पुण्य स्मरण:63 दिन लंबा मृत्युपर्यंत अनशन किया था 25 साल के जतिन दा ने

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*🔥🔥अनशन से आज़ादी की ओर…….🔥🔥*

*खुद से जो वाक़िफ नहीं, वो जवानी फ़िज़ूल है,*
*वतन की जिसको परवाह नहीं, वह मगरूर है,*
*जन्म लेना ही तो काफी नहीं है, इस मिट्टी में,*
*हक अदा करना भी तो इस जीवन का वसूल है।*

✍️ चरित्र-निर्माण,समाज-सुधार व जन-चेतना के लिए समर्पित राष्ट्रवादी संस्था, मातृभूमि सेवा संस्था आज उन 63 दिनों की अनशन (भूख-हड़ताल) पर प्रकाश डालने का प्रयास करेगी जिसने भारतीय युवा दिलों में देश की आज़ादी के लिए मर मिटने के संकल्प को दृढ़ता प्रदान की। बम बनाने में विशेषज्ञता रखने वाले *क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति व HSRA* के सदस्य जतिंद्रनाथ दास का जन्म 27 अक्टूबर 1904 को कलकत्ता,पश्चिम बंगाल में हुआ था। मात्र 16 साल की आयु में ही जतिन दा ने सन् 1921 के असहयोग आंदोलन में भाग लिया था।

📝 नवम्बर 1925 में कोलकाता के विद्यासागर कॉलेज में बी.ए. के अध्ययन के दौरान जतिन दा को विदेशी कपड़ों की दुकान पर धरना देते वक्त गिरफ्तार कर 06 महीने की सजा सुनाकर मिमेनसिंह सेंट्रल जेल (वर्तमान बांग्लादेश) में कैद कर दिया गया। जेल से छूटने के बाद जतिन दा मातृभूमि के लिए कुछ करने की भावना लिए प्रसिद्ध क्रान्तिकारी सचिन्द्रनाथ सान्याल के सम्पर्क में आए। उन्होंने सचिंद्रनाथ सान्याल से बम बनाना सिखा। *सन् 1925 में अंग्रेजों ने उन्हें ‘दक्षिणेश्वर बम कांड’ और ‘काकोरी कांड’ के सिलसिले में गिरफ़्तार कर लिया।* हालांकि सबूत न मिलने के कारण उन पर मुकदमा तो नहीं चल पाया,लेकिन वे नजरबन्द कर लिए गए। जेल में भारतीय कैदियों के साथ हो रहे बुरे व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल की। जब जतिन दा की हालत बिगड़ने लगी तो जेल अधीक्षक ने माफी माँगी और डरकर 21 दिन बाद ही उन्हें रिहा कर दिया।

📝 सन् 14 जून 1929 को जतिन दा को क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए ‘लाहौर षडयंत्र केस’ में गिरफ्तार कर लाहौर जेल में कैद किया गया था। लाहौर जेल में,जतिन दास ने अन्य क्रांतिकारी सेनानियों के साथ भूख हड़ताल शुरू कर दी क्योंकि उन्होंने यहाँ भारतीय कैदियों और विचाराधीन कैदियों के लिए समानता की माँग की जरूरत अनुभव की । भारतीय कैदियों के लिए वहाँ सब दुखदायी था- जेल प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराई गई वर्दियां कई कई दिनों तक नहीं धुलती थी, रसोई क्षेत्र और भोजन चूहे और तिलचट्टों से भरा रहता था, कोई भी पठनीय सामग्री जैसे अखबार या कोई कागज आदि नहीं प्रदान किया गया था। आपको यहाँ ये बताना जरूरी है कि सरदार भगत सिंह जी ने जतिन दा जी की 13 जुलाई 1929 की अनशन से 30 दिन पूर्व (14 जून 1929) ही भूख हड़ताल इन्हीं विषयों को लेकर शुरू कि थी, जो 114 दिन तक (06 अक्टूबर 1929) चली। जेल अधिकारियों ने हड़ताल तुड़वाने के उद्देश्य से स्वादिष्ट भोजन,मिठाई और दूध आदि का प्रलोभन इन क्रांतिकारियों को देने लगे किंतु क्रांतिकारियों पर चली गई ये चाल असफल रही।

📝 *जेल अधिकारियों ने जबरन अनशन तुड़वाने का निश्चय किया। वे बंदियों के हाथ पैर पकड़कर,नाक में रबड़ की नली घुसेड़कर पेट में दूध डाल देते थे। जतिन दा के साथ भी ऐसा किया गया,तो वे जोर से खांसने लगे। इससे दूध उनके फेफड़ों में चला गया और उनकी हालत बहुत बिगड़ गयी।* जेल प्रशासन ने उनके छोटे भाई किरणचंद्र दास को उनकी देखरेख के लिए बुला लिया; पर जतिंद्रनाथ दास ने उसे इसी शर्त पर अपने साथ रहने की अनुमति दी कि वह उनके संकल्प के बीच नही आएगा। इतना ही नहीं,यदि उनकी बेहोशी की अवस्था में जेल अधिकारी कोई खाना,दवा या इंजैक्शन देना चाहें,तो वह ऐसा नहीं होने देगा । हड़ताल का 63वाँ दिन था। उन्होंने सभी साथियों को साथ में बैठाकर गीत गाने के लिए कहा। अपने छोटे भाई को पास में बिठाकर खूब लाड़ किया। उनके एक साथी विजय सिन्हा ने उन का प्रिय गीत ‘एकला चलो रे’ और फिर ‘वन्देमातरम’ गाया। इस 63 दिन के लंबे संघर्ष उपरांत जतिन दा ने मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर करते हुए 13 सितंबर 1929 को शाम 05 बजे अंतिम साँस ली।

📝 साथियों नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 600 रुपए में रेलगाड़ी की एक अलग विशेष बोगी बुक करके जतिन दा के पार्थिव शरीर को 13 सितंबर 1929 को लाहौर से कलकत्ता भिजवाया,जिसमें दुर्गा भाभी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। जतिन दा के पार्थिव शरीर को ले गाड़ी जब लाहौर से निकली तो लाल गुलाबों से सजी हुई थी। ट्रेन जहाँ-जहाँ जाती हजारों की संख्या में लोग श्रद्धांजलि के लिए उमड़ पड़ते। उनके अंतिम संस्कार के समय कोलकाता में दो मील (तीन किलोमीटर) लंबा जुलूस अंतिम संस्कार स्थल के पास था। *साथियों इस क्रांतिकारी के बलिदान ने वही काम किया, जो एक बीज धरती में समाकर फल देने वाला वृक्ष बन जाता है। जतिन दा के बलिदान से प्रेरित होकर हजारों युवा देश की आज़ादी के लिए स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। ऋणी राष्ट्र ऐसे क्रांतिवीर के अद्भूत व अतुलनीय बलिदान के लिए सदैव नतमस्तक रहेगा।*

*जय मातृभूमि !*
✍️ राकेश कुमार
*मातृभूमि सेवा संस्था ☎️ 9891960477*
राष्ट्रीय अध्यक्ष: *यशपाल बंसल ☎️ 8800784848*
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