रिसर्च : मृत जानवरों की तरंगों से आता है भूकंप, नहीं कर सकते इग्नोर!

किताब के लेखकों का दावा है कि पीड़ा का अनुभव सचमुच भौतिक तरंगों को उत्पन्न करने में सक्षम है

रिसर्च में बड़ा खुलासा: मृत जानवरों की तरंगों से आता है भूकंप, नहीं कर सकते इग्नोर!

डॉ. मदन मोहन बजाज कोई एनिमल वेलफेयर एक्टिविस्ट नहीं. वे जानवरों के साथ होने वाले क्रूर बरताव को रोकने की कोशिश करते हों, इस बाबत विरोध जताते या विरोध-प्रदर्शनों में शरीक होते हों या फिर कोर्ट-कचहरी का रास्ता अपनाते हैं- ऐसा नहीं कह सकते. डॉ. मदन मोहन बजाज Image result for डॉ. मदन मोहन बजाजइंटरनेशनल साइंटिफिक रिसर्च एंड वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन के निदेशक हैं. वे दिल्ली विश्वविद्यालय के फिजिक्स और एस्ट्रोफिजिक्स विभाग के न्यूक्लियर बायो-फिजिक्स तथा बायोमेडिकल फिजिक्स, इम्यूनोफिजिक्स तथा मेडिक्ल फिजिक्स के भी प्रमुख हैं और यहां 1968 से ही टीचिंग का काम कर रहे हैं.

डॉक्टर बजाज ने 300 से ज्यादा शोध-पत्र लिखे हैं. वे इंडियन सोसायटी ऑफ जेनेटिक्स, अमेरिकन केमिकल सोसायटी, फिजिक्स सोसायटी ऑफ जापान, जापान सोसायटी फॉर मेडिकल इलेक्ट्रानिक्स एंड बायोमेडिकल इंजीनियरिंग, बांग्लादेश फिजिक्स सोसायटी, फिजिकल सोसायटी ऑफ नेपाल, एशियन फिजिकल सोसायटी, इंडियन सोसायटी फॉर कैंसर कीमियोथेरेपी, इंडियन सोसायटी फॉर कैंसर रिसर्च, मैथेमेटिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया और सोसायटी ऑफ फीजियोलॉजिस्ट एंड फार्माकॉलॉजिस्ट ऑफ इंडिया के फेलो हैं. उन्होंने इंडियन एकेडमी ऑफ मेडिकल फिजिक्स के सचिव का भी पदभार संभाला है और भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ एटोमिक एनर्जी की ओर से आयोजित कई सेमिनार के अध्यक्ष रह चुके हैं.

डॉक्टर बजाज ने पीएच.डी के 18, एम.फिल के 8 और डी.एससी के 2 रिसर्चर्स का मार्ग-निर्देशन किया है. उन्होंने साइंस पर 15 पुस्तकों में बतौर सह-लेखक योगदान किया है.

Buyer looks at the fur of farmed fox at the 2015 China Fur and Leather Products Fair in BeijingA buyer looks at the fur of farmed fox at the 2015 China Fur and Leather Products Fair in Beijing, January 15, 2015. Hundreds of domestic and foreign fur product companies take part in the fair which runs from January 13 to 16 at the National Convention Centre. REUTERS/Jason Lee (CHINA - Tags: BUSINESS ANIMALS SOCIETY) - GM1EB1F0Z1G01

पीड़ा का अनुभव सचमुच भौतिक तरंगों को उत्पन्न करने में सक्षम

कुष्ठरोगियों के परिवार के बच्चों के लिए उन्होंने महात्मा गांधी स्कूल फॉर द चिल्ड्रेन ऑफ लेप्रस फैमलिज की भी स्थापना की है. थोड़े में कहें तो डॉक्टर बजाज अपने धुन के धनी वैज्ञानिक और रुझान के पक्के मानवतावादी हैं.

उन्होंने कुछ प्रसिद्ध फिजिसिस्टस् (भौतिकीवेत्ता) के साथ मिलकर एक किताब लिखी है और इस किताब में एक नया नजरिया पेश किया है जो काफी दिलचस्प है. किताब का नाम है- इटिमॉलॉजी ऑफ अर्थक्वेक्स, ए न्यू अप्रोच! इस किताब के लेखकों में इब्राहिम और विजयराज सिंह के साथ डॉक्टर मदन मोहन बजाज का नाम भी शामिल है. किताब को इंदौर के एचबी प्रकाशन ने छापा है. किताब एक शोध-प्रबंध पर आधारित है जो रूस के सुदाल में 1995 के जून में हुए वैज्ञानिकों के एक सम्मेलन में प्रस्तुत किया गया था.

अभी तक मान्यता यही है कि भूकंप की भविष्यवाणी कर पाना तकरीबन नामुमकिन है. वजह ये है कि मनुष्य को भूकंप का ठीक-ठीक कारण नहीं पाता. लेकिन किताब के लेखकों का दावा है कि पशु-पक्षी तथा मछलियों की हत्या के क्रम में उन्हें जो दुख-दर्द और भय का अनुभव होता है, उसका घनीभूत रूप ही भूकंप का कारण बनता है. किताब के लेखकों का दावा है कि पीड़ा का अनुभव सचमुच भौतिक तरंगों को उत्पन्न करने में सक्षम है.

बेशक इस सिद्धांत को भूगर्भ-विज्ञानी (जियोलॉजिस्ट) नहीं मानेंगे. भूगर्म विज्ञानी अपने विषय की रक्षा में हमेशा मुस्तैद खड़े होते हैं. अन्य क्षेत्रों के वैज्ञानिक भी इस सिद्धांत का मजाक उड़ाएंगे. लेकिन याद रखें कि बिन ड्राइवर की कार, बिन तार का टेलीफोन, कोशिकाओं के प्रगुणन के जरिए तैयार किया जाने वाला मांस, बिजली पैदा करने वाली समुद्री तरंग और रोजमर्रा के बरताव का हिस्सा बन चुके ऐसी हजारों चीजों का एक ना एक दिन मजाक उड़ाया गया था, उनकी संभावना के बारे में जब कोई सिद्धांत रूप में अपनी बात रखता था तो उसका मजाक उड़ाया जाता था. यूरी गैलर दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं- वे अपनी मन की ताकत से चम्मच को मोड़ सकते हैं. लेकिन अब ये काम सिर्फ वही नहीं बल्कि कई और लोग भी कर सकते हैं.

मन की शक्ति को विकसित करने के स्कूल रूस से लेकर इटली तक दुनिया में तमाम जगहों पर खुल चुके हैं, मैंने इनमें कुछ स्कूलों को देखा है. भारत में ऐसे कई स्वामी हैं जो रोगों से छुटकारा दिलाते हैं और ध्यान केंद्रित कर लोगों के भविष्य बदल सकते हैं. तो मन और विचार की इस शक्ति की व्याख्या आप कैसे करेंगे ? मुझे इस सवाल का एक तर्कसंगत जान पड़ता जवाब ‘लकी’ नाम की फिल्म से मिला. साल 2014 की इस फिल्म को ल्यूक ब्रेसन ने बनाया है. मान लीजिए, आप किसो को याद कर रहें हैं और इस कुछ ही मिनटों में उसका फोन आ जाता है तो हम इसे ‘संयोग’ कहते हैं. इसका एक नाम सिंक्रॉनिसिटी (समकालिकता) भी है. इस शब्द का पहली दफे प्रयोग प्रसिद्ध एनालिटिकल सायकोलॉजिस्ट(मनोविज्ञानी) कार्ल युंग ने किया था.

युंग का मानना था कि अगर किन्हीं दो घटनाओं में कार्य-कारण संबंध ना हो लेकिन वे इस तरह घटित हों कि उनके बीच सार्थक रिश्ता जान पड़े तो ऐसी घटनाओं को ‘सार्थक संयोग’ (मीनिंगफुल को-इन्सिडेंस) का नाम दिया जाता है. युंग ने इस धारणा के इस्तेमाल के सहारे पैरा-नॉर्मल(अतीन्द्रिय) शक्तियों की मौजूदगी को साबित करने की कोशिश की थी लेकिन साथ में यह भी जोड़ा था कि ‘अभी जो संसाधन उपलब्ध हैं उनके सहारे अतीन्द्रिय ज्ञान-संवेदनाओं को समझना नामुमकिन है.‘

क्या मन ऊर्जा की तरंगें उत्पन्न करता है ? कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद जब शिकागो पहुंचे तो उन्होंने बड़ी दूर से ही एक खास इलाके की ओर इशारा करते हुए कहा कि इस इलाके पर उदासी की गहरी छाया है. यह एक कसाईखाना था, अमेरिका का सबसे बड़ा ‘स्लॉटरहाऊस’! यहां जानवरों को काटने के लिए लाया जाता था. क्या उदासी की वो छाया निरीह पशुओं के दुख-दर्द और कराह से निकली तरंगों की देन थी?

आज जिसे पैरा-नॉर्मल या अतीन्द्रिय (शायद नए साल में इसे ही नामर्ल यानी इंद्रियजन्य मान लिया जाय!) माना जाता है उसपर विश्वास करने वाले वैज्ञानिकों में सिर्फ युंग का ही नाम शुमार नहीं. आधुनिक विज्ञान के जनक कहे जाने वाले अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी ईपीडब्ल्यू यानी आइंस्टीनियन पे’न वेव्ज् सिद्धांत की चर्चा की थी. यह सिद्धांत भूगर्म विज्ञान से संबंधित है.

लेख में ऊपर जिस किताब की चर्चा की है उसके लेखक बजाज-इब्राहिम-सिंह का कहना है कि उनका प्रस्ताव ईपीडब्ल्यू यानी आइंस्टीनियन पे’न वेव्ज् सिद्धांत का ही परवर्ती विस्तार है. लेखकों ने जुटाए हुए साक्ष्यों के आधार पर किताब में दलील पेश की है कि पशुओं के सामूहिक संहार से भूकंप का रिश्ता कायम करना मुमकिन है.

भूकंप कब और क्यों होते हैं- इसे कोई नहीं जानता. सो, ऊपर जिस सिद्धांत का जिक्र आया है उसे भी उतना ही प्रामाणिक या अप्रामाणिक माना जा सकता है जितना भूंकप के बारे में किसी और सिद्धांत को. बहुत संभव है, आगे के वक्त में भूकंप-विज्ञानी भी उसी निष्कर्ष पर पहुंचे जिस जिसे हमारे ऋषि-मुनि सदियों से बताते आ रहे हैं कि ‘विश्वात्मा’ का मन दुनिया के तमाम उपकरणों से कहीं ज्यादा ताकतवर है.

ऊपर जिस किताब की चर्चा की गई है उसमें दुनिया की उन तमाम जगहों की रिपोर्ट का संकलन किया गया है जहां भूकंप आए और जहां पशुओं को मारने के कसाईखाने थे. ऐसी भी जगहों से रिपोर्ट संकलित की गई है जहां कसाईखाने भूकंप की आशंका वाले क्षेत्रों के नजदीक बनाये गए हैं.

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भूकंपों की तीव्रता रिक्टेल स्केल पर ज्यादा होती है

आइंस्टीन पे’न वेव्ज थियरी के मुताबिक प्राथमिक और द्वितीयक तरंगे ज्यादा तेजी से गतिशील होती हैं जबकि पे’न वेव्ज (पीड़ा के कारण उत्पन्न होने वाली तरंगे) एक लंबी अवधि तक दबाव का क्षेत्र बनाते रहती हैं और जब यह दबाव अपने चरम-विन्दु पर पहुंच जाता है तो धरती की परत टूट जाती है और यह हादसा भूकंप का रुप ले लेता है.

किताब में नोसीसेप्टिव वेव्ज की जटिल भूमिका के अध्ययन का दावा किया गया है: किसी जीवित और चेतन शरीर में तंत्रिका कोशिकाओं के उद्दीप्त होने के कारण तेज रासायनिक(जैसे आंख में मिर्ची लगना), यांत्रिक ( जैसे काटना या कुचलना) अथवा तापीय (ठंढा या गर्म) संवेदन जाग्रत हो तो वह नोसिसेप्टर्स कहलाता है. नोसिसेप्टर्स से कुछ सिग्नल(संकेत) पैदा होते हैं जो तंत्रिका-तंतुओं के सहारे मेरुदंड यानी रीढ़ की हड्डी होकर मस्तिष्क तक पहुंचते हैं और हमें दर्द का अनुभव होता है. नोसिसेप्टर्स यानी पीड़ा की संवेदना का पर्याप्त ताकतवर होना जरुरी है ताकि संकेत तंत्रिका-तंतुओं के सहारे मस्तिष्क तक पहुंचे. जब पीड़ा की संवेदना इस पर्याप्त स्तर को प्राप्त कर लेती है तो संकेत का शरीर में संचार होता है.

लेखकों का दावा है कि जानवरों को काटने के क्रम में उन्हें जिस पीड़ा का अहसास होता है उसमें चीख निकलती है, तनाव पैदा होता है और इन तमाम चीजों से भी पे’न वेव्ज का उसी तरीके से निर्माण होता है जैसा कि ऊपर बताया गया है. ये पे’न वेव्ज धरती की परत में एक ना एक दिशा में चोट करती और दरार डॉलती हैं जो ‘सिस्मिक एनीसोट्रोफी’(भूकंपीय चोट) का कारण बनता है.

लेखकों का दावा है कि यह एनीसोट्रॉफी यानी ध्वनि से धरती की परत पर लगने वाला धक्का ही भूकंप का कारण बनता है. यह धक्का अगर हल्का हो तो भी धरती की परत में कंपन होती है लेकिन ऐसे कंपन को कोई शायद ही कोई महसूस कर पाता हो.लेखकों के मुताबिक, सालों साल लाखों की तादाद में जानवरों को मारने से आने वाले भूकंपों की तीव्रता रिक्टेल स्केल पर ज्यादा होती है.

लेखकों का कहना है कि ध्वनि-तरंगें चट्टानों पर बहुत ज्यादा दबाव डॉलती हैं. रोजाना बड़ी तादाद में जानवरों को हत्या की जाय और ऐसा बरसों तक हो तो आइंस्टीनियन पेन वेव्ज के जरिए एकॉस्टिक एनिस्ट्रॉफी पैदा होती है. ऐसा मरते हुए जानवरों को पहुंचती पीड़ा के कारण होता है. किताब में दावा किया गया है कि ईपीडब्ल्यू कालक्रम में लंबी दूरी तय करते हैं इसलिए किसी एक देश में बने कसाईखानों की वजह से दूसरे देश में भी भूकंप आ सकता है.

लेखकों का दावा है कि कसाईखानों में बड़े पैमाने पर पशु-हत्या होने से भूकंप आते हैं. किताब के लेखकों ने लातूर(खिलारी) के भूकंप, उत्तरकाशी में आये भूकंप तथा असम के भूकंप को मिसाल के रुप में गिनाया है. अमेरिका में आये नार्थरिज (1994), लांग बिच (कैलिफोर्निया – 1933), लैंडर्स (कैलिफोर्निया -1992), सैन फ्रांसिस्को (1906), न्यू मैड्रिड (मिसौरी – 1811-12) के भूकंप का भी किताब में उदाहरण दिया गया है. रूस के नेफगोर्स्क (1995) के भूकंप पर किताब में विस्तार से चर्चा है. जापान के कांटो (1923), नोबी (1891), किटा टांगो (1927), सांगकिरो सुनामी (1933), शिजुका (1935), टोंनाकल (1944), नानकई (1948), फुकुई (1948), ऑफ टोकाची (1952), किज्ता-मिनो (1961), निगाटा (1964), ऑफ टोकाची (1968), कोबे (1995) के भी भूकंप को उदाहरण के रुप में दर्ज किया गया है. नेपाल में गढ़ीमई में हुए पशु-संहार और वहां आये भूकंप की भी एक पैटर्न के रुप में किताब में चर्चा आयी है.

क्या ऐसा संभव है ? हां, क्यों नहीं? गुरुत्वाकर्षण से संबंधित तरंगों(ग्रेविटेशनल वेव्ज) के बारे में एक सिद्धांत आइंस्टीन ने 1916 में बताया था. बरसों तक वैज्ञानिक इस सिद्धांत की खिल्ली उड़ाते रहे. सौ साल बाद, जब सही उपकरण तैयार हो गये तो फरवरी 2016 में अमेरिका के वैज्ञानिकों ने ऐलान किया कि उन्होंने ग्रेविटेशनल वेव्ज को खोज निकाला है, उसे सुना और मापा है. इसे एक ऐतिहासिक खोज की संज्ञा दी गई और माना गया कि ग्रेविटेशनल वेव्ज के सहारे ब्रह्मांड को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है.

ग्रेव्टीशनल वेव्ज देश-काल के आभासी परत पर हल्के बुलबुले की तरह होते हैं. ये बुलबुले ब्रह्मांड की व्यापक गति के कारण बनते हैं. इस गति की मिसाल के तौर पर आप कल्पना करें कि दो ब्लैक होल(महा-विवर) आपस में मिल रहे हों या फिर कोई अतिकाय तारा अपने विस्फोट से टूट रहा हो. जो संकेत लेजर इंटरफरमोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव ऑबजर्वेटरी (LIGO) की पकड़ में आया वह दो ब्लैक होल के आपस में टकराने से बना था. चूंकि ग्रेविटेशनल वेव्ज का किसी पदार्थ में अवशोषण या फिर विचलन नहीं हो पाता सो इन गुरुत्वाकर्षणीय तरंगों से ऐसी सूचनाएं हासिल की जा सकती हैं जिससे ब्रह्मांड में किसी वस्तु की गति का पता चल सके.

इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है जब वैज्ञानिकों ने कुछ धारणाएं और सिद्धांत प्रस्तुत किये लेकिन उन्हें उस वक्त उपकरण ना होने के कारण मापा नहीं जा सका और ठीक इसी कारण धारणाओं को सच नहीं माना गया. विगत 16 वीं सदी में गियोर्डानो ब्रूनो ने दावा किया था कि सूरज भी बस एक तारा ही है और आकाशगंगा में बहुत सारे ब्रह्मांड हैं. ब्रूनो को जिन्दा जला दिया गया. डोनाल्ड ट्रंप तो अब भी सोचते हैं कि वैश्विक तापन(ग्लोबल वार्मिंग) कोई सच्चाई नहीं बल्कि एक कहानी है.

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यह कंपन भूकंप का कारण बनता है

पे’न वेव्ज कितने विनाशक हो सकते हैं इसे समझने के लिए भौतिकी विज्ञान का एक आम-फहम उदाहरण मददगार हो सकता है. मान लीजिए कि कोई ‘ए’ नाम की वस्तु है. इस वस्तु में हमेशा कंपन होता है और वस्तु के स्वभाव के ही मुताबिक इस कंपन की एक निर्धारित बारंबारता(फ्रीक्वेंसी) होती है. अब कल्पना कीजिए कि कोई ‘बी’ नाम की वस्तु है. यह भी कंपन करेगी और इसके कंपन की भी बारंबारता होगी. मान लीजिए कि वस्तु ए और वस्तु बी आस-पास हैं और दोनों एक-सी बारंबारता से कंपन करते हैं. ऐसे में ए नाम की वस्तु कहीं ज्यादा ऊर्जा से कंपन करने लगेगी. यह घटना रेजोनेन्स कहलाती है और ए नाम की वस्तु के लिए विनाशक हो सकती है. रेजोनेन्स की बात करने वाले इस सिद्धांत के तर्ज पर हम पे’न वेव्ज को भी समझ सकते हैं. मान सकते हैं कि पे’न वेव्ज टैक्टोनिक प्लेटस् में कंपन उत्पन्न करते हैं और यह कंपन भूकंप का कारण बनता है.

अमेरिका का टेकोमा ब्रिज 1940 में गिर पड़ा था. दर्ज इतिहास में यह पहला ब्रिज था जिसके गिरने की वजह रेजोनेन्स इफेक्ट बना. पता चला कि ब्रिज के डिजायन में कमी थी और इस कमी के कारण ब्रिज की स्वाभाविक फ्रीक्वेंसी वायु-प्रवाह की फ्रीक्वेंसी से मेल खा रही थी. इस वजह से ऊपर बहती हवा के साथ कंपायमान होकर पूरा ब्रिज ही गिर पड़ा.

खास फ्रीक्वेंसी पर हो रहा हल्का सा कंपन पूरे ब्रिज के गिरने का कारण बन सकता है तो फिर मारे जाते जानवरों की पीड़ा से उत्पन्न पे’न वेव्ज से भूकंप क्यों नहीं आ सकते ? मारे जाते पशु को जो कष्ट पहुंचता है वो है क्या ? यह विशाल मात्रा में प्राण-ऊर्जा का निकलना ही तो है- एक ऐसी ऊर्जा जिसे हम अभी तक माप नहीं सके हैं.

कौन जानता है कि पशुओं के सामूहिक संहार के क्रम में उनके दुख-दर्द से पैदा होते पे’न वेव्ज तथा इनके महाविनाशकारी कंपन को माप सकने वाली प्रौद्योगिकी हम कब तक तैयार कर पायेंगे? इस मौके पर हमारा स्पेन में प्रचलित उस कहावत को याद करना ठीक होगा जिसमें कहा गया है कि ‘जो चाहते हो वही मिलेगा, लेकिन इसके लिए तुम्हें कीमत चुकानी होगी- ऐसा ईश्वर ने कहा है’!

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