108वीं जयंती:1857 की क्रांति के 51 साल पहले हुआ था वैल्लोर सैन्य विद्रोह

*वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् !*
*🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 108वीं जयंती*

*वेल्लोर सैनिक विद्रोह* 🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
*तिथि: 10.07.1806*

✍️ राष्ट्रभक्त साथियों आप सभी सन् 1857 की क्रांति से परिचित हैं, जिसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाम से जाना जाता है, किंतु आज मातृभूमि सेवा संस्था आपको सन् 1857 की क्रांति से 51 वर्ष पूर्व दक्षिण भारत में हुए मात्र एक दिन के सैनिक विद्रोह की क्रांतिकारी घटना से परिचित करवाना चाहेगी। वर्तमान तमिलनाडु के उत्तर-पूर्व के वेल्लोर किले में हुई सैनिकों की ये बग़ावत ‘वेल्लोर विद्रोह’ कहलाती है। इसमें लगभग 200 अंग्रेज़ों को मारा या ज़ख़्मी किया गया। विद्रोह चला तो सिर्फ एक दिन था,लेकिन भीषण मारकाट के बाद ख़त्म हुआ था। तारीख थी 10 जुलाई, 1806।

📝अंग्रेज़ी हुकूमत सिपाहियों के लिए नया ड्रेस कोड ले के आई। ये ड्रेस कोड ही बवाल की वजह बना। इसमें हिंदू सैनिकों को तिलक लगाने की मनाही कर दी गई। मुसलमान सैनिकों को दाढ़ी कटवाने का हुक्म दिया गया। इतना ही नहीं,सैनिकों को एक गोल हैट पहनना अनिवार्य कर दिया गया। ये हैट,उस हैट जैसा लगता था जिसे यूरोपियन लोग और धर्म परिवर्तन करवाए गए हिंदुस्तानी ईसाई लोग पहनते थे। और तो और, इस हैट पर एक लेदर की कलगी भी लगानी थी,जो बड़ी अजीब दिखा करती थी। पहनावे में ये बदलाव सिपाहियों के लिए हज़म करना मुश्किल था। सन् 1806 की शुरुआत में कुछ सिपाहियों ने इसका विरोध किया। उन्हें पकड़ कर कोड़े मारे गए। 02 सिपाहियों का किस्सा ख़ास तौर से बताया जाता है,जिनका विरोध सबसे मुखर था। इनमें एक सिपाही हिंदू था, एक मुसलमान। दोनों को सबके सामने 90 कोड़े लगाए गए। उसके बाद उन्हें सेना से बर्खास्त किया गया। 19 सिपाहियों को 50-50 कोड़े लगाए गए और माफ़ी मांगने पर मजबूर किया गया। असंतोष की आग धधकने लगी थी। आधी रात के बाद सिपाहियों ने सबसे पहले अपने अधिकारियों पर हमला बोल दिया। 14 अधिकारी तत्काल मार दिए गए। उसके बाद सैनिक चारों तरफ फ़ैल गए। अंग्रेज़ों को चुन-चुन कर मारा जाने लगा।

📝 किले के सेनापति जॉन फैनकोर्ट भी नहीं बच सका। 115 अंग्रेज़ लोगों की हत्या की गई। दर्जनों घायल हो गए। सुबह तक किले पर विद्रोही सिपाहियों का कब्ज़ा हो गया। मैसूर सल्तनत का झंडा किले पर फहरा दिया गया। इस तमाम कत्लो-गारत के बीच एक अंग्रेज़ ऑफिसर बचकर भाग निकलने में कामयाब हो गया। उसने आरकोट में मौजूद ब्रिटिश सेना को अलर्ट कर दिया। आरकोट वेल्लोर किले से महज़ 25 किलोमीटर दूर था। सर रोल्लो गिलेस्पी के नेतृत्व में तत्काल ब्रिटिश सेना वेल्लोर किले के लिए कूच कर गई। विद्रोह के ठीक 09 घंटे बाद भारतीय सिपाहियों को एक और ताज़ा दम सेना का सामना करना था। सर गिलेस्पी ने वेल्लोर पहुंचकर देखा कि कुछ बचे हुए अंग्रेज़ सिपाही अभी भी संघर्ष जारी रखे हुए हैं। भरपूर मात्रा में गोला-बारूद लेकर पहुंचे कमांडर ने किले का गेट उड़ा दिया। ब्रिटिश सेना तेज़ी से अंदर घुसी.ख़ूनी खेल शुरु हो गया। जो भी भारतीय सिपाही नज़र आया, काट डाला गया। किले के अंदर से लगभग 100 सिपाहियों को पकड़ कर बाहर लाया गया।

📝 गिलेस्पी के हुक्म पर उन्हें दीवार के सहारे खड़ा करके गोलियों से भून दिया गया। चंद घंटों में ही तकरीबन 350 विद्रोही सिपाही मार डाले गए। कुछ ज़ख़्मी सिपाहियों पर मुकदमा भी चलाया गया। उनमें से 06 को तोप से उड़ा दिया गया। 05 को फायरिंग स्क्वैड के हवाले किया गया। 08 को फांसी पर लटकाया गया। सेना की वो तीनों टुकड़ियां भंग कर दी गईं, जो इस विद्रोह में शामिल थीं। हालांकि विद्रोही सिपाहियों का जान से जाना मुकम्मल तौर से बेकार गया हो, ऐसा भी नहीं हुआ। नया ड्रेसकोड लागू करने का फैसला कैंसिल कर दिया गया। इसका फरमान सुनाने वाले अंग्रेज़ अधिकारियों को इंग्लैंड वापस भेज दिया गया। सन् 2006 में जब इस विद्रोह को 200 साल पूरे हुए, भारत सरकार ने इस पर एक डाक टिकट भी छापा इस विद्रोह के 51 साल बाद, ऐसा ही एक विद्रोह हुआ। थोड़े बड़े पैमाने पर। वो, जिसे भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है। वेल्लोर का विद्रोह छोटा भले ही था लेकिन उसकी अहमियत इतिहास के लिए बराबर है।
✍️ प्रशांत तेहल्यानी
*मातृभूमि सेवा संस्था ☎️ 9351595785*
राष्ट्रीय अध्यक्ष: *यशपाल बंसल ☎️ 8800784848*
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