वित्त वर्ष में जीडीपी माइनस 11 रहने की आशंका

वित्त वर्ष 2020-21 में माइनस 11 पर्सेंट होगी जीडीपी, तिमाही नतीजों में हाहाकार के बाद एसबीआई ने जताई आशंका
पिछले वित्त वर्ष में जनवरी-मार्च की जीडीपी ग्रोथ 3.1 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वर्ष इसी तिमाही में यह 5.2 प्रतिशत रही। रिसर्च रिपोर्ट की माने तो वित्त वर्ष 2020-21 की चारों तिमाही में वास्तविक जीडीपी ग्रोथ निगेटिव रहेगी और -10.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
एसबीआई ने जताई जीडीपी के माइनस 11 पर्सेंट तक रहने की आशंका
मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी दर में 23.9 पर्सेंट की भारी गिरावट के बाद एसबीआई ने पूरे साल के अपने अनुमान में और कटौती कर दी है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की रिसर्च रिपोर्ट Ecowrap के मुताबिक बैंक ने इस वित्त वर्ष जीडीपी में -6.8 प्रतिशत की गिरावट की आशंका जताई थी, लेकिन अप्रैल से जून की पहली तिमाही की जीडीपी गिरावट उसके अनुमान से कहीं ज्यादा है। अब बैंक ने मौजूदा वित्त वर्ष में जीडीपी में 10.9 पर्सेंट की गिरावट की आशंका जताई है। सरकार ने कुछ दिन पहले ही अप्रैल-जून की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़े जारी किए थे, जिसके अनुसार जीडीपी रिकार्ड 23.9 प्रतिशत नीचे आ गई। जीडीपी में भारी गिरावट का कारण कोरोनावायरस को रोकने के लिए 25 मार्च को लगाया गया लॉकडॉउन माना जा रहा है, जिसकी वजह से सभी आर्थिक गतिविधियां बंद हो गई थी।
इससे पहले पिछले वित्त वर्ष में जनवरी-मार्च की जीडीपी ग्रोथ 3.1 प्रतिशत रही, जबकि पिछले वर्ष इसी तिमाही में यह 5.2 प्रतिशत रही। रिसर्च रिपोर्ट की मानें तो वित्त वर्ष 2020-21 की चारों तिमाही में वास्तविक जीडीपी ग्रोथ निगेटिव रहेगी और -10.9 प्रतिशत रहने का अनुमान है। रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक दूसरी तिमाही में जीडीपी के -12 प्रतिशत से -15 प्रतिशत रहने का अनुमान है। तीसरी तिमाही में जीडीपी के -5 से -10 प्रतिशत और चौथी तिमाही में जीडीपी का -2 से -5 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है। जैसा कि उम्मीद थी प्राइवेट फाइनल कंजर्वेशन एक्सपेंडिचर (PFCE) की ग्रोथ कोरोना में कंजप्शन में कमी के कारण गिर गई है।
कोरोना से पहले ही पांच साल में 50 फीसदी कम हो गई थी हमारी जीडीपी, 8 से 4.2 पर आ गया था आंकड़
रिपोर्ट की मानें तो कोरोना वायरस महामारी ने लोगों के खर्च करने के तरीकों को प्रभावित किया है, चाहे वो शिक्षा और स्वास्थ्य पर व्यक्तिगत कंजप्शन खर्च ही हो। हालांकि इन आंकड़ों के बीच दो पॉजिटिव चीजें भी देखने को मिल रही है। पहला जुलाई के आरबीआई के सेक्टरवाइज क्रेडिट डाटा के अनुसार जुलाई में इंडस्ट्री के अलावा सभी मुख्य क्षेत्रों में क्रेडिट बढ़ा है। माइक्रो और स्मॉल इंटरप्राइजेज, कृषि और व्यक्तिगत लोन लोन क्रेडिट में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। दूसरा, पहली तिमाही में रोडवेज, बेसिक केमिकल, बिजली, अस्पताल और सीवेज पानी की पाइपलाइन क्षेत्रों में नए प्रोजेक्ट की घोषणा की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक कंस्ट्रक्शन व्यापार होटल और एविएशन सेक्टर को दोबारा से रिवाइव करने की जरूरत है।

आपकी और मेरी जेब से चलती है देश की जीडीपी; इसमें गिरावट से भी हमारी जेब का है गहरा संबंध

पहली बार भारत की जीडीपी में किसी तिमाही में 24% की गिरावट
जीडीपी दर में इस गिरावट का असर साल भर रहने का पूर्वानुमान
केंद्र सरकार के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने सोमवार को जीडीपी के आंकड़े जारी कर सबको चौंका दिया। सबको अंदाजा था कि जीडीपी दर गिरने वाली है। पिछले पांच महीने कोरोना के लॉकडाउन का असर था ही। लेकिन, गिरावट अंदाजे से बढ़कर निकली।

अर्थशास्त्री सोच रहे थे कि गिरावट 20% के आसपास रहेगी, लेकिन वह 23.9% यानी करीब 24% रही। इसके बाद भी ज्यादातर लोग अब भी सोच रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था में आई गिरावट से उनकी जेब पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उनकी जिंदगी जैसी थी, वैसी ही रहेगी। जबकि सच यह नहीं है। आइए, बताते हैं यह कैसे आप पर असर डालने वाली है?

सबसे पहले, क्या है नए आंकड़े?

कोरोनावायरस के चलते इस वित्त वर्ष के शुरुआती तीन महीने (अप्रैल-जून) लॉकडाउन में रहे। इसका असर यह हुआ कि गुड्स और सर्विसेस के कुल उत्पादन में भी गिरावट आई, जिसे हम जीडीपी कहते हैं। दरअसल, यह ही बताता है कि देश तरक्की कर रहा है या संकट में है।
नए आंकड़ों के मुताबिक, पिछले साल अप्रैल-जून पीरियड की तुलना में इस साल खेती-किसानी को छोड़कर बाकी सभी सेक्टरों में गिरावट दर्ज हुई। यह गिरावट 24% के करीब रही है। यानी अब तक हर साल पिछले साल के मुकाबले जीडीपी बढ़ती थी, इस बार घट गई है।
जीडीपी में 8 सेक्टर महत्वपूर्ण हैं। इनमें कृषि सेक्टर की ग्रोथ रेट 3.4 प्रतिशत रही है। इसके अलावा बाकी सभी सेक्टर-माइनिंग सेक्टर (-23.3%), मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (-39.3%), कंस्ट्रक्शन सेक्टर (-50.2%) की गिरावट आई है।

अब जानिए इस गिरावट का क्या असर होगा?

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि वित्त वर्ष की पहली तिमाही में गिरावट को देखकर कह सकते हैं कि इसका असर पूरे साल रहने वाला है। यानी इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था में 7 प्रतिशत तक गिरावट हो सकती है। इससे रोजगार के अवसरों में गिरावट की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
1990 के दशक में जब भारत ने अपना बाजार दुनियाभर के लिए खोला, तब से हमने औसत 7 प्रतिशत की दर से तरक्की की है। अब, इस बार इतनी ही गिरावट होने वाली है। मैन्युफैक्चरिंग, माइनिंग, कंस्ट्रक्शन जैसे जिन सेक्टरों में गिरावट हुई है, वह सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाले सेक्टर है।
प्रत्येक सेक्टर में गिरावट को देखते हुए कहा जा सकता है कि उस क्षेत्र से जुड़े लोगों का उत्पादन और कमाई घट रही है। इसका मतलब यह है कि ज्यादा से ज्यादा लोग अपनी नौकरी गंवा चुके हैं या गंवाने वाले हैं। साथ ही नई नौकरियों को हासिल करने में भी दिक्कत हो सकती है।
जीडीपी की घट-बढ़ के लिए क्या जिम्मेदार है?
जीडीपी को बढ़ाने या घटाने के चार महत्वपूर्ण इंजन होते हैं। पहला है, आप और हम। आप जितना खर्च करते हैं, वह हमारी अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा योगदान देता है। पिछले साल यानी 2019-20 की पहली तिमाही की जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी लगभग 56% है।
दूसरा ग्रोथ इंजन होता है प्राइवेट सेक्टर की बिजनेस ग्रोथ। यह जीडीपी में 32% योगदान देती है।
इसी तरह सरकारी खर्च (11%) इसका तीसरा ग्रोथ इंजन है। सरकारी खर्च से मतलब यह है कि सरकार का गुड्स और सर्विसेस प्रोड्यूस करने में क्या योगदान है।
जीडीपी का चौथा और महत्वपूर्ण इंजन है- नोट डिमांड का। इसके लिए भारत के कुल एक्सपोर्ट को कुल इम्पोर्ट से घटाया जाता है। भारत के केस में एक्सपोर्ट के मुकाबले इम्पोर्ट ज्यादा है, इस वजह से इसका इम्पैक्ट जीडीपी पर निगेटिव ही रहा है।
जीडीपी में गिरावट की वजह क्या है?

ग्रोथ इंजन में गिरावट ही मुख्य वजह है। आइए बताते हैं- किस तरह। हमारी-आपकी खपत यानी प्राइवेट कंजम्प्शन 27 प्रतिशत तक घटा है। इसी तरह बिजनेस इन्वेस्टमेंट में 50 प्रतिशत तक गिरावट आई है। ऐसे में जीडीपी में 88% योगदान रखने वाले दो इंजन रुक गए हैं।
पहली तिमाही में एक्सपोर्ट ज्यादा हुआ और इम्पोर्ट कम। जाहिर है, पेट्रोल-डीजल की खपत कम होने का असर है। वहीं, सरकारी खर्च 16% तक बढ़ा है। लेकिन, यह बाकी सेक्टर से हुए नुकसान की महज 6% भरपाई कर पाया है। जाहिर है, इससे ग्रोथ का इंजन गति नहीं पकड़ सका।
…तो सरकार खर्च क्यों नहीं बढ़ा रही?

सीधा-सा लॉजिक यह है कि जब आय कम होती है, लोग खपत कम कर देते हैं। जब खपत कम होती है, बिजनेस इन्वेस्ट करना बंद कर देते हैं। यह दोनों ही फैसले स्वैच्छिक है। लोगों या बिजनेस पर आप खर्च बढ़ाने के लिए जबरदस्ती नहीं कर सकते। इसके लिए माहौल बनाना होगा।
ऐसे में जीडीपी को बूस्ट देने के लिए सरकारी खर्च की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि सरकार सड़कों, भवनों, सेलरी चुकाने या डायरेक्ट अकाउंट में पैसा डालकर खर्च बढ़ाएगी तो कम अवधि में जीडीपी में सुधार हो सकता है। यदि खर्च नहीं बढ़ा तो रिकवरी में लंबा वक्त लगेगा।
कोरोनावायरस संकट से पहले से ही सरकारी खर्च पर बहुत ज्यादा दबाव रहा है। अन्य शब्दों में उस पर सिर्फ कर्ज का दबाव नहीं है बल्कि उसे जितना कर्ज लेना चाहिए था, उससे ज्यादा वह ले चुकी है। ऐसे में सरकार के पास खर्च बढ़ाने के लिए ज्यादा पैसा नहीं बचा है।
रिकवरी का रास्ता आखिर क्या है?

यह तो साफ है कि मैन्युफैक्चरिंग से लेकर माइनिंग, कंस्ट्रक्शन से लेकर रियल एस्टेट, हॉस्पिटेलिटी से लेकर ट्रेड तक लॉकडाउन ने किसी को भी नहीं छोड़ा है। सब जमींदोज हो गए हैं। अब सवाल यह उठता है कि यह असर कब तक रहेगा?
सब उम्मीद लगाकर बैठे थे कि यह गिरावट वी आकार में होगी। यानी जिस रफ्तार से गिरावट होगी, उसी रफ्तार से रिकवरी भी होगी। लेकिन, इसके लिए सरकार को प्रोत्साहन उपाय करने होंगे, जिससे डिमांड बढ़ सके और लोगों का भरोसा लौट सके।
इसके लिए लोगों की आय और उत्पादन बढ़ना जरूरी है। डिमांड बढ़ने पर ही लोग अपनी क्षमता के अनुसार खर्च करने लगेंगे। लेकिन, अब लग रहा है कि रिकवरी वी शेप की नहीं है। भारत में 1979 के बाद से जीडीपी ग्रोथ में गिरावट नहीं आई है।
एक्सपर्ट्स की माने तो रिकवरी तभी आएगी, जब हम और आप खर्च करने लगेंगे। इससे ही मार्केट में नया निवेश आएगा और बिजनेस निवेश बढ़ाएंगे। निश्चित तौर पर यह भारत में कंजम्प्शन साइकिल को मजबूती देगा और काम के नए अवसर बढ़ेंगे।

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