अंग्रेजों की गुलाम टिहरी राजशाही से आखिरी सांस टक्कर ली बलिदानी श्रीदेव सुमन ने

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जन्म: *25.05.1916* बलिदान: *25.07.1944*
राष्ट्रभक्त *श्रीदेव सुमन * 🙏🙏🌹🌹🌹🌹

चरित्र-निर्माण, समाज-सुधार व राष्ट्रवादी जन-चेतना के लिए समर्पित, मातृभूमि सेवा संस्था आज आपको ‘देवभूमि’ उत्तराखंड के उस राष्ट्रभक्त से परिचित कराने का प्रयास करेगी जिसने अपने महान प्रयास व सर्वस्व बलिदान से अंग्रेजों के तलवे चाटने वाली टिहरी की अलोकतांत्रिक राजशाही को उखाड़ फेंका। राष्ट्रभक्त साथियों आज हम बात करेंगे उस अमर बलिदानी की,जिनके *84 दिन के अनशन* (भूख-हड़ताल) उपरांत बलिदान ने जनता को क्रूर राजशाही उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरणा दी,जिनके नाम पर उत्तराखंड के टिहरी में स्थित एशिया के सबसे ऊँचे बाँध के विशाल जलाशय को *‘श्रीदेव सुमन सागर’* नाम दिया गया तथा जिनके बलिदान दिवस को उत्तराखंड राज्य *‘सुमन दिवस’* के रूप में मनाती है। पेशे से लोकप्रिय वैद्य,पिता हरिराम बडोनी,माता तारा देवी के घर 25 मई, 1916 को टिहरी रियासत के बामुंड पट्टी के जौल गाँव में श्रीदत्त बडोनी/श्रीदेव सुमन का जन्म हुआ था।

📝 श्रीदेव सुमन जब मात्र 03 वर्ष के थे तभी सन् 1919 में 36 वर्षीय चिकित्सक पिता हैजें से पीड़ित लोगों की दिन रात सेवा करते करते इस बीमारी की चपेट में गए, जिससे उनका देहांत हुआ। श्रीदेव सुमन का जन्म ऐसे समय में हुआ था, जब जनता राजशाही को ही आखिरी फरमान समझती थी। टिहरी रियासत में अंग्रेज यहाँ की हर कार्यवाही में खुला हस्तक्षेप करते थे। इतिहासकार भी लिखते हैं कि राजपरिवार अंग्रेजों के एहसानों तले इस कदर डूबा हुआ था कि सन् 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों को छुपने के लिए अपने राजमहल के द्वार खोल दिए थे। टिहरी के ही गाँव चम्बाखाल से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद श्रीदेव सुमन जी ने टिहरी से मिडिल कक्षा उत्तीर्ण की। विद्यार्थी जीवन के दौरान ही सन् 1930 में देहरादून में सत्याग्रही आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें 15 दिन की जेल और बैंतों से पीटे जाने की सजा मिली थी। इस सबके बीच उनका अध्ययन भी जारी रहा। सन् 1932 में देहरादून में शिक्षक बने व सन् 1936 में हिंदी साहित्य सम्मेलन से ‘विशारद’ किया। श्रीदेवी सुमन युवावस्था से ही टिहरी की राजनीतिक परिस्थितियों से अवगत होकर आज़ादी के लिए लोगों को संगठित करने में जुटे हुए थे।

📝 अगस्त सन् 1942 में जब भारत छोड़ो आन्दोलन प्रारम्भ हुआ तो टिहरी आते समय इन्हें 29 अगस्त, 1942 को देवप्रयाग में ही गिरफ्तार कर लिया गया और 10 दिन मुनि की रेती जेल में रखने के बाद 06 सितम्बर को देहरादून जेल भेज दिया गया। ढ़ाई महीने देहरादून जेल में रखने के बाद इन्हें आगरा सेन्ट्रल जेल भेज दिया गया,जहाँ ये 15 महीने नजरबन्द रखे गये। 30 दिसम्बर,1943 से 25 जुलाई, 1944 तक 209 दिन सुमन ने टिहरी की नारकीय जेल में बिताए। इस दौरान इन पर कई प्रकार से अत्याचार होते रहे। जैसे ही श्रीदेव सुमन की जेल पहुँचे उनके कपड़े छीन कर उन्हें अकेलेपन की कोठरी में बिना ओढ़ने बिछौने के फैंक दिया गया। जब उन्होंने माफीनामा लिखने से इंकार किया तो उन्हें बेंतों से पीटा गया और 35 सेर वजन वाली बेड़ियाँ उनके पैरों में डाल दी गईं। जाड़े की ठंडी रातों में उन पर बहुत सारा ठंडा पानी फेंका गया। एक सप्ताह तक यातनाएं चलती रहीं तो भी सुमन अपने पथ से तनिक न डिगे। झूठे गवाहों के आधार पर जब इन पर मुकदमा दायर किया गया तो इन्होंने अपनी पैरवी स्वयं की। झूठे मुकदमे और फर्जी गवाहों के आधार पर 31 जनवरी, 1944 को 02 साल का कारावास और 200 रुपया जुर्माना लगाकर इन्हें सजायाफ्ता मुजरिम बना दिया गया।

📝 इस दुर्व्यवहार के विरोध में श्रीदेव सुमन जी ने 29 फरवरी से 21 दिन का उपवास प्रारम्भ कर दिया, जिससे जेल के कर्मचारी कुछ झुके,लेकिन उनकी बात महाराजा से नहीं करवाई गई। श्रीदेव सुमन लगातार माँग करते रहे कि उनकी बातें राजा तक पहुँचाई जाएँ, लेकिन बदले में उन्हें कठोर दंड और यातनाएँ दी गईं। शासन की ओर से किसी प्रकार का उत्तर न मिलने पर श्रीदेव सुमन जी ने विरोध स्वरुप 03 मई,1944 से अपना ऐतिहासिक आमरण अनशन शुरू कर दिया। इस बीच उनका मनोबल तोड़ने के लिए उन पर कई क्रूर अत्याचार किए गए,लेकिन सुमन अडिग रहे। प्रशासन को यह डर था कि श्रीदेव सुमन की जेल में यदि मृत्यु हो गई तो जनता राजशाही के खिलाफ आंदोलन छेड़ देगी। सुमन के इस ऐतिहासिक अनशन का समाचार जब टिहरी की जनता तक पहुँचा, तो टिहरी रियासत ने यह अफवाह फैला दी कि श्रीदेव सुमन ने अनशन समाप्त कर दिया है और 04 अगस्त को महाराजा के जन्मदिन पर उन्हें रिहा कर दिया जाएगा। यह प्रस्ताव ठुकराने के बाद सुमन को जेल के अधिकारियों ने काँच मिली रोटियाँ खाने को दी । प्रताड़ना और अनशन से उनकी हालत बिगड़ती गई। जेलकर्मियों ने लोगों के बीच यह खबर फैला दी कि सुमन को न्यूमोनिया हो गया है,जबकि उन्हें जेल में कुनैन के इन्ट्रावेनस इन्जेक्शन लगाए गए।

📝अंततः 25 जुलाई,1944 को टिहरी राजशाही के क्रूर अत्याचारों के कारण बलिदान हुए श्रीदेव सुमन जनता को आज़ादी के लिए प्रेरित कर चुके थे। लोगों ने राजशाही के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। जनता के आन्दोलन ने टिहरी रियासत को प्रजामण्डल को वैधानिक करार देने पर मजबूर कर दिया। वर्ष 1948 में जनता ने देवप्रयाग, कीर्तिनगर और टिहरी पर अधिकार कर लिया और प्रजामण्डल का मंत्रिपरिषद गठित हुआ। टिहरी गढ़वाल के भारतीय गणराज्य में शामिल हो जाने तक यह आन्दोलन चलता रहा। इसके बाद 01 अगस्त, 1949 को टिहरी गढ़वाल राज्य का भारत गणराज्य में विलीनीकरण हो गया। राष्ट्रभक्त साथियों, श्रीदेव सुमन एक महान स्वतंत्रता सेनानी के साथ साथ एक बेहतरीन साहित्यकार भी थे। उन्होंने पंजाब विश्विद्यालय से रत्न भूषण, प्रभाकर और बाद में विशारद और साहित्य रत्न की परीक्षाएँ पास कीं थी। सुमन ने दिल्ली में देवनागिरी महाविद्यालय की स्थापना की और कविताएँ भी लिखने लगे। वर्ष 1937 में ‘सुमन सौरभ’ नाम से अपनी कविताएँ भी प्रकाशित करवाईं। इसी दौरान वे पत्रकारिता के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। *ऋणी राष्ट्र आज आज़ादी के मतवाले श्रीदेव सुमन के 76वें बलिदान दिवस पर आदर व सम्मान में नतमस्तक है।* 🌹🌹🌹🙏🙏🌹🌹🌹

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