बहादुर शाह ज़फ़र का निधन, ‘वन्दे मातरम्’ गीत रचना और रहमान राही को ज्ञानपीठ पुरस्कार घोषित हुआ था आज

इतिहास में  7 नवंबर के दिन क्या हुआ था

देश विदेश के इतिहास में आज के दिन बहुत कुछ हुआ, आइए जानते हैं आज के इतिहास में यानि 7 नवंबर के इतिहास में कौन सी और महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं।

7 November History
  • मुग़ल सल्तनत के अंतिम शासक बहादुर शाह द्वितीय की 1862 में  रंगून में मौत।
  • बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने 1876 में बंगाल के कांतल पाडा नामक गाँव में वन्दे मातरम् गीत की रचना की थी।वन्दे मातरम् ( बाँग्ला: বন্দে মাতরম)
    अवनीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा बनाया गया भारतमाता का चित्र

    बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा संस्कृत बाँग्ला मिश्रित भाषा में रचित इस गीत का प्रकाशन सन् १८८२ में उनके उपन्यास आनन्द मठ में अन्तर्निहित गीत के रूप में हुआथा। इस उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम के संन्यासी द्वारा गाया गया है। इसकी धुन यदुनाथ भट्टाचार्य ने बनायी थी। सन् २००३ में, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अन्तरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में, जिसमें उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिये दुनिया भर से लगभग ७,००० गीतों को चुना गया था और बी०बी०सी० के अनुसार १५५ देशों/द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था उसमें वन्दे मातरम् शीर्ष के १० गीतों में दूसरे स्थान पर था।

    गीत

    यदि बाँग्ला भाषा को ध्यान में रखा जाय तो इसका शीर्षक “बन्दे मातरम्” होना चाहिये “वन्दे मातरम्” नहीं। चूँकि हिन्दी व संस्कृत भाषा में ‘वन्दे’ शब्द ही सही है, लेकिन यह गीत मूलरूप में बाँग्ला लिपि में लिखा गया था और चूँकि बाँग्ला लिपि में  अक्षर है ही नहीं अत: बन्दे मातरम् शीर्षक से ही बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसे लिखा था। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शीर्षक ‘बन्दे मातरम्’ होना चाहिये था। परन्तु संस्कृत में ‘बन्दे मातरम्’ का कोई शब्दार्थ नहीं है तथा “वन्दे मातरम्” उच्चारण करने से “माता की वन्दना करता हूँ” ऐसा अर्थ निकलता है, अतः देवनागरी लिपि में इसे वन्दे मातरम् ही लिखना व पढ़ना समीचीन होगा।

    संस्कृत मूल गीत

    बांग्ला लिपि देवनागरी लिपि

    বন্দে মাতরম্৷
    সুজলাং সুফলাং
    মলয়জশীতলাম্
    শস্যশ্যামলাং
    মাতরম্!

    শুভ্র-জ্যোত্স্না-পুলকিত-যামিনীম্
    ফুল্লকুসুমিত-দ্রুমদলশোভিনীম্,
    সুহাসিনীং সুমধুরভাষিণীম্
    সুখদাং বরদাং মাতরম্৷৷

    সপ্তকোটীকন্ঠ-কল-কল-নিনাদকরালে,
    দ্বিসপ্তকোটীভুজৈধৃতখরকরবালে,
    অবলা কেন মা এত বলে!
    বহুবলধারিণীং
    নমামি তরিণীং
    রিপুদলবারিণীং
    মাতরম্৷

    তুমি বিদ্যা তুমি ধর্ম্ম
    তুমি হৃদি তুমি মর্ম্ম
    ত্বং হি প্রাণাঃ শরীরে৷
    বাহুতে তুমি মা শক্তি,
    হৃদয়ে তুমি মা ভক্তি,
    তোমারই প্রতিমা গড়ি মন্দিরে মন্দিরে৷

    ত্বং হি দুর্গা দশপ্রহরণধারিণী
    কমলা কমল-দলবিহারিণী
    বাণী বিদ্যাদায়িণী
    নমামি ত্বাং
    নমামি কমলাম্
    অমলাং অতুলাম্,
    সুজলাং সুফলাং
    মাতরম্

    বন্দে মাতরম্
    শ্যামলাং সরলাং
    সুস্মিতাং ভূষিতাম্
    ধরণীং ভরণীম্
    মাতরম্৷

    वन्दे मातरम्
    सुजलां सुफलाम्
    मलयजशीतलाम्
    शस्यश्यामलाम्
    मातरम्।

    शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्
    फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
    सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
    सुखदां वरदां मातरम्॥ १॥

    सप्त-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
    द्विसप्त-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले,
    अबला केन मा एत बले।
    बहुबलधारिणीं
    नमामि तारिणीं
    रिपुदलवारिणीं
    मातरम्॥ २॥

    तुमि विद्या, तुमि धर्म
    तुमि हृदि, तुमि मर्म
    त्वम् हि प्राणा: शरीरे
    बाहुते तुमि मा शक्ति,
    हृदये तुमि मा भक्ति,
    तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मन्दिरे॥ ३॥

    त्वम् हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
    कमला कमलदलविहारिणी
    वाणी विद्यादायिनी,
    नमामि त्वाम्
    नमामि कमलाम्
    अमलां अतुलाम्
    सुजलां सुफलाम्
    मातरम्॥४॥

    वन्दे मातरम्
    श्यामलाम् सरलाम्
    सुस्मिताम् भूषिताम्
    धरणीं भरणीं
    मातरम्॥ ५॥

    हिन्दी अनुवाद

    आनन्दमठ के हिन्दीमराठीतमिलतेलुगुकन्नड आदि अनेक भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी-अनुवाद भी प्रकाशित हुए। डॉ॰ नरेशचन्द्र सेनगुप्त ने सन् १९०६ में Abbey of Bliss के नाम से इसका अंग्रेजी-अनुवाद प्रकाशित किया। अरविन्द घोष ने ‘आनन्दमठ’ में वर्णित गीत ‘वन्दे मातरम्’ का अंग्रेजी गद्य और पद्य में अनुवाद किया। महर्षि अरविन्द द्वारा किए गये अंग्रेजी गद्य-अनुवाद का हिन्दी-अनुवादइस प्रकार है:

    मैं आपके सामने नतमस्तक होता हूँ। ओ माता!
    पानी से सींची, फलों से भरी,
    दक्षिण की वायु के साथ शान्त,
    कटाई की फसलों के साथ गहरी,
    माता!

    उसकी रातें चाँदनी की गरिमा में प्रफुल्लित हो रही हैं,
    उसकी जमीन खिलते फूलों वाले वृक्षों से बहुत सुन्दर ढकी हुई है,
    हँसी की मिठास, वाणी की मिठास,
    माता! वरदान देने वाली, आनन्द देने वाली।

    रचना की पृष्ठभूमि

    सन् १८७०-८० के दशक में ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोहों में ‘गॉड! सेव द क्वीन’ गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों के इस आदेश से बंकिमचन्द्र चटर्जी को, जो उन दिनों एक सरकारी अधिकारी (डिप्टी कलेक्टर) थे, बहुत ठेस पहुँची और उन्होंने सम्भवत: १८७६ में इसके विकल्प के तौर पर संस्कृत और बाँग्ला के मिश्रण से एक नये गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया – ‘वन्दे मातरम्’। शुरुआत में इसके केवल दो ही पद रचे गये थे जो संस्कृत में थे। इन दोनों पदों में केवल मातृभूमि की वन्दना थी। उन्होंने १८८२ में जब आनन्द मठ नामक बाँग्ला उपन्यास लिखा तब मातृभूमि के प्रेम से ओतप्रोत इस गीत को भी उसमें शामिल कर लिया। यह उपन्यास अंग्रेजी शासन, जमींदारों के शोषण व प्राकृतिक प्रकोप (अकाल) में मर रही जनता को जागृत करने हेतु अचानक उठ खड़े हुए संन्यासी विद्रोह पर आधारित था। इस तथ्यात्मक इतिहास का उल्लेख बंकिम बाबू ने ‘आनन्द मठ’ के तीसरे संस्करण में स्वयं ही कर दिया था। और मजे की बात यह है कि सारे तथ्य भी उन्होंने अंग्रेजी विद्वानों-ग्लेग व हण्टर की पुस्तकों से दिये थे। उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम का एक संन्यासी विद्रोही गाता है। गीत का मुखड़ा विशुद्ध संस्कृत में इस प्रकार है: “वन्दे मातरम् ! सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्, शस्य श्यामलाम् मातरम्।” मुखड़े के बाद वाला पद भी संस्कृत में ही है: “शुभ्र ज्योत्स्नां पुलकित यमिनीम्, फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम् ; सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्, सुखदां वरदां मातरम्।” किन्तु उपन्यास में इस गीत के आगे जो पद लिखे गये थे वे उपन्यास की मूल भाषा अर्थात् बाँग्ला में ही थे। बाद वाले इन सभी पदों में मातृभूमि की दुर्गा के रूप में स्तुति की गई है। यह गीत रविवार, कार्तिक सुदी नवमी, शके १७९७ (७ नवम्बर १८७५) को पूरा हुआ।कहा जाता है कि यह गीत उन्होंने सियालदह से नैहाटी आते वक्त ट्रेन में ही लिखी थी।

    भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भूमिका

    सन् १९०७ में भीखाजी कामा द्वारा फहराया गया ध्वज
    १९०९ में प्रकाशित ‘विजया’ नामक तमिल पत्रिका का मुखपृष्ठ
    पण्डित राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ कृत क्रान्ति गीतांजलिमें वन्दे मातरम् का मूल पाठ मातृ-वन्दना

    बंगाल में चले स्वाधीनता-आन्दोलन के दौरान विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाने लगा। धीरे-धीरे यह गीत लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय हो गया। ब्रिटिश सरकार इसकी लोकप्रियता से भयाक्रान्त हो उठी और उसने इस पर प्रतिबन्ध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया। सन् १८९६ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह गीत गाया। पाँच साल बाद यानी सन् १९०१ में कलकत्ता में हुए एक अन्य अधिवेशन में श्री चरणदास ने यह गीत पुनः गाया। सन् १९०५ के बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरलादेवी चौधरानी ने स्वर दिया।

    कांग्रेस-अधिवेशनों के अलावा आजादी के आन्दोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफी उदाहरण मौजूद हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस ‘जर्नल’ का प्रकाशन शुरू किया था उसका नाम वन्दे मातरम् रखा। अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़नेवाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हाजरा की जुबान पर आखिरी शब्द “वन्दे मातरम्” ही थे। सन् १९०७ में मैडम भीखाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में “वन्दे मातरम्” ही लिखा हुआ था। आर्य प्रिन्टिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से सन् १९२९ में प्रकाशित काकोरी के शहीद पं० राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ की प्रतिबन्धित पुस्तक “क्रान्ति गीतांजलि” में पहला गीत “मातृ-वन्दना” वन्दे मातरम् ही था जिसमें उन्होंने केवल इस गीत के दो ही पद दिये थे और उसके बाद इस गीत की प्रशस्ति में वन्दे मातरम् शीर्षक से एक स्वरचित उर्दू गजल दी थी जो उस कालखण्ड के असंख्य अनाम हुतात्माओं की आवाज को अभिव्यक्ति देती है। ब्रिटिश काल में प्रतिबन्धित यह पुस्तक अब सुसम्पादित होकर पुस्तकालयों में उपलब्ध है।

    राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकृति

    स्वाधीनता संग्राम में इस गीत की निर्णायक भागीदारी के बावजूद जब राष्ट्रगान के चयन की बात आयी तो वन्दे मातरम् के स्थान पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा लिखे व गाये गये गीत जन गण मन को वरीयता दी गयी। इसकी वजह यही थी कि कुछ मुसलमानों को “वन्दे मातरम्” गाने पर आपत्ति थी, क्योंकि इस गीत में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रूप में देखा गया है। इसके अलावा उनका यह भी मानना था कि यह गीत जिस आनन्द मठ उपन्यास से लिया गया है वह मुसलमानों के खिलाफ लिखा गया है। इन आपत्तियों के मद्देनजर सन् १९३७ में कांग्रेस ने इस विवाद पर गहरा चिन्तन किया। जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित समिति जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे, ने पाया कि इस गीत के शुरूआती दो पद तो मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गये हैं, लेकिन बाद के पदों में हिन्दू देवी-देवताओं का जिक्र होने लगता है; इसलिये यह निर्णय लिया गया कि इस गीत के शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्र-गीत के रूप में प्रयुक्त किया जायेगा। इस तरह गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर के जन-गण-मन अधिनायक जय हे को यथावत राष्ट्रगान ही रहने दिया गया और मोहम्मद इकबाल के कौमी तराने सारे जहाँ से अच्छा के साथ बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित प्रारम्भिक दो पदों का गीत वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत स्वीकृत हुआ।

    स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में २४ जनवरी १९५० में ‘वन्दे मातरम्’ को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने सम्बन्धी वक्तव्य पढ़ा जिसे स्वीकार कर लिया गया।

    डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद का संविधान सभा को दिया गया वक्तव्य इस प्रकार है) :

    शब्दों व संगीत की वह रचना जिसे जन गण मन से सम्बोधित किया जाता है, भारत का राष्ट्रगान है; बदलाव के ऐसे विषय, अवसर आने पर सरकार अधिकृत करे और वन्दे मातरम् गान, जिसने कि भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभायी है; को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले। (हर्षध्वनि)। मैं आशा करता हूँ कि यह सदस्यों को सन्तुष्ट करेगा। (भारतीय संविधान परिषद, द्वादश खण्ड, २४-१-१९५०)

    विवाद

    आनन्द मठ उपन्यास को लेकर भी कुछ विवाद हैं, कुछ कट्टर लोग इसे मुस्लिम विरोधी मानते हैं। उनका कहना है कि इसमें मुसलमानों को विदेशी और देशद्रोही बताया गया है। वन्दे मातरम् गाने पर भी विवाद किया जा रहा है। इस गीत के पहले दो बन्द, जो कि प्रासंगिक हैं, में कोई भी मुस्लिम विरोधी बात नहीं है और न ही किसी देवी या दुर्गा की आराधना है। पर इन लोगों का कहना है कि-

    • इस्लाम किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने को मना करता है और इस गीत में दुर्गा की वन्दना की गयी है;
    • यह ऐसे उपन्यास से लिया गया है जो कि मुस्लिम विरोधी है;
    • दो अनुच्छेद के बाद का गीत – जिसे कोई महत्व नहीं दिया गया, जो कि प्रासंगिक भी नहीं है – में दुर्गा की अराधना है।

    हालाँकि ऐसा नहीं है कि भारत के सभी मुसलमानों को इस पर आपत्ति है या सब हिन्दू इसे गाने पर जोर देते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि कुछ साल पहले विख्यात संगीतकार ए० आर० रहमान ने, जो ख़ुद एक मुसलमान हैं, वन्दे मातरम् को लेकर एक संगीत एलबम तैयार किया था जो बहुत लोकप्रिय हुआ। अधिकतर लोगों का मानना है कि यह विवाद राजनीतिक है।

    विविध

    क्या किसी को कोई गीत गाने के लिये मजबूर किया जा सकता है अथवा नहीं? यह प्रश्न सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बिजोय एम्मानुएल वर्सेस केरल राज्य नाम के एक वाद में उठाया गया। इस वाद में कुछ विद्यार्थियों को स्कूल से इसलिये निकाल दिया गया था क्योंकि उन्होने राष्ट्र-गान जन गण मन को गाने से मना कर दिया था। यह विद्यार्थी स्कूल में राष्ट्रगान के समय इसके सम्मान में खड़े होते थे तथा इसका सम्मान करते थे पर गीत को गाते नहीं थे। गाने के लिये उन्होंने मना कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली और स्कूल को उन्हें वापस लेने को कहा। सर्वोच्च न्यायालय का कहना था कि यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रगान का सम्मान तो करता है पर उसे गाता नहीं है तो इसका मतलब यह नहीं कि वह इसका अपमान कर रहा है। अत: इसे न गाने के लिये उस व्यक्ति को दण्डित या प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। चूँकि वन्दे मातरम् इस देश का राष्ट्रगीत है अत: इसको जबरदस्ती गाने के लिये मजबूर करने पर भी यही कानून व नियम लागू होगा।

  • फ्रैंक्लिन डी रूज़वेल्ट 1944 में चौथी बार संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति नियुक्त हुए।
  • जार्डन में 1951 में संविधान पारित किया गया।
  • तत्कालीन सोवियत संघ ने 1968 में परमाणु परीक्षण किया।
  • अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 1996 में मार्स ग्लोबल सर्वेयर का प्रक्षेपण किया।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 1998 में भारत और पाकिस्तान पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने की घोषणा की।
  • राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने 2003 में श्रीलंका में आपातकाल की घोषणा वापस ली।
  • भारत और आसियान विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास के लिए एक फ़ंड बनाने पर 2006 में सहमत हुए।
  • बिहार के जनतादल (यूनाइटेड) के लोकसभा सदस्यों ने 2008 में अपने पद से इस्तीफ़ा दिया।
  • कश्मीर के प्रसिद्ध कवि रहमान राही को 2008 में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया।रहमान राहीरहमान राही (1925-) कश्मीर के प्रमुख कवि हैं। ज्ञानपीठ पुरस्कार उन्हें २००४ में मिला।रहमान को 1961 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है. इसके अलावा वह साहित्य अकादमी के फैलो भी रह चुके हैं. उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है.उनके पाँच कविता संग्रह, आलोचना और निबंध की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.

    रहमान राही के मुख्य ग्रन्थ:

    • Sana-Wani Saaz (poems) (1952)
    • Sukhok Soda (poems)
    • कलाम-ए-राही (poems)
    • Nawroz-i-Saba (poems) (1958)
    • Kahwat (literary criticism)
    • Kashir Shara Sombran
    • Azich Kashir Shayiri
    • Kashir Naghmati Shayiri
    • बाबा फरीद (translation)
    • Saba Moallaqat
    • Farmove Zartushtan
    • Seyah Rudi Jerean Manz (collection of Kashmiri poetry)
    • Koesher Shyiree Te Waznuk Surati Hal (Kashmiri poetry and its parameters).
  • ग्वाटेमाला में 2012 में आये भूकंप से, 52 की मौत।

7 नवंबर को जन्मे व्यक्ति

  • प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ कार्यकर्ता पंडित विश्वंभर नाथ का जन्म 1832 में हुआ।
  • अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले महान क्रांतिकारी बिपिन चंद्र पाल का जन्म 1858 को हुआ था।
  • विख्यात भौतिकविद और रसायनशास्त्री मेरी क्युरी का जन्म 1867 को हुआ था।
  • वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकट रामन का जन्म 1888 को हुआ था।
  • प्रमुख कृषक नेता तथा सांसद एन.जी. रंगा का जन्म 1900  को हुआ था।
  • प्रसिद्ध भारतीय कवि एवं साहित्यकार चंद्रकांत देवताले का जन्म 1936  को हुआ था।
  • दक्षिण भारतीय फ़िल्मों के सुपर स्टार भारतीय अभिनेता कमल हसन का जन्म 1954  को हुआ था।

7 नवंबर को हुए निधन

  • मुग़ल साम्राज्य के अंतिम बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र का 1862 में निधन।बहादुर शाह ज़फर (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू के माने हुए शायर थे। उन्होंने १८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राममें भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई।

    जीवन परिचय

    जफर का जन्म 24 अक्तूबर, 1775 में हुआ था। उनके पिता अकबर शाह द्वितीय और मां लालबाई थीं। अपने पिता की मृत्यु के बाद जफर को 18 सितंबर, 1837 में मुगल बादशाह बनाया गया। यह दीगर बात थी कि उस समय तक दिल्ली की सल्तनत बेहद कमजोर हो गई थी और मुगल बादशाह नाममात्र का सम्राट रह गया था।

    भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की जफर को भारी कीमत भी चुकानी पड़ी थी। उनके पुत्रों और प्रपौत्रों को ब्रिटिश अधिकारियों ने सरेआम गोलियों से भून डाला। यही नहीं, उन्हें बंदी बनाकर रंगून ले जाया गया, जहां उन्होंने सात नवंबर, 1862 में एक बंदी के रूप में दम तोड़ा। उन्हें रंगून में श्वेडागोन पैगोडा के नजदीक दफनाया गया। उनके दफन स्थल को अब बहादुर शाह जफर दरगाह के नाम से जाना जाता है। आज भी कोई देशप्रेमी व्यक्ति जब तत्कालीन बर्मा (म्यंमार) की यात्रा करता है तो वह जफर की मजार पर जाकर उन्हें श्रद्धांजलि देना नहीं भूलता। लोगों के दिल में उनके लिए कितना सम्मान था उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हिंदुस्तान में जहां कई जगह सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया है, वहीं पाकिस्तान के लाहौर शहर में भी उनके नाम पर एक सड़क का नाम रखा गया है। बांग्लादेश के ओल्ड ढाका शहर स्थित विक्टोरिया पार्क का नाम बदलकर बहादुर शाह जफर पार्क कर दिया गया है।

    1857 में जब हिंदुस्तान की आजादी की चिंगारी भड़की तो सभी विद्रोही सैनिकों और राजा-महाराजाओं ने उन्हें हिंदुस्तान का सम्राट माना और उनके नेतृत्व में अंग्रेजों की ईंट से ईंट बजा दी। अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय सैनिकों की बगावत को देख बहादुर शाह जफर का भी गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने अंग्रेजों को हिंदुस्तान से खदेड़ने का आह्वान कर डाला। भारतीयों ने दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में अंग्रेजों को कड़ी शिकस्त दी।

    शुरुआती परिणाम हिंदुस्तानी योद्धाओं के पक्ष में रहे, लेकिन बाद में अंग्रेजों के छल-कपट के चलते प्रथम स्वाधीनता संग्राम का रुख बदल गया और अंग्रेज बगावत को दबाने में कामयाब हो गए। बहादुर शाह जफर ने हुमायूं के मकबरे में शरण ली, लेकिन मेजर हडस ने उन्हें उनके बेटे मिर्जा मुगल और खिजर सुल्तान व पोते अबू बकर के साथ पकड़ लिया।

    अंग्रेजों ने जुल्म की सभी हदें पार कर दीं। जब बहादुर शाह जफर को भूख लगी तो अंग्रेज उनके सामने थाली में परोसकर उनके बेटों के सिर ले आए। उन्होंने अंग्रेजों को जवाब दिया कि हिंदुस्तान के बेटे देश के लिए सिर कुर्बान कर अपने बाप के पास इसी अंदाज में आया करते हैं। आजादी के लिए हुई बगावत को पूरी तरह खत्म करने के मकसद से अंग्रेजों ने अंतिम मुगल बादशाह को देश से निर्वासित कर रंगून भेज दिया।

    उर्दू के कवि

    फारसी में कविता, जो बहादुरशाह ने लिखीं।.

    बहादुर शाह जफर सिर्फ एक देशभक्त मुगल बादशाह ही नहीं बल्कि उर्दू के मशहूर कवि भी थे। उन्होंने बहुत सी मशहूर उर्दू कविताएं लिखीं, जिनमें से काफी अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के समय मची उथल-पुथल के दौरान खो गई या नष्ट हो गई। उनके द्वारा उर्दू में लिखी गई पंक्तियां भी काफी मशहूर हैं-,,,, Ek aisa ghar chahiye mujh Ko jiski faza mastana Ho Ek kone mein ghazal ki mahfil Ek kone mein maykhana Ho.,,,

    देश से बाहर रंगून में भी उनकी उर्दू कविताओं का जलवा जारी रहा। वहां उन्हें हर वक्त हिंदुस्तान की फिक्र रही। उनकी अंतिम इच्छा थी कि वह अपने जीवन की अंतिम सांस हिंदुस्तान में ही लें और वहीं उन्हें दफनाया जाए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

    लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में,
    किस की बनी है आलम-ए-नापायदार में।
    बुलबुल को बागबां से न सैयाद से गिला,
    किस्मत में कैद लिखी थी फसल-ए-बहार में।
    कह दो इन हसरतों से कहीं और जा बसें,
    इतनी जगह कहाँ है दिल-ए-दाग़दार में।
    एक शाख गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमान,
    कांटे बिछा दिए हैं दिल-ए-लाल-ए-ज़ार में।
    उम्र-ए-दराज़ माँग के लाये थे चार दिन,
    दो आरज़ू में कट गये, दो इन्तेज़ार में।
    दिन ज़िन्दगी खत्म हुए शाम हो गई,
    फैला के पांव सोएंगे कुंज-ए-मज़ार में।
    कितना है बदनसीब ‘ज़फर’ दफ्न के लिए,
    दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में॥

    बहादुर शाह जफर जैसे कम ही शासक होते हैं जो अपने देश को महबूबा की तरह मोहब्बत करते हैं और कू-ए-यार (प्यार की गली) में जगह न मिल पाने की कसक के साथ परदेस में दम तोड़ देते हैं। यही बुनियादी फ़र्क़ था मूलभूत हिंदुस्तानी विचारधारा के साथ जो अपने देश को अपनी माँ मानते है।बादशाह जफर ने जब रंगून में कारावास के दौरान अपनी आखिरी सांस ली तो शायद उनके लबों पर अपनी ही मशहूर गजल का यह शेर जरूर रहा होगा- “कितना है बदनसीब जफर दफ्न के लिए, दो गज जमीन भी न मिली कू-ए-यार में।”भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर उर्दू के एक बड़े शायर के रूप में भी विख्यात हैं। उनकी शायरी भावुक कवि की बजाय देशभक्ति के जोश से भरी रहती थी और यही कारण था कि उन्होंने अंग्रेज शासकों को तख्ते-लंदन तक हिन्दुस्तान की शमशीर (तलवार) चलने की चेतावनी दी थी।जनश्रुतियों के अनुसार प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद जब बादशाह जफर को गिरफ्तार किया गया तो उर्दू जानने वाले एक अंग्रेज सैन्य अधिकारी ने उन पर कटाक्ष करते हुए यह शेर कहा- “दम में दम नहीं, अब खैर मांगो जान की ए जफर अब म्यान हो चुकी है, शमशीर (तलवार) हिन्दुस्तान की..!!” इस पर जफर ने करारा जवाब देते हुए कहा था- “हिंदीओ में बू रहेगी जब तलक इमान की, तख्ते लंदन तक चलेगी तेग (तलवार) हिन्दुस्तान की..!!”

    भारत में मुगलकाल के अंतिम बादशाह कहे जाने वाले जफर को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दिल्ली का बादशाह बनाया गया था। बादशाह बनते ही उन्होंने जो चंद आदेश दिए, उनमें से एक था गोहत्या पर रोक लगाना। इस आदेश से पता चलता है कि वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के कितने बड़े पक्षधर थे।गोरखपुर विश्वविद्यालय में इतिहास के पूर्व प्राध्यापक डॉ॰ शैलनाथ चतुर्वेदी के अनुसार 1857 के समय बहादुर शाह जफर एक ऐसी बड़ी हस्ती थे, जिनका बादशाह के तौर पर ही नहीं एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति के रूप में भी सभी सम्मान करते थे। इसीलिए बेहद स्वाभाविक था कि मेरठ से विद्रोह कर जो सैनिक दिल्ली पहुंचे उन्होंने सबसे पहले बहादुर शाह जफर को अपना बादशाह बनाया।चतुर्वेदी ने बातचीत में कहा कि जफर को बादशाह बनाना सांकेतिक रूप से ब्रिटिश शासकों को एक संदेश था। इसके तहत भारतीय सैनिक यह संदेश देना चाहते थे कि भारत के केन्द्र दिल्ली में विदेशी नहीं बल्कि भारतीय शासक की सत्ता चलेगी। बादशाह बनने के बाद बहादुर शाह जफर ने गोहत्या पर पाबंदी का जो आदेश दिया था वह कोई नया आदेश नहीं था। बल्कि अकबर ने अपने शासनकाल में इसी तरह का आदेश दे रखा था। जफर ने महज इस आदेश का पालन फिर से करवाना शुरू कर दिया था।

    देशप्रेम के साथ-साथ जफर के व्यक्तित्व का एक अन्य पहलू शायरी थी। उन्होंने न केवल गालिब, दाग, मोमिन और जौक जैसे उर्दू के बड़े शायरों को तमाम तरह से प्रोत्साहन दिया, बल्कि वह स्वयं एक अच्छे शायर थे। साहित्यिक समीक्षकों के अनुसार जफर के समय में जहां मुगलकालीन सत्ता चरमरा रही थी वहीं उर्दू साहित्य खासकर उर्दू शायरी अपनी बुलंदियों पर थी। जफर की मौत के बाद उनकी शायरी “कुल्लियात ए जफर” के नाम से संकलित की गयी।

    मुग़ल सम्राटों का कालक्रम

    अकबर शाह द्वितीय अली गौहर मुही-उल-मिल्लत अज़ीज़ुद्दीन अहमद शाह बहादुर रोशन अख्तर बहादुर रफी उद-दौलत रफी उल-दर्जत फर्रुख्शियार जहांदार शाह बहादुर शाह प्रथम औरंगज़ेब शाहजहाँ जहांगीर अकबर हुमायूँ इस्लाम शाह सूरी शेर शाह सूरी हुमायूँ बाबर

    गैलरी

  • भारत के प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता और देश भक्त अश्विनी कुमार दत्त का 1923 में निधन।
  • भारत के एक प्रमुख चिकित्सक और देश सेवक जीवराज मेहता का 1978 में निधन।
  • भारत में हरित क्रांति के जनक सी. सुब्रह्मण्यम का 2000 में निधन।
  • पद्म भूषण से सम्मानित भारत की समाज सेविका तारा चेरियन का 2000 में निधन।
  • भारतीय निर्देशक और कवि बप्पादित्य बंदोपाध्याय का 2015 में निधन।

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