युद्ध छेड़ने की हालत में नहीं दर्जनभर झूठ पर खड़ा चीन:विशेषज्ञ

झूठ के ‘ढेर’ पर खड़ा ड्रैैगन

चीन झूठ के ढेर पर खड़ा है। प्रपंच की यह रेत किसी भी क्षण पैरों तले से दरक सकती है। वह विश्व विजेता जैसी धौंस दिखाने की भूल नहीं कर सकता। चीन भी इसे समझता है। यही वजह है कि अब वास्तविक नियंत्रण रेखा से उसके जवान पीछे लौटने लगे हैं। पूर्वी लद्दाख और सिक्किम में बना तनाव पूरा नहीं तो कुछ-कुछ छंटने लगा है।
भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लंबे समय से चला आ रहा है। मगर ताजा प्रकरण 5 मई को शुरू हुआ, जब पैंगोंग त्सो के उत्तरी किनारे पर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पी.एल.ए.) और भारतीय जवानों में झड़प हुई। कुछ को हल्की चोट आई। उसके बाद 8 मई को पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब पांच और जगह जवानों का आमना-सामना हुआ। 9 मई को उत्तरी सिक्किम में भी चीन ने भारत को उकसाने की कार्रवाई की। 14 मई को सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला कि चीन ने गलवान घाटी में 80 से 100 टैंट लगा लिए हैं। टैंक और बड़ी गाडिय़ां खड़ी हैं। बंकर बनाने का काम चल रहा है। पैंगोंग त्सो झील के उत्तरी किनारे पर भी चीनी सेना ने टैंट लगा लिए थे। डेमचौक में भी ऐसा ही हो रहा था।
अब सवाल उठता है कि चीन ऐसा क्यों कर रहा है? भारत को क्यों उकसा रहा है? इसमें उसका क्या हित है? क्या वह कोई बड़ा खेल खेलना चाह रहा है? इन सवालों को समझने के लिए पूरे विवाद को समझना और उसकी जड़ तक जाना जरूरी है।
आजादी के बाद से ही दोनों देशों के बीच सीमा का विवाद चला आ रहा है। इसी वजह से 1962 की लड़ाई हुई। इस लड़ाई में दोनों सेनाओं की जो स्थिति थी उसे ही वास्तविक नियंत्रण रेखा (एल.ए.सी.) मान लिया गया। मगर इस वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भी चीन सहमत नहीं है और कई जगह आगे बढऩे की कोशिश करता रहता है। उसकी ये हरकतें ही विवाद को जन्म देती हैं। विवाद न हो, इसके लिए वाजपेयी सरकार के समय वर्ष 2000 में दोनों देशों ने सीमा निर्धारण पर काम शुरू किया था। तय यह किया गया था कि दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा का नक्शा बनाकर आदान-प्रदान करेंगे। शुरूआत मध्य सैक्टर से की गई और वहीं काम अटक गया। चीन जिसे वास्तविक नियंत्रण रेखा बता रहा था, वह उसकी बढ़ती महत्वाकांक्षा का प्रतीक था। वह भारतीय हिस्सों को भी अपना बता रहा था, इसलिए नक्शा अंतिम रूप नहीं ले सका।
चीन ने अपने बारे में दुनिया में बहुत से भ्रम गढ़े हैं। वह बहुत चालाकी से दुनिया का ताकतवर देश होने की छवि बनाना चाहता है, मगर असल में ऐसा है नहीं। चीन के ऐसे ही 12 मिथक हैं, जिनका दुनिया के सामने पर्दाफाश करना बेहद जरूरी है। भारत को अब इसके लिए रणनीति बनाकर काम करना चाहिए। ये भ्रम इस तरह हैं-
1. पी.एल.ए. बहुत ताकतवर है
यह भ्रम है कि चीन की सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पी.एल.ए.) बहुत ताकतवर है। बहुत प्रशिक्षित है। असल में यह सिर्फ एक दिखावा है। 1967 और उसके बाद भी भारत ने कई बार चीन को पीछे हटने के लिए बाध्य किया है। अब जून 2020 में भी यही हो रहा है।
2. चीनी उत्पाद
यह भी भ्रम है कि चीनी उत्पादों की तकनीक और गुणवत्ता उच्चकोटि की होती है। असल में चीन अमरीकी और दुनिया की तकनीकों को कॉपी-पेस्ट करता है, जो दोयम दर्जे का है। अधिकांश चीनी उत्पाद गुणवत्ता में बेहद निम्न श्रेणी के होते हैं।
3. चीन के लोग खुशहाल और खुश हैं
यह एक बड़ा झूठ है, जो चीन दुनिया को दिखाने की कोशिश करता है। चीन के लोग कैसे खुश रह सकते हैं, जबकि उन पर इतनी बंदिशें हैं। पी.एल.ए. और चीन की पुलिस उन्हें चैन से जीने ही नहीं देती।
4. चीन की कोई कमजोरी नहीं
तिब्बत, हांगकांग, शिनजियांग, मंगोलिया, ताईवान, साऊथ चाइना-सी हर जगह चीन घरेलू मोर्चे पर जूझ रहा है, इसलिए चीन की कमजोरियां काफी बड़ी हैं।
5. भारत-चीन बॉर्डर चिन्हित है
यह भी एक भ्रम है। भारत और चीन सीमा पूरी तरह निर्धारित नहीं है। विवाद सिर्फ एल.ए.सी. पर ही नहीं है, बल्कि अक्साई चिन को लेकर सीमा पर भी विवाद है।
6. एल.ए.सी. पर शांति रहती है
यह सही है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एल.ए.सी.) पर 1975 के बाद से कोई गोली नहीं चली है। मगर सीमा को लेकर खींचतान 1950 के दशक में ही शुरू हो गई थी। 1962 में इसी वजह से युद्ध हुआ।
7. तनातनी का कारण लोकल कमांडर
यह भी भ्रम है कि तनातनी दोनों तरफ के जवानों और कमांडरों में स्थानीय स्तर पर हो जाती है। असल में इसके पीछे चीन की महत्वाकांक्षाएं हैं।
8. चीन की संस्कृति अधिक महान
यह चीन का प्रोपेगंडा है कि उसकी संस्कृति सबसे महान है। हकीकत यह है कि चीन को धर्म भी भारत से मिला है। बौद्ध धर्म भारत से ही चीन पहुंचा। श्रेष्ठता में भारतीय सभ्यता की तुलना दुनिया में किसी से नहीं हो सकती।
9. 1962 का प्रचार
चीन का यह प्रचार कि उसने 1962 में बहुत बड़ी जीत दर्ज की थी, एक सफेद झूठ है। कुछ रणनीतिक ङ्क्षबदुओं पर जरूर हार हुई थी। मगर रिजांग्ला, बुमला, वालोंग, हाईलोंग सब जगह जवानों ने डटकर चीन का मुकाबला किया था और मुंहतोड़ जवाब दिया।
10. मनोवैज्ञानिक बढ़त
चीन खुद को मनोवैज्ञानिक रूप से काफी मजबूत दिखाने की कोशिश करता है। 1967 में नाथूला और चो ला प्रकरण के बाद से स्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं।
11 . तकनीकी ज्ञान
यह भी एक बड़ा भ्रम चीन ने दुनिया में फैलाया है कि वह साइबर,स्पेस,आर्टीफिशियल इंटैलीजैंस के क्षेत्र में काफी आगे है।
12. चीन पूरी तरह संगठित
यह सबसे बड़ा फरेब है। चीन का पूरा राजनीतिक सिस्टम क्रूर और अडिय़ल है, वह कभी भी टूट सकता है। चीन के लोग चाहते हैं कि उन्हें भी आजादी मिले, लोकतंत्र मिले। पी.आर.सी. और पी.एल.ए. की मनमानियों व अत्याचार से उन्हें मुक्ति मिले।

लैफ्टिनैंट जनरल गुरमीत सिंह

रक्षा-सैन्य विशेषज्ञों की राय: तनाव और बढ़ाएगा मगर युद्ध छेड़ने की स्थिति में नहीं है चीन
वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर 1962 के बाद पहली बार भारत और चीन के सैनिकों के बीच खूनी झड़प हुई है। कोरोना के कारण घरेलू मोर्चे पर बुरी तरह घिरे चीनी नेतृत्व से एलएसी पर तनाव को चरम पर पहुंचाने का अंदेशा पहले भी था।
घरेलू मोर्चे पर जिस तरह चीन घिरा है,उससे निकट भविष्य में तनाव कम होने की उम्मीद भी नहीं है। इसके बावजूद सच्चाई यह है कि वर्तमान में दुनिया में अलग-थलग होने की कगार पर खड़ा चीन अभी भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने की स्थिति में नहीं है। चीन की योजना भारत को चारों तरफ से घेर कर दबाव में लाने की है। इसके कई कारण हैं।
चीनी नेतृत्व की कार्यशैली पर निगाह डालें तो घरेलू मोर्चे पर मुश्किलों से घिरने पर वह हमेशा अपने देश में राष्ट्रवाद का ज्वार पैदा करता रहा है। अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर हिला चीन हांगकांग के साथ ही भारत से भी रिश्ते में लगातार तनाव बढ़ा रहा है। दरअसल,उसकी रणनीति खुद को पीडि़त के रूप में पेश करने की है।
वह कभी भारत को अपने प्रतियोगी के रूप में उभरते नहीं देखना चाहता। फिलहाल,दुनिया के ताकतवर देश चीन को अलग-थलग करने में जुटे हैं। इसमें डब्ल्यूएचओ से जांच का मामला हो या फिर दक्षिण चीन सागर का सवाल, भारत इसमें चीन को घेरने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
फिर भारत की योजना एलएसी तक चीन की तर्ज पर ही युद्ध गति से निर्माण कार्य करने की है। जाहिर है कि ऐसा करने से एलएसी पर भारत चीन को बराबरी के स्तर का टक्कर दे सकेगा। यह सवाल है कि दोनों देशों के बीच खूनी जंग आगे क्या रूप लेगी? इसके लिए यह जानना जरूरी होगा कि चीन की ओर से भारतीय जवानों पर हमले के आदेश किसने दिए?
यह लोकल कमांडर का फैसला था या फिर चीनी नेतृत्व ने अपनी सेना को ऐसा करने के लिए फ्री हैंड दिया था। अगर यह फैसला चीनी नेतृत्व का है,तो आने वाले समय में एल ए सी पर तनाव चरम पर होगा। जहां तक भारत का सवाल है तो अब उसे सतर्क रहने की जरूरत है।
आप देखिये, बीते कुछ दिनों से एलओसी पर पाकिस्तान अचानक भारत के खिलाफ आक्रामक हुआ है। सोमवार को ही उसने हमारे दो राजनयिकों का अपहरण कर झूठे आरोप लगाए। इसी दौरान नेपाल आधारहीन तथ्यों के सहारे हमारे भूभाग पर दावा जता रहा है। मतलब सीधा है,चीन हमें चारों ओर से घेर कर दबाव में लाना चाहता है। इसलिए कि भारत उसे परेशान करने वाले मुद्दों पर दुनिया से दूरी बनाए।
हां,जहां तक दोनों देशों के बीच युद्ध की नौबत है,तो मुझे ऐसा होने की संभावना नहीं दिखती। उसकी स्थिति ऐसी नहीं है। वैश्विक मोर्चे पर वह पहले ही घिरा है। फिर दुनिया में चीन की तुलना में भारत के पक्ष में समर्थन ज्यादा है। ऐसे में चीन की भावी भूमिका भारत को लगातार परेशान करने की रहेगी।

(कमर आगा, रक्षा विशेषज्ञ)

सैन्य कमांडरों से नहीं राजनीतिक हस्तक्षेप से सुलझेगा मसला
करीब छह दशक के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत और चीन के बीच खूनी झड़प में हमें अपने सैनिकों की शहादत देनी पड़ी। नए सिरे से दोनों देशों के बीच चरम पर पहुंची तनातनी के बीच इस तरह की वारदात बताती है कि ऐसी ही घटना लद्दाख के इतर दूसरी जगहों पर भी हो सकती है।
बातचीत तो हो रही है लेकिन विवाद सैन्य कमांडरों की वार्त से नहीं सुलझेगा। जरूरत शीर्ष स्तर पर राजनीतिक संवाद की है। सवाल है कि ऐसा क्या हुआ कि करीब 58 साल बाद हमें जवानों का बलिदान देना पड़ा। दरअसल यह विवाद बहुत लंबा खिंच गया है।
डेढ़ महीने से दो सेनाएं आमने-सामने हों तो ऐसी स्थिति आना अस्वाभाविक नहीं है। जहां तक तनाव की बात है तो यह सच है कि चीन के सैनिक चार-पांच जगहों पर हमारे इलाके में घुस आए हैं। इसमें गलवां घाटी भी है जो सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम है।
इसलिए जब सरकार ने पिछले दिनों एलएसी पर तनाव कम होने और चीनी सैनिकों की वापसी का बयान दिया तो मुझे विश्वास नहीं हुआ। मुझे अंदेशा था कि सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इलाके में घुसपैठ के बाद चीन इतनी आसानी से नहीं मानेगा। फिर यह किसी से छिपा नहीं है कि चीन भारत के एलएसी पर अपनी तरफ किए जा रहे निर्माण कार्यों से खुश नहीं है।
इसके पीछे दूसरे वैश्विक कारण भी हो सकते हैं। मगर अहम कारण भारत की ओर से कराया जा रहा निर्माण है। सवाल है कि अब आगे क्या होगा? तनाव की स्थिति में लंबे समय तक सेना को आमने-सामने रखने से ऐसी घटनाएं हो जाती हैं। मेरा मानना है कि भारत को अब बिना कोई देर किए राजनीतिक हस्तक्षेप करना चाहिए।

(मेजर जनरल (रिटायर) अशोक मेहता)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : इस आलेख (ब्लाग) में व्यक्त किए गए विचार लेखकों के निजी विचार हैं। इसमें सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। इसमें दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार हमारे नहीं है।

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