बेरोजगारी रिकॉर्ड स्तर पर, सर्विस, कंस्ट्रक्शन और माइनिंग सेक्टर में बढ़े हैं नौकरियों के अवसर

शैक्षणिक योग्यता बढ़ने के साथ बढ़ रही हैं बेरोज़गारी: रिपोर्ट
बेरोजगारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है
बेरोजगारी (unemployment) के ताजा आंकड़े चिंताजनक है. हालांकि कुछ सेक्टर ऐसे भी हैं जहां रोजगार (employment) के अवसर बढ़े हैं…
नई दिल्लीः देश में शैक्षणिक योग्यता बढ़ने के साथ ही बेरोजगारी में भी इजाफा हो रहा है.राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के आंकड़े यह कहते हैं कि भारत में 2018 में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत थी। इसे बीते 45 वर्षों में सबसे अधिक बताया गया। बेरोजगारी दर से मतलब होता है कामकाजी आयु वर्ग में से कितने लोग एक तय समय में रोजगार की तलाश कर रहे थे, पर उन्हें काम नहीं मिल सका। 2018 में सबसे ज्यादा बेरोजगारी दर 10.8 प्रतिशत शहरी महिलाओं में पाई गई। इसके बाद यह शहरी भारत में पुरुषों में 7.1 प्रतिशत, ग्रामीण पुरुषों में 5.8 प्रतिशत और ग्रामीण महिलाओं में 3.8 प्रतिशत पाई गई।
देखा जाए तो ये आंकड़े स्वयं में भ्रामक हैं, क्योंकि भारत में न तो कड़ाई से न्यूनतम मजदूरी दर लागू होती है और न ही काम करने के घंटे पर कोई अंकुश होता है। पूर्णत: बेरोजगार लोगों के अलावा भारत का एक और बड़ा हिस्सा वह भी है जो बहुत कम मजदूरी या फिर अनुबंध पर काम करता है। इसके अलावा वह तबका भी है जो उचित रोजगार के अभाव में कम समय के लिए किसी न किसी व्यावसायिक इकाइयों से जुड़ जाता है। यह भी एक आंशिक बेरोजगारी है जो औपचारिक आंकड़ों में नहीं दिखती। यहां यह भी बताना आवश्यक है कि बेरोजगारी केवल भारत में ही नहीं, बल्कि कई विकसित देशों की भी समस्या है। फ्रांस में बेरोजगारी दर 8.8 प्रतिशत, इटली में 10.7 प्रतिशत, स्पेन में 18.6 प्रतिशत और अमेरिका में 4.4 प्रतिशत है। हालांकि यह दर चीन में 3.6 प्रतिशत और जापान में 2.6 प्रतिशत है। इसकी एक वजह यह है कि जापान और चीन में युवाओं का प्रतिशत भारत की तुलना में कम है। वैसे तो बेरोजगारी के कई कारण हैं, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि बेरोजगारी की समस्या की जड़ हमारी शिक्षा प्रणाली है, चाहे वह औपचारिक शिक्षा हो या अनौपचारिक। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत हर साल सबसे अधिक संख्या में इंजीनियर तैयार करने के लिए जाना जाता है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि 82 प्रतिशत भारतीय इंजीनियरों के पास वह मूलभूत कौशल नहीं है जिसकी आज के तकनीकी युग में आवश्यकता है। बेरोजगारी की समस्या में हमारी अर्थव्यवस्था की भी भूमिका है।
हमारा आर्थिक विकास मॉडल कुछ महानगरों पर केंद्रित है। देश के चुनिंदा 8-10 महानगरों के अलावा अन्य इलाकों में नौकरियों के बहुत कम अवसर पैदा हो रहे हैं। इसकी वजह से छोटे शहरों से निकलने वाले युवाओं को भी अपनी पहली नौकरी महंगे महानगरों में ढूंढनी पड़ती है। बढ़ती बेरोजगारी का एक बड़ा कारण हमारे गांवों की स्थिति भी है। हमारा कृषि क्षेत्र मंदी के लंबे दौर से गुजर रहा है। 1993 से 2016 तक किसानों की आय में दो प्रतिशत से भी कम की सालाना बढ़ोतरी हुई है। हालांकि कृषि रोजगार का एक बड़ा जरिया है, लेकिन कृषि क्षेत्र में चल रही निरंतर मंदी के कारण शायद ही कोई युवा उसे करियर के रूप में चुनना चाहेगा।
जाहिर है कि निराश युवा किसान भी बेरोजगारी के आंकड़ों में दिखेंगे। बेरोजगारी का एक अन्य कारण तकनीकी बदलाव भी है। पिछले तीन-चार दशकों में तकनीक के क्षेत्र में काफी तेज विकास हुआ है। आज अधिकतर कंपनियां अपने कॉल सेंटरों पर इंसान नहीं, कंप्यूटर का प्रयोग कर रही हैं। टैक्सी बुक करने से लेकर खाना और सामान मंगाने का कार्य एप से हो रहा है। औद्योगिक क्षेत्र में ऑटोमेशन या एक रोबोट छह इंसानों का काम अकेले कर सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि 2030 तक विश्व भर में 80 करोड़ लोगों की नौकरियां रोबोट द्वारा ले ली जाएंगी। बड़ी अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों जैसे कि जर्मनी और अमेरिका में एक तिहाई कर्मचारियों की नौकरी रोबोट के हाथों में चले जाने का अनुमान है। यही प्रवृत्ति भारत और अन्य विकासशील देशों में भी दिखेगी।
आज इस सवाल से दो-चार होने की जरूरत है कि क्या हम बदलती तकनीक के साथ कदम से कदम मिलकर चल पा रहे हैं? ध्यान रहे कि भारत में इलेक्ट्रिक कारों का आगमन हो चुका है। अनुमान है कि 2030 तक भारत में पेट्रोल या डीजल की कारें नहीं बिकेंगी। आने वाले वक्त में स्वचालित कारें आएंगी जिसमें स्टीयरिंग भी नहीं होगा। इसका असर यह होगा कि टैक्सी ड्राइवर का कार्य करने वाले लोगों की नौकरियां समाप्त हो जाएंगी। इसके साथ ही कम शिक्षा स्तर वाले लाखों मोटर मैकेनिकों के रोजगार पर भी संकट आ सकता है।जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के संतोष मेहरोत्रा और सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ पंजाब के जेके परिदा ने देश के युवाओं में तेजी से बढ़ रही बेरोजगारी को लेकर एक रिपोर्ट तैयार की है.
इस रिपोर्ट को अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट की तरफ से प्रकाशित किया गया है.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, यह स्टडी 15 से 29 साल के बीच के युवाओं पर की गई है. रिपोर्ट के अनुसार, 2004-05 में युवा बेरोज़गारों की कुल संख्या 89 लाख रही, जो 2011-12 में 90 लाख, जबकि 2017-18 में 2.51 करोड़ पर पहुंच गई.बदतर स्थिति यह है कि शैक्षणिक योग्यता बढ़ने के साथ ही बेरोजगारी दर भी बढ़ी है. शैक्षणिक योग्यता की सभी श्रेणियों में युवा बेरोजगारी दर बढ़ी है.
जिन राज्यों में युवा बेरोजगारी सर्वाधिक है, वे उत्तर प्रदेश (30 लाख), आंध्र प्रदेश (22 लाख), तमिलनाडु (22 लाख), महाराष्ट्र (19 लाख), बिहार (19 लाख), पश्चिम बंगाल (15 लाख), मध्य प्रदेश (13 लाख), कर्नाटक (12 लाख), राजस्थान (12 लाख), ओडिशा (11 लाख), गुजरात (10 लाख) और केरल (10 लाख) हैं.
मेहरोत्रा और परिदा ने ये निष्कर्ष नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) के रोजगार सर्वेक्षण 2004-05 और 2011-12 के अलावा पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) 2017-18 के आंकड़ों के आधार पर किए हैं.
मेहरोत्रा के मुताबिक, कृषि सेक्टर में कुल रोजगार लगातार घट रहा है. यह 2011-2012 में 23.2 करोड़ था जो 2017-18 में घटकर 20.5 करोड़ रह गया.
अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टरों में नए रोजगारों के सृजन की दर अतिरिक्त श्रम को खपाने के लिए पर्याप्त नहीं है. सर्विस सेक्टर में रोजगार बढ़ा है. यह 2011-12 में 12.7 करोड़ से बढ़कर 2017-18 में 14.4 करोड़ हो गया.
वहीं, नॉन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (निर्माण, खनन) में भी रोजगार 5.5 करोड़ से बढ़कर 5.9 करोड़ हो गया. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कुल रोजगार दर घटी. यह 2011-12 में छह करोड़ से घटकर 2017-2018 में 5.6 करोड़ रह गई.
मेहरोत्रा ने कहा, ‘गैर कृषि रोजगारों की धीमी गति और बढ़ती बेरोजगारी से युवाओं में निराशा बढ़ी है. इसका परिणाम यह है कि 15 से 29 साल के युवाओं की संख्या 2017-2018 में बढ़कर 10 करोड़ से अधिक हो गई जबकि 2011-2012 में यह 8.3 करोड़ थी.’मेहरोत्रा ने कहा, ‘ये वे युवा हैं, जो देश की दशा से निराश हैं और न ही रोजगार ढूंढ रहे हैं और न ही इनकी पढ़ाई करने या किसी तरह का प्रशिक्षण लेने में रुचि है.’
मालूम हो कि इससे पहले संतोष मेहरोत्रा और जेके परिदा ने तैयार अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश में 2011-12 और 2017-18 के बीच छह साल में नौकरियां घटी हैं. इन छह सालों के दौरान 90 लाख नौकरियां घटी हैं.इस रिपोर्ट को अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट की तरफ से प्रकाशित किया गया था.भारत में बेरोजगारी (unemployment) के आंकड़े डराने वाले हैं. अक्टूबर में बेरोजगारी की दर (unemployment rate) 8.5 फीसदी हो गई है, जो पिछले 3 वर्षों में सबसे अधिक है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के ताजा आंकड़े में बताया गया है कि बेरोजगारी की दर अगस्त 2016 के बाद सबसे ज्यादा हैं. यह सितंबर के मुकाबले 7.2 फीसदी ज्यादा है. ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में बेरोजगारों की फौज इकट्ठा हो रही है.भारत सरकार ने इस दिशा में कदम उठाए हैं. मांग में तेजी लाने के उपाय किए जा रहे हैं, लेकिन बेरोजगारी के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि आर्थिक मंदी की वजह से ये प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं.
बढ़ती जा रही है बेरोजगारों की फौज
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी और पंजाब सेंट्रल यूनिवर्सिटी ने मिलकर बेरोजगारी की दर पर एक स्टडी की है. इसके मुताबिक युवाओं में बेरोजगारी की दर बढ़ी है. युवाओं को नौकरियां नहीं मिल रही हैं. 15 से 29 वर्ष की उम्र वाले लोगों के रोजगार के अवसर मिलने पर अध्ययन किया गया. पता चला कि इस एज ग्रुप में 2004-2005 के बीच 8.9 मिलियन यानी 89 लाख युवा बेरोजगार थे. 2011-12 में इनकी संख्या बढ़कर 9 मिलियन यानी 90 लाख हो गई. 2017-18 में युवा बेरोजगारों की फौज ढाई करोड़ के पार पहुंच गई.सबसे चिंताजनक बात यह है कि युवाओं का एजुकेशन क्वालिफिकेशन बढ़ता जा रहा है, लेकिन उन्हें नौकरियां नहीं मिल रही हैं. जिस हिसाब से पढ़े लिखे युवा बढ़ रहे हैं उस हिसाब से उन्हें नौकरियां नहीं मिल रही हैं.
सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी
इस स्टडी में राज्यवार बेरोजगारों की संख्या की जानकारी दी गई है. बेरोजगारी के मामले में उत्तर प्रदेश नंबर वन है. यूपी में सबसे ज्यादा 30 लाख युवा बेरोजगार हैं. ये सब अच्छी क्वालिफिकेशन हासिल करने वाले युवा हैं. इसके बाद आंध्र प्रदेश का नंबर आता है. आंध्र प्रदेश के 22 लाख युवा बेरोजगार हैं. इतनी ही संख्या में तमिलनाडु के युवा बेरोजगारी से जूझ रहे हैं.इसके बाद महाराष्ट्र में 19 लाख, बिहार में 19 लाख, पश्चिम बंगाल में 15 लाख, मध्य प्रदेश में 13 लाख, कर्नाटक में 12 लाख, राजस्थान में 12 लाख, ओडिशा में 11 लाख, गुजरात में 10 लाख और केरल में 10 लाख युवा बेरोजगार हैं.
इस स्टडी को नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन एम्पलॉयमेंट अनएम्पलॉयमेंट सर्वे के नतीजों के आधार पर किया गया है. श्रम मंत्रालय से भी आंकड़े जुटाए गए हैं.
सबसे ज्यादा कृषि में बेरोजगारों की संख्या
स्टडी के मुताबिक सबसे बड़ी बेरोजगारों की फौज कृषि के क्षेत्र में है. 2011-12 में कृषि क्षेत्र से 23 करोड़ लोग जुड़े थे. 2017-18 में इनकी संख्या घटकर 20 करोड़ रह गई. खेती किसानी में सबसे ज्यादा बेरोजगारी पैदा हुई है. बाकी सेक्टर का भी बुरा हाल है और उनमें भी नई नौकरियां नहीं पैदा हो रही हैं. इसलिए जो बेरोजगार हो रहे हैं उन्हें किसी दूसरी जगह नौकरी भी नहीं मिल पा रही है.
सर्विस सेक्टर में बढ़े हैं नौकरियों के अवसर
कुछ सेक्टर में नौकरियों की संख्या बढ़ी भी है. इसमें सर्विस सेक्टर सबसे आगे है. 2017-18 में सर्विस सेक्टर में नौकरी करने वालों की संख्या 12.7 करोड़ से बढ़कर 14.4 करोड़ हो गई. नॉन मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर जैसे- कंस्ट्रक्शन और माइनिंग जैस क्षेत्रों में नौकरियों की संख्या बढ़ी है.
इन सेक्टर में नौकरियों की संख्या 5.5 करोड़ से बढ़कर 5.9 करोड़ हो गई है. मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में बेरोजगार हुए लोगों को नौकरी के अवसर उपलब्ध करवाने की क्षमता सबसे अधिक है. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में ये सेक्टर ऐसा करने में सक्षम नहीं हो पा रहा है. 2011-12 की तुलना में 2017-18 के बीच करीब 40 लाख नौकरियां घटी हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *