नैनीताल  : उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नगर निगम मेयर सीट के आरक्षण को चुनौती देती याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट के इस फैसले से सरकार ने भी राहत की सांस ली है।

मेयर पद के लिए हुए आरक्षण को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। सात निगमों में से पांच निगमों में मेयर पदों को आरक्षण में लाए जाने को आधार बनाया गया था। इस मामले में कोर्ट ने आज सुनवाई की।

हाईकोर्ट के अधिवक्ता डीके त्यागी ने जनहित याचिका दायर कर कहा था कि सरकार ने प्रदेश के सात नगर निगमो में मेयर पद के लिए गलत तरीके से आरक्षण तय किया है। अभी सरकार सात नगर निगमों में चुनाव करा रही है।

मेयर के सात पदों में से पांच पद आरक्षित कर दिए गए हैं और दो पद अनारक्षित हैं। यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार आरक्षण पचास प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता। सरकार ने यह आरक्षण सत्तर प्रतिशत कर दिया है। याचिका में आरक्षण की प्रक्रिया को दोबारा तय करने की मांग की गई थी।

कोर्ट के फैसले के बाद निकाय चुनाव को लेकर उठ रही आशंका निर्मूल साबित हुई है। वहीं हाईकोर्ट के इस फैसले से सरकार ने भी राहत की सांस ली है।

हाईकोर्ट के अधिवक्ता डीके त्यागी ने जनहित याचिका दायर की है। त्यागी ने याचिका दायर कर कहा था कि रुड़की को छोड़ सात निगमों में से पांच को आरक्षित कर दिया जो। जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। कार्यवाहक मुख्य न्यायधीश न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति मनोज तिवारी की खंडपीठ ने मामले पर सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य में निकाय चुनावों की अधिसूचना जारी हो चुकी है, इसलिए निकाय चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप उचित नहीं है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को छूट देते हुए कहा कि अगर लगता है इसमें कानूनी पेंच है तो चुनाव बाद चुनाव याचिका दाखिल कर सकते हैं। याचिका खारिज होने से सरकार व निर्वाचन आयोग को बड़ी राहत मिली है।

मेयर पदों के आरक्षण को लेकर दी गई थी चुनौती

अधिवक्ता डीके त्यागी ने जनहित याचिका दायर कर कहा है कि सरकार ने सात नगर निगमों में मेयर पद के लिए आरक्षण का निर्धारण गलत तरीके से किया है। सरकार ने रुड़की को छोड़कर देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार, रुद्रपुर, काशीपुर, हल्द्वानी, कोटद्वार नगर निगमों का चुनाव करा रही है। इन सात निगमों में से मेयर के लिए पांच पदों को आरक्षित कर दिया गया, जबकि दो पद अनारक्षित हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ है। याचिकाकर्ता के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में साफ किया है कि आरक्षण किसी भी पद के लिए 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता, मगर सरकार ने आरक्षण 70 फीसद कर दिया है, जो असंवैधानिक है, लिहाजा आरक्षण नए सिरे से तय किया गया। इस याचिका से सरकार की भी चिंता बढ़ गई थीत।