आदि क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फडके व मानव कम्प्यूटर शकुन्तला देवी का जन्म हुआ था आज

इतिहास में  4 नवंबर के दिन क्या हुआ था

देश विदेश के इतिहास में 4 नवंबर को यानि आज के दिन कई महत्वपूर्ण घटनाये दर्ज है। आज उन्हीं महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में जानेंगे।

4 November History
  • अल्मीडा के बाद 1509 में अल्फांसो द अल्बुकर्क भारत में दूसरे पुर्तग़ाली वायसराय बने।
  • फ्रेडरिक पंचम 1619 में यूरोपीय देश बोहेमिया के राजा बने।
  • दिल्ली में 1822 में जल आपूर्ति योजना का औपचारिक रूप से शुभारंभ।
  • अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने 1822 में मैरी टोड के साथ शादी की.
  • जेम्स बुकानन 1856 में अमेरिका के 15वें राष्ट्रपति बने।
  • अमेरिका के बोस्टन में 1875 में मैसाचुसेट्स राइफल एसोसिएशन की स्थापना हुयी।
  • अफ्रीकी देश मोरक्को और कांगो को लेकर फ्रांस तथा जर्मनी के बीच 1911 में समझौते पर हस्ताक्षर।
  • वायोमिंग की नेली टेलो रॉस 1924 में संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रथम महिला गवर्नर चुनी गई।
  • कश्मीर के बडगांव के मेजर सोमनाथ शर्मा को 1947 में पहला परमवीर चक्र मिला। हालांकि उन्हें यह सम्मान मरणोपरांत दिया गया।
  • दार्जिलिंग में हिमालयन पर्वतारोहण की संस्थान की स्थापना 1954 में की गई।
  • ओ बी अग्रवाल 1984 में एमेच्योर स्नूकर के विश्व चैंपियन बने।
  • 1995 में इसराइल के प्रधानमंत्री की हत्या हो गई.
  • सियाचीन बेस कैम्प में सेना की आफ़ सिग्नल ने 1997 में विश्व का सर्वाधिक ऊँचा एस.टी.डी. बूथ स्थापित किया।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ में परमाणु हथियारों पर प्रतिबंध लगाने व विखंडनीय पदार्थों के उत्पादन पर रोक संबंधी जापान का प्रस्ताव 2000 में भारत के विरोध के बावजूद पारित।
  • चीन ने 2002 में आसियान देशों के साथ मुक्त व्यापार क्षेत्र संधि पर हस्ताक्षर किये।
  • श्रीलंका की राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने 2003 में रक्षा, गृह और सूचना मंत्रियों को बर्खास्त कर संसद को निलम्बित किया।
  • बराक ओबामा 2008 में अफ्रीकी मूल के पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बने।
  • पाकिस्तान के लाहौर में 2015 में एक इमारत ढ़हने से 45 मरे तथा करीब 100 लोग घायल हुए।

4 नवंबर को जन्मे व्यक्ति

  • मुग़ल शासक औरंगज़ेब का जन्म 1618 में हुआ।
  • भारत के प्रसिद्ध क्रांतिकारी वासुदेव बलवन्त फड़के का जन्म 1845 में हुआ।
    मुम्बई में वासुदेव बलवंत फडके की मूर्ति

    वासुदेव बलवंत फडके (4 नवम्बर 1845 – 17 फ़रवरी 1883) भारत के स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी थे जिन्हें आदि क्रांतिकारी कहा जाता है। फड़के ने 1857 ई. की प्रथम संगठित महाक्रांति की विफलता के बाद आज़ादी के महासमर की पहली चिंंनगारी जलायी थी। वे ब्रिटिश काल में किसानों की दयनीय दशा को देखकर विचलित हो उठे थे। उनका दृढ विश्वास था कि ‘स्वराज‘ ही इस रोग की दवा है।

    जिनका केवल नाम लेने से युवकों में राष्ट्रभक्ति जागृत हो जाती थी, ऐसे थे वासुदेव बलवंत फडके। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्रामके आद्य क्रांतिकारी थे। उन्होंने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सशस्त्र मार्ग का अनुसरण किया। अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए लोगों को जागृत करने का कार्य वासुदेव बलवंत फडके ने किया। 

    वासुदेव बलवन्त फड़के बड़े तेजस्वी और स्वस्थ शरीर के बालक थे। उन्हें वनों और पर्वतों में घूमने का बड़ा शौक़ था। कल्याण और पूना में उनकी शिक्षा हुई। फड़के के पिता चाहते थे कि वह एक व्यापारी की दुकान पर दस रुपए मासिक वेतन की नौकरी कर लें और पढ़ाई छोड़ दें। लेकिन फड़के ने यह बात नहीं मानी और मुम्बई आ गए। वहाँ पर जी.आर.पी. में बीस रुपए मासिक की नौकरी करते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी। 28 वर्ष की आयु में फड़के की पहली पत्नी का निधन हो जाने के कारण इनका दूसरा विवाह किया गया।

    व्यावसायिक जीवन

    विद्यार्थी जीवन में ही वासुदेव बलवन्त फड़के 1857 ई. की विफल क्रान्ति के समाचारों से परिचित हो चुके थे। शिक्षा पूरी करके फड़के ने ‘ग्रेट इंडियन पेनिंसुला रेलवे’ और ‘मिलिट्री फ़ाइनेंस डिपार्टमेंट’, पूना में नौकरी की। उन्होंने जंगल में एक व्यायामशाला बनाई, जहाँ ज्योतिबा फुले भी उनके साथी थे। यहाँ लोगों को शस्त्र चलाने का भी अभ्यास कराया जाता था। लोकमान्य तिलक ने भी वहाँ शस्त्र चलाना सीखा था।Image result for वासुदेव बलवन्त फड़के

    महाराष्ट्र की कोळी, भील तथा धांगड जातियों को एकत्र कर उन्होने ‘रामोशी’ नाम का क्रान्तिकारी संगठन खड़ा किया। अपने इस मुक्ति संग्राम के लिए धन एकत्र करने के लिए उन्होने धनी अंग्रेज साहुकारों को लूटा।

    गोविन्द रानाडे का प्रभाव

    1857 की क्रान्ति के दमन के बाद देश में धीरे-धीरे नई जागृति आई और विभिन्न क्षेत्रों में संगठन बनने लगे। इन्हीं में एक संस्था पूना की ‘सार्वजनिक सभा’ थी। इस सभा के तत्वावधान में हुई एक मीटिंग में 1870 ई. में महादेव गोविन्द रानाडे ने एक भाषण दिया। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अंग्रेज़ किस प्रकार भारत की आर्थिक लूट कर रहे हैं। इसका फड़के पर बड़ा प्रभाव पड़ा। वे नौकरी करते हुए भी छुट्टी के दिनों में गांव-गांव घूमकर लोगों में इस लूट के विरोध में प्रचार करते रहे।Image result for वासुदेव बलवन्त फड़के

    माता की मृत्यु

    1871 ई. में एक दिन सायंकाल वासुदेव बलवन्त फड़के कुछ गंभीर विचार में बैठे थे। तभी उनकी माताजी की तीव्र अस्वस्थता का तार उनको मिला। इसमें लिखा था कि ‘वासु’ (वासुदेव बलवन्त फड़के) तुम शीघ्र ही घर आ जाओ, नहीं तो माँ के दर्शन भी शायद न हो सकेंगे। इस वेदनापूर्ण तार को पढ़कर अतीत की स्मृतियाँ फ़ड़के के मानस पटल पर आ गयीं और तार लेकर वे अंग्रेज़ अधिकारी के पास अवकाश का प्रार्थना-पत्र देने के लिए गए। किन्तु अंग्रेज़ तो भारतीयों को अपमानित करने के लिए सतत प्रयासरत रहते थे। उस अंग्रेज़ अधिकारी ने अवकाश नहीं दिया, लेकिन वासुदेव बलवन्त फड़के दूसरे दिन अपने गांव चले आए। गांव आने पर वासुदेव पर वज्राघात हुआ। जब उन्होंने देखा कि उनका मुंह देखे बिना ही तड़पते हुए उनकी ममतामयी माँ चल बसी हैं। उन्होंने पांव छूकर रोते हुए माता से क्षमा मांगी, किन्तु अंग्रेज़ी शासन के दुव्यर्वहार से उनका हृदय द्रवित हो उठा।Image result for वासुदेव बलवन्त फड़के

    सेना का संगठन

    इस घटना के वासुदेव फ़ड़के ने नौकरी छोड़ दी और विदेशियों के विरुद्ध क्रान्ति की तैयारी करने लगे। उन्हें देशी नरेशों से कोई सहायता नहीं मिली तो फड़के ने शिवाजी का मार्ग अपनाकर आदिवासियों की सेना संगठित करने की कोशिश प्रारम्भ कर दी। उन्होंने फ़रवरी 1879 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा कर दी। धन-संग्रह के लिए धनिकों के यहाँ डाके भी डाले। उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में घूम-घूमकर नवयुवकों से विचार-विमर्श किया, और उन्हें संगठित करने का प्रयास किया। किन्तु उन्हें नवयुवकों के व्यवहार से आशा की कोई किरण नहीं दिखायी पड़ी। कुछ दिनों बाद ‘गोविन्द राव दावरे’ तथा कुछ अन्य युवक उनके साथ खड़े हो गए। फिर भी कोई शक्तिशाली संगठन खड़ा होता नहीं दिखायी दिया। तब उन्होंने वनवासी जातियों की ओर नजर उठायी और सोचा आखिर भगवान श्रीराम ने भी तो वानरों और वनवासी समूहों को संगठित करके लंका पर विजय पायी थी। महाराणा प्रताप ने भी इन्हीं वनवासियों को ही संगठित करके अकबर को नाकों चने चबवा दिए थे। शिवाजी ने भी इन्हीं वनवासियों को स्वाभिमान की प्रेरणा देकर औरंगज़ेब को हिला दिया था।

    ईनाम की घोषणा

    महाराष्ट्र के सात ज़िलों में वासुदेव फड़के की सेना का ज़बर्दस्त प्रभाव फैल चुका था। अंग्रेज़ अफ़सर डर गए थे। इस कारण एक दिन मंत्रणा करने के लिए विश्राम बाग़ में इकट्ठा थे। वहाँ पर एक सरकारी भवन में बैठक चल रही थी। 13 मई, 1879 को रात 12 बजे वासुदेव बलवन्त फड़के अपने साथियों सहित वहाँ आ गए। अंग्रेज़ अफ़सरों को मारा तथा भवन को आग लगा दी। उसके बाद अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें ज़िन्दा या मुर्दा पकड़ने पर पचास हज़ार रुपए का इनाम घोषित किया। किन्तु दूसरे ही दिन मुम्बई नगर में वासुदेव के हस्ताक्षर से इश्तहार लगा दिए गए कि जो अंग्रेज़ अफ़सर ‘रिचर्ड’ का सिर काटकर लाएगा, उसे 75 हज़ार रुपए का इनाम दिया जाएगा। अंग्रेज़ अफ़सर इससे और भी बौखला गए।

    गिरफ़्तारी

    1857 ई. में अंग्रेज़ों की सहायता करके जागीर पाने वाले बड़ौदा के गायकवाड़ के दीवान के पुत्र के घर पर हो रहे विवाह के उत्सव पर फड़के के साथी दौलतराम नाइक ने पचास हज़ार रुपयों का सामान लूट लिया। इस पर अंग्रेज़ सरकार फड़के के पीछे पड़ गई। वे बीमारी की हालत में एक मन्दिर में विश्राम कर रहे थे, तभी 20 जुलाई, 1879 को गिरफ़्तार कर लिये गए। राजद्रोह का मुकदमा चला और आजन्म कालापानी की सज़ा देकर फड़के को ‘अदन’ भेज दिया गया।

    फडके को तब विशेष प्रसिद्धि मिली जब उन्होने पुणे नगर को कुछ दिनों के लिए अपने नियंत्रण में ले लिया था। २० जुलाई १८७९ को वे बीजापुर में पकड़ में आ गए और आजन्म कारावास की सज़ा देकर इन्हें अदन भेज दिया गया। अदन पहुँचने पर फड़के भाग निकले, किन्तु वहाँ के मार्गों से परिचित न होने के कारण पकड़ लिये गए। जेल में उनको अनेक प्रकार की यातनाएँ दी गईं। वहाँ उन्हें क्षय रोग भी हो गया और इस महान् देशभक्त ने 17 फ़रवरी1883 ई. को अदन की जेल के अन्दर ही प्राण त्याग दिए।

  • भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान् क्रांतिकारी भाई परमानन्द का जन्म 1876 में हुआ।
  • स्वतंत्रता सेनानी जमनालाल का जन्म 1889 में हुआ।
  • साहित्यकार एवं स्वतंत्रता सेनानी सुदर्शन सिंह चक्र का जन्म 1911 में हुआ।
  • लेखक और फ़िल्मकर्मी ऋत्विक घटक का जन्म 1925 में हुआ।
  • शकुन्तला देवी, मानसिक परिकलित्र (गणितज्ञ) शकुन्तला देवी का जन्म 1929 में हुआ।

    शकुन्तला देवीशकुन्तला देवी (अंग्रेज़ीShakuntala Devi, जन्म: 4 नवम्बर 1929 – मृत्यु: 21 अप्रैल 2013) जिन्हें आम तौर पर “मानव कम्प्यूटर” के रूप में जाना जाता है, बचपन से ही अद्भुत प्रतिभा की धनी एवं मानसिक परिकलित्र (गणितज्ञ) थीं। उनकी प्रतिभा को देखते हुए उनका नाम 1982 में ‘गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में भी शामिल किया गया। शकुन्तला देवी के अंदर पिछली सदी की किसी भी तारीख का दिन क्षण भर में बताने की क्षमता थी। उन्होंने कोई औपचारिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। वह ज्योतिषी भी थीं। इनके 84वें जन्मदिन पर 4 नवम्बर 2013 को गूगल ने उनके सम्मान में उन्हें गूगल डूडल समर्पित किया।

    जीवन परिचयImage result for मानसिक परिकलित्र (गणितज्ञ) शकुन्तला देवी

    शकुन्तला देवी का जन्म कर्नाटक की राज्यधानी बंगलौर नामक महानगर में एक रुढ़ीवादी कन्नड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। शकुन्तला देवी के पिता सर्कस में करतब दिखाते थे। वह 3 वर्ष की उम्र में जब अपने पिता के साथ ताश खेल रही थीं तभी उनके पिता ने पाया कि उनकी बेटी में मानसिक योग्यता के सवालों को हल करने की क्षमता है।

    शकुन्तला देवी के सम्मान में गूगल का डूडल

    शकुंतला ने 6 वर्ष की उम्र में मैसूर विश्वविद्यालय में एक बड़े कार्यक्रम में अपनी गणना क्षमता का प्रदर्शन किया। वर्ष 1977 में शकुंतला ने 201 अंकों की संख्या का 23वां वर्गमूल बिना कागज़ कलम के निकाल दिया। उन्होने 13 अंकों वाली 2 संख्याओं का गुणनफल 26 सेकंड बता दिया था।आर्थिक तंगी के चलते उन्हें दस साला होने पर ही संत थेरेसा कोंवेंट चमाराजपेट में कक्षा 1 में भर्ती किया जा सका। माँ बाप के पास स्कूल की फीस (शुल्क मात्र दो रुपया प्रति माह) देने के लिए भी पैसे नहीं थे लिहाजा तीन माह के बाद ही उन्हें स्कूल से चलता कर दिया गया। तकरीबन गुट्टाहल्ली का झोंपड पट्टी नुमा इलाका ही था गाविपुरम जहां आपका लालन पालन हुआ।Image result for मानसिक परिकलित्र (गणितज्ञ) शकुन्तला देवीएक गणित विश्वविद्यालय और शोध एवं विकास केंद्र खोलना आपका स्वप्न था जहां अभिनव तकनीकों के ज़रिये जनमानस को पेचीला गणीतिय सवालों के हल करने के शोर्टकट्स और प्रभावशाली स्मार्ट तरीकों में प्रवीण बनाया जा सके। टाइम्स आफ इंडिया के साथ एक बात चीत में आपने कहा था -मैं अपनी क्षमता तो लोगों को अंतरित नहीं कर सकती लेकिन एक संख्यात्मक रुझान तेज़ी से विकसित कर लेने में मैं जनसामान्य की मदद ज़रूर कर सकती हूँ। बड़ी संख्या है ऐसे लोगों की जिनकी तर्क शक्ति का दोहन नहीं किया जा सका है। आप इस मिथक को तोड़के महाप्रयाण यात्रा पर निकल गईं हैं कि लड़कियों का हाथ गणित में तंग होता है।

    पुस्तकें

    • फन विद नंबर्स
    • एस्ट्रोलॉजी फॉर यू
    • पजल्स टू पजल्स यू
    • मैथब्लीट

    निधन

    मानव कम्प्यूटर के नाम से प्रसिद्ध शकुन्तला देवी का बंगलौर में 21 अप्रैल2013 को निधन हो गया। वह 83 वर्ष की थी। जटिल गणितीय गणनाएं अत्यंत सरलता से मौखिक रूप से हल करने की कुशलता की वजह से उन्हें मानव कम्प्यूटर का नाम दिया गया।

  • प्रसिद्ध संगीतकार शंकर जयकिशन का जन्म 1932 में हुआ।
  • भारतीय सिनेमा की एक उच्च श्रेणी की महिला फ़िल्मकार विजया मेहता का जन्म 1934 में हुआ।
  • ऑस्ट्रेलिया के 28वें प्रधानमंत्री टोनी एबॉट का जन्म 1957 में हुआ।
  • फ़िल्म अभिनेत्री तब्बू का जन्म 1971 में हुआ।

4 नवंबर को हुए निधन

  • प्रसिद्ध कथक नर्तक पंडित शम्भू महाराज का 1970 में निधन।

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