पहाड़िया विद्रोह

पहाड़िया विद्रोह, 1763-83

राजमहल पहाड़ियों के पूरब पाकुड़ तथा राजमहल से लेकर पहाड़ियों के पश्चिम गोड्डा और कहलगाँव तक का क्षेत्रमालेर ( अथवा सौरिया ) पहाड़िया-जन का वास-स्थान था । मालेर पहाड़िया-जनों की बड़ी शाखा थे और पहाड़िया-जन खुद वृहत्तर द्राविड़-जन की एक छोटी शाखा । पहाड़िया-जनों की दूसरी शाखा थी माल-पहाड़िया ( नैया अथवा पुजहर )जिसका वास-स्थान पहाड़ियों के दक्षिण और पश्चिम का क्षेत्र था ।
मालेर पहाड़िया के वास-स्थानवाले क्षेत्रों में पहले एक नट राजा दरियार सिंह का शासन था । दरियार सिंह ने लकड़ागढ़ के किले का निर्माण कराया था । गोड्डा के उत्तर मनिहारी टप्पा के एक खेतौरी कल्याण सिंह इसी नट राजा के मुलाजिम थे । कल्याण सिंह का बेटा रूपकरण सिंह बाद में नट राजा द्वारा लकड़ागढ़ किले का किलेदार नियुक्त किया गया ।
1600 ईस्वी में मुगल सम्राट अकबर ने बंगाल सूबे की गड़बड़ियों को दुरुस्त करने मानसिंह के सेनापतित्व में एक सैन्यदल बंगाल के लिए रवाना किया । एक स्थानीय सरदार सुभान सिंह ने वहाँ ( बंगाल में ) बगावत खड़ी कर रखी थी । नट राजा सुभान सिंह के पक्ष में था, लेकिन रूपकरण ने अपने राजा से बगावत कर मानसिंह की सहायता की । रूपकरण लकड़ागढ़ का किलेदार था ही, उसने नट राजा को किले से बेदखल कर उसे मुगल सेना की सेवा में सौंप दिया । इतना ही नहीं, वह मानसिंह के साथ बंगाल चला गया और सुभान सिंह के विद्रोह को कुचलने में उसने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । उसकी इन ‘ बहुमूल्य सेवाओं ’ के लिए इनाम के रूप में उसे उपर्युक्त पूरा क्षेत्र मनसब ( लगान मुक्त मुकर्ररी ) जागीर के रूप में दे दिया गया । उसे राजा की उपाधि भी मिली । मनिहारी का यह खेतौरी परिवार इस तरह इस क्षेत्र का राजा बन गया ।
बहरहाल, जैसा कि हम पहले बता चुके हैं, यह पूरा क्षेत्र मालेर पहाड़िया लोगों का वासस्थान था । नए राजा के साथ उनका सम्बन्ध अठारहवीं सदी का मध्य आते-आते अत्यंत तनावपूर्ण हो चुका था । एक-के-बाद-एक कई पहाड़िया सरदारों की खेतौरी जागीरदारी के लोगों ने छलपूर्वक हत्या कर दी थी । मनिहारी के इस खेतौरी राजा ने पहाड़िया क्षेत्र के तराईवाले इलाकों को जागीरों के रूप में अपने नाते-रिश्तेदारों को दे रखा था । पहाड़िया जन, इस स्थिति में, अपनी ताकत का एहसास कराने को बाध्य हो गए ।
उन्होंने अपनी ताकत का धमाकेदार प्रदर्शन किया । हजारों की संख्या में गोलबंद होकर मालेर पहाड़िया लकड़ागढ़ किले की ओर बढ़ चले । वे तीर-धनुष से लैस थे । उन्होंने किले पर धावा बोला और खेतौरी जागीरदारों को वहाँ से खदेड़ दिया । फिर उन्होंने एक-के-बाद-एक तराई के गाँवों पर धावा बोला । यह वह समय था जब पूरे बंगाल सूबे में राजनीतिक अस्त-व्यस्तता थी । पलासी की लड़ाई ( 1757 ) और बक्सर की लड़ाई ( 1764 ) के बीच का यह समय भारतीय इतिहास में निर्णयात्मक मोड़ लेनेवाला समय था । ऐसी स्थिति में, पहाड़िया विद्रोह को तत्काल किसी व्यवस्थित विरोध का सामना नहीं करना पड़ा । 1770 के महा-अकाल के समय पहाड़ियों के हमले में स्वभावतः काफी तेजी आ गई ।
इस क्षेत्र में अँग्रेजों के आगमन के समय पहाड़िया अपनी ताकत का एहसास करा चुके थे । तराईवाले कृषि-क्षेत्रों से जागीरदार भाग चुके थे । गंगा के दक्षिणी किनारे शाम ढ़लने के बाद नावों का चलना बंद था । राजमहल तथा तेलियागढ़ी की घाटियों से सरकारी डाकियों का आवागमन प्रायः ठप हो गया था । यह मार्ग सदियों से बिहार को बंगाल से जोड़नेवाला महत्वपूर्ण मार्ग था । जागीरदारों की आपसी प्रतिद्वंद्विता के फलस्वरूप जागीरदारों और घटवालों का एक समूह भी पहाड़िया-जनों के साथ हो गया था ।
इस पहाड़िया विद्रोह से निबटने के पहले अँग्रेजों ने वही किया जो औपनिवेशिक शक्तियाँ आज तक करती आई हैं – विद्रोही समुदाय को ‘ बुराई के मूर्तिमान प्रतीक ’ के रूप में पेश करना और उनके खिलाफ चौतरफा घृणा-अभियान छेड़ देना । पहाड़ियों को चोर-लुटेरों के रूप में पेश किया गया और ‘ पागल कुत्तों ’ की तरह उनके शिकार को प्रोत्साहित किया जाने लगा । 1806 ई. में बनारस डिवीजन के एक जज ने उन दिनों की स्थिति का खुलासा कुछ इस प्रकार किया था, “ ब्रिटिश शासन के आरम्भिक काल में बीरभूम और भागलपुर के बीच के क्षेत्र में चरम अव्यवस्था की स्थिति थी । उस क्षेत्र के बाशिन्दों ने सरकार और उसकी अन्य प्रजाओं के विरुद्ध खुलकर हथियार उठा रखा था । उन्होंने मैदान के निवासियों के खिलाफ अनवरत् बर्बर युद्ध छेड़ रखा था । उन्हें विधि-बाह्य घोषित कर दिया गया और जंगली जानवरों की तरह उनका शिकार किया जाने लगा । उन दिनों बीरभूम के कलक्टर रहे एक भद्रजन ने मुझे बताया कि उनके ( पहाड़ियों के ) कटे सिर टोकरियों में भर-भर कर लाए जाते थे । ”

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