क्या उत्तर प्रदेश तीन हिस्सों में तोड़ने को है सरकार? फ़ैक्ट चेक

सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश के ज़िला मुख्यालयों की एक लिस्ट इस दावे के साथ शेयर की जा रही है कि ‘सरकार ने उत्तर प्रदेश के बंटवारे का मसौदा तैयार कर लिया है’.
इस लिस्ट के हवाले से फ़ेसबुक, ट्विटर और वॉट्सऐप के बहुत से यूज़र यह दावा कर रहे हैं कि ‘उत्तर प्रदेश को तीन राज्यों में बाँटा जाने वाला है. इनका नाम होगा उत्तर प्रदेश, बुंदेलखण्ड और पूर्वांचल. पहले की राजधानी लखनऊ, दूसरे की प्रयागराज और तीसरे की राजधानी गोरखपुर होगी.’
इस वायरल लिस्ट में यह भी दावा किया गया है कि उत्तर प्रदेश के कुछ ज़िलों को उत्तराखण्ड, दिल्ली और हरियाणा में शामिल करने की योजना बनाई गई है और इसकी घोषणा जल्द ही की जाएगी.
इन दावों में कितनी सच्चाई है? यह जानने के लिए तीन सौ से ज़्यादा पाठकों ने वॉट्सऐप के ज़रिये यह लिस्ट हमें भेजी है.
कुछ पोस्ट ऐसी हैं जिनमें इस लिस्ट को गृह मंत्रालय के हवाले से शेयर किया जा रहा है. जबकि कुछ जगह दावा किया गया है कि ये लिस्ट उत्तर प्रदेश सरकार ने बनाई है
उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार यह एक फ़र्ज़ी लिस्ट है और सरकार इस दिशा में कोई क़दम नहीं उठा रही है.पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया, फेसबुक, वॉट्सऐप और ट्विटर पर उत्तर प्रदेश के बंटवारे की बातें चल रही हैं. दावा किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश तीन राज्यों में बंटेगा. एक होगा उत्तर प्रदेश जिसकी राजधानी लखनऊ होगी. इसमें 20 जिले होंगे. उत्तर प्रदेश के बंटवारे के बाद दूसरा राज्य बनेगा बुंदेलखंड, जिसकी राजधानी प्रयागराज होगी. इसमें 17 जिले शामिल होंगे. तीसरा राज्य होगा पूर्वांचल, जिसमें 23 जिले होंगे. और इसकी राजधानी होगी गोरखपुर.
वायरल मैसेज में कुछ और दावे किए जा रहे हैं.
1. सहारनपुर मंडल के तीन जिले हरियाणा में शामिल किए जाएंगे.
2.मुरादाबाद मंडल के सभी जिले उत्तराखंड राज्य में शामिल हो सकते हैं.
3.मेरठ मंडल के जिले बागपत, गाजियाबाद, हापुड़ बुलंदशहर और मेरठ को दिल्ली में शामिल किया जाएगा.
4.इसके साथ ही दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा.
सोशल मीडिया में इस तरह का मैसेज फॉरवर्ड हो रहा है.
काहे ज़ू ?? कछू जानकरी इस लाने ??? 👇🏽
यू॰पी॰ के सरकार टुकड़े कर रही है पूर्वांचल, यूपी , बुंदेलखंड और बाक़ी (मेरठ, नॉएडा , ग़जिबाद) दिल्ली प्रदेश में मिला रही है , दिल्ली को पूर्ण राज्य बना रही है ?? हरियाणा के भी कुछ जिले दिल्ली में आ रहे है और उनका ख़ामियाज़ा सरकार मुज़फ़रनगर और सहारनपुर को हरियाणा में मिलाकर पूरा करेगी, इस विषय में क्षेत्रीय सांसद और विधायक से राय माँगी गयी है !
अभी कुछ फ़ाइनल नहि पर नोर्थ ब्लाक में इसकी ड्राफ़्टिंग चल रही है
मुझे संजीव बालियान के एक क़रीबी ने बताई है ये बात , कोई जानकरी इस विषय में ???
‘ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं’
सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इस लिस्ट के बारे में हमने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के सूचना सलाहकार मृत्युंजय कुमार से बात की.
उन्होंने कहा, “उत्तर प्रदेश के बँटवारे की कोई योजना नहीं है. उत्तर प्रदेश सरकार के सामने इस तरह का कोई प्रस्ताव नहीं है. सोशल मीडिया पर इससे संबंधित जो भी ख़बरें घूम रही हैं, वो फ़र्ज़ी हैं. लोग ऐसी अफ़वाहों पर ध्यान ना दें.”
वहीं भारत के गृह मंत्रालय की ओर से प्रेस से बात करने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी ने भी इस बात से इनकार किया कि ‘उत्तर प्रदेश के बँटवारे की कोई योजना’ बनाई गई है.
उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार के सामने ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं आया है. सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही लिस्ट फ़र्ज़ी है.”
2011: यूपी के बँटवारे का प्रस्ताव
उत्तर प्रदेश का एक बँटवारा 9 नवंबर 2000 को किया जा चुका है जिसके बाद भारत का 27वां राज्य उत्तराखण्ड बना था. इस राज्य में अब 13 ज़िले हैं.लेकिन इसके बाद भी उत्तर प्रदेश के कुछ और टुकड़े करने की माँग समय-समय पर उठती रही है.बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख और उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उत्तर प्रदेश को चार भागों में बाँटने का प्रस्ताव पास किया था.
मायावती सरकार ने 21 नवंबर 2011 को विधानसभा में भारी हंगामे के बीच बिना चर्चा यह प्रस्ताव पारित कर दिया था कि उत्तर प्रदेश का चार राज्यों: अवध प्रदेश, बुंदेलखण्ड, पूर्वांचल और पश्चिम प्रदेश में बँटवारा होना चाहिए.नवम्बर 2011 में तत्कालीन मायावती सरकार ने उत्तर प्रदेश को पूर्वाचल, बुंदेलखंड, पश्चिमी प्रदेश और अवध प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव विधानसभा से पारित कराकर केंद्र को भेजा था. लेकिन केंद्र ने राज्य के इस प्रस्ताव को वापस कर दिया था. सरकार के प्रस्ताव के मुताबिक पूर्वांचल में 32, पश्चिम प्रदेश में 22, अवध प्रदेश में 14 और बुंदेलखण्ड में 7 जिले शामिल होने थे.
उत्तर प्रदेश सरकार ने एक लाइन का यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को आगे की कार्यवाही के लिए भेजा था जिसे 19 दिसंबर 2011 को केंद्र की यूपीए सरकार में गृह सचिव रहे आर के सिंह ने कई स्पष्टीकरण मांगते हुए राज्य सरकार को वापस भिजवा दिया था.
पूर्व गृह सचिव आर के सिंह अब नरेंद्र मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री हैं. उन्होंने दिसंबर 2011 में समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा था कि केंद्रीय गृह मंत्रालय उत्तर प्रदेश सरकार से यह जानना चाहता है कि नए राज्यों की सीमाएँ कैसी होंगीं, उनकी राजधानियाँ कहाँ बनेंगीं और भारतीय सेवा के जो अधिकारी इस समय उत्तर प्रदेश में काम कर रहे हैं, उनका बँटवारा चार नए राज्यों में किस तरह से होगा?
साथ ही केंद्र सरकार का सबसे अहम सवाल था कि देश के सबसे अधिक आबादी वाले प्रदेश पर जो भारी भरकम कर्ज़ है, उसका बँटवारा किस तरह होगा?
इसके बाद प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर मायावती ने कहा था कि “संविधान के अनुसार राज्य के पुनर्गठन का क़ानून संसद में ही पारित किया जाता है. राज्य सरकार की इसमें कोई संवैधानिक भूमिका नहीं होती.”
पार्टियों का क्या रुख़ रहा?
बहरहाल, 2012 में मायावती यूपी का चुनाव हार गईं और सत्ता में आई समाजवादी पार्टी जिसने अपने ‘अखंड उत्तर प्रदेश’ के नारे को बुलंद किया. समाजवादी पार्टी का रुख रहा है कि उत्तर प्रदेश को संसाधनों के असामान्य बँटवारे की वजह से विभाजित नहीं किया जाना चाहिए.
मायावती सरकार के उत्तर प्रदेश के विभाजन के फ़ैसले के ख़िलाफ़ समाजवादी पार्टी विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई थी.
विधानसभा में भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों ने अविश्वास प्रस्ताव पर सपा का साथ दिया था. विपक्षी दलों ने मायावती के इस फ़ैसले को एक ‘चुनावी शिगूफ़ा’ कहा था.
लेकिन छोटे राज्यों की हिमायत करने वाली मायावती अकेली नेता नहीं हैं. राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष अजीत सिंह ने उनसे काफ़ी पहले हरित प्रदेश (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) के गठन की माँग उठाई थी.
एक समय में राष्ट्रीय लोक दल के साथ गठबंधन में रही कांग्रेस पार्टी भी हरित प्रदेश के निर्माण और यूपी के बँटवारे की ज़रूरत को स्वीकार कर चुकी है.
फ़रवरी 2014 में यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे कांग्रेस के नेता जय राम रमेश
ने कहा था, “बीते 15 वर्षों से मेरी यह राय रही है कि यूपी जैसे बड़े राज्य में ‘गुड गवर्नेंस’ संभव नहीं है. इस राज्य के बेहतर भविष्य के लिए हमें इसके बँटवारे के बारे में सोचना चाहिए.”उत्तर प्रदेश के बंटवारे की मांग को समझने के लिए नेहरू युग में जाना होगा. 7 जुलाई, 1952. लोकसभा में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था,

मैं व्यक्तिगत रूप से इस बात से सहमति रखता हूं कि उत्तर प्रदेश का बंटवारा किया जाना चाहिए. इसे चार राज्यों में विभाजित किया जा सकता है. हालांकि मुझे संदेह है कि उत्तर प्रदेश के कुछ साथी मेरे विचार को शायद ही पसंद करेंगे. संभवत: मुझसे विपरीत राय रखने वाले साथी इसके लिए अन्य राज्यों के हिस्सों को शामिल करने की बात कहें.
1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग बना. हालांकि इसने उत्तर प्रदेश के विभाजन की सिफारिश नहीं की. लेकिन आयोग के एक सदस्य इतिहासकार और राजनयिक केएम पणिक्कर ने उत्तर प्रदेश के विशाल आकार के कारण पैदा होने वाले असंतुलन को लेकर चिंता जताई थी. उन्होंने संकेत दिए थे कि भारतीय संविधान की सबसे बड़ी और मूलभूत कमजोरी किसी एक राज्य विशेष और शेष अन्य के बीच व्यापक असमानता का होना है.
उन्होंने एक नए राज्य आगरा के निर्माण का प्रस्ताव किया, जिसमें उत्तर प्रदेश के मेरठ, आगरा, रुहेलखंड और झांसी मंडल को शामिल करने की बात कही थी. उन्होंने मेरठ मंडल में देहरादून और रुहेलखंड मंडल में पीलीभीत को शामिल नहीं करने सुझाव दिया था. इसके अलावा उन्होंने भिंड के चार जिलों समेत विंध्य प्रदेश से दतिया, मुरैना, ग्वालियर और मध्य भारत के शिवपुरी को नए राज्य आगरा में शामिल करने की बात कही थी. हालांकि पुनर्गठन आयोग के अन्य सदस्यों एस फजल अली और एचएन कुंजरू ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया था.
1955 में आई किताब थॉट्स एंड लिंग्विस्टिक स्टेट्स में डॉ. अंबेडकर ने भाषायी आधार पर राज्यों के विभाजन पर अपने विचार व्यक्त किए. उन्होंने उत्तर प्रदेश के तीन टुकड़े किए जाने की बात कही. प्रशासकीय कुशलता, राजव्यवस्था पर इतने बड़े राज्य के असमान प्रभाव को घटाने और छोटे राज्यों में अल्पसंख्यकों के हित को भी उन्होंने बंटवारे का आधार बनाया.
असल में किस तरह के राज्यों की मांग है?
बुंदेलखंड: प्रस्तावित राजधानी- झांसी
अखंड बुंदेलखंड की बात करने वाले उत्तरप्रदेश के झांसी, बांदा, ललितपुर, हमीरपुर, जालौन, महोबा और चित्रकूट जिले को इसमें शामिल करते हैं. वहीं मध्यप्रदेश से दतिया, सागर, छतरपुर, टीकमगढ़, दमोह और पन्ना जिले को मिलाकर नया राज्य बनाने की बात होती है. अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग बहुत पुरानी है. 1970 में बुंदेलखंड एकीकरण समिति का गठन किया गया था. लेकिन कुछ खास हुआ नहीं. बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक शंकरलाल ने पहली बार अलग राज्य की मांग को लेकर 1989 में अग्रेसिव आंदोलन शुरू किया. बाद में राजा बुंदेला भी अलग बुंदेलखंड की मांग को लेकर एक्टिव हुए. हालांकि बाद में उन्होंने बीजेपी जॉइन कर ली. और उनकी ये मांग ठंडी पड़ गई.
कांग्रेस की अगुआई वाली डॉ. मनमोहन सिंह सरकार में राज्यमंत्री रहे प्रदीप जैन भी अलग बुंदेलखंड के पक्ष में रहे. बीजेपी सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री रहीं उमा भारती ने भी 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान अलग बुंदेलखंड राज्य बनाने का वादा किया था. एक चुनावी रैली में उमा भारती ने कहा था कि केंद्र में बीजेपी की सरकार बनते ही 3 साल के भीतर अलग बुंदेलखंड राज्य का गठन कर दिया जाएगा. केंद्र में सरकार तो बनी लेकिन उमा भारती अपना वादा नहीं निभा पाईं.

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