नागरिकता संशोधन कानून पर कांग्रेस-लेफ्ट की ‘डर्टी पॉलिटिक्स’,न जाऊंगी विपक्षी बैठक में:ममता

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने नागरिका कानून पर कांग्रेस और लेफ्ट की ‘डर्टी पॉलिटिक्स’ से नाराजगी जताई है.
नई दिल्ली: नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देश के कई हिस्सों में प्रदर्शन हो रहा है. विपक्ष सरकार पर लगातार हमला बोल रही ही और इस कानून को असंवैधानिक बता रही है. अब 13 जनवरी को दिल्ली में नागरिकता कानून के खिलाफ विपक्ष की बैठक है. हालांकि इस बैठक से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दूरी बना ली है.
ममता ने कहा है कि वह 13 जनवरी को दिल्ली में नागरिकता कानून के खिलाफ विपक्ष की बैठक में हिस्सा नहीं लेंगी. ममता ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां इस मुद्दे पर डर्टी पॉलिटिक्स कर रही हैं. ममता बनर्जी ने कहा है कि वो नागरिकता कानून के खिलाफ वो अकेले लड़ाई लड़ेंगी.
इससे पहले बुधवार को ममता बनर्जी ने वामदलों और कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि जिनका राज्य में कोई राजनीतिक अस्तित्व नहीं है वह हड़ताल की सस्ती राजनीति कर राज्य की अर्थव्यवस्था को बर्बाद करने की कोशिश कर रहे हैं.
क्या है नागरिकता संशोधन कानून?
भारत देश का नागरिक कौन है, इसकी परिभाषा के लिए साल 1955 में एक कानून बनाया गया जिसे ‘नागरिकता अधिनियम 1955’ नाम दिया गया. मोदी सरकार ने इसी कानून में संशोधन किया है जिसे ‘नागरिकता संशोधन बिल 2016’ नाम दिया गया है. पहले ‘नागरिकता अधिनियम 1955’ के मुताबिक, वैध दस्तावेज होने पर ही लोगों को 11 साल के बाद भारत की नागरिकता मिल सकती थी.
किन देशों के शरणार्थियों को मिलेगा फायदा?
इस कानून के लागू होने के बाद अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के कारण 31 दिसंबर 2014 तक भारत आए गैर मुस्लिम शरणार्थी यानी हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के लोगों को भारतीय नागरिकता दी जाएगी. मतलब 31 दिसंबर 2014 के पहले या इस तिथि तक भारत में प्रवेश करने वाले नागरिकता के लिए आवेदन करने के पात्र होंगे. नागरिकता पिछली तिथि से लागू होगी.
कानून को लेकर विवाद क्या है?
इस कानून में छह अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख) से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता दी जाएगी, लेकिन इसमें मुसलमानों की बात नहीं कही गई है. विरोधियों का कहना है कि यह भारत के मूलभूत संवैधानिक सिद्धांत के विरुद्ध है और यह विधेयक मुसलमानों के ख़िलाफ़ है. ये भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 जो कि एक मौलिक अधिकार है उसका (समानता का अधिकार) उल्लंघन करता है. सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि इस बिल में मुस्लिम धर्म के साथ भेदभाव किया जा रहा है.

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