दुखभंजन रामलला का मामला क्यों अटका सुप्रीम कोर्ट में ?

रामलला मामले में ऐसे समझिए, अदालतों की कार्यशैली और विलंब के कारण

दुखभंजन श्री रामलला का मामला सुप्रीम कोर्ट में क्यों अटका?
राम जन्मभूमि में गर्भ गृह के हिस्से की भूमि को रामलला के पक्ष में दिए जाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2010 में ही फैसला दे दिया था. इसका मतलब सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ राम मंदिर का ही नहीं, बल्कि रामलला का मामला भी अटका हुआ है. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अनुसार न्याय में विलम्ब मतलब अन्याय को बढ़ावा मिलना है.

राम मंदिर का मामला पिछली दो शताब्दियों से अदालतों के चक्कर काटने की वजह से विश्व के सबसे पुराने मुकदमों में शामिल हो सकता है. रामलला मामले में इन बिन्दुओं से अदालतों की कार्यशैली और विलंब के कारणों को समझा जा सकता है-

सुप्रीम कोर्ट के 1994 के फैसले के बाद मामला खत्म क्यों नहीं?

अयोध्या में विवादित बाबरी ढांचा गिराए जाने के बाद केंद्र की नरसिम्हा राव सरकार ने राम जन्मभूमि परिसर की लगभग 67 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने के लिए संसद में कानून बना दिया था. इस कानून को चुनौती दिए जाने पर इस्माइल फारूकी मामले में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अपना फैसला दिया. इससे पहले 1991 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा किए गए भूमि अधिग्रहण को रद्द कर दिया था. लेकिन 1994 के फारूकी मामले फैसले में केंद्र सरकार द्वारा किए गए भूमि अधिग्रहण पर सुप्रीम कोर्ट ने सशर्त स्वीकृति दी थी. सुप्रीम कोर्ट द्वारा 25 साल पहले दिए गए फैसले के बाद अब बाबरी मस्जिद के पुर्ननिर्माण का रास्ता लगभग बंद हो गया. इस फैसले से यह भूमि की मिल्कियत का सीमित मामला बन गया, किन्तु उन विवादों को खत्म करने से सुप्रीम कोर्ट के इनकार की वजह से देश भर में राजनीतिक अशांति बनी हुई है.

सुप्रीम कोर्ट में अपीलों पर आठ साल से सुनवाई लंबित है

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित स्थान के 2.77 एकड़ भूमि को तीन हिस्सों में बांटने का आदेश दे दिया. यद्यपि जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने विवादित स्थल की पूरी जमीन को मंदिर और हिंदुओं के पक्ष में देने के लिए आदेश दिया था. इस मामले में अपील पर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने हाईकोर्ट द्वारा जमीन के बंटवारे के लिए दिए गए फैसले पर रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर पिछली तारीख को सिर्फ 2 मिनट सुनवाई हुई. हाईकोर्ट से हजारों-लाखों पेजों का केस रिकॉर्ड मंगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 2010-11 में आदेश दिया जिस पर 3 साल बाद 2014 में अमल हो पाया.

इसके बाद मामलों के नए पक्षकारों को जोड़ने और हटाने पर कई राउंड की सुनवाई हुई. उसके बाद यह मामला 2 साल से ज्यादा के लिए इसलिए अटक गया क्योंकि हजारों कागजातों का अंग्रेजी में अनुवाद नहीं हुआ था. फिर 1994 के फैसले पर पुर्नविचार की दलील पर सीनियर एडवोकेट राजीव धवन की बहस होने लगी, जिस पर सितंबर 2018 में जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने फैसला दिया.

पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा

अयोध्या की भूमि पर स्वामित्व के बावजूद केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में पक्षकार क्यों नहीं?

जल्द सुनवाई करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से साॅलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की बेंच से आग्रह किया था. नई बेंच के गठन और सुनवाई की नई तारीख के लिए मामले को जनवरी, 2019 तक टाल दिया गया, जिस पर संघ परिवार द्वारा सुप्रीम कोर्ट की निंदा की जा रही है. सवाल यह है कि संसद द्वारा पारित 1993 के कानून के अनुसार अयोध्या की भूमि का स्वामित्व केंद्र सरकार के पास है तो फिर मिल्कियत के विवाद में केंद्र भी पक्षकार क्यों नहीं है? इस बारे में इलाहाबाद हाईकोर्ट में दलील दी गई थी, लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पक्षकार बनने से मना कर दिया. बीजेपी ने राम जन्मभूमि को अपने घोषणा पत्र में शामिल किया था, तो फिर मामले में केंद्र सरकार द्वारा पक्षकार बनकर सुप्रीम कोर्ट में जल्द सुनवाई का आग्रह क्यों नहीं किया जाता?

अध्यादेश से पुराने कानून में बदलाव करके विवाद को खत्म किया जाए

अयोध्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2010 में 8,000 पेज से ज्यादा का फैसला दिया. सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में मंगाए गए केस रिकॉर्ड में 90,000 पेज से ज्यादा के तो मौखिक बयान ही हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सभी पक्षों की अपील के साथ 22 जुड़े हुए मामले हैं, जिन पर वकीलों की दांव-पेंच स्वाभाविक है. बाबरी ढांचा गिराए जाने के आपराधिक मामले पर लखनऊ की विशेष अदालत में अलग से ट्रायल हो रहा है, जिसको अप्रैल, 2019 तक खत्म करने के आदेश दिए गए हैं.

इलाहाबाद हाईकोर्ट में पेश पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए 1994 के फैसले के बाद अब विवादित स्थल में बाबरी ढांचे के पुर्ननिर्माण का कोई औचित्य नहीं है. विवादित स्थल पर केंद्र सरकार के स्वामित्व पर 25 साल पहले सुप्रीम कोर्ट की मुहर लग चुकी है. संसद द्वारा पारित 1993 के कानून में संशोधन करके मिल्कियत के मुकदमों को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार यदि अध्यादेश लाए तो ही इन विवादों का अंत किया जा सकता है. देश भर में 3 करोड़ लंबित मुकदमों की वजह से 25 करोड़ लोग पीड़ित हैं. अयोध्या मामले पर विलंब के लिए नेताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट को कोसने के बजाय न्यायिक व्यवस्था को दुरुस्त करने की सार्थक पहल अब होनी ही चाहिए, जिससे करोड़ों वंचित घरों में न्याय की रोशनी पहुंच सके.

(लेखक  विराग गुप्ताVirag Gupta

सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं )

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