पुस्तक समीक्षा:काला पानी और लिपूलेख: शेखर पाठक ,ललित पंत की बदनियती

डॉ पाठक व डॉ पन्त की कलुषित , बदनीयत पर डॉ उनियाल का पर कड़ा प्रहार
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कालापानी और लिपूलेख

– लेखक – शेखर पाठक एवं ललित पंत ..
बंधुओं हम अक्सर देखते हैं कि जब ईसाई मिशनरियों को अपने धर्म का प्रचार करना होता है तो वह अपने प्रचार पुस्तिकाओं के मुखपृष्ठ पर कभी भी ईसा मसीह का नाम नहीं लिखते, बल्कि वहां लिखा होगा, चिंताओं से मुक्त हों या रोगों को दूर करें या सुखी जीवन कैसे बिताएं आदि आदि । इससे आम मनुष्य यह समझता है कि यह कोई महत्वपूर्ण पुस्तक होगी, लेकिन जब उसे पढ़ने लगते हैं तो पता चलता है कि अंदर केवल ईसाई धर्म का प्रचार है और कुछ नहीं। ठीक इसी तरह यदि कोई इतिहासकार और पर्यावरणविद् कालापानी और लिपूलेख जैसे महत्वपूर्ण विषय की पुस्तक प्रकाशित कर रहा हो, तो मुखपृष्ठ देखने से यही लगता है कि यह कोई महत्वपूर्ण तथ्यों पर आधारित पुस्तक होगी, लेकिन जब अंदर के पृष्ठों पर नजर जाती है तो पता चलता है कि यह केवल पूर्वाग्रहों व राजनीतिक संकीर्णताओं से भरी हुई पुस्तक है । पुस्तक को पढ़ने के बाद लेखकगणों का मूल उद्देश्य सामने आ गया, जिसके कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं । उनके अनुसार – और हाल के महीनों में विवाद के बढ़ने के बाद नेपाल ने बार-बार उच्चस्तरीय संवाद करने का आग्रह किया तो भारत ने कोविड-19 का बहाना बनाया, जबकि यह एक वैश्विक समस्या है । क्या लद्दाख में चीनी घुसपैठ से निपटने में भारत कोविड-19 का बहाना कर सकता है । ….भारत के सेनाध्यक्ष तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अनावश्यक बयान दिया । …. रक्षामंत्री को इस सड़क का उद्घाटन करने की क्या जल्दी थी, क्या नेपाल से संवाद नहीं किया जा सकता था (पृष्ठ 43) । पुस्तक के अंतिम पृष्ठ में लेखकद्वय भारत सरकार को सलाह देते हैं कि – नेपाल पहल करता रहा है । भारत को उसे आगे बढ़ाना चाहिए । भारत को जरूरी अकड़ से मुक्ति पानी चाहिए। अपने सभी पड़ोसियों को शत्रुता में बदलना भारतीय उपमहाद्वीप को अशांत कर देगा । वैसे विद्वान लेखकगण इस विवाद का मूल कारण भी बता देते हैं कि – बिना उपलब्धियों की मोदी सरकार फिर सत्ता में आ गई । अब उसका एजेंडा ज्यादा दिक्कत करने वाला था .. धारा 35a तथा धारा 370 को उठाने के बाद .. 31 अक्टूबर 2019 को जारी नक्शे में जम्मू कश्मीर के संदर्भ में अनेक बदलाव थे, पर काला पानी को पूर्ववत् भारत में दिखाया गया था । यहीं से नेपाल में उबाल आना शुरू हुआ (पृष्ठ40)। शायद लेखक महोदय का कहने का तात्पर्य है कि ना तो धारा 370 हटाई जाती ना नक्शे में बदलाव होता तो नेपाल में उबाल भी नहीं आता और यह मामला शांत रहता । कहने की आवश्यकता नहीं है किे लेखक महोदय पद्मश्री से सम्मानित हैं और अवार्ड वापसी गैंग के रथी रहे हैं, तो मोदीजी के प्रति खुन्नस तो बनी रहनी चाहिए । वह अपने मन की इस पीड़ा को भी अपनी पुस्तक में वर्णित करते हैं । लेकिन विरोध का मतलब नेपाल का पक्ष लेना किस बात का संकेत देता है, कहने की आवश्यकता नहीं है । एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा वाली बात यह है कि जब भारत के प्रधानमंत्री कहते थे कि मैं दुर्भाग्य से हिंदू हूं तो तब नेपाल हिंदू राष्ट्र था और अब जब नेपाल में कम्युनिस्टों का राज हो गया तो भारत हिंदुत्व व राष्ट्रवाद की ओर बढ़ रहा है । लेखकगण अपनी इस वेदना को भी पुस्तक में प्रस्तुत कर ही देते हैं । .. 2014 में जब भारत में हिन्दूराष्ट्र के विचार से संचालित राजनीति सत्तासीन हो रही थी, नेपाल संवैधानिक रूप से अपने औपचारिक हिंदू राष्ट्र के पुछल्ले से मुक्त हो रहा था (पृ40) । .. राष्ट्रवाद वास्तव में मुद्दों को ठीक से देखने नहीं देता । यह न तार्किक होता है ना दूरदर्शी । यह नजरिया बड़ी गलतफहमियों को जन्म देता है (पृ3)। फिर भी हम विद्वान लेखकगणों को इस बात की अवश्य बधाई देते हैं कि उन्होंने कालापानी और लिपूलेख के बहाने ही सही, परंतु अपने मन की व्यथा कथा व्यक्त कर ही दी, नहीं तो उन्हें यह वेदना कितना सताती रहती, हम सोच भी नहीं सकते थे । जिस प्रकार से मैथिलीशरण गुप्त जी ने साकेत के माध्यम से उर्मिला की विरह वेदना को व्यक्त किया था, ठीक उसी प्रकार से लेखकद्वय ने अपनी 45 पृष्ठीय कालापानी और लिपूलेख जैसी इतिहासपरक व भौगोलिक तथ्यों वाली द्विपक्षीय संवेदनशील पुस्तक में भी अंततः अपनी राजनीतिक विरह वेदना को व्यक्त करने का प्रयास किया है । अंततः यदि यह पुस्तक नेपाली विद्वानों की लिखी होती तो कम से कम नेपाल में अवश्य सराही जाती । … समीक्षक -डॉक्टर राजेश्वर उनियाल।

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