अमृतसर नगर और आज़ाद हिंद फ़ौज की स्थापना हुई थी आज

 हिमालयी खोज करने वाले पहले भारतीय पंडित नैन सिंह रावत का जन्म भी  हुआ था आज ! देश विदेश के इतिहास में आज यानि 21 अक्टूबर को क्या कई कारणों से कौन सी महत्वपूर्ण घटनाएँ घटी आज उनके बारे में जानेंगे।
21 October History
  • अलाउद्दीन ख़िलजी ने 1296 में दिल्ली की गद्दी संभाली।
  • इंग्लैंड के संसद ने 1555 में फिलिप को स्पेन के राजा के रुप मे मानने से मना किया।
  • गुरू रामदास ने अमृतसर नगर की स्थापना 1577 में की। अमृतसर (पंजाबी:ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ) भारत के पंजाब राज्य का एक शहर है।अमृतसर पंजाब का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र शहर माना जाता है। पवित्र इसलिए माना जाता है क्योंकि सिक्खों का सबसे बड़ा गुरूद्वारा स्वर्ण मंदिर अमृतसर में ही है। ताजमहल के बाद सबसे ज्यादा पर्यटक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को ही देखने आते हैं। स्वर्ण मंदिर अमृतसर का दिल माना जाता है। यह गुरू रामदास का डेरा हुआ करता था। अमृतसर का इतिहास गौरवमयी है। यह अपनी संस्कृति और लड़ाइयों के लिए बहुत प्रसिद्ध रहा है। अमृतसर अनेक त्रासदियों और दर्दनाक घटनाओं का गवाह रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा नरसंहार अमृतसर के जलियांवाला बाग में ही हुआ था। इसके बाद भारत पाकिस्तान के बीच जो बंटवारा हुआ उस समय भी अमृतसर में बड़ा हत्याकांड हुआ। यहीं नहीं अफगान और मुगल शासकों ने इसके ऊपर अनेक आक्रमण किए और इसको बर्बाद कर दिया। इसके बावजूद सिक्खों ने अपने दृढ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से दोबारा इसको बसाया। हालांकि अमृतसर में समय के साथ काफी बदलाव आए हैं लेकिन आज भी अमृतसर की गरिमा बरकरार है।

    इतिहास

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    अमृतसर लगभग साढ़े चार सौ वर्ष से अस्तित्व में है। सबसे पहले गुरू रामदास ने 1577 में 500 बीघा में गुरूद्वारे की नींव रखी थी। यह गुरूद्वारा एक सरोवर के बीच में बना हुआ है। यहां का बना तंदूर बड़ा लजीज होता है। यहां पर सुन्दर कृपाण, आम पापड, आम का आचार और सिक्खों की दस गुरूओं की खूबसूरत तस्वीरें मिलती हैं।

    अमृतसर में पहले जैसा आकर्षण नहीं रहा। अमृतसर के पास उसके गौरवमयी इतिहास के अलावा कुछ भी नहीं है। अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के अलावा देखने लायक कुछ है तो वह है अमृतसर का पुराना शहर। इसके चारों तरफ दीवार बनी हुई है। इसमें बारह प्रवेश द्वार है। यह बारह द्वार अमृतसर की कहानी बयान करते हैं। अमृतसर दर्शन के लिए सबसे अच्छा साधन साईकिल रिक्शा और ऑटो हैं। इसी प्रचालन को आगे बढ़ाने और विरासत को सँभालने के उद्देश से पंजाब पर्यटन विभाग ने फाजिल्का की एक गैर सरकारी संस्था ग्रेजुएट वेलफेयर एसोसिएशन फाजिल्का से मिलकर, फाजिल्का से शुरू हुए इकोफ्रेंडली रिक्शा ने नए रूप, “ईको- कैब” को अमृतसर में भी शुरू कर दिया है। अब अमृतसर में रिक्शा की सवारी करते समय ना केवल पर्यटकों की जानकारी के लिए ईको- कैब में शहर का पर्यटन मानचित्र है, बल्कि पीने के लिए पानी की बोतल, पढ़ने के लिए अख़बार और सुनने के लिए एफ्फ़ एम्म रेडियो जैसे सुविधाएं भी है।

    अमृतसर का स्वर्ण मंदिर

    स्वर्ण मंदिर अमृतसर का सबसे बड़ा आकर्षण है। इसका पूरा नाम हरमंदिर साहब है लेकिन यह स्वर्ण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। पूरा अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है। स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों पर्यटक आते हैं। अमृतसर का नाम वास्वत में उस तालाब के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण गुरू रामदास ने अपने हाथों से कराया था।

    सिक्ख केवळ भगवान में विश्वास करते। उनके लिए गुरू ही सब कुछ हैं। स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले वह मंदिर के सामने सर झुकाते हैं, फिर पैर धोने के बाद सीढ़ियों से मुख्य मंदिर तक जाते हैं। सीढ़ियों के साथ-साथ स्वर्णमंदिर से जुडी हुई सारी घटनाएं और इसका पूरा इतिहास लिखा हुआ है। स्वर्ण मंदिर बहुत ही खूबसूरत है। इसमें रोशनी की सुन्दर व्यवस्था की गई है। सिक्खों के लिए स्वर्ण मंदिर बहुत ही महत्वपुर्ण है। सिक्खों के अलावा भी बहुत से श्रद्धालु यहां आते हैं। उनकी स्वर्ण मंदिर और सिक्ख धर्म में अटूट आस्था है।

    हरमंदिर साहब परिसर में दो बडे़ और कई छोटे-छोटे तीर्थस्थल हैं। ये सारे तीर्थस्थल जलाशय के चारों तरफ फैले हुए हैं। इस जलाशय को अमृतसर और अमृत झील के नाम से जाना जाता है। पूरा स्वर्ण मंदिर सफेद पत्थरों से बना हुआ है और इसकी दिवारों पर सोने की पत्तियों से नक्काशी की गई है। हरमंदिर साहब में पूरे दिन गुरु बानी की स्वर लहरियां गुंजती रहती हैं। मंदिर परिसर में पत्थर का स्मारक लगा हुआ है। यह पत्थर जांबाज सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि देने के लिए लगा हुआ है।

    जलियांवाला बाग

    जलियांवाला बाग स्मारक

    13 अप्रैल 1919 को इस बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था। यह सभा ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध थी। इस सभा को बीच में ही रोकने के लिए जनरल डायर ने बाग के एकमात्र रास्ते को अपने सैनिकों के साथ घेर लिया और भीड़ पर अंधाधुंध गोली बारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में बच्चों, बुढ़ों और महिलाओं समेत लगभग 300 लोगों की जान गई और 1000 से ज्यादा घायल हुए। यह घटना को इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है।

    जलियां वाला बाग हत्याकांड इतना भयंकर था कि उस बाग में स्थित कुआं शवों से पूरा भर गया था। अब इसे एक सुन्दर पार्क में बदल दिया गया है और इसमें एक संग्राहलय का निर्माण भी कर दिया गया है। इसकी देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी जलियांवाला बाग ट्रस्ट की है। यहां पर सुन्दर पेड लगाए गए हैं और बाड़ बनाई गई है। इसमें दो स्मारक भी बनाए गए हैं। जिसमें एक स्मारक रोती हुई मूर्ति का है और दुसरा स्मारक अमर ज्योति है। बाग में घुमने का समय गर्मियों में सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक और सर्दियों में सुबह 10 बजे से शाम 5 तक रखा गया है।

    अन्य दर्शनीय स्थल

    पावन वाल्मीकि तीर्थ

    यह वो पावन धरती है, जहां पर आदिकवि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी। यहीं पर माता सीता ने लव को जन्म दिया और सीता की मन की इच्छा को जानकार आदिकवि वाल्मीकि ने काखों( घास के तिनकों) में प्राण डाले और कुश को प्रगट किया।कहा जाता है कि अमृतसर शहर की स्थापना भगवान वाल्मीकि के अमृत से ही हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा रामचंदर ने जब अश्वमेघ यज्ञ का घोडा छोड़ा था, तो वह घोडा घूमता हुआ वाल्मीकि आश्रम आ पहुंचा, जहां पर लव और कुश खेल रहे थे। वह घोडा लव और कुश ने पकड़ लिया। उसके बाद राम की सेना और कुश-लव के मध्य युद्ध हुआ, जिसमें राजा राम की ७२,००,००० सेना को कुश और लव ने मौत के घात उतार दिया। आखिर में राजा राम युद्ध के लिए आये और कुश के हाथों वो भी मृत्यु को प्राप्त हुए। अपने पति को मृत देखकर माता सीता विलाप करने लगी और सीता ने आदिकवि वाल्मीकि से प्रार्थना की। माता सीता की प्रार्थना पर आदिकवि ने अमृत की वर्षा की और राजा राम समेत सबको जिन्दा किया। वह अमृत भगवान वाल्मीकि ने कुश- लव से वहीं दबा देने को कहा।

    कहा जाता है कि रजनी के पति का जन्मों का कोढ़ उस अमृत के सरोवर में स्नान करने से ठीक हो गया। जब सिखों के पांचवे गुरु गुरु रामदास जी को यह बात पता चली, तो उन्होंने इस शहर का नाम अमृतसर रखा।

    गुरुद्वारे

    अमृतसर की दक्षिण दिशा में संतोखसर साहब और बिबेसर साहब गुरूद्वार है। इनमें से संतोखसर गुरूद्वारा स्वर्ण मंदिर से भी बड़ा है। महाराजा रणजीत सिंह ने रामबाग पार्क में एक समर पैलेस बनवाया था। इसकी अच्छी देखरेख की गई जिससे यह आज भी सही स्थिति में हैं। इस महल की बाहरी दीवारों पर लाल पत्थर लगे हुए हैं। इस महल को अब महाराजा रणजीत सिंह संग्राहलय में बदल दिया गया है। इस संग्राहलय में अनेक चित्रों और फर्नीचर को प्रदर्शित किया गया है। यह एक पार्क के बीच में बना हुआ है। इस पार्क को बहुत सुन्दर बनाया गया है। इस पार्क को लाहौर के शालीमार बाग जैसा बनाया गया है। संग्राहलय में घूमने का समय सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक रखा गया है। यह सोमवार को बंद रहता है।

    दुर्ग्याणा मंदिर

    प्राचीन हिन्दू मंदिर हाथी गेट क्षेत्र में स्थित हैं। यहां पर दुर्गीयाना मंदिर है। इस मंदिर को हरमंदिर की तरह बनाया गया है। इस मंदिर के जलाशय के मध्य में सोने की परत चढा गर्भ गृह बना हुआ है। दुर्गीयाना मंदिर के बिल्कुल पीछे हनुमान मंदिर है। दंत कथाओं के अनुसार यही वह स्थान है जहां हनुमान अश्वमेध यज्ञ के घोडे को लव-कुश से वापस लेने आए थे और उन दोनों ने हनुमान को परास्त कर दिया था।

    खरउद्दीन मस्जिद

    यह मस्जिद गांधी गेट के नजदीक हॉल बाजार में स्थित है। नमाज के समय यहां बहुत भीड़ होती है। इस समय इसका पूरा प्रागंण नमाजियों से भरा होता है। उचित देखभाल के कारण भारी भीड के बावजूद इसकी सुन्दरता में कोई कमी नहीं आई है। यह मस्जिद इस्लामी भवन निर्माण कला की जीती जागती तस्वीर पेश करती है मुख्य रूप से इसकी दीवारों पर लिखी आयतें। यह बात ध्यान देने योग्य है कि जलियांवाला बाग सभा के मुख्य वक्ता डॉ सैफउद्दीन किचलू और डॉ सत्यपाल इसी मस्जिद से ही सभा को संबोधित कर रहे थे।

    बाबा अटल राय स्तंभ

    यह गुरु हरगोविंदसिंह के नौ वर्षीय पुत्र का शहादत स्थल है।

    आसपास के दर्शनीय स्‍थल

    बाघा बोर्डर

    बाघा बोर्डर पर हर शाम भारत की सीमा सुरक्षा बल और पाकिस्तान रेंजर्स की सैनिक टुकडियां इकट्ठी होती है। विशेष मौकों पर मुख्य रूप से 14 अगस्त के दिन जब पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस समाप्त होता है और भारत के स्वतंत्रता दिवस की सुबह होती है उस शाम वहां पर शांति के लिए रात्रि जागरण किया जाता है। उस रात वहां लोगों को एक-दुसरे से मिलने की अनुमति भी दी जाती है। इसके अलावा वहां पर पूरे साल कंटिली तारें, सुरक्षाकर्मी और मुख्य द्वार के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता।

    तरन तारन

    अमृतसर से करीब 22 किलोमीटर दूर इस स्थान पर एक तालाब है। ऐसी मान्यता है कि इसके पानी में बीमारियों को दूर करने की ताकत है।

    खानपान

    अमृतसर के व्यंजन पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। यहां का बना चिकन, मक्के की रोटी, सरसों का साग और लस्सी बहुत प्रसिद्ध है। अमृतसर पंजाब में स्थित है। खाने-पीने के शौकीन लोगों के लिए पंजाब स्वर्ग माना जाता है।

    दरबार साहिब के दर्शन करने के बाद अधिकतर श्रद्धालु भीजे भठुर, रसीली जलेबी और अन्य व्यंजनों का आनंद लेने के लिए भरावन के ढाबे पर जाते हैं। यहां की स्पेशल थाली भी बहुत प्रसिद्ध है। इसके अलावा लारेंस रोड की टिक्की, आलू-पूरी और आलू परांठे बहुत प्रसिद्ध हैं। अमृतसर के अमृतसरी कुल्चे बहुत प्रसिद्ध है। अमृतसरी कुल्चों के लिए सबसे बेहतर जगह मकबूल रोड के ढा़बे हैं। यहां केवल दो बजे तक की कुल्चे मिलते हैं। पपडी़ चाट और टिक्की के लिए बृजवासी की दूकान प्रसिद्ध है। यह दूकान कूपर रोड पर स्थित है। लारेंस रोड पर बी.बी.डी.ए.वी. गर्ल्‍स कॉलेज के पास शहर के सबसे अच्छे आम पापड़ मिलते हैं। शाकाहारी खाने के साथ-साथ अमृतसर अपने मांसाहारी व्यंजनों के लिए भी प्रसिद्ध है। मासंहारी व्यंजनों में अमृतसरी मछी बहुत प्रसिद्ध है। इस व्यंजन को चालीस साल पहले चिमन लाल ने तैयार किया था। अब यह व्यंजन अमृतसर के मांसाहारी व्यंजनों की पहचान है। लारेंस रोड पर सूरजीत चिकन हाऊस अपने भूने हुए चिकन के लिए और कटरा शेर सिंह अपनी अमृतसरी मछी के लिए पूरे अमृतसर में प्रसिद्ध है।

    बाजार-हाट

    अमृतसर का बाजार काफी अच्छा है। यहां हर तरह के देशी और विदेशी कपडे़ मिलते हैं। यह बाजार काफी कुछ लाजपत नगर जैसा है। अमृतसर के पुराने शहर के हॉल बाजार के आस-पास के क्षेत्र मुख्यत: कोतवाली क्षेत्र के पास परंपरागत बाजार हैं। इन बाजारों के अलावा यहां पर अनेक कटरे भी हैं। यहां पर आभूषणों से लेकर रसोई तक का सभी सामान मिलता है। यह अपने अचारों और पापडों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। पंजाबी पहनावा भी पूरे विश्व में बहुत प्रसिद्ध है। खासकर लड़कियों में पंजाबी सूट के प्रति बहुत चाव रहता है। सूटों के अलावा यहां पर पगडी़, सलवार-कमीज, रूमाल और पंजाबी जूतियों की बहुत मांग हैं।

    दरबार साहब के बाहर जो बाजार लगता है। वहां पर स्टील के उच्च गुणवत्ता वाले बर्तन और कृपाण मिलते हैं। कृपाण को सिक्खों में बहुत पवित्र माना जाता है। इन सब के अलावा यहां पर सिक्ख धर्म से जुडी किताबें और साहित्य भी प्रचुर मात्रा में मिलता है।

    स्थिति

    यह भारत के बिल्कुल पश्चिम छोर पर स्थित है। यहां से पाकिस्तान केवल 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। राष्ट्रीय राजमार्ग 1 द्वारा करनालअम्बाला, खन्ना,जलंधर और लुधियाना होते हुए अमृतसर पहुंचा जा सकता है।

    दूरी: यह दिल्ली से उत्तर पूर्व में 447 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

    अमृतसर जाने के लिए सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च है

    आवागमन

    दिल्ली से यात्रा में लगने वाला समय: रेलमार्ग और सडक मार्ग से 9 घंटे, वायुमार्ग से 1 घंटा।

    वायु मार्ग

    श्री गुरु रामदास जी अन्तर्राष्ट्रीय विमानक्षेत्र अमृतसर से करीब 11 किलोमीटर की दूरी पर राजासांसी में स्थित है, जिसे तय करने में 15 मिनट का समय लगता है। यह हवाई अड्डा दिल्ली से अच्छी तरह जुडा हुआ है।

    रेल मार्ग

    दिल्ली से शताब्दी, व कई एक्सप्रैस और मेल ट्रेनों द्वारा आसानी से अमृतसर रेलवे स्टेशन पहुंचा जा सकता है।

    सडक मार्ग

    अपनी कार से भी ग्रैंड ट्रंक रोड द्वारा आसानी से अमृतसर पहुंचा जा सकता है। बीच में विश्राम करने के लिए रास्ते में सागर रत्ना, लक्की ढाबा और हवेली अच्छे रस्तरां है। यहां पर रूककर कुछ देर आराम किया जा सकता है और खाने का आनंद भी लिया जा सकता है। इसके अलावा दिल्ली के कश्मीरी गेट बस अड्डे से भी अमृतसर के लिए बसें जाती हैं।

  • रूस और चीन ने सीमाओं को सही करने के लिए 1727 में समझौते किये।
  • स्पेन के तट पर 1805 में ट्राफलगर की लड़ाई हुई।
  • फ्लोरेंस नाइटींगेल को 1854 में 38 नर्स कर्मचारी के साथ क्रिमिया युद्ध में भेजा गया।
  • अमेरिका में 1871 को पहला अव्यवसायी आउटडोर एथलेटिक खेल (न्यूयॉर्क) हुआ।
  • मार्गेट ओवन ने 1918 में 1 मिनट में 170 वीपीएम की टाइपिंग स्पीड के साथ विश्व रिकार्ड स्थापित किया।
    • शेरे-हिन्द,सरदारे-जंग,वीरे-हिन्द,शहीदे-भारत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 1934 में आज़ाद हिंद फ़ौज की स्थापना सिंगापुर में की।

      आज़ाद हिन्द फौज़ का ध्वज

      आज़ाद हिन्द फ़ौज सबसे पहले राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने 29 अक्टूबर 1915 को अफगानिस्तान में बनायी थी। मूलत: यह ‘आजाद हिन्द सरकार’ की सेना थी जो अंग्रेजों से लड़कर भारत को मुक्त कराने के लक्ष्य से ही बनायी गयी थी। किन्तु इस लेख में जिसे ‘आजाद हिन्द फौज’ कहा गया है उससे इस सेना का कोई सम्बन्ध नहीं है। हाँ, नाम और उद्देश्य दोनों के ही समान थे। रासबिहारी बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू किया था और उसे भी यही नाम दिया अर्थात् आज़ाद हिन्द फ़ौज। बाद में उन्होंने नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आज़ाद हिन्द फौज़ का सर्वोच्च कमाण्डर नियुक्त करके उनके हाथों में इसकी कमान सौंप दी।

      इतिहास

      तोयामा मित्सुरु, रासबिहारी बोस का स्वागत करते हुए
      ‘बृहद पूर्वी एशिया’ सम्मेलन के समय नेताजी (नवम्बर, १९४३)
      आजाद हिन्द फौज का एक सैनिक MG34 चलाते हुए

      द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सन 1942 में भारत को अंग्रेजों के कब्जे से स्वतन्त्र कराने के लिये आजाद हिन्द फौज या इन्डियन नेशनल आर्मी (INA) नामक सशस्त्र सेना का संगठन किया गया। इसकी संरचना रासबिहारी बोस ने जापान की सहायता से टोकियो में की।

      आरम्भ में इस फौज़ में उन भारतीय सैनिकों को लिया गया था जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे। बाद में इसमें बर्मा और मलाया में स्थित भारतीय स्वयंसेवक भी भर्ती किये गये। एक वर्ष बाद सुभाष चन्द्र बोस ने जापान पहुँचते ही जून 1943 में टोकियो रेडियो से घोषणा की कि अंग्रेजों से यह आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे। हमें भारत के भीतर व बाहर से स्वतंत्रता के लिये स्वयं संघर्ष करना होगा। इससे गद्गद होकर रासबिहारी बोस ने 4 जुलाई 1943 को 46 वर्षीय सुभाष को इसका नेतृत्व सौंप दिया। 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर के टाउन हाल के सामने ‘सुप्रीम कमाण्डर’ के रूप में सेना को सम्बोधित करते हुए “दिल्ली चलो!” का नारा दिया और जापानी सेना के साथ मिलकर ब्रिटिश व कामनवेल्थ सेना से बर्मा सहित इम्फाल और कोहिमा में एक साथ जमकर मोर्चा लिया।

      21 अक्टूबर 1943 के सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज के सर्वोच्च सेनापति की हैसियत से स्वतन्त्र भारत की अस्थायी सरकार बनायी जिसे जर्मनीजापानफिलीपीन्सकोरियाचीनइटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता दे दी। जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। सुभाष उन द्वीपों में गये और उनका नया नामकरण किया। अंडमान का नया नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा गया। 30 दिसम्बर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज भी फहरा दिया गया। 4 फ़रवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों पर दोबारा भयंकर आक्रमण किया और कोहिमा, पलेल आदि कुछ भारतीय प्रदेशों को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया।

      6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से गाँधी जी के नाम जारी एक प्रसारण में अपनी स्थिति स्पष्ठ की और आज़ाद हिन्द फौज़ द्वारा लड़ी जा रही इस निर्णायक लड़ाई की जीत के लिये उनकी शुभकामनाएँ माँगीं।21 मार्च 1944 को ‘चलो दिल्ली’ के नारे के साथ आज़ाद हिंद फौज का हिन्दुस्थान की धरती पर आगमन हुआ।Image result for आज़ाद हिंद फ़ौज

      22 सितम्बर 1944 को शहीदी दिवस मनाते हुये सुभाष बोस ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा –

      हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की माँग है।

      किन्तु दुर्भाग्यवश युद्ध का पासा पलट गया। जर्मनी ने हार मान ली और जापान को भी घुटने टेकने पड़े। ऐसे में सुभाष को टोकियो की ओर पलायन करना पड़ा और कहते हैं कि हवाई दुर्घटना में उनका निधन हो गया। यद्यपि उनका सैनिक अभियान असफल हो गया, किन्तु इस असफलता में भी उनकी जीत छिपी थी। निस्सन्देह सुभाष उग्र राष्ट्रवादी थे। उनके मन में फासीवादी अधिनायकों के सबल तरीकों के प्रति भावनात्मक झुकाव भी था और वे भारत को शीघ्रातिशीघ्र स्वतन्त्रता दिलाने हेतु हिंसात्मक उपायों में आस्था भी रखते थे। इसीलिये उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया था।यद्यपि आज़ाद हिन्द फौज के सेनानियों की संख्या के बारे में थोड़े बहुत मतभेद रहे हैं परन्तु ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि इस सेना में लगभग चालीस हजार सेनानी थे। इस संख्या का अनुमोदन ब्रिटिश इंटेलिजेंस में रहे कर्नल जीडी एण्डरसन ने भी किया है।

      जब जापानियों ने सिंगापुर पर कब्जा किया था तो लगभग 45 हजार भारतीय सेनानियों को पकड़ा गया था।

      सिंगापुर में आईएनए का स्मारक

      सिंगापुर के एस्प्लेनेड पार्क में लगी आईएनए की भूमिका का उल्लेख करती हुई स्मृति पट्टिका

      आज़ाद हिन्द फौज़ के गुमनाम शहीदों की याद में सिंगापुर के एस्प्लेनेड पार्क में आईएनए वार मेमोरियल बनाया गया था। आज़ाद हिन्द फौज के सुप्रीम कमाण्डर सुभाष चन्द्र बोस ने 8 जुलाई 1945 को इस स्मारक पर जाकर उन अनाम सैनिकों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की थी। बाद में इस स्मारक को माउण्टबेटन के आदेश पर ब्रिटिश साम्राज्य की सेनाओं ने ध्वस्त करके सिंगापुर शहर पर कब्जा कर लिया था। इस स्मारक पर आज़ाद हिन्द फौज़ के तीन ध्येयवाचक शब्द – इत्तेफाक़ (एकता), एतमाद (विश्वास) और कुर्बानी (बलिदान) लिखे हुए थे।

      सन् 1995 में सिंगापुर की राष्ट्रीय धरोहर परिषद (नेशनल हैरिटेज बोर्ड) ने वहाँ निवास कर रहे भारतीय समुदाय के लोगों के आर्थिक सहयोग से इण्डियन नेशनल आर्मी की बेहद खूबसूरत स्मृति पट्टिका उसी ऐतिहासिक स्थल पर फिर से स्थापित कर दी। इसकी देखरेख का काम सिंगापुर की सरकार करती है।

      द्रुत प्रयाण गीत

      कदम कदम बढाये जा – आजाद हिन्द फौज का प्रयाण गीत (क्विक मार्च) था जिसकी रचना राम सिंह ठाकुर ने की थी। इस ट्यून का आज भी भारतीय सेना के प्रयाण गीत के रूप में इसका प्रयोग होता है। पूरा गीत इस प्रकार है-Image result for आज़ाद हिंद फ़ौज

      कदम कदम बढ़ाये जा
      खुशी के गीत गाये जा
      ये जिंदगी है क़ौम की
      तू क़ौम पे लुटाये जा
      तू शेर-ए-हिन्द आगे बढ़
      मरने से तू कभी न डर
      उड़ा के दुश्मनों का सर
      जोश-ए-वतन बढ़ाये जा
      कदम कदम बढ़ाये जा
      खुशी के गीत गाये जा
      ये जिंदगी है क़ौम की
      तू क़ौम पे लुटाये जा
      हिम्मत तेरी बढ़ती रहे
      खुदा तेरी सुनता रहे
      जो सामने तेरे खड़े
      तू खाक में मिलाये जा
      कदम कदम बढ़ाये जा
      खुशी के गीत गाये जा
      ये जिंदगी है क़ौम की
      तू क़ौम पे लुटाये जा
      चलो दिल्ली पुकार के
      ग़म-ए-निशाँ संभाल के
      लाल क़िले पे गाड़ के
      लहराये जा लहराये जा
      कदम कदम बढ़ाये जा
      खुशी के गीत गाये जा
      ये जिंदगी है क़ौम की
      तू क़ौम पे लुटाये जा

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      आज़ाद हिन्द फौज के तमगे

      (वरीयता के क्रम में)

      • शेरे-हिन्द
      • सरदारे-जंग
      • वीरे-हिन्द
      • शहीदे-भारत
  • जयप्रकाश नारायण ने 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया।
  • फ्रांस में महिलाओं को 1945 में पहली बार वोट करने का अधिकार मिला।
  • संयुक्त राष्ट्र ने 1948 में आण्विक हथियार नष्ट करने के रूस के प्रस्ताव को ठुकराया।
  • चीन ने 1950 में तिब्बत पर अपना प्रभुत्व जमा लिया।
  • बेल्जियम में 1950 को मृत्यु दंड समाप्त।
  • भारतीय जनसंघ की स्थापना 1951 में हुई।
  • भारत और फ्रांस ने 1954 में पौण्डीचेरी, करैकल, और माहे को भारतीय गणतंत्र में शामिल करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किया। यह समझौता 1 नवम्बर से लागू हुआ।
  • चीन और भारत की सेनाओं में 1959 को भिडंत।
  • नारमन इ बारलॉग को 1970 में नोबेल का शांति पुरस्कार दिया गया।
  • दूरदर्शन ने 1990 में दोपहर की हिंदी व अंग्रेजी समाचार ब्लूटेन सेवाएं आरंभ कीं।
  • एल. के आडवानी 1995 में चौथी बार निर्विरोध बीजेपी के प्रधान चुने गए।
  • फिल्म निर्माता बी.आर चोपड़ा को 1999 में दादासाहेब फालके पुरस्कार।
  • सुकर्णो पूत्री मेघावती 1999 में इंडोनेशिया की उप-राष्ट्रपति चुनी गयीं।
  • चीन और पाकिस्तान का नौसैनिक अभ्यास 2003 को प्रारम्भ। चीन ने 4-बी कैरियर राकेट से दो उपग्रहों का प्रक्षेपण किया।
  • भारतीय मूल के अमेरिकी बॉबी जिंदल ने 2007 में अमेरिका के लुसियाना प्रान्त के गवर्नर पद पर अपनी जीत दर्ज की।
  • भारत व पाकिस्तान के बीच 61 वर्ष बाद कारवाँ-ए-तिजास 2008 को शुरू हुआ।
  • सायना नेहवाल ने 2012 में डेनमार्क ओपन सुपर सीरीज ख़िताब अपने नाम कर लिया।
  • कनाडा की संसद ने मलाला युसफजई को 2013 में कनाडा की नागरिकता प्रदान की।
  • प्रसिद्ध पैरालम्पिक धावक आस्कर पिस्टोरियोस को 2014 में अपनी प्रेमिका रीवा स्टीनकेंप की हत्या के लिये पांच साल की कैद की सजा।

21 अक्टूबर को जन्मे व्यक्ति

  • हिमालयी इलाकों की खोज करने वाले पहले भारतीय पंडित नैन सिंह रावत का जन्म 1830 में हुआ।पंडित नैन सिंह रावत (1830-1895) १९वीं शताब्दी के उन पण्डितों में से थे जिन्होने अंग्रेजों के लिये हिमालय के क्षेत्रों की खोजबीन की। नैन सिंह कुमाऊँ घाटी के रहने वाले थे। उन्होने नेपाल से होते हुए तिब्बत तक के व्यापारिक मार्ग का मानचित्रण किया। उन्होने ही सबसे पहले ल्हासा की स्थिति तथा ऊँचाई ज्ञात की और तिब्बत से बहने वाली मुख्य नदी त्सांगपो (Tsangpo) के बहुत बड़े भाग का मानचित्रण भी किया।

    जीवन परिचय

    पंडित नैन सिंह रावत का जन्म उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी तहसील स्थित मिलम गांव में 21 अक्तूबर 1830 को हुआ था। उनके पिता अमर सिंह को लोग ‘लाटा बुढा’ के नाम से जानते थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव में ही हासिल की लेकिन आर्थिक तंगी के कारण जल्द ही पिता के साथ भारत और तिब्बत के बीच चलने वाले पारंपरिक व्यापार से जुड़ गये। इससे उन्हें अपने पिता के साथ तिब्बत के कई स्थानों पर जाने और उन्हें समझने का मौका मिला। उन्होंने तिब्बती भाषा सीखी जिससे आगे उन्हें काफी मदद मिली। हिन्दी और तिब्बती के अलावा उन्हें फारसी और अंग्रेजी का भी अच्छा ज्ञान था। इस महान अन्वेषक, सर्वेक्षक और मानचित्रकार ने अपनी यात्राओं की डायरियां भी तैयार की थी। उन्होंने अपनी जिंदगी का अधिकतर समय खोज और मानचित्र तैयार करने में बिताया।

    पंडित नैन सिंह और उनके भाई 1863 में जीएसटी (ग्रेट ट्रिगोनोमैट्रिकल सर्वे) से जुड़े और उन्होंने विशेष तौर पर नैन सिंह 1875 तक तिब्बत की खोज में लगे रहे। नैन सिंह और उनके भाई मणि सिंह को तत्कालीन शिक्षा अधिकारी एडमंड स्मिथ की सिफारिश पर कैप्टेन थामस जार्ज मोंटगोमेरी ने जीएसटी के तहत मध्य एशिया की खोज के लिये चयनित किया था। उनका वेतन 20 रूपये प्रति माह था। इन दोनों भाईयों को ग्रेट ट्रिगोनोमैट्रिकल सर्वे के देहरादून स्थित कार्यालय में दो साल तक प्रशिक्षण भी दिया गया था।

    पंडित नैन सिंह ने काठमांडो से लेकर ल्हासा और मानसरोवर झील का नक्शा तैयार किया। इसके बाद वह सतलुज और सिंध नदी के उद्गम स्थलों तक गये। उन्होंने 1870 में डगलस फोर्सिथ के पहले यरकंड यानि काशगर मिशन और बाद में 1873 में इसी तरह के दूसरे मिशन में हिस्सा लिया था।

    इस बीच 1874 की गर्मियों में मिशन लेह पहुंचा तो तब तक कैप्टेन मोंटगोमेरी की जगह कैप्टेन हेनरी ट्रोटर ने ले ली थी। जीटीएस के सुपरिटेंडेंट जनरल जेम्स वाकर के निर्देश पर कैप्टेन ट्रोटर ने पंडित नैन सिंह ने लेह से ल्हासा तक तिब्बत के उत्तरी भाग का मानचित्र तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी। उनका यह सबसे कठिन दौरा 15 जुलाई 1874 को लेह से शुरू हुआ था जो उनकी आखिरी खोज यात्रा भी साबित हुई। इसमें वह लद्दाख के लेह से होते हुए ल्हासा और फिर असम के तवांग पहुंचे थे। इस यात्रा के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण जानकारियां जुटायी जो बाद में बहुत उपयोगी साबित हुई। उन्हें ल्हासा से बीजिंग तक जाना था लेकिन ऐसा संभव नहीं होने पर सांगपो यानि ब्रह्मपुत्र या भूटान के रास्ते भारत आने के निर्देश दिये गये थे।

    पंडित नैन सिंह 24 दिसंबर को तवांग पहुंचे थे लेकिन वहां उन्हें व्यापारी मानकर बंदी बना दिया गया और 17 फरवरी तक वह स्थानीय लोगों के कब्जे में रहे। आखिर में उन्हें छोड़ दिया गया। वह एक मार्च 1875 को उदयगिरी पहुंचे और वहां स्थानीय सहायक कमांडर से मिले जिन्होंने टेलीग्राम करके कैप्टेन ट्रोटर को उनके सही सलामत लौटने की खबर दी। सहायक कमांडर ने ही उनकी गुवाहाटी तक जाने की व्यवस्था की जहां उनका सांगपो से मिलन हुआ जो अब ब्रह्मपुत्र बन चुकी थी। गुवाहाटी से वह कोलकाता गये थे। इस तरह से पंडित ने लेह से लेकर उदयगिरी तक 1405 मील की यात्रा की थी। द ज्योग्राफिकल मैगजीन में 1876 में पहली बार उनका कार्यों पर लेख प्रकाशित हुआ था।

    पंडित नैन सिंह को उनके इस अद्भुत कार्यों के लिये देश और विदेश में कई पुरस्कार पदक भी मिले। रायल ज्योग्राफिकल सोसायटी ने उन्हें स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया था। उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान करते हुए कर्नल युले ने कहा था कि किसी भी अन्य जीवित व्यक्ति की तुलना में एशिया के मानचित्र तैयार करने में उनका योगदान सर्वोपरि है। पेरिस के भूगोलवेत्ताओं की सोसायटी ने उन्हें स्वर्णजड़ित घड़ी प्रदान की। उन्हें रूहेलखंड में एक गांव जागीर के रूप में और साथ में 1000 रूपये दिये गये थे। उनकी यात्राओं पर कई किताबें प्रकाशित हुई हैं। इनमें डेरेक वालेर की ‘द पंडित्स’ तथा शेखर पाठक और उमा भट्ट की ‘एशिया की पीठ पर’ महत्वपूर्ण हैं। इस महान अन्वेषक का 1 फरवरी 1895 में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।

    उत्तराखण्ड के एक सीमांत गांव के शिक्षक थे जिन्होंने न सिर्फ़ 19वीं सदी में पैदल तिब्बत को नापा बल्कि वहां का नक्शा तैयार किया. ये वो दौर था जब तिब्बत दुनिया की नजरों से छिपा हुआ था और उसे फॉरबिडन लैंड कहा जाता था. वहाँ विदेशियों को पूरी तरह से आने की मनाही थी. पंडित नैन सिंह न केवल तिबब्त गए बल्कि वहां जाकर तिबब्त का नक्शा बना लाए और वह भी बिना किसी आधुनिक उपकरण के.

    19वीं शताब्दी में अंग्रेज़ भारत का नक्शा तैयार कर रहे थे और लगभग पूरे भारत का नक्शा बना चुके थे. अब वो आगे बढने की तैयारी कर रहे थे लेकिन उनके आगे बढ़ने में सबसे बड़ा रोड़ा था तिब्बत.

    यह क्षेत्र दुनिया से छुपा हुआ था. न सिर्फ़ वहां की जानकारियां बेहद कम थीं बल्कि विदेशियों का वहां जाना भी सख़्त मना था. ऐसे में अंग्रेज कशमकश में थे कि वहां का नक्शा तैयार होगा कैसे?

    हालांकि ब्रितानी सरकार ने कई कोशिशें कीं लेकिन हर बार नाकामी ही हाथ लगी. पंडित नैन सिंह पर किताब लिख चुके और उन पर शोध कर रहे रिटार्यड आईएएस अधिकारी एसएस पांगती बताते है कि अंग्रेज अफसर तिब्बत को जान पाने में नाकाम हो गए थे.

    कई बार विफल होने के बाद उस समय के सर्वेक्षक जनरल माउंटगुमरी ने ये फैसला लिया कि अंग्रेजों के बजाए उन भारतीयों को वहां भेजा जाए जो तिब्बत के साथ व्यापार करने वहां अक्सर आते जाते हैं.

    और फिर खोज शुरु हुई ऐसे लोगों की जो वहां की भौगोलिक जानकारी एकत्र कर पाए. और आखिरकार 1863 में कैप्टन माउंटगुमरी दो ऐसे लोग मिल ही गए. 33 साल के पंडित नैन सिंह और उनके चचेरे भाई माणी सिंह.

    अब सबसे बडी चुनौती ये थी कि आखिर दिशा और दूरी नापने के यंत्र तिब्बत तक कैसे ले जाए जाएं क्योंकि ये आकार में बहुत बड़े थे और पकड़े जाने पर तिब्बती इसे जासूसी मान कर मौत की सजा भी दे सकते थे.आखिरकार दोनों भाइयों को ट्रेनिंग के लिए देहारदून लाया गया और ये तय किया गया कि दिशा नापने के लिए छोटा कंपास लेकर जाएंगे और तापमान नापने के लिए थर्मामीटर. हाथ में एक प्रार्थना चक्र था जिसे तिब्बती भिक्षुक साथ रखते थे और दूरी नापने के लिए एक नायाब तरीका अपनाया गया. नैन सिंह के पैरों में 33.5 इंच की रस्सी बांधी गई ताकि उनके कदम एक निश्चित दूरी तक ही पड़ें. इसके साथ उन्हें देहरादून में महीनों अभ्यास करवाया गया. हिंदुओं की 108 की कंठी के बजाय उन्होंने अपेन हाथों में जो माला पकड़ी वह 100 मनकों की थी ताकि गिनती आसान हो सके.

    भले ही उनके पास उपकरण बेहद साधारण रहे हों लेकिन हौसला असाधारण था. 1863 में दोनों भाइयों ने अलग-अलग राह पकड़ी. नैन सिंह रावत काठमांडू के रास्ते वह तिब्बत के लिए निकले और माणी सिंह कश्मीर के रास्ते.

    माणी सिंह इस पहले ही प्रयास में नाकाम हो गए और कश्मीर से वापस लौट आए लेकिन नैन सिंह ने अपनी यात्रा जारी रखी. वह तिब्बत पहुंचे और अपनी पहचान छुपा कर बौद्ध भिक्षु के रूप में रहे.

    वह दिन में शहर में टहलते और रात में किसी ऊंचे स्थान से तारों की गणना करते. जो भी गणनाएं वो करते थे उन्हें कविता के रूप में याद रखते या फिर कागज में लिख अपने प्रार्थना चक्र में छिपा देते थे.

    नैन सिंह रावत ने ही सबसे पहले दुनिया को ये बताया कि लहासा की समुद्र तल से ऊंचाई कितनी है, उसके अक्षांश और देशांतर क्या है. यही नहीं उन्होंने ब्रहमपुत्र नदी के साथ लगभग 800 किलोमीटर पैदल यात्रा की और दुनिया को बताया कि स्वांग पो और ब्रह्मपुत्र एक ही नदी हैं.

    सतुलज और सिंधु नदी के स्रोत भी सबसे पहले उन्होँने ही दुनिया को बताये. सबसे पहली बार उन्होँने ही दुनिया को तिब्बत के कई अनदेखे और अनसुलझे रहस्योँ से रूबरू करवाया

    सबसे बड़ी बात उन्होँने अपनी समझदारी, हिम्मत और अपनी वैज्ञानिक दक्षता से तिब्बत का नक्शा अपनी जान जोखिम में डाल कर बनाया.

    नैन सिंह पर सागा ऑफ नेटिव एक्सपलोरर नाम किताब लिख चुके पांगती बताते हैं कि यह कितना मुश्किल था. अन्वेषक होने की कारण नैन सिँह रावत ने चार बड़ी यात्रायेँ की.

    सबसे पहले वह साल 1865 में वो काठमांडू के रास्ते लहासा गए और कैलाश मानसरोवर के रास्ते वापस 1866 में वापस भारत आए.

    साल 1867-68 में वह उत्तराखण्ड में चमोली जिले के माणा पास से होते हुए तिब्बत के थोक जालूंग गए, जहां सोने की खदानें थीं.

    उनकी तीसरी बड़ी यात्रा थी शिमला से लेह और यारकंद जो उन्होंने साल 1873 -74 में की.

    उनकी आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण यात्रा वर्ष 1874-75 में की. वह लद्दाख से ल्हासा गये और फिर वहाँ से असम पहुँचे. इस यात्रा में वह ऐसे इलाकोँ से गुजरे जहाँ दुनिया का कोई आदमी अभी तक नहीँ पहुँचा था.

    नैन सिँह को एक एक्सप्लोरर के रूप मेँ ही याद नहीँ किया जाता बल्कि हिंदी मेँ आधुनिक विज्ञान में उन्होनेँ अक्षांश दर्पण नाम की एक किताब लिखने वाले वह पहले भारतीय थे. यह पुस्तकेँ जो सर्वेयरोँ की आने वाली पीढियोँ के लिये भी एक ग्रंथ के समान हैं.

    ब्रिटिश राज में उनके कामोँ को काफी सराहा गया. ब्रितानी सरकार ने 1977 में बरेली के पास 3 गावोँ की जागीरदारी उन्हे पुरस्कार स्वरूप प्रदान की. इसके अलावा उनके कामोँ को देखते हुए कम्पेनियन ऑफ द इंडियन एम्पायर का खिताब दिया गया. इसके अलावा भी अनेक संस्थाओँ ने उनके काम को सराहा. एशिया का मानचित्र तैयार करने में उनका योगदान सर्वोपरि है.

    रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी ने उन्हें स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया था।

    भारतीय डाक विभाग ने उनकी उपलब्धि के 139 साल बाद 27 जून 2004 को उन पर डाक टिकट निकाला था।

  • बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री कृष्ण सिंह का जन्म 1887 में हुआ।
  • भारतीय पुरातत्व के विद्वान काशीनाथ नारायण दीक्षित का जन्म 1889 में हुआ।
  • प्रसिद्ध हिन्दी फ़िल्म अभिनेता शम्मी कपूर का जन्म 1931 में हुआ।
  • हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री और नर्तकी हेलन का जन्म 1939 में हुआ।
  • इज़राइल के नौवें प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का जन्म 1949 में हुआ।
  • भारतीय हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता अजीत का जन्म 1998 में हुआ।

21 अक्टूबर को हुए निधन

  • भारतीय फ़िल्म निर्माता-निर्देशक यश चोपड़ा का निधन 2012 में हुआ।

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