अजीत अंजुम ने माना कि बचना था आईसीयू में जाने से

बिहार में खतरनाक बीमारी से कई बच्चों की हो चुकी है मौत

Ajit Anjun

नर्स की बात सुनकर मेरा माथा ठनका। भीतर से जोर-जोर से रोने की आवाज आ रही थी। वो बच्चे की मां थी। मैंने तुरंत मोबाइल निकाला और बाहर कॉरिडोर में डॉक्टर को खोज रही नर्स का विडियो बनाना शुरू किया (वो विडियो इस पोस्ट के साथ है)। ये विडियो ही इस बात का सबूत है कि मैं वहां कैमरा लेकर भी नहीं गया था। मोबाइल से शूट करने के दौरान ही इशारों से रिपोर्टर को कैमरामैन बुलाने को कहा। नर्स बचाव की मुद्रा में आई। फिर मैं आईसीयू की तरफ गया। मोबाइल से ये विडियो रिकॉर्ड किया। पांच मिनट तक दरवाजे पर कैमरे का इंतजार करता रहा। भीतर से आ रहीं रोने की आवाजें मुझे विचलित करती रहीं। कैमरा आने के बाद जब मैंने डॉक्टर की गैरमौजूदगी पर रिकॉर्ड करना शुरू किया, तभी डॉक्टर आ गए। उनसे सवाल-जवाब के दौरान ही पता चला कि दूसरे आईसीयू में भी बच्चे की मौत हुई है।

डॉक्टर एश्वर्य ने जो बातें बताईं, वो हैरान करने वाली थीं। उन्होंने दवा, डॉक्टर, नर्स से लेकर सुविधाओं की कमी धाराप्रवाह होकर बताई। उन्होंने कहा कि एक सीनियर डॉक्टर के जिम्मे चार आईसीयू हैं,  जबकि इससे काफी ज्यादा डॉक्टरों की तैनाती होनी चाहिए। उन्होंने कुछ दवाओं के नाम बताए, जो दूसरे और तीसरे लेवल की जरूरी दवा हैं, लेकिन यहां नहीं हैं। उन्होंने ये भी कहा कि मैनेजर से इन दवाओं की मांग की है, लेकिन नहीं मिली हैं। नर्स के बारे में उन्होंने कहा कि यहां ट्रेंड नर्स होनी चाहिए, जबकि ये सब स्टूडेंट्स नर्स हैं।

इतना सब बताने के लिए मैंने डॉक्टर एश्वर्य की तारीफ की और ये सोचकर वहां से निकल ही रहा था कि अब मेडिकल सुपरिटेंडेंट से किल्लतों के बारे में बात करूंगा, तभी एक शख्स की दनदनाते हुए आईसीयू में इंट्री हुई। वो शख्स एक बेड पर अपने बच्चे के इलाज के लिए शोर कर रही महिला को जोर-जोर से डांटने लगा। वो कह रहा था-चुप हो जाओ, नहीं तो उठाकर फिंकवा देंगे। मुझसे फिर रहा नहीं गया। मैंने कैमरा ऑन करवाया। उस शख्स के आखिरी शब्द मेरे कैमरे में रिकार्ड हैं। मैंने उस शख्स से पूछा कि आप इस महिला को क्यों डांट रहे हैं? ये भी पूछा कि आप कौन हैं? मेरे सवाल का जवाब उस शख्स ने नहीं दिया और कैमरा बंद कराने की कोशिश की। वहां मौजूद दो परिजनों ने रोते हुए अव्यवस्था की शिकायत की। ये जानकर और देखकर मेरे भीतर थोड़ा गुस्सा था। बाद में किसी ने बताया कि वो साहब स्थानीय पत्रकार हैं और अक्सर वहां देखे जाते हैं।

आईसीयू से मैं सीधा मेडिकल सुपरिटेंडेंट के कमरे में गया। उनसे अस्पताल की कमियों पर सवाल-जवाब किया। वो मानने को तैयार नहीं थे कि किसी तरह की कोई कमी है। उल्टे डॉक्टर एश्वर्य के खिलाफ गलतबयानी के लिए कार्रवाई की बात कहने लगे। मैंने उनसे कहा कि आप मेरे साथ आईसीयू चलिए और देखिए-सुनिए कि आपके डॉक्टर ही क्या कह रहे हैं। वो मेरे साथ चलने को तैयार हुए। उनके साथ हम दो आईसीयू तक गए। दोनों में उस वक्त भी डॉक्टर नहीं थे। आईसीयू में तैनात चार में से किसी भी नर्स को ये तक नहीं पता था कि किस डॉक्टर की यहां ड्यूटी है। ये सब देखकर मेडिकल सुपरिटेंडेंट ने भी कैमरे पर माना कि ऐसी आपात स्थिति में हर हाल में डॉक्टर को होना चाहिए था। ये गलत बात है। उन्होंने ये भी माना कि अस्पताल में डॉक्टरों की कमी है। मैंने उनसे बार-बार कहा कि आप सरकार से और यहां आ रहे मंत्रियों से क्यों नहीं कह रहे कि अतिरिक्त नर्सेज और डॉक्टर यहां भेजे जाएं। उन्होंने कहा भी कि इस बारे में बात की है और डॉक्टर व नर्स आने वाले हैं।

मेरा गु्स्सा इस बात को लेकर था कि डॉक्टर, दवा और नर्स की कमी का जो काम सबसे आसानी से हो सकता है, वो अब तक क्यों नहीं हुआ है। जिस अस्पताल में सत्तर-अस्सी बच्चों की मौत हो चुकी हो, केंद्रीय मंत्रियों के दौरे हो चुके हों, वहां का आईसीयू इंचार्ज अगर कहे कि बच्चों की जान बचाने के लिए जरूरी दवा और वेंटिलेटर जैसी सुविधाएं नहीं हैं, तो गुस्सा नहीं आना चाहिए?

मुझे तब तक पता चल चुका था कि अगले दिन केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन आने वाले हैं। मैं उनसे यही सब सवाल करने के लिए रुका रहा। डॉक्टर हर्षवर्धन के मुआयने के दौरान उन्हें ये सब बताने और पूछने के लिए पांच घंटे तक अस्पताल के बरामदे में मैं खड़ा रहा। डॉक्टर एश्वर्य ने जिन दवाओं की कमी का जिक्र किया था, वो सब मैंने उनके विडियो देखकर नोट किए। हर्षवर्धन मुझे अच्छी तरह से जानते हैं, लेकिन उस वक्त मेरे लिए वो सिर्फ स्वास्थ्य मंत्री थे,  जिनसे सीधा सवाल पूछा जाना चाहिए था। मैंने उनसे पूछा भी, लेकिन उन्होंने नहीं माना। तब मैंने कहा कि आप अपने पीछे बैठे मेडिकल सुपरिटेंडेंट से पूछिए। जो सुपरिटेंडेंट साहब कल तक डॉक्टरों की कमी कबूल कर चुके थे, वो कोई भी कमी मानने को तैयार नहीं हुए।

मैं चाहता तो बहस कर सकता था, लेकिन मैंने प्रेस कॉन्फ़्रेंस की मर्यादा का ख्याल रखते हुए बात खत्म कर दी, वरना कहा जाता कि आप कोई एजेंडा लेकर आए हैं। वैसे भी ये कोई इंटरव्यू नहीं था कि मैं दस काउंटर सवाल पूछता। मैं मायूस भी हुआ कि आईसीयू के डॉक्टर से मिली जानकारी पर संज्ञान लेने की बजाय उसे हल्के में उड़ा दिया गया। मैं बदमगजी नहीं करना चाहता था, इसलिए चार-पांच सवालों के बाद चुप हो गया कि अब बाकी रिपोर्टर पूछें। वहां से चलने के बाद भी अफसोस करता रहा कि मैंने मोबाइल से विडियो निकालकर क्यों नहीं दिखाया, हंगामा होता तो होता।

खैर, अब आखिरी बात! इतना सब होने के बाद भी मैं ये मानता हूं कि मुझे आईसीयू में जाने से बचना चाहिए था। एक दिन पहले ही कई चैनलों पर आईसीयू से रिपोर्टर के वाकथ्रू चले थे। तब मुझे लगा था कि सही नहीं है। मुजफ्फरपुर जाने से पहले जब मेरे शो के दौरान आईसीयू की तस्वीरें प्ले की गई थीं, तो ऑनएयर मैंने कहा था कि आईसीयू की ऐसी तस्वीरें हम नहीं देखना चाहते, ये भी ऑनरिकॉर्ड है।

मैं जानता हूं कि आईसीयू का क्या प्रोटोकॉल होता है, लेकिन मुजफ्फरपुर जाकर लगा कि ये आईसीयू वो है ही नहीं, जिसकी छवि आपके दिमाग में है। मेरे जाने के पहले भी पचासों लोग बेरोकटोक वहां जा रहे थे और मेरे आने के बाद भी। रही बात ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों की, तो मैं नहीं कह रहा कि वो अपनी ड्यूटी में कोई कमी छोड़ रहे होंगे। कमी है तो डॉक्टरों की, नर्स की। अगर चार आईसीयू पर एक सीनियर डॉक्टर होगा तो वो कहां-कहां भागेगा। वो भी तब, जब हर बेड पर दो-दो बीमार बच्चे हों।

मेरी शिकायत, मेरा गुस्सा सिस्टम और सरकार से है कि बच्चों की मौतों का सिलसिला शुरू होने के बीस दिन बाद भी उस मेडिकल कॉलेज-अस्पताल की ऐसी हालत क्यों थी? क्यों नहीं पटना, दिल्ली या कहीं और से अतिरिक्त डॉक्टर बुला लिए गए? क्यों नहीं वहां दवा और वेंटिलेटर के पर्याप्त इंतजाम हुए? क्यों नहीं दस-बीस एंबुलेंस की तैनाती हुई? क्यों नहीं आपात स्थिति को देखते हुए दो-चार अस्थाई आईसीयू बना दिये गये?

ऐसे बीसियों सवाल मेरे जेहन में आज भी हैं। मैंने उन बच्चों के परिजनों को देखा है। वो इतने गरीब लोग थे कि कई के पास अपने बच्चे के बेजान जिस्म को घर ले जाने के लिए वाहन खर्च तक नहीं था। इसी से आप सोचिए कि जिनके पास अपने बीमार बच्चे को बचाने के लिए अस्पताल तक लाने के लिए दो-चार सौ रुपए नहीं होते, वो किस तबके के होंगे? करीब डेढ़ सौ बच्चों की मौत के बाद भयंकर गर्मी से त्रस्त वार्ड में कल कूलर लगा है। क्या कूलर के इंतजाम में बीस दिन लगने चाहिए था?

ये तो उत्तर बिहार के सबसे बड़े अस्पताल का हाल है, बाकी छोटे सरकारी अस्पतालों और पीएचसी की हालत पर अभी बात करना भी बेमानी है। इतना सब होने के बाद भी मैं आईसीयू में अपने जाने को जस्टीफाई नहीं कर रहा। आखिरी बात तो यही है कि बचा जाना चाहिए था।

(वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम की फेसबुक वॉल से)

‘स्वनामधन्य संपादकों के मानसिक उपचार के लिए भी बने एक ICU’

बिहार में हर साल गर्मी के मौसम में एक्यूट इनसेफलोपैथी सिंड्रोम से कई बच्चों की हो जाती है मौत

Abhiranjan Kumar

मीडिया इसलिए, क्योंकि मीडिया भी तभी जागता है, जब हमारे सौ-पचास बच्चे असमय काल के गाल में समा जाते हैं। इससे पहले किसी भी बड़े मीडिया प्लेटफॉर्म पर इन इलाकों के हालात और आसन्न खतरे को लेकर प्रायः कोई रिपोर्टिंग देखने को नहीं मिलती। यूं भी गरीबों के दो-चार बच्चे कहीं मर जाएं, तो मेनस्ट्रीम मीडिया हाउसेज के लिए यह तूल देने लायक खबर नहीं होती, क्योंकि इन खबरों से टीआरपी नहीं आती। भारतीय मीडिया के द ग्रेट संपादकों को लगता है कि सैफ अली खान के बेटे तैमूर का अंगूठा चूसना भी एक महान खबर है और शाहरुख खान की बेटी की एक झलक पर तो गरीबों की सौ-सौ बेटियां भी कुर्बान की जा सकती हैं।

इन संपादकों के टेलिविजन ज्ञान के मुताबिक, सुबह आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि लोग उस वक्त सोकर उठे होते हैं। नाश्ता करते-करते टीवी देखते हैं। गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत देखकर उनका जायका बिगड़ सकता है। दोपहर को भी आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि वह वक्त सास-बहू नाम और थीम वाले मनोरंजक कार्यक्रमों का होता है। आमतौर पर उस वक्त मिडिल क्लास घरेलू महिलाएं टीवी देख रही होती हैं। उस वक्त अगर आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत दिखाएंगे तो सास-बहुओं के कुटिलता भरे हथकंडे दुनिया के सामने नहीं आ पाएंगे।

शाम को भी आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि वह वक्त प्रमुख पार्टियों के प्रवक्ताओं और हिंदू-मुस्लिम प्रतिनिधियों के बीच चिल्ला-चिल्ली कराने और टीवी स्टूडियो में हाथापाई के अभ्यास का होता है। उस वक्त अगर आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत दिखाएंगे तो देश का लोकतंत्र ही खतरे में पड़ जाएगा। रात को भी आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत नहीं दिखा सकते, क्योंकि वह वक्त लोगों के डिनर करने का होता है। लोग अच्छी-अच्छी खबरें देखकर चैन की नींद सोना चाहते हैं, इसलिए उस वक्त अगर आप गरीबों के बच्चों की बदहाली या मौत दिखाएंगे तो लोगों को बुरे-बुरे सपने आएंगे। वे अनिंद्रा के शिकार हो जाएंगे और अगली सुबह उठेंगे तो ताजगी महसूस नहीं करेंगे।

यही वजह है कि चाहे बिहार के मुजफ्फरपुर और आसपास के इलाके हों या उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और आसपास के इलाके, यहां बच्चों पर बरपने वाले कहर का पता बाकी देश को तभी चल पाता है, जब बीमारी सुरसा राक्षसी की तरह अपना मुंह पूरा खोल चुकी होती है और अनगिनत बच्चों को निगल चुकी होती है। इन इलाकों में हर साल यह बीमारी फैलती है, लेकिन किसी साल आपने इन इलाकों में बीमारी फैलने से पहले अस्पतालों के प्रबंध का रियलिटी चेक देखा है? या किसी इंटरव्यू में किसी संबंधित नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रशासनिक अधिकारी को इस बात के लिए रगड़े जाते हुए देखा है कि इस बार आपने अमुक बीमारी से बचाव के लिए क्या इंतजाम किए हैं?

इसीलिए यह अकारण नहीं है कि इस बार भी जब मुजफ्फरपुर में बच्चों की मौत का आंकड़ा 100 को पार कर गया है, तब जाकर दिल्ली के कुछ टीआरपी-लोलुप संपादक अपना चेहरा चमकाने और चैनल के लिए टीआरपी बटोरने के मकसद से एसकेएमसीएच अस्पताल के आईसीयू में आतंक मचाने पहुंचे हैं। करीब 14 साल से प्रदेश की सत्ता पर काबिज मुख्यमंत्री और केंद्र व राज्य के स्वास्थ्य मंत्रियों को रगड़ने की हैसियत या हिम्मत नहीं है तो इस त्रासद घड़ी में उन ट्रेनी डॉक्टरों और नर्सों को ही रगड़े जा रहे हैं, जो अपने सीमित ज्ञान और सुविधा के हिसाब से मरते हुए बच्चों को बचाने के लिए पल-पल जूझ रहे हैं।

जरा इन टीआरपी-लोलुप संपादकों का मानसिक दिवालियापन तो देखिए-

1.ट्रेनी डॉक्टरों और नर्सों को रगड़ा जा रहा है कि अस्पताल में डॉक्टरों की कमी क्यों है?

2. ट्रेनी डॉक्टरों और नर्सों को रगड़ा जा रहा है कि अस्पताल में बेड की कमी क्यों है और एक-एक बेड पर दो-दो तीन-तीन बच्चों का इलाज क्यों किया जा रहा है?

3. आईसीयू में बच्चों के इलाज में लगे डॉक्टरों और नर्सों को इलाज से भटकाकर उनके साथ डांट-फटकार की जा रही है।

4. जिन बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले ही खतरनाक रूप से कम हो चुकी है, उनकी जान से खेलते हुए आईसीयू में पूरे लाव-लश्कर के साथ घुसा जा रहा है, इस बात की परवाह किए बिना कि इससे उन बच्चों में इंफेक्शन का खतरा भी हो सकता है।

5. नेताजी के चमचों को तो रगड़ा जा रहा है कि आप आईसीयू में जूता पहनकर कैसे घुस गए, लेकिन टीआरपी-लोलुप संपादकों को इसी कृत्य के लिए कौन रगड़े?

6. अस्पताल में इलाज की मारामारी के बीच भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की राजनीतिक बहस कराई जा रही है।

7. आईसीयू की पोल-खोलते ऐसे प्रचार-लोलुप संपादक पल-पल अपने विडियोज वॉट्सऐप ग्रुपों में शेयर करना नहीं भूल रहे और व्यक्तिगत प्रचार में कोई कमी नहीं रह जाए,  इसके लिए संस्थान के सोशल और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर इसे भी अपने मातहतों के ज़रिए सुनिश्चित करा रहे हैं।

हालांकि, ऐसी बेवकूफाना हरकतें सभी संपादक नहीं कर रहे, बल्कि वही संपादक कर रहे हैं, जिनके पास या तो पत्रकारिता की औपचारिक डिग्री भी नहीं है या जो सनसनीछाप क्राइम शोज बनाते-बनाते हर घटना, दुर्घटना, त्रासदी और मौत में सनसनी ढूंढ़ने के आदी हो गए हैं या जिनका चैनल टीआरपी की रेस में काफी पीछे है और नौकरी बचाने के लिए जिन पर टीआरपी लाने का जबर्दस्त दबाव है या प्राइम टाइम डिबेट्स करते-करते जिन्हें बात-बात पर हल्ला-हंगामा करने की आदत लग चुकी है। इनकी समझ यह है कि जब भी ये किसी को रगड़ते हैं तो जनता ताली बजाती है।

ये लोग पत्रकारिता की मर्यादा भूल चुके हैं। इनकी मानवीय संवेदनाओं को लकवा मार चुका है। कायदे से एक सर्व-सुविधा-संपन्न आईसीयू तो इन लोगों के मानसिक दिवालियापन के उपचार के लिए भी इस देश में होना चाहिए। इन स्वनामधन्य संपादकों ने हमें बताया कि मासूमों की लाशों पर केवल सियासत ही नहीं चमकाई जा सकती, बल्कि पत्रकारिता भी चमकाई जा सकती है और अपना चेहरा तो निश्चित रूप से चमकाया जा सकता है।

लब्बोलुआब ये कि ‘चमकी’ बुखार के कवरेज में भी चेहरा न ‘चमका’ तो शायद ‘चमकने’ का मौका ये चूक न जाएं! इसीलिए त्रासदी के विकराल रूप धारण करने से पहले ये अपने सियासी आकाओं की चाशनी चाटकर देश में सरकार बनाने-गिराने के खेल में जुटे हुए थे और अब त्रासदी के विकराल रूप धारण कर लेने के बाद ये अपना विकराल मानवीय चेहरा प्रस्तुत करने के लिए बेसब्र हुए जा रहे हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की फेसबुक वॉल से)

संवेदनशीलता की बात करते संवेदन शून्य पत्रकार

मेरे प्यारे वरिष्ठ पत्रकारों, लाखों की तनख्वाह में से एक हजार के ओआरएस खरीद कर बांट दो

अतुल गुप्ता, पत्रकार

यहां सब कुशल मंगल है और मुजफ्फरपुर में सब कुशल मंगल हो जाने की आशा और ईश्वर से प्रार्थना करता हूं। क्योंकि आपसे, आपके चैनल से ऐसी आशा करना तो खैर व्यर्थ है ही। फिर भी एक निवेदन है कि अस्पताल में रिपोर्टिंग और वॉक थ्रू करके आप और दूसरे चैनल के लोग उन डॉक्टरों पर दबाव न बनाएं कि डॉक्टर कम हैं, वो सुनते नहीं, इलाज नहीं कर रहे, लापरवाह हैं आदि इत्यादि। उन्हें अपना काम करने दीजिए, ताकि वो समस्या पर काबू कर पाएं, न कि अपनी नौकरी बचाने में और आपके गैर संवेदनशील सवालों के जवाब देने में अपनी ऊर्जा लगाएं। अपनी टीआरपी बढ़ाने और चैनल को स्टेबल करने की कोशिश में कम से कम डाक्टरों की पेशेगत विवशताओं को समझिए। वो डाक्टर कम से कम पांच घंटे कुछ लाइनें नियमित सुनता है।

डॉ. साब देख लीजिए, सब ठीक तो है, बहुत तेज बुखार है, जल्दी सूई लगाइए। ज्यादा खून बह गया है, जल्दी करिए, हमारे मरीज को पहले देखिए आदि। कई बार लोग मारपीट पर उतर आते हैं। कई बार डॉक्टर नाराज होते हुए भी मन मसोसकर इलाज करता है। उस पर स्थानीय लोगों, नेताओं, पत्रकारों की सिफारिशें भी देखनी होती हैं। जरा सोचिए! एक डॉक्टर के साथ ये समस्याएं सामान्य हैं, लेकिन डॉक्टर दबता या डरता कब है, उखड़ता कब है, नाराज कब होता है? बड़े विचारणीय प्रश्न हैं।

इन प्रश्नों का उत्तर मेरे पास है और इसलिए है कि मुझे सरकारी डॉक्टरों पर प्राइवेट से ज्यादा भरोसा है। जब कोई पत्रकार या रसूखदार कहता है कि मैं तुम्हें देख लूंगा या लगाता हूं तुम्हारी खबर! या व्यावसायिक हितों के चलते अपनी मानवता को बेच देता है। वह भूल जाता है कि सवाल पूछना किससे है! दोषी किसे कहना है! एक डॉक्टर को, व्यवस्था को या फिर लाशों पर फैली टीआरपी बढ़ाने की भूख को! वो कहता है कि देश की संवेदना मर गई है और खुद इतना असंवेदनशील!!

बताते हैं कि एक चील एक बच्चे की मौत का इंतजार कर रही थी, फोटो पत्रकार ने उसकी फोटो क्लिक की और पुलित्जर अवॉर्ड जीत गया, लेकिन उस बच्चे की मौत से वो पत्रकार इतना द्रवित हुआ कि उसने आत्महत्या कर ली! और आप कर रहे हैं संवेदना की बात!! आपकी संवेदना कहां मर गई सरकार? और फिर क्या आपकी हिम्मत हुई कि एक बार भी सरकार से यही सवाल कर सकें? क्यों नहीं कर सके। क्या आपकी रिपोर्टिंग के बाद समस्या खत्म हो गई! या उस राज्य से विज्ञापन बंद होने के डर से आप सवाल नहीं कर सकते हैं?

एक आंकड़ा बाबू बैठकर बता रहे हैं कि 2014 में यही हुआ था। केंद्रीय मंत्री ने छल किया, कुछ नहीं किया। पर बाबू साहेब आप तो बिहार की माटी के हैं! आपने क्या किया? एक पैकेट ओआरएस भिजवा देते। एक साहेब केंद्रीय मंत्री से सवाल करके विडियो शेयर करके दम किए हैं कि उन्होंने सवाल किया और पत्रकारिता बचा ली और पता नहीं क्या-क्या!

मेरे प्यारे वरिष्ठ पत्रकारों, बच्चों की मौत को कम से कम न बेचो? वहां गए हैं आप तो लाख रुपए की तनख्वाह में से एक हजार के ओआरएस खरीद कर बांट दो। किसी मां-बाप को ढांढस बंधा दो। एक सवाल है, हिम्मत हो तो जवाब दीजियेगा। खुदा न खास्ता कि अगर उसी अस्पताल में आप अपने बच्चे को लेकर जाते और उन मृतकों के परिवार का कोई पत्रकार आपसे ऐसे बेहूदे सवाल पूछता और बच्चे के इलाज में मदद के बजाय देरी करवाता तो आप क्या करते? हां! आपसे ये नहीं हो पा रहा तो कृपा करके आप वो न करो, जो आप कर रहे हो।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

अंजना ओम कश्यप को लिखा डॉक्टर्स का ये खत हो रहा है वायरल

बिहार के मुजफ्फरपुर के हास्पिटल के आईसीयू में अंजना ओम कश्यप ने जिस तरह से रिपोर्टिंग की है

anjana

ऐसे में अब मेडिकल फेटरनिटी द्वारा लिखित एक पत्र भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। फेसबुक पर बेहद सक्रिय डॉक्टर सुभाष शल्या ने ये पत्र शेयर किया है, जिसके बाद से लगातार लोग इस पर कमेंट कर रहे हैं। हम इस पत्र की सत्यता को प्रमाणित नहीं कर रहे हैं, बस इसमे उठे मुद्दों से आपको अवगत करा रहे हैं।
आप ये पत्र नीचे पढ़ सकते हैं…
To
Anjana Om Kashyap
Aaj tak

Dt. 18.06.2019
Mrs. Kashyap
You entered ICU with your shoes, camera, camera person, Mike, and all equipments did you care enough to change your clothes in protocol to ICU.

Above it you shouted on doctor on duty for whom every life is precious. You must have came to Patna in flight , traveling to muzzafarpur via ac van but that doctor works day and night there with minimum standards. Did you care to ask questions to minister, MLA, MPs of that area.

No you won’t ever bcz you all are filling your banks with their money. But that doctor reached at that point via merit and for him a life is life. We doc never ever kill patient intentionally.
Do you know how much effort we put in to reach here? Cracking PMT among 15 lakhs candidate we qualify, reaching college we study day and night writing this letter i am sitting in library with my medicine book.

Then qualify pg entrance in which for 1.5 lakh 5000 gets qualified and you dare to ask our morality? Where are your morals when you journalist lick the foots of politicians?

We stand doing duty for continuously 24-36 hours on regular basis with a bare minimum salary of 50-60 k and you raisw questions about our character?

You must thank your luck that on that day a doc like me wasn’t on duty otherwise i would have made sure to throw you out of my ICU.

We are the backbone of medicine without facilities we treat we diagnose we bring people out of death so next time while questioning my morality look inside yours first. And if have problem ask govt to spend 10% of GDP on health, but no you can’t do that bcz your media houses run bcz of government.

If you want to debate come in open field we will have and make sure that day you leave aside the shield of journalism

We were we are we will remain to be brightest brain bcz we know how to defeat death.
Singing off
On behalf of medical fraternity.

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