कितना स्थायी होगा सत्ता को बना शिवसेना,कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन!

शिवसेना के नेतृत्व में बनने वाली सरकार राज्य को एक स्थाई सरकार दे पाएगी या इसका भी वही हश्र होगा जो सत्ता के लिए अब तक बने बे-मेल गठबंधनों का हुआ है।
भाजपा के पीछे हटने के बाद शिवसेना के पाले में है सरकार बनाने की गेंद, शिवसेना-कांग्रेस की विचारधारा में मेल नहीं, साथ आए तो होगा बे-मेल गठबंधन
नई दिल्ली : महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्व में सरकार बनाने के लिए हलचल तेज हो गई है। मुंबई से लेकर दिल्ली में कांग्रेस और एनसीपी के नेता सत्ता का समीकरण बनाने में जुट गए हैं। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सरकार गठन के लिए शिवसेना से जवाब मांगा है। अब गेंद शिवसेना के पाले में है। शिवसेना सांसद अरविंद सावंत ने मोदी सरकार से इस्तीफा दे दिया है। सावंत के इस्तीफे के बाद समझा जाता है कि शिवसेना का एनडीए से नाता खत्म हो चुका है। महाराष्ट्र में नई सरकार के भावी स्वरूप पर चर्चा एवं रणनीति बनाने के लिए शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा की अंदरखाने बैठकें जारी हैं। हालांकि, एनसीपी और कांग्रेस ने खुले तौर पर शिवसेना को समर्थन देने की बात नहीं की।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी महाराष्ट्र के नेताओं के साथ बैठक के बाद एनसीपी अपना रुख स्पष्ट करेगी। लेकिन राजनीतिक उठापठक देखने से लगता है कि महाराष्ट्र में अगली सरकार शिवसेना के नेतृत्व में बनेगी। कांग्रेस एवं एनसीपी इस सरकार के साथ किस रूप में जुड़ती है यह देखने वाली बात होगी। खासकर, कांग्रेस सरकार में शामिल होगी या शिवसेना सरकार को बाहर से समर्थन देगी यह दिलचस्प होगा। शिवसेना की विचारधार कांग्रेस की सोच एवं सिद्धांतों से मेल नहीं खाती। क्या कांग्रेस शिवसेना की विचारधारा का समर्थन करेगी या कुछ शर्तों के साथ उसे समर्थन देगी, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।
सत्ता के लिए दो विरोधी विचारधारा वाले दलों का एक साथ आना नई बात नहीं है। कई राज्यों में एक-दूसरे के धुर विरोधी रही पार्टियों ने सत्ता के लिए गठबंधन किया है और सरकार बनाई है लेकिन यह अलग बात है कि इस तरह का गठबंधन ज्यादा दिनों तक नहीं चला और आपसी मतभेदों की वजह से ये सरकारें चल नहीं पाईं। उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने बे-मेल गठबंधन किया लेकिन चुनाव नतीजे आने के बाद यह गठबंधन चल नहीं सका और बसपा सुप्रीमो मायावती इस गठबंधन से अलग हो गईं। जनता ने सपा-बसपा गठबंधन को नकार दिया। लोकसभा चुनाव में मायावती को तो लाभ हुआ लेकिन सपा को अपनी पारिवारिक सीटें भी गवानी पड़ी।
जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी का गठबंधन भी ज्यादा समय नहीं चला। इस राज्य में भी सत्ता के लिए दो विरोधी विचार रखने वाले दल एक साथ आए। कुछ समय बाद भाजपा ने महबूबा सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और आगे चलकर इस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। विरोधी दलों के साथ गठबंधन का हश्र कर्नाटक से भी समझा जा सकता है। यहां येदियुरप्पा के बहुमत साबित न कर पाने पर जेडी-एस के एचडी कुमारस्वामी ने कांग्रेस के सहयोग सरकार बनाई। यह सरकार भी ज्यादा समय तक नहीं चल पाई। कांग्रेस-जेडीएस नेताओं की आपसी खींचतान की भेंट यह गठबंधन चढ़ गया। मुख्यमंत्री कुमारस्वामी कई अवसरों पर गठबंधन की मजबूरी एवं मुश्किलें गिनाते नजर आए। आंध्र-प्रदेश में तेदेपा और भाजपा का गठबंधन अंतर्विरिधों के चलते ज्यादा समय तक नहीं चल पाया और टूट गया।
महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी तो एक-दूसरे के सहयोगी रहे हैं। एनसीपी का निर्माण कांग्रेस से हुआ है। दोनों दल एक-दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी हैं लेकिन शिवसेना की राजनीति हिंदुत्व के एजेंडे पर आधारित रही है और वह भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की पक्षधर रही है। यह अलग बात है कि शिवसेना ने कई मौकों एवं मुद्दों पर भाजपा से अलग राह अपनाते हुए कांग्रेस का समर्थन किया है। हालांकि, विचारधारा के स्तर पर कांग्रेस ने कभी शिवसेना का समर्थन नहीं किया। ऐसे में महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस यदि शिवसेना का समर्थन करने का फैसला करती है तो यह भारत की राजनीति में बहुत बड़ा घटनाक्रम होगा। इससे यह संदेश जाएगा कि राजनीत में कोई ‘अछूत’ नहीं होता और सियासत में सब कुछ संभव है। देखने वाली बात होगी कि शिवसेना के नेतृत्व में बनने वाली सरकार राज्य को एक स्थाई सरकार दे पाएगी या इसका भी वही हश्र होगा जो सत्ता के लिए अब तक बने बे-मेल गठबंधनों का हुआ है।

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