विजयादशमी / बाहर से आया लिंचिंग शब्द थोपा जा रहा हम पर; स्वयंसेवकों का इससे कोई संबंध नहीं: भागवत

विजयादशमी के मौके पर मंगलवार को नागपुर स्थित संघ मुख्यालय में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने शस्त्र पूजा की। सबसे पहले बजे संघ मुख्यालय से स्वयंसेवकों ने लगभग 2 किमी पथ संचलन किया . इसके बाद संघ परंपरा के मुताबिक शस्त्र पूजन किया गया और सरसंघचालक मोहन भागवत ने शस्त्र पूजन विधि पूरी की. शस्त्र पूजन के बाद कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि शिव नादर का स्वागत किया गया.
ये आरएसएस का सालाना कार्यक्रम है
आरएसएस का विजयादशमी कार्यक्रम नागपुर के रेशमबाग में संघ मुख्यालय में आयोजित किया गया. यह आरएसएस का सालाना कार्यक्रम है जिस पर राजनीतिक विश्लेषकों की नजर रहती है क्योंकि विजयादशमी पर आरएसएस प्रमुख के भाषण में संघ के साथ-साथ उससे जुड़े संगठनों का आने वाले समय का एजेंडा सामने आता है. पिछले साल विजयादशमी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी थे.
शिव नादर ने किया कार्यक्रम को संबोधित
इसके बाद समारोह के मुख्य अतिथि शिव नादर ने सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि वो इस उत्सव में शामिल होकर सम्मानित महसूस कर रहे हैं. आरएसएस के कार्यकर्ताओं की ऊर्जा से रेशमीबाग जीवंत हो उठा है.
मोहन भागवत ने क्या कहा
नागपुर.आरएसएस के स्थापना दिवस के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि ऐसा नहीं है कि प्रजातंत्र की व्यवस्था पश्चिम के देशों ने भारत को दी है, बल्कि ये भारत की परंपरा का हिस्सा रहा है. भागवत ने कहा कि भारत का चुनाव दुनिया में सबके लिए रुचि का विषय है कि कैसे इतने बड़े चुनाव संपन्न कराए जा सकते हैं। लोग जानना चाहते थे कि 2014 में जो परिवर्तन आया था, वो क्या पिछली सरकार के लिए निगेटिव फॉलआउट था या फिर लोग खुद ही बदलाव चाहते थे।
भागवत ने प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की
उन्होंने कहा कि इस देश की जनता ने प्रत्यक्ष चुनाव के निर्णय लिए, इसके चलते वह परिपक्व हुई है। जनता ने 2014 की अपेक्षा इस बार सरकार को ज्यादा बहुमत दिया। यह भी साबित हुआ है कि सरकार अनुच्छेद 370 हटाने जैसा कठोर निर्णय लेने के लिए प्रतिबद्ध है। सरकार ने यह फैसला लोकसभा और राज्यसभा में आमचर्चा के माध्यम से किया। सभी दलों ने इसे जो समर्थन दिया, प्रधानमंत्री का यह कार्य अभिनंदनीय है। नई सरकार को बढ़ी हुई संख्या में फिर से चुनकर समाज ने उनके पिछले कार्यों की सम्मति व आने वाले समय को बहुत सारी अपेक्षाओं को जाहिर किया था.
मोहन भागवत ने ये भी कहा कि पिछले कुछ सालों में भारत की सोच की दिशा में एक बदलाव आया है. उसको न चाहने वाले व्यक्ति दुनिया में भी हैं और भारत में भी मौजूद हैं. हालांकि भारत को बढ़ता हुआ देखना जिनके स्वार्थों के लिए डर पैदा करता है,ऐसी शक्तियां भी भारत को दृढ़ता व शक्ति से संपन्न होने नहीं देना चाहती हैं.
मोहन भागवत ने मॉब लिंचिंग के मामलों को संघ से संबंधित न होने की बात कही. उन्होंने कहा कि यह शब्द पश्चिमी देशों से हमारे यहां आया और हम पर थोपा जा रहा है। इसे लेकर भारत को दुनिया में बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। संघ का नाम लिंचिंग की घटनाओं से जोड़ा गया, जबकि संघ के स्वयंसेवकों का ऐसी घटनाओं से कोई संबंध नहीं होता। उन्होंने कहा कि इन सबसे संघ का कोई संबंध नहीं है और स्वयंसेवक ऐसे काम नही करते . अगर कोई स्वयंसेवक इसमें शामिल मिला तो संघ उसको प्रोटेक्ट करने नही जाता. ये षडयंत्र है .सारे देश और हिंदू समाज को सर्वत्र बदनाम करने का प्रयास शुरू किया जा रहा है. संघ के स्वयंसेवक किसी को मारने नहीं बल्कि बचाने जाएंगे.
‘लिंचिंग शब्द बाहर का’
संघ प्रमुख ने कहा, ‘‘ईसा मसीह एक दिन कहीं जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि कुछ लोग एक युवती को गालियां दे रहे हैं। ईसा ने उनके पास जाकर पूछा कि तुम लोग इस अकेली महिला पर क्रोध क्यों कर रहे हो? इस पर कुछ लोगों ने कहा कि यह युवती चरित्रहीन है। आज हम इसे पत्थरों से मार डालेंगे। इसी बीच कुछ लोगों ने पत्थर उठा लिए। यीशु ने कहा- यह बात ठीक है कि युवती ने पाप किया है। तुम लोगों का क्रोधित होना भी ठीक है। लेकिन दंड वहीं दे सकता है जिसने अपने जीवन में कभी कोई अपराध नहीं किया हो। इस युवती को पहला पत्थर वह मारे, जिसने मन, वचन और शरीर से कभी कोई पाप नहीं किया हो। अगर तुम लोगों में कोई महान धर्मात्मा हो, तो वह आगे आए। यीशु की बात सुनते ही सबके चेहरे उतर गए। उनके हाथों के पत्थर नीचे गिर गए। धीरे-धीरे सभी वहां से खिसक लिए। पत्थरों से मारने की घटना किसी बाहर देश में मिलती है, हमारे यहां नहीं।’’
‘संघ हिंदू समाज का संगठन करता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह मुस्लिम और ईसाइयों से शत्रुता रखता है’
इस मौके पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस मौजूद रहे।
‘जो भारतीयों के पूर्वज, वे हिंदू’
भागवत के मुताबिक, ‘‘संघ की दृष्टि में हिंदू शब्द केवल अपने आप को हिंदू कहने वालों के लिए नहीं है। जो भारत के हैं, भारतीय पूर्वजों के वंशज है तथा सभी विविधताओं का स्वीकार सम्मान व स्वागत करते हुए आपस में मिलजुल कर देश का वैभव तथा मानवता में शांति बढ़ाने में जुट जाते हैं वे सभी भारतीय हिंदू हैं। संघ की अपने राष्ट्र के पहचान के बारे में, हमारे देश के स्वभाव की पहचान के बारे में स्पष्ट दृष्टि व घोषणा है, कि भारत हिंदुस्थान, हिंदू राष्ट्र है।’’
‘‘हिंदू समाज, हिंदुत्व इनके बारे में अनेक प्रमाणहीन, विकृत आरोप लगाकर उनको भी बदनाम करने का प्रयास चलता ही आया है। इन सब कुचक्रों के पीछे हमारे समाज का निरंतर विघटन होता रहे, उसका उपयोग अपने स्वार्थलाभ के लिए हों, यह सोच काम कर रही है। संघ हिंदू समाज का संगठन करता है, इसका अर्थ वह अपने आप को हिंदू न कहने वाले समाज के वर्गों, विशेषकर मुस्लिम और ईसाइयों से शत्रुता रखता है, यह नितांत असत्य है। इसी बात का लगातार प्रयास चलता रहता है। संघ नौ दशकों से समाज में एकात्मता, सद्भावना, सदाचरण और राष्ट्र के प्रति स्पष्ट दृष्टि और भक्ति उत्पन्न करने का कार्य कर रहा है।’’
‘हमारे यहां मंदी नहीं’
भागवत के मुताबिक, ‘‘अर्थव्यवस्था के एक जानकार ने मुझे बताया कि ‘मंदी उसे कहते हैं, जब विकास दर शून्य से नीचे जाए। हमारे यहां तो विकास दर अभी 5 फीसदी से ज्यादा है। आर्थिक व्यवस्था चक्र की गति में आई मंदी सर्वत्र कुछ न कुछ परिणाम देती है। अमेरिका और चीन में चली आर्थिक स्पर्धा के परिणाम भी भारत समेत सभी देशों को भुगतने पड़ते हैं।’’
देश के अंदर भी उग्रवादी हिंसा में कमी- भागवत
भागवत ने कहा कि हमारी स्थल सीमा और जल सीमाओं पर सुरक्षा सतर्कता पहले से बेहतर है। केवल स्थल सीमा पर रक्षक और चौकियों की संख्या व जल सीमा पर (द्वीपों वाले टापुओं की) निगरानी बढ़ानी पड़ेगी। देश के अंदर भी उग्रवादी हिंसा में कमी आई है। उग्रवादियों के आत्मसमर्पण की संख्या भी बढ़ी है।
‘हमारे सामने कुछ संकट, जिनका उपाय करना है’
भागवत ने कहा कि मार्ग के रोड़े, बाधाएं और हमें रोकने की इच्छा रखने वाली शक्तियों के कारनामे अभी समाप्त नहीं हुए हैं। हमारे सामने कुछ संकट हैं जिनका उपाय हमें करना है। कुछ प्रश्न हैं, जिनके उत्तर हमें देने हैं और कुछ समस्याएं हैं, जिनका निदान कर हमें उन्हें सुलझाना है। सौभाग्य से हमारे देश के सुरक्षा सामर्थ्य की स्थिति, हमारे सेना की तैयारी, हमारे शासन की सुरक्षा नीति और हमारे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुशलता की स्थिति इस प्रकार की बनी है कि इस मामले में हम लोग सजग और आश्वस्त हैं।
‘‘समाज के विभिन्न वर्गों को आपस में सद्भावना, संवाद और सहयोग बढ़ाने की कोशिश करते रहनी चाहिए। समाज के सभी वर्गों का सद्भाव, समरसता व सहयोग और कानून संविधान की मर्यादा में ही अपने मतों की अभिव्यक्ति आज की स्थिति में नितांत आवश्यक है। कानून-व्यवस्था की सीमा का उल्लंघन कर हिंसा की प्रवृत्ति समाज में परस्पर संबंधों को नष्ट कर अपना प्रताप दिखाती है। यह प्रवृत्ति हमारे देश की परंपरा नहीं है, न ही हमारे संविधान में यह बैठती है। कितना भी मतभेद हो, कानून और संविधान की मर्यादा के अंदर ही न्याय व्यवस्था में चलना पड़ेगा।’’
‘कुछ बातों का फैसला कोर्ट से ही हो सकता है’
संघ प्रमुख ने कहा कि कुछ बातों का निर्णय कोर्ट से ही होता है। फैसला कुछ भी हो आपस के सद्भाव को किसी भी बात से ठेस न पहुंचे ऐसी वाणी और कृति सभी जिम्मेदार नागरिकों की होनी चाहिए। यह जिम्मेदारी किसी एक समूह की नहीं बल्कि सभी की है। सभी को उसका पालन करना चाहिए। सभी मानकों में स्वनिर्भरता और देश में सबको रोजगार देनी की शक्ति रखने वाले ही अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक संबंध बना सकते हैं, बढ़ा सकते हैं। साथ ही स्वयं सुरक्षित रहकर विश्वमानवता को भी एक सुरक्षित भविष्य दे सकते हैं।
‘पुरुषों को महिलाओं को देखनी की दृष्टि बदलनी होगी’
भागवत ने कहा, ‘‘पाठ्यक्रम से लेकर तो शिक्षकों के प्रशिक्षण तक सब बातों में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता लगती है। केवल ढांचागत परिवर्तनों से काम बनने वाला नहीं । शिक्षा में इन सब बातों के अभाव के साथ हमारे देश में परिवारों में होने वाला संस्कारों का क्षरण और सामाजिक जीवन में मूल्य निष्ठा रहित आचरण यह समाज जीवन में दो बहुत बड़ी समस्याओं का कारण बनता है। महिलाओं के सम्मान की रक्षा को रामायण, महाभारत जैसे महाकाव्यों का विषय बनने वाले भीषण संग्राम हुए, स्वयं की मान रक्षा हेतु जौहर जैसे बलिदान हुए, उस देश में आज हमारी माता, बहनें न समाज में सुरक्षित हैं, न परिवार में। महिलाओं को देखने की पुरुषों की दृष्टि में हमारी संस्कृति के पवित्रता व शालीनता के संस्कार भरने ही पड़ेंगे।’’

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