नई दिल्‍ली,। संविधान निर्माता और भारत के पहले कानून मंत्री बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर अनुच्‍छेद 370 के धुर विरोधी थे। उन्‍होंने इसका मसौदा तैयार करने से इनकार कर दिया था। आंबेडकर के मना करने के बाद शेख अब्‍दुल्‍ला नेहरू के पास पहुंचे और प्रधानमंत्री के निर्देश पर गोपालस्‍वामी आयंगर ने मसौदा तैयार किया था। बता दें कि सोमवार 5 अगस्त 2019 की तारीख में स्वतंत्र भारत का नया इतिहास लिख दिया गया। 17 अक्टूबर 1949 को संविधान में राष्ट्रपति के आदेश से जोड़े गये अनुच्छेद 370 को उसी तरीके से खत्म कर दिया गया।

अब्‍दुल्‍ला को लिखा पत्र 
अब्‍दुल्‍ला को अनुच्‍छेद 370 पर लिखे पत्र में आंबेडकर ने कहा था कि आप चाहते हैं कि भारत जम्‍मू-कश्‍मीर की सीमा की रक्षा करे, यहां सड़कों का निर्माण करे, अनाज सप्‍लाई करे। साथ ही, कश्‍मीर को भारत के समान अधिकार मिले, लेकिन आप चाहते हैं कि कश्‍मीर में भारत को सीमित शक्तियां मिलें। ऐसा प्रस्‍ताव भारत के साथ विश्‍वासघात होगा, जिसे कानून मंत्री होने के नाते मैं कतई स्‍वीकार नहीं करूंगा।

पटेल को नहीं किया था सूचित
नेहरू ने पटेल को सूचित किए बिना ही शेख अब्‍दुल्‍ला के साथ अनुच्‍छेद 370 के मसौदे को अंतिम रूप दिया। गोपालस्वामी आयंगर ने धारा 306-ए का प्रारूप पेश किया था। बाद में यह धारा 370 बनी। इन अनुच्छेद के तहत जम्मू-कश्मीर को अन्य राज्यों से अलग अधिकार मिले। 1951 में राज्य को संविधान सभा अलग से बुलाने की अनुमति दी गई। नवंबर 1956 में राज्य के संविधान का कार्य पूरा हुआ। 26 जनवरी 1957 को राज्य में विशेष संविधान लागू कर दिया गया। संविधान सभा की चर्चा में मसौदे को पारित करवाने की जिम्‍मेदारी गोपालस्‍वामी आयंगर को मिली, लेकिन प्रस्‍ताव को सभा में मौजूद सदस्‍यों द्वारा फाड़ दिया गया। उस समय प्रधानमंत्री नेहरू अमेरिका में थे। सरदार और अब्‍दुल्‍ला के रिश्‍ते ठीक नहीं थे। ऐसे में आयंगर ने मदद के लिए वल्‍लभभाई पटेल की ओर रुख किया। उन्‍होंने पटेल से कहा कि यह मामला नेहरू के अहम से जुड़ा है, नेहरू ने शेख को उनके अनुसार ही फैसले लेने को कहा है। लिहाजा, वल्‍लभभाई पटेल ने मसौदे को स्‍वीकृति दे दी।

हुआ था भारी विरोध
हालांकि, जब पटेल ने कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बैठक में मसौदे को पेश किया तो सभी ने इसका भारत की संप्रभुता के लिए खतरा बताया। यहां तक कि भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद ने भी इसका विरोध किया था।

कौन थे गोपालस्‍वामी अयंगर 
गोपालस्‍वामी आयंगर का जन्‍म 31 मार्च 1882 को तमिलनाडु में हुआ था। 1905 में वह मद्रास सिविल सेवा में शामिल हुए और डिप्‍टी कलेक्‍टर और राजस्‍व बोर्ड के सदस्‍य सहित कई पदों पर रहे। वह संविधान सभा के सदस्‍य भी थे। इसके साथ ही वह उस प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख भी थे, जिसने कश्‍मीर पर लगातार विवाद में संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारत का प्रतिनिधित्‍व किया। आयंगर को 1937 में दीवान बहादुर की उपाधि से सम्‍मानित किया गया था। 1941 में, किंग जॉर्ज षष्‍टम ने उन्हें नाइटहुड की उपाधि दी। वह जम्‍मू-कश्‍मीर के महाराज हरि सिंह के दीवान भी रहे। 10 फरवरी, 1953 को उनका देहांत हो गया।

संयुक्‍त राष्‍ट्र पहुंचा जम्‍मू-कश्‍मीर का मामला
यह माउंटबेटन थे, जिन्‍होंने नेहरू को जम्‍मू-कश्‍मीर के मुद्दे को संयुक्‍त राष्‍ट्र में ले जाने के लिए राजी किया था। इसलिए तो पाकिस्‍तान बार-बार कहता है कि कश्‍मीर विवाद को भारत ही संयुक्‍त राष्‍ट्र लेकर गया था। गौरतलब है कि गृह मंत्री शाह ने रास में कहा कि हम वही तरीका अपना रहे हैं जो 1952 व 1962 में कांग्रेस ने अपनाया था। तत्कालीन कांग्रेस सरकारों ने अधिसूचना के माध्यम से ही इस अनुच्छेद में संशोधन किए थे। सपा के प्रो. राम गोपाल यादव ने इस पर शाह से पूछा था कि क्या बगैर संविधान संशोधन विधेयक लाए संविधान में संशोधन हो सकता है? इस पर शाह ने उक्त स्पष्टीकरण दिया।

370 के साथ जम्मू कश्मीर के पास थे ये विशेष अधिकार

धारा 370 के तहत संसद को जम्मू-कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून बनाने का अधिकार थी।
अलग विषयों पर कानून लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार की सहमति लेनी पड़ती थी।
जम्मू-कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती थी। राष्ट्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं था।
शहरी भूमि कानून (1976) भी जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं होता था।
जम्मू-कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते थे।
धारा 370 के तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि खरीदने का अधिकार था।

धारा 370 की बड़ी बातें

-जम्मू-कश्मीर में बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते थे।
-जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 साल होता था।
-भारत की संसद जम्मू-कश्मीर के संबंध में बहुत ही सीमित दायरे में कानून बना सकती थी।
-जम्मू-कश्मीर में महिलाओं पर शरियत कानून लागू होता था।
-जम्मू-कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के व्यक्ति से शादी कर ले तो उस महिला की जम्मू-कश्मीर की नागरिकता खत्म हो जाती थी।
-यदि कोई कश्मीरी महिला पाकिस्तान के किसी व्यक्ति से शादी करती थी, तो उसके पति को भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जाती थी।
-जम्मू-कश्मीर में पंचायत के पास कोई अधिकार नहीं था।
-जम्मू-कश्मीर में काम करने वाले चपरासी को आज भी ढाई हजार रूपये ही बतौर वेतन मिल रहे थे।
-कश्मीर में अल्पसंख्यक हिंदुओं और सिखों को 16 फीसदी आरक्षण नहीं मिलता था।
-जम्मू-कश्मीर का झंडा अलग होता था।
-जम्मू-कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती थी।
-जम्मू-कश्मीर में भारत के राष्ट्रध्वज या राष्ट्रीय प्रतीकों का अपमान अपराध नहीं था। यहां सुप्रीम कोर्ट के आदेश मान्य नहीं होते थे।
-धारा 370 के चलते कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानियों को भी भारतीय नागरिकता मिल जाती थी।
-सूचना का अधिकार (आरटीआई) लागू नहीं होता था।
-शिक्षा का अधिकार (आरटीई) लागू नहीं होता था। यहां सीएजी (CAG) भी लागू नहीं था।