सावरकर नाम में कैसे जुड़ा ‘वीर’? इस खास नाम की अनसुनी कहानी

हिंदू राष्ट्रवाद के प्रणेता वीर सावरकर.
यह नाम (Title) देने वाली हस्ती को सावरकर (Veer Savarkar) ने भी बदले में एक नाम दिया और लोकप्रियता ये है कि दोनों को अब उनके विशेष नामों के साथ ही पुकारा जाता है.हिंदू राष्ट्रवाद (Hindu Nationalism) के प्रणेता माने जाने वाले विनायक दामोदर सावरकर (V. D. Savarkar) का नाम इन दिनों महाराष्ट्र की राजनीति में चर्चा में है. असल में भाजपा ने विधानसभा चुनाव (Maharashtra Assembly Election) के दौरान घोषणा पत्र में सावरकर को भारत रत्न देने का वादा कर दिया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने अपनी चुनावी सभा में भाषण के दौरान भी सावरकर का नाम कुछ संदर्भों में लिया. सावरकर को वीर सावरकर के नाम से जाना और पुकारा जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि उनके नाम के साथ ‘वीर’ शब्द या उपाधि किस तरह जुड़ी?
इस टाइटल के पीछे एक पूरी कहानी है,जो इतिहास (History) के कम सुने अध्यायों से होकर गुज़रती है. इस कहानी में आपको एक और दिलचस्प बात यह जानने को मिलेगी कि जिस कलाकार (Artist) ने सावरकर को ‘वीर’ नाम दिया, सावरकर ने भी उसे ‘आचार्य’ कहकर पुकारा. दोनों नामों को इस कदर लोकप्रियता मिली कि अब दोनों का नाम इन उपाधियों के बगैर नहीं लिया जाता. जानिए इतिहास के हवाले से एक कम सुनी लेकिन दिलचस्प दास्तान.
किसने दिया था नाम ‘वीर’?
असल में, कांग्रेस के साथ एक बयान को लेकर विवाद में उलझ जाने के बाद सावरकर को कांग्रेस ने ब्लैकलिस्ट कर दिया था और हर जगह उनका विरोध किया जाता था. यह 1936 का समय था. ऐसे में मशहूर पत्रकार, शिक्षाविद, लेखक, कवि और नाटक व फिल्म कलाकार पीके अत्रे ने सावरकर का साथ देने का मन बनाया क्योंकि वह नौजवानी की उम्र से सावरकर के किस्से सुनते रहे थे और उनके बड़े प्रशंसक थे. अत्रे के बारे में आप कहानी में और भी बहुत कुछ जानेंगे.
कैसे दिया गया ये चर्चित टाइटल?
अत्रे ने पुणे में अपने बालमोहन थिएटर के कार्यक्रम के तहत सावरकर के लिए एक स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया. इस कार्यक्रम को लेकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सावरकर के खिलाफ पर्चे बांटे और धमकी दी कि वे सावरकर को काले झंडे दिखाएंगे. इस विरोध के बावजूद हज़ारों लोग जुटे और सावरकर का स्वागत कार्यक्रम संपन्न हुआ, जिसमें अत्रे ने वो टाइटल दिया, जो आज तक चर्चित है.
‘जो काला पानी से नहीं डरा, काले झंडों से क्या डरेगा?’
सावरकर के विरोध में कांग्रेसी कार्यकर्ता कार्यक्रम के बाहर हंगामा कर रहे थे और अत्रे ने कार्यक्रम में अपने भाषण में सावरकर को निडर करार देते हुए कह दिया कि काले झंडों से वो आदमी नहीं डरेगा, जो काला पानी की सज़ा तक से नहीं डरा. इसके साथ ही, अत्रे ने सावरकर को उपाधि दी ‘स्वातंत्र्यवीर’. यही उपाधि बाद में सिर्फ ‘वीर’ टाइटल हो गई और सावरकर के नाम के साथ जुड़ गई.
‘सावरकर ने जीत लिया था पुणे’
अत्रे के भाषण और उपाधि दिए जाने के बाद तालियों से सभागार गूंज उठा और उसके बाद करीब डेढ़ घंटे तक सावरकर ने ऐसा ज़ोरदार भाषण दिया कि अत्रे ने ही बाद में लिखा कि उस भाषण का करिश्मा था कि’सावरकर ने पुणे फतह कर लिया था’.असल में,यह कांग्रेस के विरोध का जवाब देकर सावरकर की लोकप्रियता को ज़ाहिर करने का कदम था.इतिहास, राजनीति और धर्म से जुड़ी कई किताबें सावरकर ने लिखी थीं.
क्यों दिया गया यह टाइटल?
सावरकर ने जेल के दिनों में 1857 की क्रांति पर आधारित चार खंडों में विस्तृत मराठी ग्रंथ लिखा था जिसका नाम ‘1857 चे स्वातंत्र्य समर’ था. यह ग्रंथ बेहद चर्चित हुआ था और इसी ग्रंथ के नाम से अत्रे ने सावरकर को ‘स्वातंत्र्यवीर’ नाम दिया था. यही नहीं, ये वही अत्रे थे, जिन्होंने बाद में यह घोषणा तक की थी कि ‘महाराष्ट्र में ध्यानेश्वर के बाद सावरकर से ज़्यादा मेधावी कोई लेखक नहीं हुआ’.१८५७ का स्वातंत्र्य समर (मूल मराठी नाम : १८५७चे स्वातंत्र्यसमर) एक प्रसिद्ध इतिहास ग्रन्थ है जिसके लेखक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर थे। इस ग्रन्थ में उन्होंने तथाकथित ‘सिपाही विद्रोह’ का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिख कर ब्रिटिश शासन को हिला डाला था। यह ग्रन्थ को प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबन्धित होने का गौरव प्राप्त है। अधिकांश इतिहासकारों ने १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक ‘सिपाही विद्रोह’ या अधिकतम भारतीय विद्रोह कहा था। दूसरी ओर भारतीय विश्लेषकों ने भी इसे तब तक एक योजनाबद्ध राजनीतिक एवं सैन्य आक्रमण कहा था, जो भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के ऊपर किया गया था।
सावरकर ने १८५७ की घटनाओं को भारतीय दृष्टिकोण से देखा। स्वयं एक तेजस्वी नेता व क्रांतिकारी होते हुए, वे १८५७ के शूरवीरों के साहस, वीरता, ज्वलन्त उत्साह व दुर्भाग्य की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने इस पूरी घटना को उस समय उपलब्ध साक्ष्यों व पाठ सहित पुनरव्याख्यित करने का निश्चय किया। उन्होंने कई महीने इण्डिया ऑफिस पुस्तकालय में इस विषय पर अध्ययन में बिताए। सावरकर ने पूरी पुस्तक मूलतः मराठी में लिखी व १९०८ में पूर्ण की क्योंकि उस समय इसका भारत में मुद्रण असम्भव था, इसकी मूल प्रति इन्हें लौटा दी गई। इसका मुद्रण इंग्लैंड व जर्मनी में भी असफल रहा। वीर सावरकर रचित ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ विश्व की पहली इतिहास पुस्तक है, जिसे प्रकाशन के पूर्व ही प्रतिबंधित होने का गौरव प्राप्तक हुआ। इस पुस्तक को ही यह गौरव प्राप्त है कि सन् 1909 में इसके प्रथम गुप्त संस्करण के प्रकाशन से 1947 में इसके प्रथम खुले प्रकाशन तक के अड़तीस वर्ष लंबे कालखंड में इसके कितने ही गुप्तर संस्करण अनेक भाषाओं में छपकर देश-विदेश में वितरित होते रहे। इस पुस्तक को छिपाकर भारत में लाना एक साहसपूर्ण क्रांति-कर्म बन गया। यह देशभक्त् क्रांतिकारियों की ‘गीता’ बन गई। इसकी अलभ्य प्रति को कहीं से खोज पाना सौभाग्य माना जाता था। इसकी एक-एक प्रति गुप्तं रूप से एक हाथ से दूसरे हाथ होती हुई अनेक अंतःकरणों में क्रांति की ज्वाला सुलगा जाती थी।
पुस्तक के लेखन से पूर्व सावरकर के मन में अनेक प्रश्न थे-सन् 1857 का यथार्थ क्या है ? क्या वह मात्र एक आकस्मिक सिपाही विद्रोह था ? क्या उसके नेता अपने तुच्छ स्वार्थों की रक्षा के लिए अलग-अलग इस विद्रोह में कूद पड़े थे, या वे किसी बड़े लक्ष्य की प्राप्तित के लिए एक सुनियोजित प्रयास था ? यदि हाँ, तो उस योजना में किस-किसका मस्तिष्क कार्य कर रहा था ? योजना का स्वरूप क्या था ? क्या सन् 1857 एक बीता हुआ बंद अध्याय है या भविष्य के लिए प्रेरणादायी जीवंत यात्रा ? भारत की भावी पीढ़ियों के लिए 1857 का संदेश क्या है ? आदि-आदि। और उन्हीं ज्वलंत प्रश्नोंज की परिणति है प्रस्तुत ग्रंथ-‘1857 का स्वातंत्र्य समर’! इसमें तत्कालीन संपूर्ण भारत की सामाजिक व राजनीतिक स्थिति के वर्णन के साथ ही हाहाकार मचा देनेवाले रण-तांडव का भी सिलसिलेवार, हृदय-द्रावक व सप्रमाण वर्णन है।इंडिया हाउस में रह रहे कुछ छात्रों ने इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद किया और अन्ततः यह पुस्तक १९०९ में हॉलैंड में मुद्रित हुयी। इसका शीर्षक था, ‘द इण्डियन वार ऑफ इंडिपेन्डेंस – 1857’। इस पुस्तक का द्वितीय संस्करण लाला हरदयाल द्वारा गदर पार्टी की ओर से अमरीका में निकला और तृतीय संस्करण सरदार भगत सिंह द्वारा निकाला गया। इसका चतुर्थ संस्करण नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा सुदूर-पूर्व में निकाला गया। फिर इस पुस्तक का अनुवाद उर्दु, हिंदी, पंजाबी व तमिल में किया गया। इसके बाद एक संस्करण गुप्त रूप से भारत में भी द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद मुद्रित हुआ। इसकी मूल पाण्डुलिपि मैडम भीकाजी कामा के पास पैरिस में सुरक्षित रखी थी। यह प्रति अभिनव भारत के डॉ॰ क्यूतिन्हो को प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान पैरिसम संकट आने के दौरान सौंपी गई। डॉ॰ क्युतिन्हो ने इसे किसी पवित्र धार्मिक ग्रन्थ की भांति ४० वर्षों तक सुरक्षित रखा। भारतीय स्वतंत्रता उपरान्त उन्होंने इसे रामलाल वाजपेयी और डॉ॰ मूंजे को दे दिया, जिन्होंने इसे सावरकर को लौटा दिया। इस पुस्तक पर लगा निषेध अन्ततः मई, १९४६ में बंबई सरकार द्वारा हटा लिया गया।
सावरकर ने कैसे चुकाया नाम का कर्ज़?
अत्रे ने सावरकर के स्वागत में जो कामयाब कार्यक्रम आयोजित किया, उसके बाद पुणे में ही एक और कार्यक्रम हुआ. इस कार्यक्रम में सावरकर ने अत्रे को महान शिक्षाविद, लेखक और कलाकार घोषित करते हुए उन्हें आचार्य कहकर पुकारा. ‘आचार्य’ कुछ ही समय बाद अत्रे के नाम के साथ उसी तरह जुड़ने लगा जैसे सावरकर के नाम के साथ ‘वीर’ जुड़ रहा था. 80 साल बाद ये स्थिति है कि दोनों को उपाधियों के साथ ही ज़्यादातर पुकारा या सं​बोधित किया जाता है.
(स्रोत : वैभव पुरंदरे लिखित पुस्तक ‘सावरकर: द ट्रू स्टोरी ऑफ फादर ऑफ हिंदुत्व’ के अध्याय पर आधारित)

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