भगिनी निवेदिता का जन्म हुआ था आज

देश और दुनिया के इतिहास में 28 अक्टूबर

देश और दुनिया के इतिहास में 28 अक्टूबर कई कारणों से महत्वपूर्ण है, जिनमें से ये सभी प्रमुख हैं…

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नई दिल्ली, 27 अक्टूबर !देश और दुनिया के इतिहास में 28 अक्टूबर कई कारणों से महत्वपूर्ण है, जिनमें से ये सभी प्रमुख हैं…

1867: स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता का आयरलैंड में जन्म

भगिनी निवेदिता

भगिनी निवेदिता (१८६७-१९११) का मूल नाम ‘मार्गरेट एलिजाबेथ नोबुल’ था। वे एक अंग्रेज-आइरिश सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, शिक्षक एवं स्वामी विवेकानन्द की शिष्या थीं।

भारत में आज भी जिन विदेशियों पर गर्व किया जाता है उनमें भगिनी निवेदिता का नाम पहली पंक्ति में आता है, जिन्होंने न केवल भारत की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले देशभक्तों की खुलेआम मदद की बल्कि महिला शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। भगिनी निवेदिता का भारत से परिचय स्वामी विवेकानन्द के जरिए हुआ। स्वामी विवेकानन्द के आकर्षक व्यक्तित्व, निरहंकारी स्वभाव और भाषण शैली से वह इतना प्रभावित हुईं कि उन्होंने न केवल रामकृष्ण परमहंस के इस महान शिष्य को अपना आध्यात्मिक गुरु बना लिया बल्कि भारत को अपनी कर्मभूमि भी बनाया।Image result for भगिनी निवेदिता

मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल का जन्म 28 अक्टूबर 1867 को आयरलैंड में हुआ था। प्रारंभिक जीवन में उन्होंने कला और संगीत का अच्छा ज्ञान हासिल किया। नोबेल ने पेशे के रूप में शिक्षा क्षेत्र को अपनाया।Image result for भगिनी निवेदिता नोबेल के जीवन में निर्णायक मोड़ 1895 में उस समय आया जब लंदन में उनकी स्वामी विवेकानंद से मुलाकात हुई। स्वामी विवेकानंद के उदात्त दृष्टिकोण, वीरोचित व्यवहार और स्नेहाकर्षण ने निवेदिता के मन में यह बात पूरी तरह बिठा दी कि भारत ही उनकी वास्तविक कर्मभूमि है। इसके तीन साल बाद वह भारत आ गईं और भगिनी निवेदिता के नाम से पहचानी गईं।

स्वामी विवेकानंद ने नोबेल को 25 मार्च 1898 को दीक्षा देकर मानव मात्र के प्रति भगवान बुद्ध के करुणा के पथ पर चलने की प्रेरणा दी। दीक्षा देते हुए स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रेरणाप्रद शब्दों में उनसे कहा- जाओ और उस महान व्यक्ति का अनुसरण करो जिसने 500 बार जन्म लेकर अपना जीवन लोककल्याण के लिए समर्पित किया और फिर बुद्धत्व प्राप्त किया। दीक्षा के समय स्वामी विवेकानंद ने उन्हें नया नाम निवेदिता दिया और बाद में वह पूरे देश में इसी नाम से विख्यात हुईं। भगिनी निवेदिता कुछ समय अपने गुरु स्वामी विवेकानंद के साथ भारत भ्रमण करने के बाद अंतत: कलकत्ता में बस गईं। अपने गुरु की प्रेरणा से उन्होंने कलकत्ता में लड़कियों के लिए स्कूल खोला। निवेदिता स्कूल का उद्घाटन रामकृष्ण परमहंस की जीवनसंगिनी मां शारदा Image result for भगिनी निवेदिताने किया था। मां शारदा ने सदैव भगिनी निवेदिता को अपनी पुत्री की तरह स्नेह दिया और बालिका शिक्षा के उनके प्रयासों को हमेशा प्रोत्साहित किया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बांग्ला विभाग के पूर्व अध्यक्ष अमरनाथ गांगुली ने कहा कि मार्गरेट नोबेल को स्वामी विवेकानंद ने निवेदिता नाम दिया था। इसके दो अर्थ हो सकते हैं एक तो ऐसी महिला जिसने अपने गुरु के चरणों में अपना जीवन अर्पित कर दिया, जबकि दूसरा अर्थ निवेदिता पर ज्यादा सही बैठता है कि एक ऐसी महिला जिन्होंने स्त्री शिक्षा के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया।

गांगुली ने कहा कि सिस्टर निवेदिता में एक आग थी और स्वामी विवेकानंद ने उस आग को पहचाना। निवेदिता अपने गुरु की प्रेरणा से स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में उस समय उतरीं जब समाज के संभ्रांत लोग भी अपनी लड़कियों को स्कूल भेजना पसंद नहीं करते थे। ऐसे समाज में स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना निवेदिता जैसी जीवट महिला के प्रयासों से ही संभव हो सका। कलकत्ता प्रवास के दौरान भगिनी निवेदिता के संपर्क में उस दौर के सभी प्रमुख लोग आये। उनके साथ संपर्क रखने वाले प्रमुख लोगों में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु, शिल्पकार हैमेल तथा अवनीन्द्रनाथ ठाकुर और चित्रकार नंदलाल बोस शामिल हैं। उन्होंने रमेशचन्द्र दत्त और यदुनाथ सरकार को भारतीय नजरिए से इतिहास लिखने की प्रेरणा दी। गांगुली ने सिस्टर निवेदिता के देशप्रेम की चर्चा करते हुए कहा कि आयरिश होने के कारण स्वतंत्रता प्रेम उनके रक्त में था। ऐसे में यह बेहद स्वाभाविक था कि उन्होंने भारत में स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों का समर्थन किया और उन्हें सहयोग दिया। भारत प्रेमी भगिनी निवेदिता दुर्गापूजा की छुट्टियों में भ्रमण के लिए दार्जीलिंग गई थीं। लेकिन वहां उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और अंत में 13 अक्टूबर 1911 को 44 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

  • 1886: फ्रांस ने दोस्ती के प्रतीक के रूप में अमेरिका को स्टैचु ऑफ लिबर्टी भेंट की.

1913: जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा की स्थापना हुई

1962: सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव ने घोषणा किया कि उनका देश अमरीका के निशाने पर सधी, क्यूबा में तैनात परमाणु मिसायलें हटा लेगा.

दुनिया की सबसे ताकतवर महिलाओं में शुमार इंद्रा नूई का जन्मदिन

 1955 में 28 अक्टूबर के दिन तमिलनाडु के मद्रास (अब चेन्नई) शहर में एक बच्ची का जन्म हुआ। माता-पिता ने उसका नाम इंद्रा रखा। उस समय कोई नहीं जानता था कि एक दिन यह बच्ची दुनिया की सबसे शक्तिशाली महिलाओं की कतार में शुमार होगी और रोशनी की एक बुलंद मीनार की तरह महत्वाकांक्षी लोगों के सपनों में चमकीले रंग भरने का काम करेगी। पेप्सिको की अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी इंद्रा कृष्णमूर्ति नूई की कहानी इस बात का सबूत है कि अगर इंसान अपने सपनों को पूरा करने की ठान ले और उन्हें पूरा करने के लिए सही रास्ता चुने तो मंजिल की तरफ बढ़ते उसके कदमों को कोई रोक नहीं सकता।
*1886 : अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ग्रोवर क्लेवलैंड ने फ्रांस की जनता की तरफ से अमेरिका की जनता को तोहफे के तौर पर मिले स्टैच्यू आफ लिबर्टी को राष्ट्र को समर्पित किया।
*1914 : अमेरिका के चिकित्सा विज्ञानी जोनास एडवर्ड साल्क का जन्म, जिन्होंने पोलियो की पहली सुरक्षित और कारगर दवा ईजाद की।
*1955 : अमेरिका के विश्व प्रसिद्ध कंप्यूटर प्रोग्रामर और उद्यमी बिल गेट्स का जन्म। उन्होंने दुनिया की सबसे बड़ी कंप्यूटर सॉफ्टवेयर कंपनी माइक्रोसाफ्ट की स्थापना की।
*1962: क्यूबा का मिसाइल संकट हल होने से विश्व ने राहत की सांस ली। अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी ने रूस की इस घोषणा का स्वागत किया कि वह क्यूबा में तैनात अपने प्रक्षेपास्त्रों को निष्क्रिय करेगा।
*1971: ग्रेट ब्रिटेन ने प्रोस्परो का प्रक्षेपण किया। यह एक्स-3 उपग्रह श्रृंखला का पहला उपग्रह था।
*2009 : पाकिस्तान के पेशावर शहर में आत्मघाती बम हमले में 117 लोगों की मौत, 213 घायल हुए।

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