किस-किस देश में क्या-क्या है ईशनिंदा क़ानून ?

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई महिला आसिया बीबी को ईशनिंदा के एक मामले में बरी कर दिया है.निचली अदालत और फिर हाई कोर्ट ने इस मामले में आसिया बीबी को मौत की सज़ा सुनाई थी.उसी सज़ा के ख़िलाफ़ अपील की सुनवाई करते हुए अदालत ने आसिया बीबी को अब बरी कर दिया है.फ़ैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस मियां साक़िब निसार ने कहा कि वो हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फ़ैसलों को रद्द करते हैं.आसिया पर उनके पड़ोस में रहने वाली महिलाओं ने पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने के आरोप लगाए थे.

अदालत के इस फ़ैसले के बाद पाकिस्तान में एक बार फ़िर तौहीन-ए-रिसालत यानी ईशनिंदा क़ानून पर बहस तेज़ हो गई है.साल 1990 के बाद से अब तक पाकिस्तान में भीड़ या लोगों ने ईशनिंदा का आरोप लगाकर कम से कम 69 लोगों की हत्या कर दी है.अलग-अलग संस्थानों से जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान में इस समय 40 लोग ईशनिंदा के क़ानून में दोषी क़रार दिए जाने के बाद या तो मौत की सज़ा का इंतज़ार कर रहे हैं या उम्रक़ैद काट रहे हैं.पाकिस्तान में निचली अदालतों में आए सैकड़ों मामलों में ईश-निंदा के लिए लोगों को सज़ा सुनाई गई लेकिन हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव, छानबीन की प्रक्रिया में कमी या शिकायतकर्ता की गलत मंशा को देखते हुए फैसलों को पलट दिया. इसमें से सैकड़ों ईसाई हैं जिनपर आरोप लगाए गए हैं.

कई देशों में ईशनिंदा क़ानून

लेकिन पाकिस्तान दुनिया का ऐसा अकेला देश नहीं है जहां ईशनिंदा को लेकर क़ानून हैं. शोध संस्थान प्यू रिसर्च की ओर से साल 2015 में जारी की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 26 फ़ीसदी देशों में धर्म के अपमान से जुड़े क़ानून हैं जिनके तहत सज़ा के प्रावधान हैं. इनमें से 70 फ़ीसदी देश मुस्लिम बहुल है.इन देशों में ईशनिंदा के आरोप के तहत जुर्माना और क़ैद की सज़ा के प्रावधान हैं लेकिन सऊदी अरब, ईरान और पाकिस्तान में इस अपराध में मौत तक की सज़ा का प्रावधान है.एक नज़र ऐसे चुनिंदा देशों पर जहां ईशनिंदा से जुड़े क़ानून हैं.

पाकिस्तान

पाकिस्तान में प्रदर्शनधर्म से संबंधित आपराधिक मामलों को सबसे पहले ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1860 में संहिताबद्ध किया गया था और इसमें वर्ष 1927 में विस्तार किया गया.

विभाजन के बाद पाकिस्तान ने इसे अपना लिया.पाकिस्तान में ज़िया-उल हक़ की सैन्य सरकार के दौरान 1980 से 86 के बीच इसमें और धाराएं शामिल की गईं. वे उनका इस्लामीकरण करना चाहते थे और वर्ष 1973 में अहमदी समुदाय को ग़ैर-मुस्लिम समुदाय घोषित किया गया था और वो इसे क़ानूनी तौर पर अलग करना चाहते थे.

ब्रितानी शासनकाल के दौरान बनाया गया ये आम क़ानून था. इसके तहत अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी पूजा करने की वस्तु या जगह को नुकसान या फिर धार्मिक सभा में खलल डालता है तो उसे दंड दिया जाएगा. साथ ही अगर कोई किसी की धार्मिक भावनाओं का अपमान बोलकर या लिखकर या कुछ दृष्यों से करता है तो वो भी गैरक़ानूनी माना गया.

इस क़ानून के तहत एक से 10 साल तक की सज़ा दी सकती थी जिसमें जुर्माना भी लगाया जा सकता था. वर्ष 1980 की शुरुआत में पाकिस्तान की दंड संहिता में धार्मिक मामलों से संबंधित अपराधों में कई धाराएं जोड़ दी गईं.इन धाराओं को दो भागों में बांटा गया- जिसमें पहला अहमदी विरोधी क़ानून और दूसरा ईशनिंदा क़ानून शामिल किया गया.

अहमदी विरोधी क़ानून 1984 में शामिल गया था. इस क़ानून के तहत अहमदियों को खुद को मुस्लिम या उन जैसा बर्ताव करने और उनके धर्म का पालन करने पर प्रतिबंध था.ईशनिंदा क़ानून को कई चरणों में बनाया गया और उसका विस्तार किया गया. वर्ष 1980 में एक धारा में कहा गया कि अगर कोई इस्लामी व्यक्ति के खिलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी करता है तो उसे तीन साल तक की जेल हो सकती है.

वहीं वर्ष 1982 में एक और धारा में कहा गया कि अगर कोई व्यक्ति कुरान को अपवित्र करता है तो उसे उम्रकैद की सज़ा दी जाएगी. वर्ष 1986 में अलग धारा जोड़ी गई जिसमें ये कहा गया कि पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ ईशनिंदा के लिए दंडित करने का प्रावधान किया गया और मौत या उम्र कैद की सज़ा की सिफारिश की गई.

सऊदी अरब

सऊदी का झंडासऊदी अरब में इस्लामी क़ानून शरिया लागू है. सऊदी अरब में लागू शरिया क़ानून के तहत ईशनिंदा करने वाले लोग मुर्तद यानी धर्म को ना मानने वाले घोषित कर दिए जाते हैं जिसकी सज़ा मौत है.2014 में सऊदी अरब में दहशतगर्दी से निबटने के लिए नया क़ानून बनाया गया जिसके तहत स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि ”नास्तिकता का किसी भी रूप में प्रचार करना और इस्लाम के बुनियादी सिद्धांत जिन पर ये देश स्थापित है उनके बारे में सवाल उठाना दहशतगर्दी में आता है.”

ईरान

2012 में ईरान में नए सिरे से लाई गई दंड संहिता में ईशनिंदा के लिए एक नई धारा जोड़ी गई थी. इस नई धारा के तहत धर्म को न मानने वाले और धर्म का अपमान करने वाले लोगों के लिए मौत की सज़ा तय की गई है.नई संहिता की धारा 260 के तहत कोई भी व्यक्ति अगर पैगंबर-ए-इस्लाम या किसी और पैगंबर की निंदा करता है तो उसे मौत की सज़ा दी जाएगी.इसी धारा के तहत शिया फ़िरक़े के 12 इमामों और पैगंबर इस्लाम की बेटी की निंदा करने की सज़ा भी मौत है. इस नए क़ानून के तहत बदलाव ये किया गया है कि इसमें से इस्लाम के पवित्र स्थलों को अलग कर दिया गया है. हालांकि पुरानी दंड संहिता की धारा 513 को अभी भी क़ानूनी हैसियत हासिल है जिसमें ये बात भी शामिल की गई है. इन दोनों ही धाराओं के तहत ईशनिंदा की सज़ा मौत है.

प्रदर्शनइन दो अलग-अलग क़ानूनों के अलावा ईरान के संविधान के तहत ईशनिंदा के जुर्म को सिर्फ़ ‘सबउन्नबी’ यानी नबी की शान में गुस्ताख़ी ही नहीं बल्कि ज़मीन पर फ़साद फैलाने जैसा कहा गया है लेकिन इसके तहत कोई सज़ा तय नहीं की गई है. लेकिन ये जुर्म करने वाले को ईरान में सज़ा या सज़ा-ए-मौत दोनों हो सकती हैं.

मिस्र

मिस्र के संविधान में 2014 में हुए अरब स्प्रिंग (सरकार विरोधी प्रदर्शनों) के बाद संशोधन किया गया है जिसके बाद से इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म का दर्जा दिया गया है और अन्य धर्मों को वैध माना गया है.मिस्र की दंड संहिता की धारा 98-एफ़ के तहत पर ईशनिंदा पर प्रतिबंध है और इस क़ानून का उल्लंघन करने वालों को कम से कम छह महीनों और अधिकतम पांच साल तक की सज़ा हो सकती है.

इंडोनेशिया

इंडोनेशिया में प्रदर्शनदुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में सरकारी नज़रिए के मुताबिक सिर्फ़ एक ख़ुदा पर यक़ीन किया जा सकता है.

1965 में पूर्व राष्ट्रपति सुकार्णो ने देश के संविधान में इशनिंदा के क़ानून को धारा ए-156 के मसौदे पर हस्ताक्षर किए थे लेकिन ये लागू हुआ राष्ट्रपति सूहार्तो के शासनकाल में 1969 में.इस क़ानून के तहत देश के सरकारी धर्म, इस्लाम, ईसाइयत, हिंदू धर्म, बुद्ध मत और कन्फ्यूसिज़्म से अलग होना, या इन धर्मों का अपमान करना, दोनों को ही ईशनिंदा माना गया है जिसकी ज़्यादा से ज़्यादा सज़ा पांच साल क़ैद है.इस क़ानून के तहत किसी व्यक्ति पर मुक़दमा दर्ज करने से पहले जांच करना ज़रूरी है लेकिन अगर उस व्यक्ति पर दोबारा इस जुर्म के आरोप लगते हैं तो उस पर मुक़दमा चलाया जा सकता है.

देश में क़ानूनी तौर पर अभिव्यक्ति की आज़ादी है लेकिन धर्मों पर टिप्पणी की सख़्त मनाही है. इसके अलावा नास्तिकता और इसके प्रचार पर भी पूरी तरह पाबंदी है.राष्ट्रपति सुहार्तो का 32 साल का कार्यकाल 1998 तक चला जिसके बाद देश में ईशनिंदा के तहत मुक़दमों की संख्या में बढ़ौत्तरी हुई. मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक यहां सौ से ज़्यादा लोगों को ईशनिंदा के क़ानून के तहत दोषी क़रार दिया जा चुका है.

मलेशिया

मुसमलान प्रदर्शनकारीमलेशिया की दंड संहिता भी पाकिस्तान की दंड संहिता की ही तरह मूल रूप से अंग्रेज़ों की बनाई हुई दंड संहिता पर ही आधारित है. दोनों ही देशों में ईशनिंदा से जुड़े क़ानून बहुत हद तक मिलते जुलते हैं.

मलेशियाई दंड संहिता की धारा 295, 298 और 298-ए ईशनिंदा से जुड़ी हैं. इनके तहत किसी भी धर्म के धर्मस्थल का अपमान करना, धर्म के आधार पर समाज में फूट पैदा करना या लोगों को उत्तेजित करना, जानबूझकर किसी भी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना अपराध है. इसके तहत अधिकतम तीन साल की सज़ा हो सकती है और जुर्माना लगाया जा सकता है.इसके अलावा मलेशिया की एक अदालत के फ़ैसले के बाद से दूसरे धर्मों की किताब में अल्लाह शब्द के इस्तेमाल पर भी पाबंदी है. सितंबर 2015 में दिए एक फ़ैसले में उच्च अदालत ने कहा था कि अगर कोई भी मुसलमान ऐसी किताब प्रकाशित करते हुए पकड़ा जाता है जिसमें धार्मिक क़ानूनों के ख़िलाफ़ मवाद हो तो उस पर भी मुक़दमा दायर किया जा सकता है.

 क्या पाकिस्तान बनने की राह पर है पंजाब?

पंजाब का ईशनिंदा कानून, पंजाब विधानसभापिछले तीन सालों के दौरान पंजाब में हुई धार्मिक ग्रंथों की बेअदबी की घटनाओं की जांच करने वाले रणजीत सिंह आयोग की रिपोर्ट आने के बाद भी कुछ मामले अनसुलझे हैं.

इन घटनाओं के सभी आरोपियों के ख़िलाफ़ ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ है, किसी को सज़ा मिलने की ख़बर भी नहीं आई है. मगर जिस दिन आयोग की रिपोर्ट पर पंजाब विधानसभा में चर्चा हुई, उसी दिन वहां एक बिल पारित कर भारतीय दंड संहिता में धारा 295AA जोड़ी गई.इस धारा के अनुसार श्री गुरु ग्रंथ साहिब, श्रीमद्भागवत गीता, पवित्र कुरान और पवित्र बाइबल से जुड़ी जनता की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने के इरादे से अगर कोई इन्हें नुकसान पहुंचाता है या इनकी बेअदबी करता है, तो उस व्यक्ति को आजीवन कारावास की सज़ा दी जाएगी.

पंजाब विधानसभा में पारित बिल को संविधान के धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत, संविधान के अनुच्छेद 19A में अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार और मानवाधिकार की कसौटी पर परखने की ज़रूरत है.साथ ही इस बिल के क़ानून बनने पर इसके दुरुपयोग और सामाजिक व्यवहार में उत्पन्न होने वाले परिवर्तनों की परख करना भी ज़रूरी है ताकि हम एक निष्पक्ष राय बना सकें.

पंजाब का ईशनिंदा कानून, पंजाब विधानसभाअसहमति लोकतंत्र का आधार है. संविधान के अनुच्छेद 19A में अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार दिया गया है.

मगर 1927 में भारतीय दंड संहिता में धारा 295A जोड़कर प्रावधान किया गया था कि यदि कोई जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से भारत के नागरिकों के किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाएगा या फिर उस वर्ग के धर्म या धार्मिक विश्वास का अपमान करेगा तो उसे 3 साल तक की सज़ा हो सकेगी.

पंजाब का ईशनिंदा कानून, पंजाब विधानसभा

क़ानून की पृष्ठभूमि

एक मैगज़ीन के संपादक रामजीलाल मोदी को इस धारा के तहत सज़ा हुई तो मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और इस धारा की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी.मगर 1961 में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 295A को संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में बोलने की आज़ादी पर तर्कसंगत रोक लगाने के दायरे में मानते हुए संवैधानिक रूप से जायज़ ठहराया.पंजाब में साल 2015 के दौरान धर्म ग्रंथों की बेअदबी की कई घटनाएं सामने आई थीं. तब उस संवैधानिक और क़ानूनी पृष्ठभूमि में पंजाब विधानसभा ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के लिए आजीवन कारावास का प्रावधान करने वाला बिल 2016 में पारित किया.मगर उस बिल को राष्ट्रपति की सहमति नहीं मिल पाई. कहा गया कि किसी एक धर्म ग्रंथ को लेकर इस तरह का क़ानून बनाना भारत के संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांत के ख़िलाफ़ है.

1927 में जब गिरफ़्तार हुआ एक लेखक

अब 2018 में पंजाब की कांग्रेस सरकार ने चार धर्म ग्रंथों की बेअदबी और उन्हें नुकसान पहुंचाने के अपराध में आजीवन कारावास का प्रावधान करने वाले बिल को पारित कर दिया गया है.भारतीय दंड संहिता में धारा 295A जोड़े जाने की पृष्ठभूमि में 1927 में प्रकाशित हुई एक पुस्तक ‘रंगीला रसूल’ है. इसमें पैग़म्बर मोहम्मद के जीवन के बारे लिखा गया था.इस पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाते हुए प्रकाशक के ख़िलाफ शिकायत हुई थी और उन्हें गिरफ़्तार भी कर लिया गया था.लेकिन अप्रैल, 1929 में वो इस आधार पर मुकदमे में बरी हो गए कि धर्म का अपमान करने के ख़िलाफ़ कोई क़ानून नहीं था.बाद में उस प्रकाशक की हत्या कर दी गई और हत्या करने वाले को बड़े सम्मान से नवाज़ा गया.

पंजाब का ईशनिंदा कानून, पंजाब विधानसभा

ईशनिंदा संबंधी क़ानून की मांग

उस समय धार्मिक भावनाओं का अपमान करने वाले को सजा देने के क़ानून बनाने की मांग उठी जिसके चलते ब्रिटिश सरकार ने भारतीय दंड संहिता में धारा 295A जोड़ दी.1952 में गोरक्षक नामक एक पत्रिका में छपे लेख को लेकर नवंबर 1953 में उसके संपादक और प्रकाशक रामजीलाल मोदी को आईपीसी की धारा 295A के तहत 18 महीने की सज़ा सुनाई गई.हाईकोर्ट ने भी जब रामजीलाल को दोषी माना तब उन्होंने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, साथ ही भारतीय दंड संहिता की धारा 295A की संवैधानिक वैधता पर भी सवाल उठाते हुए एक याचिका दायर कर दी.दलील दी गई कि भारतीय दंड संहिता की धारा 295A संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (A) में दी गई बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी का उल्लंघन करती है.वो धारा संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत लगाए जाने वाले तर्कसंगत प्रतिबंध के दायरे में नहीं आती है.

पंजाब का ईशनिंदा कानून, पंजाब विधानसभाउस समय सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत सामाजिक व्यवस्था के हित में अभिव्यक्ति की आज़ादी पर तर्कसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. धार्मिक ठेस पहुंचाने के मामलों को लेकर समाज में शांति को ख़तरा होने की आशंका बनी रहती है.

पंजाब सरकार समाज को गुमराह कर रही है?

मगर पंजाब विधानसभा में पारित किए गए बिल के अनुसार धारा 295AA जोड़ कर कठोर क़ानून बनाए जाने को संविधान में दिए गए बोलने की आज़ादी के मौलिक अधिकार की भावना के विपरीत ही माना जाएगा क्योंकि कोई प्रतिबंध तभी लगाया जा सकता है जब उस समय की परिस्थितियों में उसको लागू करना टाला न जा सके.साथ ही बोलने की आज़ादी और तर्कसंगत लगाई रोक के बीच संतुलन रहना चाहिए, जो इस बिल के प्रावधान से टूटता है. पंजाब के इस क़ानून से लगाई गई रोक को तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता.संविधान में ईशनिंदा का ज़िक्र तक नहीं किया गया है, लेकिन पंजाब सरकार सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने में असफल रहने पर सख्त क़ानून बना कर समाज को गुमराह करने के रास्ते पर चल रही है.

पंजाब का ईशनिंदा कानून, पंजाब विधानसभा

क्या ख़ास धार्मिक समूहों को खुश करने के लिए क़ानून बनाया गया

इतना ही नहीं धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के क़ानून का बनाया जाना समाज के धार्मिक वर्गों में एक तरह की उग्र भावना का माहौल उत्पन्न करता है. वैसे भी धारा 295A जहां धार्मिक भावना का अपमान जान-बूझकर, दुर्भावना से करने को अपराध मानती है, वहीं प्रस्तावित धारा 295AA धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने की नीयत से की गई बेअदबी को अपराध मान लेती है.अगर पंजाब विधानसभा में पारित किए गए कानून की समीक्षा इसके धर्मनिरपेक्ष होने के नज़रिए से की जाए तो एक क़ानून मात्र इसलिए धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता कि इसमें एक धर्म ग्रंथ की बजाय चार धर्म ग्रंथों को शामिल कर लिया गया है.इसके दो कारण हैं. पहला, इन चार धर्म ग्रंथों के अलावा भी बौद्ध धर्म और जैन धर्म समेत अनेक धार्मिक संप्रदायों आदि के ग्रंथ भी हैं जिनमें नागरिकों का एक समूह आस्था रखता है. लेकिन उन्हें इस प्रावधान में शामिल नहीं किया गया है.

इस क़ानून का बनना धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के ख़िलाफ है. यह सही है कि भारत का संविधान हर नागरिक को अपने धर्म को मानने और प्रचार करने की छूट देता है, बशर्ते यह सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के अनुरूप हो.दूसरा, जब राज्य का कोई धर्म नहीं है तब ऐसे क़ानून बनाना जो किसी धर्म को नुक्ताचीनी से बचाने की कोशिश करे, धर्मनिरपेक्षता बनाए रखने की कोशिश की नहीं बल्कि धार्मिक समूह को खुश रखने की चुनावी राजनीति ही है.

पंजाब का ईशनिंदा कानून, पंजाब विधानसभा

नए क़ानून के ख़तरे

संविधान किसी भी नागरिक को अपना धर्म मानने की छूट देता है, मगर अपने धर्म को मानना से किसी दूसरे द्वारा धर्म को लेकर किसी वाजिब आधार पर सवाल करने के अधिकार को नहीं छीना जा सकता.पंजाब विधानसभा में पारित बिल में बेअदबी की परिभाषा नहीं दी गई है, इसलिए इस क़ानून का दुरुपयोग होने के ख़तरे बढ़ जाते हैं.किसी क़ानून की अस्पष्टता भी उसको रद्द किए जाने का आधार हो सकती है.

सही है कि संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत बोलने की आज़ादी पर सामाजिक व्यवस्था के हित में तर्कसंगत प्रतिबंध लगाया जा सकता है, लेकिन पंजाब विधानसभा द्वारा पारित बिल किसी नागरिक के बोलने की आज़ादी पर तर्कसंगत नहीं बल्कि साफ़ तौर पर गैरवाजिब प्रतिबंध लगाता है.इस क़ानून के तहत यदि कोई वैज्ञानिक समझ को प्रचारित-प्रसारित करने वाला नागरिक, धर्म ग्रंथों के किसी विचार पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सवाल करता है तब भी इसे अपराध करने के मामले में फंसाया जा सकता है.भारत ने संविधान के अनुच्छेद 51( ह) के अनुसार भारत के हर नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवता के आधार पर जांच और सुधार की भावना को विकसित करे.

पंजाब का ईशनिंदा कानून, पंजाब विधानसभा

वैज्ञानिक दृष्टिकोण के ख़िलाफ़

जब कोई नागरिक अपने मौलिक कर्तव्य का पालन करते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित जांच करने की विधि का विकास करेगा तब नए प्रावधान के आधार पर उसे यह कह दिया जाएगा कि अब वह किसी धर्म ग्रंथ की वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समीक्षा ना करे क्योंकि इस तरह की समीक्षा से जनता की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना समझा जा सकता है.इस क़ानून का दुरुपयोग होने का ख़तरा लगातार बना रहेगा क्योंकि ना तो सार्वजनिक व्यवस्था के हित को स्पष्ट किया गया है और ना ही धर्म ग्रंथ की बेअदबी का अर्थ स्पष्ट हुआ है.धर्म ग्रंथों की बेअदबी के सवाल पर धार्मिक आस्था पर चोट पहुंचाने के नाम पर भीड़ द्वारा अभियुक्त को तुरंत सज़ा देने से लेकर लिंचिंग किए जाने तक की घटनाएं सामने आई हैं.

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