतिक्रिया में सरदार पटेल ने इस्मे को कड़क चिट्ठी भेजी। इस पत्र में सरदार ने लिखा- जैसा कि आप जानते हैं, हमारा देश भूतकाल में वर्षों तक ग़लतबयानी का शिकार रहा है। हमने सोचा था कि भारत के आज़ाद हो जाने के बाद अतीत के सारे विवाद बंद हो जाएंगे।इंग्लैंड के सार्वजनिक जीवन के प्रसिद्ध नेता भारत की स्वतंत्रता के अपने पुराने विरोध को भूल जाएंगे और मित्रता तथा सद्भावना का दृष्टिकोण अपना लेंगे। परन्तु यह देखकर मुझे खेद होता है कि हमारे पुराने विरोधी, जिनमें आपके वयोवृद्ध मुखिया चर्चिल भी शामिल हैं, जब भी हम पर कीचड़ उछालने का मौक़ा मिलता है, तब- तब अपना वही पुराना राग अलापते हैं। मैं हिम्मत के साथ कहता हूँ कि यह बात इसलिए और दुखद हो जाती है कि दुनिया की  दूसरी किसी जनता ने और दूसरे किसी देश ने पीढ़ियों की कड़वाहट को इतनी जल्दी और आसानी से भुलाकर क्षमा नहीं की होती जितनी आसानी से हमने कर दी है। जैसे एक रात में ही हमने भूतकाल को दफ़ना दिया और आपके राष्ट्र के साथ सर्वथा नए संबंध बना लिए। आपने स्वयं ही देखा है कि 15 अगस्त के दिन मनोवैज्ञानिक अवसर उपस्थित होने पर भी किस तरह मैत्री भाव और सद्भावना की प्रचंड अभिव्यक्ति भारत में हुई। अब ये आपके राजनीतिज्ञों और आपके देश का काम है कि उस मित्रता और सद्भावना का पूरा लाभ उठाएँ और पुराने विवादों को नए रूप में प्रस्तुत कर के इन भावनाओं का गला न घोटें।

आपका यह अनोखा सौभाग्य रहा कि आप लॉर्ड माउंटबेटन के साथ भारत आए और इसलिए निकट से यह देख सके कि आपकी जनता ने हमारे प्रति जो अंतिम सद्भावना प्रकट की, उसकी भारत पर क्या प्रतिक्रिया हुई। आपने यह भी देखा कि हमने उस कठिन कार्य का कैसे सामना किया, जो किसी भी देश की सरकार के सामने कभी उपस्थित हुआ हो। आप इस बात के भी साक्षी रहे हैं कि हमारे देश ने और प्रशासन तंत्र ने, विदेशी हुकूमत से स्वराज में होने वाले महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिवर्तन को कैसे सुंदर ढंग से अपना लिया है। अब अपने वयोवृद्ध नेता को यह विश्वास कराना आपका काम है कि यहाँ आपको निकम्मे आदमियों के साथ काम करना पड़ा या शक्ति- सम्पन्न आदमियों के साथ। मुझे विश्वास है कि अगर आप कंज़र्वेटिव पार्टी के सदस्यों में रही भारत के लोगों और कामकाज संबंधी ग़लतफ़हमियों को दूर करने के लिए कुछ कर सकें, और ख़ासतौर पर उसके प्रतिभाशाली नेता की ग़लतफ़हमियों को दूर करने में सफल हों, तो आप न केवल इस देश की बल्कि अपने देश की भी महत्वपूर्ण सेवा करेंगे। क्योंकि मैं मानता हूं कि हमारे देशों के बीच मैत्री और सद्भावना बने रहने में दोनों का हित है। कहना चाहूँगा कि जब कभी सामाजिक या सरकारी कार्यों के अवसरों पर हमारा मिलन हुआ, तब मुझे हार्दिक आनंद हुआ है। आपने अपने मन के सच्चे विचार, जिस स्पष्टता और खुले ढंग से हमारे सामने रखे, उनका हमने सदा आदर के साथ स्वागत किया है। हमें लगा कि आपकी सलाह में मनुष्यों तथा परिस्थितियों का वज़न है, जिसका विरले अवसरों पर ही लाभ मिलता है, विशेषत: ऐसे संकटकालीन समय में जिसमें से हम लोगों को गुज़रना पड़ा है। 

अत: मैं सच्चे ह्रदय से आपके लिए अपनी शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ और आशा करता हूँ कि जब कभी आपको छुट्टी मनाने की इच्छा हो, तब आप यह न भूलें कि यहाँ हमारा हार्दिक स्वागत आपकी प्रतीक्षा कर रहा है।

जो प्रस्ताव नेहरू- पटेल ने नहीं देखे, वे जिन्ना के सामने रखे गए
जब माउंटबेटन, जिन्ना के पीछे व्यर्थ ही दिल्ली और लाहौर के बीच बार- बार दौड़ते रहे तब भारत में परिस्थिति का संचालन करने में उनका उद्देश्य समझौतावादी रहा। इस प्रक्रिया में वे जिन्ना को कोई भी कड़ी बात कहने से बचते रहे और उल्टे भारतीय नेताओं की उदारता का बेजा फ़ायदा उठाते गए। उन्होंने पाकिस्तान सरकार के समक्ष जो मूल प्रस्ताव (देखें मूल प्रस्ताव) रखे थे, उनमें उन्होंने भारत सरकार को मजबूर कर दिया था कि जैसे ही आक्रमणकारी कश्मीर छोड़कर लौट जाएँ, तुरंत भारत अपनी सेना कश्मीर से हटा लेगा और संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में कश्मीर में जनमत संग्रह कराया जाएगा। हैरत की बात है कि ये बातें अपने प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री (नेहरूजी और पटेल) को बताने के पहले एक नवम्बर 1947 को नवाबजादा लियाक़त अली खान (पाक प्रधानमंत्री) और जिन्ना को बता दी गई।

सरदार और नेहरूजी के समक्ष उन्होंने इसका ज़िक्र तक नहीं किया कि इस मसौदे में जूनागढ़ का भी समावेश होगा। यह तथ्य दिखाता है कि समझौता कराने और अपनी वाहवाही का डंका पिटवाने के लिए वे किस हद तक जाने के लिए तैयार थे। दो नवम्बर 1947 को नेहरूजी को लिखा गया माउंटबेटन का पत्र (देखें पत्र) बताता है कि उन्होंने नेहरू और सरदार को बताए बिना ही ये प्रस्ताव बना लिए थे। पत्र से यह भी पता चलता है कि वे किस हद तक सोचते थे कि समझौते की खोज में वे भारतीय नेताओं को झुकने के लिए समझा ही लेंगे। परन्तु वी शंकर ने पूरे विश्वास के साथ कहा कि यदि इस बारे में नेहरूजी और सरदार से पहले परामर्श किया होता तो वे इन प्रस्तावों को कभी स्वीकार नहीं करते। क्योंकि दोनों नेताओं ने कश्मीर और जूनागढ़ के बारे में जो नीति अपनाई थी, माउंटबेटन उससे काफ़ी परे चले गए थे।

एक नवम्बर, 1947 को हुई लाहौर कान्फ्रेंस से माउंटबेटन के लौटने के बाद केम्पबेल जॉन्सन ने उनसे जो मुलाक़ात की, उसके विवरण से मालूम होता है कि माउंटबेटन स्पष्ट वक़्ता होते हुए भी अतिशय आशावादी थे। हैदराबाद की स्थिति पर भी उन्होंने ऐसी ही अतिशय आशावादिता दिखाई थी, जो सर्वथा बेमानी थी। चूँकि उन्हें अपने छोटे से कार्यकाल में समझौतों के कई तमग़े अपनी वर्दी पर लगाने थे, इसलिए समझौते की खोज में वे भारत सरकार की मूल स्थिति को हल्की बनाने के लिए अथवा सरकार को ऐसा करने की सलाह देने के लिए हमेशा तैयार रहते थे और ऐसा करने में उनकी अतिशय आशावादिता उनसे यह कल्पना भी करवा लेती थी कि वे अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल होंगे। इसके लिए वे गांधीजी पर और विशेषत: पंडित नेहरू पर जो उनका प्रभाव था, उस प्रभाव पर निर्भर करते थे। सच पूछा जाए तो गांधीजी और पंडित नेहरू अक्सर अपने श्रेष्ठतर विवेक के विरुद्ध जाकर माउंटबेटन की बात मान लेते थे।

माउंटबेटन का पत्र नेहरूजी को
तारीख़
2 नवम्बर,1947

मि. जिन्ना और मि. लियाक़त अली खान के साथ हमारी जो संयुक्त वार्ता हुई, उसकी मुख्य विषय- वस्तु को यथासंभव अधिक से अधिक स्पष्ट रूप से पुनर्गठित करने के प्रयत्न में ही आज का मेरा और इस्मे का अधिकांश समय व्यतीत हुआ। हम दोनों यह मानते हैं कि साथ में भेजे जा रहे वार्ताओं के विवरण उतने ही स्पष्ट हैं, जितने स्पष्ट वे प्रस्तुत किए जा सकते थे। इस बात को ध्यान में रखते हुए कि उस वक़्त कोई नोटिस नहीं लिए गए थे और केवल मि. जिन्ना के साथ हुआ वार्तालाप ही तीन घंटे से ज़्यादा चला था, ये विवरण यदि आप उपप्रधानमन्त्री (पटेल) को दिखाएँगे तो मुझे आनंद होगा। मेरे साथ परामर्श किए बिना यदि अन्य किसी व्यक्ति को ये विवरण यदि न दिखाएँ तो मैं आपका कृतज्ञ रहूँगा।
जब हम पहुँचे, उस समय इसमें कोई संदेह नहीं कि लियाक़त अली और जिन्ना को ऐसा लगता था कि भारतीय उपनिवेश के साथ कश्मीर का स्थाई सम्मिलन सिद्ध करने के लिए आरंभ से अंत तक एक सुनिश्चित, दीर्घ काल से रचा हुआ, गंभीर षड्यंत्र था। हम दोनों ने उनका यह भ्रम दूर करने का कठिन श्रम किया, परन्तु हम विश्वास से नहीं कह सकते कि इसमें हमें सफलता मिली।
मैं पत्र के साथ चर्चा के लिए एक संभव आधार के रूप में अत्यन्त मोटी रूपरेखा वाला नोट भेजता हूँ, इसके बाद मैं सुझाऊँगा कि आप लियाक़त अली को एक तार करें और उसमें इस लड़ाई को बंद करने के बारे में अपना प्रस्ताव रखें। शायद आप और उप प्रधानमंत्री कल प्रात: प्रतिरक्षा समिति की बैठक के बाद इस विषय में चर्चा के लिए मेरे साथ रुकेंगे।

क्या मैं आपको उस रेडियो पर प्रसारित भाषण के लिए हार्दिक अभिनंदन दे सकता हूँ, जिसे मैंने अभी- अभी पढ़ा है और जो प्रशंसनीय है तथा मि. जिन्ना के वक्तव्य से इतना विपरीत है।
धन्यवाद

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पाक सरकार के सामने रखे मूल प्रस्ताव
1. केवल भारत- पाकिस्तान और कश्मीर की सरकारों के लिए ही नहीं, विश्वशांति के लिए इस बात का सर्वाधिक महत्व है कि कश्मीर में चल रहा युद्ध यथासंभव जल्दी से जल्दी बंद हो।
2. इस उद्देश्य को सिद्ध करने की उत्तम आशा (यह एकमात्र आशा न हो तो भी) इस बात में निहित है कि दोनों देशों के अधिकृत प्रतिनिधि बहुत जल्दी परस्पर मिलें।
3.  एक बार कश्मीर आक्रमण से मुक्त हो जाए और वहाँ शांति तथा व्यवस्था स्थापित हो जाए, उसके बाद भारत सरकार की कश्मीर में अपनी सैन्य टुकड़ियाँ रखने की बिलकुल इच्छा नहीं है। इसलिए वह ऐसा वचन देने को तैयार है कि वह अपनी सेना कश्मीर से हटा लेगी।
4. भारत सरकार की यह हार्दिक इच्छा है कि कश्मीर में यथासंभव, जल्दी से जल्दी और शुद्ध से शुद्ध पद्धति से जनमत संग्रह किया जाना चाहिए। उसका यह सुझाव है कि संयुक्त राष्ट्र संघ से यह विनती की जाए कि वह जनमत संग्रह के लिए अपने निरीक्षक भेजे। भारत सरकार यह स्वीकारने के लिए भी तैयार है कि जब तक जनमत संग्रह का काम चले, तब तक भारत और पाकिस्तान की संयुक्त सेना वहाँ हाज़िर रहे।
5. भारत सरकार यह सुझाती है कि दोनों सरकारों को उन राज्यों के जिनमें सम्मिलन का प्रश्न विवाद का विषय बना हुआ है, सम्मिलन की पद्धति के संबंध में की जाने वाली सरकारी घोषणा के स्वरूप के बारे में सहमत हो जाना चाहिए। चर्चा के आधार के रूप में एक मसौदा संलग्न है।
6. भारत सरकार का सुझाव है कि उपर्युक्त प्रस्तावों पर जल्दी से जल्दी गोलमेज़- परिषद में चर्चा होना चाहिए।

जहाँ पाक सेना जमी थी, वहाँ भारत को हमला नहीं करने दिया
कश्मीर पर पाकिस्तानी आक्रमण के बाद यद्यपि परिस्थिति ने कुछ ऐसा रूप ले लिया था कि खुले संघर्ष की दिशा में ही दोनों देश बढ़ रहे थे तथा भारतीय सेना, सैनिकों और युद्ध सामग्री की दृष्टि से काफ़ी हानि उठा रही थी। फिर भी माउंटबेटन खुले संघर्ष को रोकने के प्रयत्न में लगे रहे। इस दौरान पाकिस्तान कबाइलियों के ज़रिए और कबाइलियों में स्वयंसेवकों के वेश में शामिल नियमित सैनिकों के ज़रिए सारी कार्रवाई कर रहा था (यहाँ यह उल्लेखनीय है कि कबाइलियों के नाम से जो घुसपैठिए पाकिस्तान की ओर से कश्मीर में आते हैं, उनमें पाकिस्तान के नियमित सैनिक ज़्यादा होते हैं)।

बाद में माउंटबेटन के भारत छोड़ने से पहले पाकिस्तान की नियमित सैन्य टुकड़ियाँ भारी संख्या में खुले तौर पर लड़ाई में प्रवेश कर चुकी थीं। सबसे बुरी बात तो यह थी कि माउंटबेटन की सलाह से भारतीय वायुसेना ने जिस गलियारे पर बम वर्षा नहीं की थी, वहाँ पाकिस्तान की नियमित सेना आकर जम गई थी और उसे उन्होंने अपनी आधार भूमि बना लिया था। इसके बाद तो ख़ूँख़ार लड़ाइयाँ लड़ी गईं, जिनमें हमें ब्रिगेडियर उस्मान जैसा शक्तिशाली और महत्वपूर्ण अधिकारी खोना पड़ा। फिर भी हम जनवरी, 1949 तक, जब युद्ध- विराम ने हमें अपने पंजे में ले लिया, पाकिस्तानियों को राज्य से बाहर निकालने में असफल रहे। इसके पहले 15 अगस्त 1948 को माउंटबेटन ने लंदन से पं. नेहरू को एक विशिष्ठ पत्र लिखकर अनुरोध किया था कि युद्ध की घोषणा को टाला जाए। इस पत्र में उन्होंने पं. नेहरू को विश्वास दिलाया कि ब्रिटिश सरकार भारत को अपना सच्चा मित्र मानती है। सामान्य अर्थ में शायद यह कथन सच्चा हो, परन्तु कश्मीर के प्रश्न से इसका कोई संबंध नहीं था, ऐसा लगता है। उन्होंने पत्र में प्रत्यक्ष युद्ध शुरू करने के अविवेक के बारे में अपना मत प्रकट किया और अनुरोध किया कि संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ थोड़ा धीरज रखा जाए।

उन्होंने यह करुण श्रद्धा (जिसकी बाद की घटनाओं ने पुष्टि की है) प्रकट की कि संयुक्त राष्ट्र संघ के सुयोग्य, कार्यक्षम तथा प्रामाणिक निरीक्षक पाकिस्तानी सेना के जमाव को रोकेंगे, पाकिस्तान द्वारा किए जाने वाले उल्लंघनों की सूचना देंगे और इसके फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ तथा दुनिया के समक्ष पाकिस्तान के पक्ष की सुनवाई नहीं होगी। यह संभव है कि इस मूल्याँकन ने ही पं. नेहरू को सरदार पटेल की इस सलाह की उपेक्षा करने की प्रेरणा दी हो कि यूएनसीआईपी के 13 अगस्त 1948 के प्रस्ताव को, जिसे भारत ने स्वीकार किया था परन्तु पाकिस्तान ने अस्वीकार कर दिया था, अंतिम शब्द माना जाए और जब तक पाकिस्तान इस प्रस्ताव को स्वीकार न करे तब तक कोई चर्चा न की जाए। यदि पटेल की इस सलाह पर अमल किया होता तो संभव था कि सैनिक स्थिति के दबाव में जिसने 1948 के अंत में अनुकूल मोड़ लिया था, हमने पाकिस्तानी सेना को कश्मीर के बाहर खदेड़ने में काफ़ी प्रगति की होती।

हो सकता है इसका परिणाम अंत में दोनों उपनिवेशों के बीच खुले युद्ध के रूप में आता, लेकिन उस स्थिति में युद्ध को बंद कराने के लिए विदेशी सत्ताएँ बीच में पड़ी होतीं और हमारी अधिक शक्तिशाली सेना के कारण संभवत: हमने बड़े भू- भाग पर अधिकार कर लिया होता और पाकिस्तान की अपेक्षा हम सौदा करने की अधिक अच्छी स्थिति में रहे होते। वस्तुस्थिति यह है कि भारत ऐसी स्थिति में धकेल दिया गया था, जिसमें भारत और पाकिस्तान के बीच राज्य की विभाजन रेखा सामरिक नीति की दृष्टि से जितनी महत्वपूर्ण हो सकती थी या होनी चाहिए थी, उससे बहुत कम महत्व रखती थी। बहुत संभव है कि सरदार पटेल की सलाह मानी गई होती तो 1949 में ही इस समस्या का हल आ गया होता और वह आज तक हमारा सिरदर्द न बनी रहती।

करोड़ों का क़र्ज़ लेकर माफ़ करवा लेना ही उनकी फ़ितरत 
आज़ादी के बाद भी कश्मीर के बारे में कांग्रेस या उसके सर्वेसर्वा की नीति ढुलमुल ही रही। वैसे आज़ादी के बहुत बाद तक भी कांग्रेसी नेता अपनी कश्मीर नीति की डींगें हाँकते नहीं अघाते थे, पर संक्षेप में कहा जाए तो हमेशा से कश्मीर में कांग्रेस की एक ही नीति रही है- ‘ नेकी कर और झेलम में डाल’। करोड़ों रुपए ख़र्च किए पर कभी हिसाब नहीं माँगा। अनेक पाप करने वाले अब्दुल्ला परिवार को आँच तक नहीं आने दी। हिसाब देखने एक बार आयकर वाले श्रीनगर पहुँच गए थे, भाई लोगों ने उन्हें इस तरह घेर कर मारा जैसे चौके में घुस आए कुत्ते को मार रहे हों। हालाँकि युद्धविराम के बाद जितना कुछ कश्मीर हमारे पास बचा, वह आज भी भारत का अभिन्न अंग है, लेकिन उसको विशेष दर्जा और इसके बावजूद अब्दुल्ला परिवार (चाहे शेख अब्दुल्ला रहे हों या उनके बेटे फ़ारूख अब्दुल्ला) की यदा- कदा स्वतंत्र कश्मीर वाली दबी- छिपी महत्वाकांक्षा ने इस राज्य को भारत के बाक़ी राज्यों से अलग श्रेणी में रख दिया और अब्दुल्ला परिवार के भारत के प्रति पूर्ण समर्पण के अभाव में पाकिस्तान की नजर में इस राज्य को भारत की कमज़ोरी के रूप में पेश किया। मुस्लिम बहुलता यहाँ पाकिस्तान के डोरे डालने की खास वजह रही।

दरअसल, भारत से लड़ने की ताक़त पाकिस्तान के पास कभी नहीं रही। वहाँ की अस्थाई राजनीति और सत्ता में स्थायित्व का अभाव ही हमारे कश्मीर के लिए दुखदायी रहा। शिया- सुन्नी का झगड़ा वहाँ अब तक नहीं सुलझ पाया। लोग एक- दूसरे को मारने- काटने पर उतारू हैं। यह मार- काट और सरकारों में स्थायित्व का अभाव एवं अन्य विकार चीख़- चीख़कर यही कहते हैं कि धर्म पर आधारित राष्ट्र कभी सफल नहीं हो सकता। नेपाल जैसा हिन्दुवादी राष्ट्र भी इतिहास से सबक़ सीख कर लोकतांत्रिक हो गया है। यहाँ यह अभिप्राय क़तई नहीं है कि हिन्दुत्व लोकतांत्रिक नहीं हो सकता। स्वामी विवेकानंद, ऋषि बर्वे और महर्षि अरविंद का हिन्दुत्व लोकतंत्र से भी कहीं ऊपर आता है। लेकिन पाकिस्तान में कट्टरता चरम पर पहुँच कर अट्टहास करती रही। मुस्लिम कट्टरवाद ने महिलाओं सालों तक पढ़ने नहीं दिया। लोगों को मनचाहा व्यवसाय तक करने नहीं दिया और आज हालत यह है कि किसी भी बाहरी ताक़त की कठपुतली बनकर नाचने के आदी हो चुके हैं वहाँ के कर्ता- धर्ता। जिन्ना ने अंग्रेज़ों की कठपुतली बनकर अलग राष्ट्र माँगा और अब जब अंग्रेज़ों के राज में भी सूरज के डूबने का सच सामने आ गया है, तब भी पाकिस्तान किसी न किसी की कठपुतली बना हुआ है। कश्मीर मुद्दे को वहाँ के हुक्मरान अपनी घरेलू समस्या से जनता का ध्यान हटाने के लिए इस्तेमाल करते आए हैं।

भारत- पाकिस्तान के बीच कश्मीर मुद्दे पर जब- तब समझौता वार्ता होती रहती है, लेकिन आज तक यह भी तय नहीं हो पाया है कि दोनों देश क्या चाहते हैं? समझौता अथवा समाधान क्या होना चाहिए और अपनी- अपनी चाहत में दोनों ओर से कितना और क्या झुकाव संभव है। इतनी सी बात तय न कर पाने के बावजूद भाई लोग बड़े- बड़े प्रतिनिधिमंडल लेकर आते- जाते हैं। चाय- नाश्ते के बाद वार्ता को सफल या विफल बता दिया जाता है, बस हो गई छुट्टी। सफलता क्या मिली, आज तक कोई नहीं जानता। पाकिस्तानी सत्ता पर जिया उल हक़ बैठे हों, भारत से सौ साल तक लड़ने की क़सम खाने वाले ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो क़ाबिज़ हों या उनकी बेटी बेनज़ीर हो, कश्मीर में हमेशा घुसपैठ होती रही। उग्रवादियों को प्रशिक्षण देकर और हथियार देकर उन्हें कश्मीर में उत्पात मचाने के लिए हमेशा भेजा जाता रहा। केसर की क्यारियाँ शोले उगलने लगीं और सेब की जगह बाग़ों में हथगोले और बारूद पैदा होने लगा। पर्यटन के क्षेत्र में करोड़ों कमाने वाले कश्मीर में आज पाक समर्थित उग्रवाद को दबाने के लिए भारत सरकार का अरबों रुपया खप रहा है। फ़ारूख अब्दुल्ला इतने चतुर हैं कि वर्षों उन्होंने केंद्र की सरकार को उलझाए रखा। क़र्ज़ा लेते और माफ़ करवा लेते। जिस दल की केंद्र में सरकार होती थी, वे उसी के साथ हो जाते थे। पहले लंबे समय तक कांग्रेस के साथ रहे। फिर वीपी सरकार के वक़्त जनता दल से दोस्ती गाँठी, फिर देवगौड़ा और गुजराल के जमाने में संयुक्त मोर्चे के साथ हो गए और 1998 में अटल जी के आते ही उन्होंने भाजपा की गठबंधन सरकार का दामन थाम लिया।

… तो जिन्ना बैरिस्टर नहीं, फ़क़ीर होते
जहाँ तक पाकिस्तान का सवाल है, वहाँ के हुक्मरान ने भारतीय मुसलमानों के साथ अन्याय होने की झूठी और निराधार बात का काफ़ी प्रचार किया जबकि तथ्य यह है कि भारत में मुसलमानों के साथ अन्याय होता तो जिन्ना बैरिस्टर नहीं, फ़क़ीर होते। जब- तब भारतीय मुसलमानों की भावनाओं को उभारकर उनमें यह भावना भरने की कोशिश की गई है कि मुसलमानों के लिए समूचा भारत ही अन्यायपूर्ण है, जबकि पाकिस्तान में बाद में गए बिहारी मुसलमान आज भी मुहाजिर के बेचारगी भरे संबोधन से जाने जाते हैं। वे बेचारे नागरिक की हैसियत भी नहीं पा सके। पाकिस्तानी समाज इन्हें आज तक अपने में नहीं मिला पाया। फिर पाकिस्तानी हिन्दुओं की स्थिति तो दूर की बात है, भारतीय मुसलमानों की चिंता में घड़ियालों आँसू बहाने वाले पाक शासकों ने कभी यह नहीं सोचा कि उनके देश में अल्पसंख्यक हिन्दुओं की क्या हालत है?

दरअसल, पाकिस्तान में रहने वाले हिन्दुओं में 95% वे हैं जो भारत में हरिजन कहे जाते हैं। आप किसी भी पाकिस्तानी अस्पताल में जाएंगे तो वहाँ नर्स या डॉक्टर किसी दुर्गा या लक्ष्मी को पुकारते मिल जाएंगे। … और उसी पल किसी कोने में, कूड़े की टोकरी या झाड़ू हाथ में लिए ये महिलाएँ नज़र आ जाएँगी। सन् 1947 में जब हिन्दुओं का क़त्लेआम हो रहा था, तब भी सबसे ज़्यादा सुरक्षित ये हरिजन ही थे। वजह यह थी कि इस्लाम के नाम पर जिहाद करती पैनी छुरी या तलवार में भी इतनी दूरदर्शिता ज़रूर थी कि कल उनका मैला ढोने के लिए इन लोगों की ज़रूरत पड़ी तो क्या होगा? क्योंकि सबको एक नज़र से देखने वाले इस्लाम ने तो ये गुंजाइश छोड़ी नहीं थी। हाँ काफ़िरों के यहाँ ज़रूर इसका रेडीमेड इंतज़ाम था। यही वजह है कि पिछले सत्तर सालों में बलात् इस्लाम क़बूल कराने की मुहिम के बावजूद इन हरिजनों को मुसलमान बनाने की कोशिश नहीं की गई, क्योंकि हो सकता था मोमिन होते ही मैला ढोने या झाड़ू लगाने के काम से ये तौबा कर लेते!

पाकिस्तान में हिन्दुओं की हालत बदतर
पाकिस्तान के तक़रीबन सात लाख हिन्दुओं में से अधिकांश सिंध सूबे के अंदरूनी गाँवों और क़स्बों में रहते हैं। जैसे अमरकोट। गुजरांवाला। बाक़ायदा हिन्दू गाँव और मोहल्ले हैं। इन हिन्दुओं को मंदिर में जाने की इजाज़त तो है लेकिन ज़्यादा शोर- शराबा करने की नहीं। गाँवों में रहने वाले हिन्दुओं में से  कुछ अमीर ज़मींदार हैं। इनका यहाँ के ग़रीब मुसलमानों पर रसूख़- रुआब भी है, लेकिन पाकिस्तान के कुल राजनीतिक- सामाजिक ढाँचे में इनकी हैसियत वही है जो भारत में एंग्लो इंडियंस की है। भारत में एंग्लो इंडियंस की तरह पाकिस्तान में भी हिन्दुओं के लिए राष्ट्रीय और सूबाई असेंबली में दो- दो सीटें आरक्षित हैं।

कहने को तो भारत की तरह आम सीटों पर, पाकिस्तान में भी वहाँ के अति- अल्पसंख्यक हिन्दू चुनाव लड़ सकते हैं पर भारत के ठीक विपरीत, पाकिस्तान में आम सीटों पर हिन्दू प्रत्याशी चुनाव नहीं लड़ते। यही वजह है कि पाकिस्तान के हिन्दू नेता उतने मुखर नहीं हैं जितने कि भारतीय मुस्लिम नेता। कुछ गिने- चुने हिन्दू परिवार, जैसे करांची का गोकुलदास ख़ानदान ज़रूर ऐसे हैं जिनके पास लंबी- चौड़ी ज़मीन- जायदाद है और जिसकी बदौलत उन्होंने काफ़ी पैसा कमाया है। पर ये लोग भी अपने रसूख़ और रहन- सहन को ढंका- छिपाकर रखते हैं। इसी प्रकार गाँवों में कुछ राजे- रजवाड़े हैं- जैसे राजा चंदर सिंह का परिवार। ये पाक नेशनल असेम्बली के सदस्य रहे हैं और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के रिश्तेदार कहे जाते हैं। जब वीपी सिंह भारत के प्रधानमंत्री बने, राजा चंदर सिंह का रुतबा कुछ बढ़ गया था। ये पाकिस्तान के सबसे प्रभावशाली हिन्दू माने जाते थे।

राजा चंदर सिंह जैसे भाग्यशाली बिरले ही होते हैं जो हिन्दू होकर भी पाकिस्तान में अपना रुतबा क़ायम किए हुए थे, वर्ना पाकिस्तान के आम हिन्दू ने तो ख़ुद को वहाँ की सभ्यता और संस्कृति में उसी प्रकार जज़्ब कर लिया है, जैसे आटे में नमक।  … और नमक थोड़ा  भी ज्यादा हो तो जीभ पर रड़कने लगता है, जिसका इलाज करने में देर नहीं की जाती। पाकिस्तानी अख़बारों में आए दिन ख़बरें छपती रहती हैं कि अमुक गाँव में फ़लाँ हिन्दू ने मौलवी साहब  से कलमा पढ़ा और ख़ुशी- ख़ुशी इस्लाम क़ुबूल किया (जबकि अमूमन यह सब ज़बरन  और दबाव डालकर ही करवाया जाता है)। भारतीय उच्चायोग के पास इन सब की सूची है, जिन्होंने हिन्दू धर्म छोड़कर ज़बरन इस्लाम क़ुबूल किया। ख़ासकर, गाँवों में हिन्दू लड़की की मुस्लिम लड़के से शादी और उसका इस्लाम क़ुबूल करना आम बात है। भारतीय मुसलमानों द्वारा यहाँ के (भारत के) हिन्दुओं से धर्म परिवर्तन कराने का तरीक़ा अलग है। प्राय: भारतीय मुस्लिम लड़की यदि बहुसंख्यक हिन्दू युवक से शादी करती है तो धर्म लड़की नहीं बदलती बल्कि उस युवक को इस्लाम क़ुबूल करना पड़ता है।

खैर, पाकिस्तान की हिन्दू लड़कियों की मुस्लिम युवकों से जबरन शादी कराने के हालात से वहाँ के हिन्दू ख़ुश नहीं हैं, वे इस फ़िराक़ में रहते हैं कि किसी तरह उनके बच्चे या तो भारत या फिर पश्चिम के किसी देश में चले जाएँ। लेकिन अक्सर उनकी इस तीव्र किन्तु निर्बल इच्छा का ख़ून हो जाया करता है क्योंकि भारतीय मुस्लिमों में जो ताक़त है, पाकिस्तानी हिन्दुओं में उतनी कबूतर नहीं कि जो मन में आए, खुलेआम कर सकें। फिर ये पाकिस्तानी हिन्दू, भारत की ओर आशा की नज़र से देख भी नहीं सकते क्योंकि ऐसी हरकत पर उन्हें अपनी आँख गँवा बैठने का डर चौबीसों घंटे बना रहता है। यही वजह है कि पाकिस्तानी सत्ताधीश इस ओर से सर्वथा बेफ़िक्र रहते हैं क्योंकि कुल आबादी का एक प्रतिशत, बल्कि इससे भी कम हिस्सा, किसी की मदद से जिहाद छेड़ना भी चाहे तो भी कुछ कर पाना मुमकिन नहीं है। अब ऐसे में पाकिस्तानी शासकों का भारतीय मुस्लिमों के नाम पर घड़ियाली आँसू बहाना और ख़ासकर कश्मीरी मुस्लिमों पर तथाकथित अत्याचार का दुष्प्रचार करना कहाँ तक ठीक है? उन्हें पहले अपने गिरेबां में झाँकना चाहिए।

कश्मीर को राष्ट्र संघ में धकेलने के पीछे माउंटबेटन
हम इसे कितना ही आंतरिक या द्विपक्षीय बताएँ लेकिन सच यह है कि जम्मू- कश्मीर की समस्या आज भी हमारे साथ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से जुड़ी हुई है। अंतरराष्ट्रीय दृष्टि से इसलिए कि वह संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यसूची पर बनी रहती है और पाकिस्तान समय- समय पर कम या अधिक, हिंसक तरीक़े से या तीव्रता से उसे वहाँ उठाता रहता है। हमें शर्मिंदगी होती है जब अत्याचारी अंग्रेज़ों की टोली का एक सदस्य माउंटबेटन भारत छोड़ने के बाद लंदन से पं. नेहरू को एक पत्र (तारीख़ 15 अगस्त, 1948) लिखकर कहता है ” आपको कोई सलाह देने की बात तो छोड़ूँ, किसी प्रकार की टीका करने का अधिकार भी अब मुझे नहीं है। फिर भी एक तरह से मुझे लगता है कि आज जिस स्थिति का सामना आपको करना पड़ रहा है, उसके लिए मेरी ज़िम्मेदारी अभी बनी हुई है, क्योंकि मैंने ही कश्मीर की समस्या संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने के लिए आपको प्रोत्साहित किया था”। यह स्वीकारोक्ति चीख़- चीख़ कर कह रही है कि माउंटबेटन की सलाह पर ही नेहरूजी ने कश्मीर मुद्दे को राष्ट्र संघ में न ले जाने की सरदार पटेल की अपील को ठुकरा दिया होगा।

वैसे जम्मू- कश्मीर का प्रश्न ताशकंद क़रार तथा शिमला क़रार में भी सामने आया था। हम कितने ही इस विचार के भ्रम में क्यों न रहें कि कश्मीर की समस्या अब अंतरराष्ट्रीय रजिस्टर में नहीं रह गई है, हम एकतरफ़ा विचार से उसे मिटा नहीं सकते। राष्ट्रीय दृष्टि से कश्मीर की समस्या मौजूद है, क्योंकि न केवल यह राज्य आज भारतीय संघ के अन्य घटकों से संविधान में विशिष्ठ स्थिति भोगता है, बल्कि राज्य में कुछ तत्व आज भी भारत के साथ उसके मिलने तथा भारत के साथ उसके संबंध के स्वरूप के बारे में प्रश्न उठाते रहते हैं। जानकार लोगों का यह सर्वमान्य विश्वास है कि यदि जम्मू- कश्मीर का प्रश्न सरदार पटेल पर छोड़ा गया होता, तो हमेशा के लिए इसका समाधान हो सकता था। कहा जाता है कि एक बार शेख अब्दुल्ला और बख़्शी ग़ुलाम मोहम्मद इस विनती के साथ सरदार के पास पहुँचे थे कि यह समस्या वे अपने हाथ में ले लें, परन्तु सरदार ने इनकार कर दिया और कहा कि यह समस्या प्रधानमंत्री पं. नेहरू का विशिष्ठ सुरक्षित विषय है, इसलिए इसका निबटारा उन्हें ही करना चाहिए।

कश्मीर में क्यों खड़ा रहता है एक न एक कारगिल?
यदि कश्मीर के इतिहास को देखें तो हमें अपनी ही वे अनगिनत ग़लतियाँ स्पष्ट नज़र आती हैं जिनकी वजह से आज भी हमें इस राज्य में किसी न किसी कारगिल से दो- चार होना पड़ रहा है। पहले राज्य के पाकिस्तान में सम्मिलन के लिए महाराजा को धमकी देना, फिर माउंटबेटन की इन धमकियों से न डरने  और राज्य के भारत में सम्मिलन के बाद अप्रत्याशित तौर पर शेख अब्दुल्ला के अत्याचारों, अनीतियों और भ्रष्टाचार को सहन करते हुए उनकी महत्वाकांक्षाओं को हवा देना और फिर महाराजा को कश्मीर छोड़ने पर विवश करना। पहले शेख की गिरफ्तारी और फिर उन्हीं की संतुष्टि के लिए उनकी रिहाई। पुन: उसी तुष्टिकरण के चलते धारा- 370 के तहत राज्य को विशेष दर्जा देना।

पाकिस्तानी आक्रमण को विफल करने के लिए कश्मीर में भारतीय सेना भेजने के एवज़ में शेख को कश्मीर की बागडोर सौंपने की पूर्व शर्त (परोक्ष)  और इन सब अनीतियों को घोषित करते वक़्त सरदार पटेल की सलाहों की अनवरत उपेक्षा और एक अंग्रेज़ शासक की चालबाजियों को नतमस्तक होकर स्वीकारना। माउंटबेटन की सलाह पर एक विशेष क्षेत्र पर हमला करने से सेना को रोकना और तमाम विरोधों को नकारते हुए राष्ट्र संघ में जाकर युद्धविराम तथा युद्धविराम- रेखा को स्वीकारना तथा परिणामस्वरूप कश्मीर का एक चौथाई हिस्सा गँवा बैठना। यही नहीं, इसके बाद की लड़ाई में ऐसी ही ढुलमुल नीतियों की वजह से लाहौर के करीब पहुँच चुकी सेना को वापस बुलाना। चीन के हाथों अपना मानसरोवर तीर्थ गवाँ देना और इन सब के बावजूद कश्मीर में जनमत संग्रह की माँग को धीमा करने के लिए धारा- 370 को मंद कर राज्य को हिन्दू- बहुसंख्यक बनाने के एकमात्र और अंतिम उपाय से मुँह मोड़े रहना।

कारगिल पर केंद्र से सवाल कर रही कांग्रेस से पूछा जाना चाहिए था कि कश्मीर के बारे में उक्त तमाम ग़लतियाँ आख़िर किसने की? क्या इनका कोई जवाब उसके पास है? ‘कश्मीर का सच’ लेखमाला के ज़रिए बीस कड़ियों में कश्मीर में हुई तमाम ग़लतियों को सबूतों और प्रमाणों के साथ पाठकों तक पहुँचाने की यहाँ पुरज़ोर कोशिश की गई। चूँकि कश्मीर के ऐतिहासिक स्वरूप और उससे जुड़ी भारतीय विभूतियों की भूमिका पर कोई चोट न पहुँचे, इसलिए इस लेखमाला के सभी तथ्यों, बल्कि एक- एक शब्द को ज़िंदा प्रमाणों से तौलकरही पाठकों तक पहुँचाया गया। एक के बाद एक इस लेखमाला की कड़ियाँ प्रकाशित होती जा रही थी और पाठकों की प्रतिक्रिया में यह महसूस गया कि कारगिल लड़ाई के इस मौक़े पर आज की वह पीढ़ी जो पचास साल पहले के कश्मीर के इतिहास से नावाक़िफ़ थी, उसके लिए ‘कश्मीर का सच’ कितना महत्वपूर्ण और आवश्यक था। यदि कश्मीर के इस तथ्यपरक और प्रामाणिक इतिहास को पढ़कर पाठक यह विचार भर करे कि आख़िर कश्मीर में किसने लगातार ग़लतियाँ कीं और आज जिस कश्मीर समस्या से रूबरू होना पड़ रहा है, वह आख़िर किसकी देन है? तो हम समझेंगे कि यह कोशिश सफल हो गई।

इति

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