जापान में शिंज़ो आबे मोदी के लिए पलक-पांवड़े क्यों बिछाते हैं

2014 के मई महीने में नरेंद्र मोदी जब सत्ता में आए तो जापान पहला देश था, जहां वो भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर गए थे.इस दौरे के ज़रिए मोदी ने जापानी प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे से मधुर संबंध विकसित करने की कोशिश की थी.मोदी और आबे के बीच की गर्मजोशी कई मौक़ों पर दिखी. हालांकि अहम मुद्दा यह है कि दोनों की गर्मजोशी से क्या कुछ ठोस हासिल हुआ है?

एशिया-प्रशांत में चीन के बढ़ते सैन्य प्रभाव को लेकर दोनों देश चिंतित हैं और यही चिंता दोनों देशों को क़रीब लाती है. अमरीकी राष्ट्रपति डोन्लड ट्रंप को लेकर बढ़ रही अनिश्चितता के कारण भी दोनों देशों के लिए साथ आना अहम है.हालांकि ट्रंप चीन के कथित विस्तारवाद को लेकर काफ़ी आक्रामक हैं. भारत और जापान के बीच बढ़ते सहयोग को दोनों देशों की आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता से भी जोड़ा जाता है.

जापान और भारतआबे हिन्द महासागर और प्रशांत में काफ़ी दिलचस्पी दिखा रहे हैं. भारत और जापान दोनों एक-दूसरे के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हैं.

मोदी सरकार भी एक्ट ईस्ट एशिया पॉलिसी के तहत दक्षिणी-पूर्वी एशिया और पूर्वी एशिया से संबंधों को मज़बूत करना चाहता है. जापान को लेकर भरोसे का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ़ उसे ही भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में निवेश की अनुमति है.कई विश्लेषकों का मानना है कि भारत और जापान की दोस्ती में चीन का डर सबसे अहम है, लेकिन दोनों देश चीन के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आना भी नहीं चाहते हैं.

चीनी मीडिया में विश्लेषकों का कहना है कि शिंज़ो आबे की मोदी से मुलाक़ात एक संतुलनवादी क़दम है. चीनी मीडिया का कहना है कि जापान एशिया-प्रशांत में संतुलन बनाने की नीति पर चल रहा है.मोदी का स्वागत आबे ने यामानशी शहर स्थित अपने निजी घर में किया. जापान की समाचार एजेंसी जिजी प्रेस का कहना है कि यह पहली बार है जब शिंज़ो आबे ने किसी विदेशी नेता का स्वागत अपने प्राइवेट विला में किया.

जापान और भारत

चाइनीज़ एकेडमी ऑफ सोशल साइंस में इंस्टिट्यूट ऑफ जैपनीज स्टडीज के रिसर्च स्कॉलर लू हाओ ने ग्लोबल टाइम्स से कहा है, ”चीन के लिहाज़ से भारत के लिए जापान का पक्ष लेना स्वाभाविक है. हालांकि भारत जापान के साथ अंतरिक्ष में रणनीतिक सहयोग भी बढ़ाना चाहता है. एशिया-प्रशांत में बड़ी ताक़तों के संबंध काफ़ी जटिल हो गए हैं.”

संतुलनवादी नीति

जापानी मीडिया का कहना है कि आबे मोदी से क़रीबी बढ़ा बड़ी ताक़तों के बीच संतुलनवादी रणनीति से आगे बढ़ना चाहते हैं. मोदी ने भी जापानी मीडिया एनएचके को दिए इंटरव्यू में कहा है कि भारत और जापान की साझेदारी का कोई विकल्प नहीं है.

कई विश्लेषकों का यह भी कहना है कि ट्रंप ने जापान से दूरी बनाई है इसलिए जापान, भारत और चीन से क़रीबी बढ़ाना चाहता है. पिछले हफ़्ते आबे चीन के दौरे पर गए थे और यह किसी भी प्रधानमंत्री का चीन दौरा सात साल बाद हुआ है.

जापान और भारतजापान और भारत दोनों के रिश्ते चीन से कड़वाहट भरे रहे हैं, लेकिन दोनों देश चीन से शत्रुता को बढ़ावा नहीं देना चाहते हैं. जापान और भारत के हित चीन से भी जुड़े हुए हैं. दोनों देश चीन की महत्वाकांक्षी योजना वन बेल्ट वन रोड का विरोध कर रहे हैं.

भारत का चीन के साथ सीमा विवाद है तो जापान का भी चीन से समुद्री विवाद है. दक्षिण चीन सागर में जापान ने युद्धपोत जेएस कागा की तैनाती की है जो अमरीकी सैन्य बेड़े का साथ दे रहा है.जापान का अफ़्रीकी देश जिबूती में नौसैनिक बेस है. यह पश्चिम के देशों और भारत के लिए अहम है. मोदी के दौरे में दोनों देश एक दूसरे की सैन्य सुविधाओं के इस्तेमाल पर समझौते की भी बात कर रहे हैं.

दोनों देशों के बीच पहला सैन्य अभ्यास ‘धर्मा गार्डियन’ अगले महीने होने जा रहा है. यह पू्र्वोत्तर भारत के जंगलों में होगा और मुख्य फोकस जवाबी कार्यवाही पर होगा. भारत और जापान के बीच व्यापारिक रिश्तों में अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है. मार्च में ख़त्म हुए वित्तीय वर्ष 2016-17 में दोनों देशों के बीच महज 13.61 अरब डॉलर का ही व्यापार हुआ.पिछले हफ़्ते ही शिंज़ो आबे और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाक़ात हुई थी. चीनी राष्ट्रपति से मुलाक़ात के बाद शिंज़ो आबे का मोदी से मिलने को जापान टाइम्स ने संतुलनवादी रवैया बताया है.

जापान टाइम्स ने लिखा है कि भारत चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना से काफ़ी चिंतित है. चीन इसके तहत हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है. भारत के लिए चीन की इस परियोजना को रणनीतिक रूप घिरने के तौर पर देखा जा रहा है.

कई विश्लेषकों का मानना है कि मोदी को लगता है कि जापान के ज़रिए चीन को चुनौती देने में मदद मिल सकती है. मोदी पीएम बनने के बाद से तीन बार जापान जा चुके हैं और जापानी पीएम शिंज़ो आबे भी 2014, 2015 और 2017 में भारत आ चुके हैं. 2005 से दोनों देशों के प्रमुख लगभग हर साल मिल रहे हैं. आबे और मोदी 11 बार मिल चुके हैं.

जापान और भारत

चीन और जापान की दुश्मनी

भारतीय और चीनियों की दुश्मनी की तुलना में चीनियों और जापानियों की दुश्मनी कहीं आगे है. प्यू रिसर्च के अनुसार केवल 11 फ़ीसदी जापानी ही चीन के बारे में सकारात्मक राय रखते हैं वहीं 14 फ़ीसदी चीनी जापान के बारे में ठीक राय रखते हैं.

1931 में जापान ने चीन के मंचूरिया में आक्रमण किया. जापान ने यह आक्रमण एक विस्फोट के बाद किया था जो जापानी नियंत्रण वाले रेलवे लाइन के पास हुआ था. इस दौरान जापानी सैनिकों का मुक़ाबला चीनी सैनिक नहीं कर पाए और जापान ने कई चीनी इलाक़ों को अपने क़ब्ज़े में ले लिया.जापान चीन पर अपनी पकड़ मजबूत बनाता गया और चीन कम्युनिस्टों और राष्ट्रवादियों के गृह युद्ध में फंसा था. चीन के राष्ट्रवादी नेता च्यांग काई-शेक ने नानजिंग को राष्ट्रीय राजधानी घोषित किया था.

जापान और भारतकई जापानियों को लगता है कि चीन में जापान की ज़्यादती को वहां की टेक्स्ट बुक में बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है. हालांकि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि 1931 में जापान ने बड़ी आक्रामकता से चीन में मंचूरिया पर क़ब्ज़ा किया था.

इसके परिणामस्वरूप 1937 में एक व्यापक युद्ध की शुरुआत हुई थी और लाखों चीनियों की मौत के बाद 1945 में दूसरे विश्व युद्ध के अवसान के साथ इसका अंत हुआ था.दूसरे विश्व युद्ध में पूर्वी एशिया जंग का मैदान बना हुआ था. इस इलाक़े में राष्ट्रीय अस्मिता को केंद्र में लाने में दूसरे विश्व युद्ध की बड़ी भूमिका रही है. चीन आज की तारीख़ में आर्थिक और सैन्य शक्ति में काफ़ी आगे निकल चुका है लेकिन इस सफर में उसके अतीत की भी ख़ासी भूमिका रही है.माओ की मौत के छह साल बाद हालात तेज़ी से बदले. जुलाई 1982 में जापान के शिक्षा मंत्री ने एक टेक्स्ट बुक छपवाई और उसमें दूसरे विश्वयुद्ध में जापान की भूमिका की लीपापोती की गई.

जापान और भारत

जापान के उपप्रधानमंत्री के तौर पर तारो असो 2006 में भारत के दौरे पर आए थे. उस वक़्त उन्होंने एक बयान में कहा था, ”अतीत के 1500 सालों से भी ज़्यादा वक़्त से इतिहास का ऐसा कोई वाक़या नहीं है जब चीन के साथ हमारा संबंध ठीक रहा हो.’1972 में जापानी प्रधानमंत्री काकुई तानका चीन के दौरे पर गए थे. उन्होंने इस दौरे में चीन से रिश्ते सुधारने की कोशिश की थी. जिस जापान ने 1930 के दशक से 40 के दशक तक चीन पर इतनी सैन्य आक्रामकता दिखाई थी उसी चीन के नायक माओ ने जापानी पीएम की मेहमानवाज़ी की थी.

जापानी पीएम काकुई से माफ़ी की बात माओ से पूछी गई तो उन्होंने कहा कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं है. माओ ने कहा कि बिना जापानी आक्रमण के चीन में कम्युनिस्ट क्रांति संभव नहीं हो पाती.भारत और चीन की शत्रुता, जापान और चीन की शत्रुता से अलग है. जापान ने चीन को हराया था जबकि चीन ने 1962 में भारत को बुरी तरह से हराया था.

जापान और भारत

मोदी के दौरे में अहम समझौता

भारत ने जापान के साथ 75 अरब डॉलर का मुद्रा अदला-बदली समझौता किया है. कहा जा रहा है कि इस समझौते से भारत के गिरते रुपए और पूंजी बाज़ार की अस्थिरता को थामने में मदद मिलेगी. दोनों देशों के बीच टु-प्लस-टु संवाद को लेकर भी सहमति बनी है.इस संवाद में दोनों देश एशिया-प्रशांत में साझी रणनीति और चीन के विस्तार पर बातचीत करेंगे. 75 अरब डॉलर की मुद्रा की अदला-बदली पर भारत के वित्त मंत्रालय ने कहा कि यह मुश्किल वक़्त में काम आएगा.भारत के साथ जापान के बढ़ते रिश्तों के लेकर भी चीन हरकत में है. जापान के सहयोग से भारत चीन से लगी सीमा पर आधारभूत ढांचे का विकास कर रहा है और इसी इलाक़े पर चीन अपना दावा करता है.

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