जम्मू-कश्मीर: सुको दखल से इनकार, कहा- मामला संवेदनशील, सरकार को वक्त मिलना चाहिए

जम्मू-कश्मीर पर सरकार को मिला सुको का साथ, धारा 144 हटाने की मांग पर आदेश देने से मना किया. इस मामले पर अब दो हफ्ते बाद फिर सुनवाई होगी.जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल पास होने के बाद से सरकार ने ऐहतिहातन पूरे जम्मू और श्रीनगर में सेक्शन 144 लगा रखी है. कश्मीर घाटी में भी सुरक्षा बढ़ी दी गई है.
जम्मू-कश्मीर: सुप्रीम कोर्ट का दखल देने से इनकार , कहा- मामला संवेदनशील, सरकार को वक्त मिलना चाहिएजम्मू-कश्मीर में तनाव का माहौल है,

नई दिल्ली: जम्मू कश्मीर के मौजूदा हालात पर आज सरकार को सुप्रीम कोर्ट का पूरा साथ मिला. कोर्ट ने राज्य में मोबाइल-इंटरनेट बहाल करने और धारा 144 हटाने जैसी मांग करने वाली याचिका पर फिलहाल कोई आदेश देने से मना कर दिया. कहा, “सरकार हालात को सामान्य बनाने की पूरी कोशिश कर रही है. इस वक्त हमारा दखल देना स्थिति को सिर्फ जटिल बनाएगा.”

कांग्रेस समर्थक सामाजिक कार्यकर्ता तहसील पूनावाला की तरफ से दाखिल याचिका में कहा गया था कि राज्य में लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है. धारा 144 लगाकर आवाजाही बाधित कर दी गई है. नेताओं को हिरासत में ले लिया गया है. मोबाइल, इंटरनेट, टीवी प्रसारण जैसी सेवाओं पर भी रोक लगा दी गई है. इसलिए, कोर्ट मामले में दखल दे. हालात की समीक्षा के लिए रिटायर्ड जज के नेतृत्व में एक कमिटी का गठन करे.

जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने याचिकाकर्ता की वकील मेनका गुरुस्वामी से सवाल किया, ”आप कौन हैं? आपने अपना परिचय सामाजिक कार्यकर्ता बताया है. आप मामले में प्रभावित पक्ष तो नहीं लगते. हम सब जानते हैं कि जम्मू कश्मीर में अभी स्थिति सामान्य नहीं है. लेकिन सरकार इसका प्रयास कर रही है. क्या आपको नहीं लगता कि सरकार को मौका दिया जाना चाहिए?”

कोर्ट के सवाल पर वकील ने कहा, “राज्य में संचार सेवाएं बंद कर दी गई हैं. लोग अपने परिवार से बात नहीं कर सकते. हॉस्पिटल और पुलिस थानों तक पहुंचना भी इस पर मुश्किल है. ये लोगों के मौलिक अधिकारों का मामला है. कोर्ट को सरकार को स्थिति सामान्य बनाने के लिए आदेश चाहिए.”

याचिका का विरोध करते हुए एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने कहा, “सरकार की प्राथमिकता शांति व्यवस्था बनाए रखना है. हम पूरी कोशिश कर रहे हैं कि नागरिकों को कम से कम असुविधा हो. याचिकाकर्ता हर दिन टीवी पर बैठने वाले एक एक्टिविस्ट हैं. उन्होंने मामले की गंभीरता को समझे बिना याचिका दाखिल कर दी है.” वेणुगोपाल ने आगे कहा, “स्थिति की रोज समीक्षा की जा रही है. हर दिन नई-नई छूट दी जा रही है. हालात पूरी तरह से सामान्य होने में 3 महीने का वक्त लग सकता है. लेकिन जो बातें याचिका में लिखी गई हैं, उनमें से ज्यादातर अगले कुछ दिनों में बहाल हो जाएंगी.”

सरकार के सबसे बड़े वकील के इस जवाब पर असंतोष जता रही मेनका गुरुस्वामी से बेंच के सदस्य जस्टिस एम आर शाह ने सख्त लहजे में कहा, “अगर कोई बड़ी घटना हो जाती है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? सरकार अपना काम कर रही है. रातों-रात स्थिति नहीं बदल सकती. हम दखल देकर हालात की जटिलता नहीं बढ़ाएंगे.”

इसके बाद कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई बंद कर देने के संकेत दिए. याचिकाकर्ता से कहा कि वो इंतजार करे. कुछ समय के बाद अगर हालात न बदलें तो दोबारा अदालत का दरवाजा खटखटाए. लेकिन बाद में वकील के आग्रह पर मामले को लंबित रखा. कहा, “हम फिलहाल मामले पर कोई आदेश नहीं दे रहे हैं. 2 हफ्ते बाद इस पर फिर सुनवाई करेंगे. तब आप और सरकार हमें हालात के बारे में जानकारी दें.”

जम्मू-कश्मीर को स्पेशल स्टेटस देने वाले संविधान के आर्टिकल 370 (Article 370) हटाने के बाद तनाव का माहौल है. इसके बाद सरकार ने राज्य में तमाम तरह के बैन लगा रखे हैं. सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने को लेकर दायर याचिकाओं पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. कोर्ट ने इन प्रतिबंधों को हटाने से इनकार कर दिया है. शीर्ष अदालत का कहना है कि मामला संवेदनशील है. सरकार को कुछ और वक्त मिलना चाहिए. मामले की अगली सुनवाई अब दो हफ्ते बाद होगी.
बता दें कि जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल पास होने के बाद से सरकार ने ऐहतिहातन पूरे जम्मू और श्रीनगर में सेक्शन 144 लगा रखी है. कश्मीर घाटी में भी सुरक्षा बढ़ा दी गई है. सरकार ने कई इलाकों में मोबाइल फोन कनेक्शन और इंटरनेट पर रोक लगा रखी है.
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से पूछा कि घाटी में ऐसा कब तक चलेगा. इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि जैसी ही स्थिति सामान्य होगी सारी पाबंदियां खत्म हो जाएगी. हम कोशिश कर रहे हैं कि लोगों को कम से कम असुविधा हो. 1999 से हिंसा के कारण अब तक घाटी में 44000 लोग मारे गए हैं.

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 याचिका में मांग

सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर कई याचिकाएं दर्ज थी.. इनमें से एक याचिका कांग्रेस नेता तहसीन पूनावाला ने दायर की थी.  उन्होंने घाटी से कर्फ़्यू हटाने के साथ फ़ोन, इंटरनेट, न्यूज़ चैनल पर लगी सभी पाबंदियों को हटाने की मांग की थी. पूनावाला ने जम्मू-कश्मीर के हालात की वस्तुस्थिति का पता लगाने के लिए एक न्यायिक आयोग के गठन का अनुरोध भी किया था. कश्मीर टाइम्स की संपादिका अनुराधा भसीन ने भी मीडिया की आजादी को बहाल करने और नज़रबंद नेताओं की रिहाई के लिए दायर की थी.  नेशनल कॉन्फ्रेस के दो सांसद अकबर लोन और हसनैन मसूदी के अलावा एक वकील ने भी याचिका दायर करके अनुच्छेद 370 के संशोधनों और नए राज्य के गठन को चुनौती दी थी.

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