जिंदगीभर लिव इन रिलेशनशिप में रहे अविवाहित डाॅ.लोहिया

डाॅक्टर राम मनोहर लोहिया (Ram Manohar Lohia) भारतीय राजनीति (Indian Politics) की बड़ी शख्सियतों में एक थे. उनकी समाजवादी प्रेरक विचारधारा को मानने वाले और राजनीति में उन्हें आदर्श मानने वाले बड़े राजनीतिज्ञ आज भी हैं. डाॅक्टर राम मनोहर लोहिया ऐसी दुनिया देखना चाहते थे, जिसमें न कोई सीमाएं हों और न कोई बंधन. यूं तो लोहिया अविवाहित रहे लेकिन उन्होंने अपनी महिला मित्र और सहयोगी रोमा मित्रा से टूटकर प्यार किया. जीवनभर उनके साथ रहे.
डाॅक्टर लोहिया को किसी परिचय की जरूरत नहीं. सहयोगी उन्हें जीनियस कहते थे. उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी गए. कुछ ही समय में जर्मन भाषा पर इतना अधिकार हो गया कि उन्होंने अपना पूरा रिसर्च पेपर जर्मन भाषा में लिखा. वह मराठी, बांग्ला, हिन्दी, अंग्रेजी, जर्मन और फ्रेंच भाषाएं जानते थे.
लोहिया की काफी महिला मित्र थीं
डाॅक्टर राममनोहर लोहिया मानते थे कि स्त्री पुरुष के रिश्तों में सब जायज है बशर्ते सहमति से हो. उसमें धोखा न हो. पूरी जिंदगी उन्होंने जो रिश्ते रखे उनमें इसका पुख्ता तरीके से पालन किया. उनकी महिला मित्रों की बड़ी तादाद थी. सभी उनकी बुद्धिमत्ता, साफगोई और व्यक्तित्व से प्रभावित थीं. लेकिन क्या मजाल कभी किसी महिला मित्र से कोई विवाद हुआ हो. कांग्रेस के सीनियर लीडर वसंत साठे ने एक बार कहा था कि उन्हें याद है कि उन्होंने लोहिया को कई महिलाओं के साथ देखा था लेकिन वह ईमानदार थे. उन्होंने संबंधों को लेकर कभी झूठ नहीं बोला. इसलिए उनके सार्वजनिक जीवन पर कोई असर नहीं पड़ा.
Ram Manohar Lohiaराम मनोहर लोहिया की फाइल फोटो. (सौजन्य- फॉरवर्ड प्रेस)
रोमा से हमेशा रहे अच्छे संबंध
आमतौर पर लोहिया के जीवन में आने वाली महिलाएं भी तेज और मेधा वाली थीं. लेकिन उनके जितने अच्छे संबंध रोमा से थे, वो शायद ही किसी और से रहे हों. रोमा को भी लोहिया की किसी महिला से दोस्ती से ऐतराज नहीं रहा. वह खुद प्रखर और बौद्धिक थीं. उन पर सिमोन द बोउवार का प्रभाव था. यूरोप में रहने के दौरान वह उनके संपर्क में भी रही थीं.
लंबे समय से जानते थे
रोमा बंगाल के ऐसे परिवार से थीं, जो वामपंथ से प्रभावित था. उनके एक भाई खुद बड़े वामपंथी नेता थे जो बाद में बंगाल सरकार में मंत्री भी रहे. 30 के दशक में जब डाॅक्टर लोहिया जर्मनी के हमबोल्ट विश्वविद्यालय से मास्टर्स और पीएचडी करने गए तो रोमा यूरोप में ही थीं. शायद फ्रांस में. दोनों एक दूसरे को जानते थे. पत्रों के जरिए संवाद होता था. रोमा ने वहां रहने के दौरान सिमोन से मुलाकात की. उनका इंटरव्यू लिया.
आकर्षक थी रोमा की पर्सनैलिटी
जब डाॅक्टर लोहिया 1933 के आसपास यूरोप से भारत लौटे तो गांधीजी के साथ आजादी के आंदोलन में कूद पड़े. रोमा भी आमतौर पर उनके साथ होती थीं. इसी दौरान दोनों करीब आए. जब 1942 में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन के दौरान लोहिया की गिरफ्तारी हुई तो वह रोमा के साथ ही थे. रोमा लंबी और आकर्षक महिला थीं. उनके तर्क उनके व्यक्तित्व में चार चांद लगाते थे.
Roma mitraरोमा मित्रा (सबसे दाहिनी तरफ खड़ी हुई) की एक तस्वीर उपलब्ध है. (सौजन्य- ओमलता ब्लॉग )
लिव इन रिलेशनशिप में रहे
50 और 60 के दशक में भारत में लिव इन रिलेशनशिप के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था. तब लोहिया और रोमा लिव इन में एक दूसरे के साथ रहते थे. उस समय तो भारतीय समाज की स्थितियों और मान्यताओं के लिहाज से ये बहुत क्रांतिकारी कदम था. उस समय का समाज वर्जनाओं की रस्सियों से खुद को जबरदस्त ढंग से बांधे हुआ था. जहां विवाह के बिना साथ रहना घोर आपत्तिजनक माना जाता था.
रोमा से कहा-डिस्टर्ब नहीं किया जाए
60 के दशक में डाॅक्टर लोहिया को गुरुद्वारा रकाबगंज के पास सांसदों का सरकारी आवास मिला था. रोमा उसी घर में डाॅक्टर लोहिया के साथ रहती थीं. आने-जाने वालों के साथ उनकी मुलाकात भी होती थी. लेखक अयूब सैयद ने अपनी किताब ‘ट्वेंट ट्बुलेंट ईयर्सः इनसाइट्स इन टू इंडिय़न पॉलिटिक्स’ में लिखा है कि 1967 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब वह डाॅक्टर लोहिया का इंटरव्यू लेने गए तो उन्होंने उन्हें बेडरूम में बुलाकर लंबी बात की. उन्होंने अपनी मित्र रोमा से कहा वह ध्यान रखें कि इस दौरान न तो उन्हें कोई फोन दिया जाए और न डिस्टर्ब किया जाए. वह ताजिंदगी रोमा के साथ ही रहे. वह भी उनकी पत्नी की तरह रहीं. इसके बावजूद लोहिया जी की अन्य महिला मित्रों के साथ दोस्ती के चर्चे खूब उड़ते रहते थे. रोमा ने कभी इसकी परवाह नहीं की.
रोमा मिरांडा में लेक्चरर थीं
रोमा उन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रख्यात कॉलेज मिरांडा हाउस में लेक्चरर थीं. वह इतिहास विभाग में थीं. मिरांडा में वह वर्ष 1949 से 1979 तक पढ़ाती रहीं. वह छात्राओं के बीच काफी लोकप्रिय थीं. वहां की एक छात्रा सुरजीत, जो बाद में भारतीय विदेश सेवा में चयनित हुईं, उन्होंने कॉलेज की प्लेटिनम जयंती के मौके पर कॉलेज की मैगजीन में एक लेख में रोमा को अपनी पसंदीदा शिक्षिका के रूप में याद किया.
रोमा ने चुनाव भी लड़ा था
रोमा का निधन 1985 में हुआ. इससे पहले उन्होंने 1983 में लोहिया के पत्रों पर एक किताब ‘लोहिया थ्रू लेटर्स’ प्रकाशित की. इसमें लोहिया के लवलेटर्स भी हैं. रोमा ने 1942 के आंदोलन में शिरकत की. इससे पहले चिटगांव विद्रोह में उनका नाम आया था. बाद में उन्होंने सोशिलिस्ट पार्टी ज्वाइन कर ली थी. जब लोहिया सांसद बने तो उन्होंने उनके घर का जिम्मा भी संभाला. उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा.
इस पहलू को क्यों छिपाया गया
लोहिया की 1967 में निधन के बाद उन पर काफी कुछ लिखा गया लेकिन हैरानी की बात है कि जिन लोहिया ने जिंदगी भर स्त्री-पुरुष बराबरी की पैरवी की. जीवनभर संबंधों को लेकर बेबाक और ईमानदार रहे, उनके स्त्री पक्ष और रोमा से रिश्तों पर ईमानदारी भरी रोशनी न तो कभी उनकी पार्टी ने डाली और न ही उनके अनुयायियों ने. उन पर बहुत कुछ लिखा गया लेकिन इस पक्ष को जानबूझकर ढांप दिया गया.

रमा मित्रा और डाॅक्टर राम मनोहर लोहिया के प्रेम संबंधों के बारे में लोहिया के खतों से पता चलता है. कई बार तो दिन में तीन-तीन खत लिखते. उनके खत उनकी राजनीति की तरह ही खुले और स्वच्छंद होते थे. उस समय बिना शादी के एक व्यक्ति के साथ खुले तौर पर उस तरह रहना जैसा कि लोहिया और मित्रा रहते थे, वह साहस और दृढ़ विश्वास का काम था. लोहिया राजनीति और व्यक्तिगत जीवन दोनों में जुनूनी थे. मित्रा को लिखे पत्रों में वे एक ऐसे व्यक्ति दिखाई देते हैं, जो प्यार में पागल है. जिसने उनके साथ कई लोकों की यात्रा की, प्रेमियों वाले नखरे किए, प्रेमिका को डांट लगाई, उसकी बीमारी में विचलित हुए, उनकी पीएचडी के लिए चिंतित रहे और राजनीति के अलावा इतिहास की भी शिक्षा प्रेमिका को दी.
एक अन्य खत में उन्होंने लिखा, “मैं अब लगभग यह मानता हूं कि शार्क, चूहे और कछुए राजनीति के लिए फिट हैं. फिर भी राजनीति अल्पकालीन धर्म है, जिस तरह धर्म लंबे समय की राजनीति है. दोनों ही मानव जाति के सर्वोच्च गुण हैं.”
एक प्रेमी युवा की तरह लोहिया हमेशा अपने व्यस्त राजनीतिक जीवन के बीच कुछ अनमोल क्षणों को चुराने की विस्तृत योजना बनाते थे. इन चिट्ठियों के लोहिया मानवीय आशक्तियों से परे नहीं थे. वो प्यार में जलते और असुरक्षित होते, कई प्यार भरे नामों से अपनी प्रेमिका को बुलाते, विदेश यात्राओं पर उसके लिए फुटवियर खरीदते, सावधानी से इलायची और लौंग के मिश्रण की व्यवस्था करते ताकि जर्मनी भेजा जा सके और उनके लिए खरीदी गई कोलोन के लिए वे मित्रा को शुक्रिया भी अदा करते. जब वे अपमानित महसूस करते तो उनके शब्दों में नारी विरोध की झलक मिलती.
उनकी अधिकांश चिट्ठियों में लोहिया की खीझ एक बात को लेकर झलकती है कि वे मित्रा से मिलने के पहले एक-एक मिनट का कार्यक्रम पहले से ही तय कर लेते ताकि वे साथ समय बिता सकें. मित्रा को सारनाथ आने के लिए कहते हुए लोहिया ने लिखा,
“प्रिय इला, बनारस कार्यक्रम 10 और 11 अप्रैल को है. सारनाथ होटल में रहने का इरादा है. 12 अप्रैल को बिल्कुल कोई काम नहीं है. यहां तक ​​कि 10 और 11 की शाम भी कुछ नहीं करना. तुम इस दौरान आने की कोशिश करो.”
अगर मित्रा इन योजनाओं के पूरा न होने का कारण बनतीं तो उन्हें गुस्सा आ जाता.
“प्रिय इल्लुरानी, ​​ मैंने आपको 12 की रात को एक खत भेजा था. मुझे आपका खत 13 तारीख को मिला. गोरखपुर पहुंचने के तीन दिन बाद मुझे आपके बारे में पता चला. यह सही नहीं है. जो तय किया गया है, उसका पालन किया जाना चाहिए. आपने जो तय था उसका पालन नहीं किया और न हीं मुझे बताया. मैं किसी दुर्घटना की कल्पना करता रहा. अगर मैं आप पर भरोसा करना बंद कर दूं तो यह अच्छा नहीं होगा.”
खीझ निकालने के बाद लोहिया ने मित्रा को बिना कोई गड़बड़ किए मिर्जापुर आने को कहा.
खतों में लोहिया की मित्रा को खोने की असुरक्षा भी साफ झलकती है. एक खत में वे इस बात से परेशान थे कि मित्रा ने किसी और के साथ प्लान बना लिया. उन्होंने लिखा, “जब आप किसी के साथ प्लान बनाती हैं, तो आपको उसी समय दूसरों के साथ प्लान बनाने का कोई अधिकार नहीं है. आप बताएं कि पोर्ट पर लेने किसे आना होगा. अगर मैं वहां आया, तो आपको मेरे साथ आना होगा और मेरे साथ एलीफेंटा भी जाना होगा”.
इसके बाद उन्होंने महत्वपूर्ण सवाल उठाया, “मुझे आपके कई सारे प्रेमियों के होने की कहानी पसंद नहीं है. लेकिन अगर आप मुझे पूरी बात बताएंगी तो, मैं इसे एक महत्वपूर्ण बात की भांति स्वीकार कर सकता हूं. बेहतर होगा कि आप शादी कर लें, लेकिन यह उचित नहीं है कि आप उसके बारे में बात करती रहें, ये ठीक नहीं है.”
इसके बाद लोहिया ने मित्रा को फटकार लगाई. मित्रा उस वक्त जर्मनी में थीं. मित्रा ने पूछा था कि क्या लोहिया को उनकी याद आती है. जवाब में लोहिया ने लिखा, “इस बारे में महिलाओं वाली चाल का इस्तेमाल करना बंद करें. मैं आपको याद करता हूं या नहीं यह पूछना बंद करें.”
1960 के दशक के ये शुरुआती खत लोहिया को उनके सबसे अनपेक्षित रूप में दिखाते हैं. खत मित्रा के लिए उनके प्यार को दिखाते हैं, इनमें लोहिया का राजनीतिक करियर के प्रति असंतोष भी झलकता हैं. उन्होंने लिखा, “चाहे दिल में जितना भी दर्द हो, क्योंकि ऐसा है, फिर भी कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए. समाजवादी पार्टी के लिए लड़ाई जारी रहनी चाहिए.”
एक बार काफी आत्म-आलोचना के साथ उन्होंने एक नेता के रूप में अपनी विफलता की बात की. कभी-कभी लोहिया उदासीन हो जाते थे कि वे सफल क्यों नहीं हुए. एक खत में मित्रा से कोलोन की मांग करते हुए लोहिया ने स्वीकार किया कि वे “एक नेता या यहां तक लेखक भी नहीं बन सके.”
एक अन्य खत में उन्होंने लिखा, “मैं अब लगभग यह मानता हूं कि शार्क, चूहे और कछुए राजनीति के लिए फिट हैं. फिर भी राजनीति अल्पकालीन धर्म है, जिस तरह धर्म लंबे समय की राजनीति है. दोनों ही मानव जाति के सर्वोच्च गुण हैं.”

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