संथाल विद्रोह हुआ था आज के दिन 1855 में

६०० पहाड़ियों का दल ४०वें रेजिमेण्ट के ५० सिपाहियों पर आक्रमण करता हुआ।
वर्ष १८५५ में बंगाल के मुर्शिदाबाद तथा बिहार के भागलपुर जिलों में स्थानीय जमीनदार,महाजन और अंग्रेज कर्मचारियों के अन्याय अत्याचार के शिकार पहाड़िया जनता ने एकबद्ध विद्रोह का बिगुल फूँक दिया था। इसे पहाड़िया विद्रोह या पहाड़िया जगड़ा कहते हैं। पहाड़िया भाषा में’जगड़ा शब्द का शाब्दिक अर्थ है-‘विद्रोह’। यह अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम सशस्त्र जनसंग्राम था। जावरा पहाड़िया उर्फ तिलका मांझी,भाइयों ने शाम टुडू (परगना) के मार्गदर्शन में नेतृत्व किया था। 1793 में लॉर्ड कार्नवालिस के आरम्भ स्थाई बन्दोबस्त से जनता पर अत्याचार इस विद्रोह का एक प्रमुख कारण था। सन १८५५ में अंग्रेज कैप्टन अलेक्ज़ेंडर ने विद्रोह का दमन कर दिया।
अभेद्य पहाड़ियां
19वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में,बुकानन ने राजमहल पहाड़ियों का दौरा किया था। उसके अनुसार ये पहाड़ियाँ अभेद्य लगती थीं। यह ऐसा खतरनाक इलाका था जहाँ बहुत कम यात्री जाने की हिम्मत करते थे। बुकानन जहाँ कहीं गया,उसने निवासियों का व्यवहार शत्रुतापूर्ण पाया। वे लोग कंपनी के अधिकारियों के प्रति आशंकित थे और बातचीत को तैयार नहीं थे। कई उदाहरणों में तो वे अपने घर-बार और गाँव छोड़कर भाग गए । बुकानन की पत्रिका में हमें उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में पहाड़िया लोगों की दयनीय हालत थी उसकी झलक मिलती है। उन स्थानों के बारे में उसने डायरी लिखी थी,जहाँ-जहाँ उसने भ्रमण किया था,लोगों से मुलाकात कर रीति-रिवाज देखे थे।

पहाड़ी वासी
18वीं शताब्दी के परवर्ती दशकों के राजस्व अभिलेखों से पता लगता है कि पहाड़ी लोगों को ‘पहाड़िया’क्यों कहा जाता था। वे राजमहल की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द रहा करते थे। वे जंगल की उपज से अपनी गुजर-बसर करते थे और झूम खेती किया करते थे। वे जंगल के छोटे-से हिस्से में झाड़ियां काट और घास-फ़ूँस को जला जमीन साफ कर लेते थे और राख की पोटाश से उपजाऊ बनी जमीन पर ये पहाड़िया अपने खाने को तरह-तरह की दालें और ज्वार-बाजरा उगा लेते थे। वे कुदाल से जमीन को थोड़ा खुरच कुछ वर्षो तक उस साफ की जमीन में खेती करते थे । फ़िर उसे कुछ वर्षो को परती छोड़ कर नए इला्के में चले जाते थे जिससे उस जमीन में खोई हुई उर्वरता फ़िर से उत्पन्न हो जाती थी।

उन जंगलों से पहाड़िया लोग खाने को महुआ के फ़ूल इकट्ठा करते थे,बेचने को रेशम के कोया और राल और काठकोयला बनाने को लकड़ियाँ इकट्ठा करते थे। पेड़ों के नीचे जो छोटे-छोटे पौधो उग आते थे या परती जमीन पर जो घास-फ़ूस की हरी चादर-सी बिछ जाती थी वह पशुओं के लिए चरागाह बन जाती थी। शिकारियों,झूम खेती,खाद्य बटोरने,काठकोयला ,रेशम के कीड़े पालने वालों के रूप में पहाड़िया लोगों की ज़िंदगी इस प्रकार जंगल से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई थी। वे इमली के पेड़ों के बीच बनी अपनी झोपड़ियों में रहते थे और आम के पेड़ों की छाँह में आराम करते थे। वे पूरे प्रदेश को अपनी निजी भूमि मानते थे और यह भूमि उनकी पहचान और जीवन का आधार थी। वे बाहरी प्रवेश का प्रतिरोध करते थे। मुखिया समूह में एकता बनाए रखते थे,आपसी लड़ाई-झगड़े निपटा देते थे और अन्य जनजातियों तथा मैदानी लोगों से लड़ाई छिड़ने पर अपनी जनजाति का नेतृत्व करते थे।

संथाल
इन पहाड़ियों को अपना मूलाधार बनाकर,पहाड़िया लोग बराबर उन मैदानों पर आक्रमण करते रहते थे जहाँ किसान एक स्थान पर बस कर अपनी खेती-बाड़ी किया करते थे। पहाड़ियों के ये आक्रमण ज्यादातर अपने आपको विशेष रूप से अभाव या अकाल के वर्षों में जीवित रखने को किए जाते थे। साथ ही,ये हमले मैदानों में बसे समुदायों पर अपनी ताकत दिखलाने का भी एक तरीका था। इसके अलावा,ऐसे आक्रमण बाहरी लोगों से अपने राजनीतिक संबंधो बनाने को भी किए जाते थे। मैदानों में रहने वाले जमींदारों को इन पहाड़ी मुखियाओं को नियमित भेंट दे उनसे शांति खरीदनी पड़ती थी। इसी प्रकार,व्यापारी भी पहाड़ियों से नियंत्रित रास्तों का इस्तेमाल करने की अनुमति हेतु उन्हें कुछ पथकर दिया करते थे। पथकर पहाड़िया मुखियाओं को मिलने पर वे व्यापारियों की रक्षा कर यह भी आश्वासन देते थे कि कोई भी उनका माल नहीं लूटेगा। इस प्रकार कुछ ले-देकर की गई शांति संधि लंबे समय तक नहीं चली। यह 18वीं शताब्दी के अंतिम दशकों में उस समय भंग हो गई जब स्थिर खेती की सीमाएँ आक्रामक रीति से पूर्वी भारत में बढ़ाई जाने लगीं।
अंग्रेजों ने जंगलों की कटाई-सफ़ाई को प्रोत्साहित किया और जमींदारों तथा जोतदारों ने परती भूमि धान के खेतों में बदल दी। अंग्रेजों के लिए स्थायी कॄषि विस्तार आवश्यक था क्योंकि उससे राजस्व के स्रोंतों में वृद्धि होती थी,निर्यात को फ़सल पैदा हो सकती थी और एक स्थायी,सुव्यवस्थित समाज की स्थापना हो सकती थी। वे जंगलों को उजाड़ मान वनवासियों को असभ्य,बर्बर,उपद्रवी और क्रूर समझते थे जिन पर शासन करना कठिन था। इसलिए उन्होंने यही महसूस किया कि जंगलों का सफ़ाया कर वहाँ स्थायी कॄषि स्थापित करनी होगी और जंगली लोगों को पालतू व’सभ्य’ बना उनसे शिकार का काम छुड़वा उन्हे खेती का धंधा अपनाने को राजी करना होगा। ज्यों-ज्यों स्थायी कॄषि का विस्तार होता गया,जंगलों तथा चरागाह क्षेत्र संकुचित होता गया। इससे पहाड़ी तथा स्थायी खेतीहरों में झगड़ा तेज हो गया। पहाड़ी पहले से अधिक नियमित रूप से बसे हुए गाँवों पर हमले बोलने लगे और ग्रामवासियों से अनाज और पशु छीन-झपट ले जाने लगे। औपनिवेशिक अधिकारियों ने उत्तेजित हो इन पहाड़ियों पर काबू की भरसक कोशिशें कीं परंतु यह आसान नहीं था।

क्रूर नीतियाँ
1770 के दशक में ब्रिटिश अधिकारियों ने इन पहाड़ियों को निर्मूल कर देने की क्रूर नीति अपना ली और उनका शिकार और संहार करने लगे। तदोपरांत,1780 के दशक में भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड ने शांति स्थापना की नीति प्रस्तावित की जिसके अनुसार पहाड़िया मुखियाओं को एक वार्षिक भत्ता दिया जाना था और बदले में उन्हें अपने आदमियों का चाल-चलन ठीक रखने की जिम्मेदारी लेनी थी। उनसे यह भी आशा की गई थी कि वे अपनी बस्तियों में व्यवस्था बनाए रखेंगे और अपने लोगों को अनुशासन में रखेंगे। लेकिन बहुत से पहाड़िया मुखियाओं ने भत्ता लेने से मना कर दिया। जिन्होंने इसे स्वीकार किया उनमें से अधिकांश अपने समुदाय में अपनी सत्ता खो बैठे। औपनिवेशिक सरकार के वेतनभोगी बन जाने से उन्हें अधीनस्थ कर्मचारी या वैतनिक मुखिया माना जाने लगा।
जब शांति स्थापना को अभियान चल रहे थे तभी पहाड़िया लोग खुद को शत्रु सैन्यबलों से बचाने और बाहरियों से लड़ाई चालू रखने को पहाड़ों के भीतरी भागों में चले गए। इसलिए जब 1810-11 की सर्दियों में बुकानन ने इस क्षेत्र की यात्रा की थी तो यह स्वाभाविक ही था कि पहाड़िया लोग बुकानन को संदेह और अविश्वास से देखते। शांति स्थापना अभियानों के अनुभव और क्रूरतापूर्ण दमन की यादों से उनके मन में यह धारणा बन गई थी कि उनके इलाको ब्रिटिश लोगो की घुसपैठ का क्या असर होने वाला है, उन्हे प्रतीत होता था कि प्रत्येक गोरा एक ऐसी शक्ति का प्रतिनिधित्व कर रहा है जो उनसे उनके जंगल और जमीन छीन कर उनकी जीवन शैली और जीवित रहने के साधनों को नष्ट करने पर उतारू हैं। वस्तुत: इन्हीं दिनों उन्हें एक नए खतरे की सूचनाएँ मिलने लगी थीं और वह था संथाल लोगों का आगमन।

संथाल लोग वहाँ के जंगलों का सफ़ाया करते हुए,इमारती लकड़ी को काटते हुए,जमीन जोतते हुए और चावल तथा कपास उगाते हुए उस इलाको में बड़ी संख्या में घुसे चले आ रहे थे। चूँकि संथाल बाशिंदों ने निचली पहाड़ियों पर अपना कब्जा जमा लिया था,इसलिए पहाड़ियों को राजमहल की पहाड़ियों में और भीतर की ओर पीछे हटना पड़ा। पहाड़िया लोग अपनी झूम खेती को कुदाल का प्रयोग करते थे इसलिए कुदाल को पहाड़िया जीवन का प्रतीक माना जाए तो हल को नए बाशिंदों;संथालों की शक्ति का प्रतिनिधि मानना होगा। हल और कुदाल के बीच की यह लड़ाई बहुत लंबी चली।

संथाल अगुआ – बुकानन
सन्‌ 1810 के अंत में, बुकानन ने गंजुरिया पहाड़, जो कि राजमहल श्रंखलाओं का एक भाग था, को पार किया और आगे के चट्‌टानी प्रदेश के बीच से निकलकर वह एक गाँव में पहुँच गया। वैसे तो यह एक पुराना गाँव था पर उसके आस-पास की जमीन खेती करने के लिए अभी-अभी साफ की गई थी। वहां के भूदॄश्य का देख उसे पता चला कि‘मानव श्रम के समुचित प्रयोग से’उस क्षेत्र की तो काया ही पलट गई है। उसने लिखा,गंजुरिया में अभी-अभी काफ़ी जुताई की गई है जिससे यह पता चलता है कि इसे कितने शानदार इला्के में बदला जा सकता है मैं सोचता हूँ,इसकी सुंदरता और समृद्ध विश्व के किसी भी क्षेत्र जैसी विकसित की जा सकती है। यहाँ की जमीन अलबत्ता चट्‌टानी है लेकिन बहुत ही ज्यादा बढ़िया है और बुकानन ने उतनी बढ़िया तंबाकू और सरसों और कहीं नहीं देखीं। पूछने पर पता चला कि वहाँ संथालों ने कॄषि क्षेत्र की सीमाएँ काफ़ी बढ़ा ली थी। वे इस इलाके में 1800 के आस-पास आए थे। उन्होंने वहाँ रहने वाले पहाड़ी लोगों को नीचे के ढालों पर भगा दिया,जंगलों का सफाया किया आरै फ़िर वहाँ बस गए।

संथाल- राजमहल की पहाड़ियों में
संथाल 1780 के दशक के आस-पास बंगाल में आने लगे थे। जमींदार लोग खेती के लिए नयी भूमि तैयार करने और खेती का विस्तार करने के लिए उन्हें भाड़े पर रखते थे और ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें जंगल महालों में बसने का निमंत्रण दिया। जब ब्रिटिश लोग पहाड़ियों को अपने बस में करके स्थायी कॄषि के लिए एक स्थान पर बसाने में असफल रहे तो उनका ध्यान संथालों की ओर गया। पहाड़िया लोग जंगल काटने के लिए हल को हाथ लगाने को तैयार नहीं थे और अब भी उपद्रवी व्यवहार करते थे। जबकि,इसके विपरीत, संथाल आदर्श बाशिंदे प्रतीत हुए,क्योंकि उन्हें जंगलों का सफ़ाया करने में कोई हिचक नहीं थी और वे भूमि को पूरी ताकत लगाकर जोतते थे।
संथालों को जमीनें देकर राजमहल की तलहटी में बसने के लिए तैयार कर लिया गया। 1832 तक, जमीन के एक काफ़ी बड़े इलाको को दामिन-इ-कोह के रूप में सीमांकित कर दिया गया। इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया गया। उन्हें इस इलाके के भीतर रहना था, हल चलाकर खेती करनी थी और स्थायी किसान बनना था। संथालों को दी जाने वाली भूमि के अनुदान-पत्र में यह शर्त थी कि उनको दी गई भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को साफ़ करके पहले दस वर्षों के भीतर जोतना था। इस पूरे क्षेत्र का सर्वेक्षण करके उसका नक्शा तैयार किया गया। इसके चारों ओर खंबे गाड़कर इसकी परिसीमा निर्धारित कर दी गई और इसे मैदानी इलाके के स्थायी कॄषकों की दुनिया से और पहाड़िया लोगों की पहाड़ियों से अलग कर दिया गया।
दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद, संथालों की बस्तियाँ बड़ी तेजी से बढ़ीं,संथालों के गाँवों की संख्या जो 1838 में 40 थी, तेजी से बढ़कर 1851 तक 1,473 तक पहुँच गई। इसी अवध में, संथालों की जनसंख्या जो केवल 3,000 थी,बढ़कर 82,000 से भी अधिक हो गई। जैसे-जैसे खेती का विस्तार होता गया,वैसे-वैसे कंपनी की तिजोरियों में राजस्व राशि में वृद्धि होती गई। उन्नीसवीं शताब्दी के संथाल गीतों और मिथकों में उनकी यात्रा के लंबे इतिहास का बार-बार उल्लेख किया गया है:उनमें कहा गया है कि संथाल लोग अपने लिए बसने योग्य स्थान की खोज में बराबर बिना थके चलते ही रहते थे। अब यहाँ दामिन-इ-कोह में आकर उनकी इस यात्रा को पूर्ण विराम लग गया।
जब संथाल राजमहल की पहाड़ियों पर बसे तो पहले पहाड़िया ने इसका प्रतिरो्ध किया पर अंततोगत्वा वे इन पहाड़ियों में भीतर की ओर चले जाने को मजबूर कर दिए गए। उन्हें निचली पहाड़ियों तथा घाटियों में नीचे की ओर आने से रोक दिया गया और ई…परी पहाड़ियों के चट्टानी और अधिक बंजर इलाकों तथा भीतरी शुष्क भागों तक सीमित कर दिया गया। इससे उनके रहन-सहन तथा जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ा और आगे चलकर वे गरीब हो गए। झूम खेती नयी-से-नयी जमीनें खोजने और भूमि की प्राकॄतिक उर्वरता का उपयोग करने की क्षमता पर निर्भर रहती है। अब सर्वाधिक उर्वर जमीनें उनके लिए दुर्लभ हो गईं क्योंकि वे अब दामिन का हिस्सा बन चुकी थीं। इसलिए पहाड़िया लोग खेती के अपने तरीके ;झूम खेती को आगे सफलतापूर्वक नहीं चला सके।
जब इस क्षेत्र के जंगल खेती के लिए साफ़ कर दिए गए तो पहाड़िया शिकारियों को भी समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसके विपरीत संथाल लोगों ने अपनी पहले वाली खानबदोश ज़िंदगी को छोड़ दिया था। अब वे एक जगह बस गए थे और बाजार के लिए कई तरह के वाणिज्यिक फ़सलों की खेती करने लगे थे और व्यापारियों तथा साहूकारों के साथ लेन-देन करने लगे थे। किंतु, संथालों ने भी जल्दी ही यह समझ लिया कि उन्होंने जिस भूमि पर खेती करनी शुरू की थी वह उनके हाथों से निकलती जा रही है। संथालों ने जिस जमीन को साफ़ करके खेती शुरू की थी उस पर सरकार ;राज्य भारी कर लगा रही थी,साहूकार;दिकू लोग बहुत ऊंचा ब्याज लगा रहे थे और कर्ज अदा न होने पर जमीन पर कब्जा कर जमींदार दामिन इलाके पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे। 1850 के दशक तक,संथाल लोग महसूस करने लगे थे कि अपने लिए एक आदर्श संसार का निर्माण करने को,जहाँ उनका अपना शासन हो,जमींदारों,साहूकारों और औपनिवेशिक राज के विरुद्ध विद्रोह का समय आ गया है।

संथाल परगना
1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद संथाल परगने का निर्माण कर दिया गया,जिसके लिए 5,500 वर्गमील का क्षेत्र भागलपुर और बीरभूम जिलों से लिया गया। औपनिवेशिक राज को आशा थी कि संथालों के लिए नया परगना बना उसमें कुछ विशेष कानून लागू करने से संथाल संतुष्ट हो जाएँगे।

बुकानन का विवरण
वह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एक कर्मचारी था। उसकी यात्राएँ केवल भूदृश्यों के प्यार और अज्ञात की खोज से ही प्रेरित नहीं थीं। वह नक्शा नवीसों, सर्वेक्षकों, पालकी उठाने वालों कुलियों आदि के बड़े दल के साथ सर्वत्र यात्रा करता था। उसकी यात्राओं का खर्च ईस्ट इंडिया कंपनी उठाती थी क्योंकि उसे उन सूचनाओं की आवश्यकता थी जो बुकानन प्रत्याशित रूप से इकट्‌ठी करता था। बुकानन को यह साफ़-साफ़ हिदायत दी जाती थी कि उसे क्या देखना, खोजना और लिखना है। वह जब भी अपने लोगों की फ़ौज के साथ किसी गाँव में आता तो उसे तत्काल सरकार के एक एजेंट के रूप में ही देखा जाता था।
जब कंपनी ने अपनी शक्ति को सुदृढ़ बना लिया और अपने व्यवसाय का विकास कर लिया तो वह उन प्राकॄतिक साधनों की खोज में जुट गई जिन पर कब्जा करके उनका मनचाहा उपयोग कर सकती थी। उसने परिदृश्यों तथा राजस्व स्रोंतों का सर्वेक्षण किया, खोज यात्राएँ आयोजित कीं और जानकारी इकट्‌ठी करने के लिए अपने भूविज्ञानियों, भूगोलवेत्ताओं, वनस्पति विज्ञानियों और चिकित्सकों को भेजा। निस्संदेह असाधारण प्रेक्षण शक्ति का बुकानन ऐसा ही एक व्यक्ति था। बुकानन जहाँ कहीं भी गया,वहाँ उसने पत्थरों तथा चट्‌टानों और वहाँ की भूमि के भिन्न-भिन्न स्तरों तथा परतों को ध्यानपूर्वक देखा। उसने वाणिज्यिक मूल्यवान पत्थरों तथा खनिज खोजने की कोशिश की. उसने लौह खनिज और अबरक,ग्रेनाइट तथा साल्टपीटर से संबंधित स्थानों का पता लगाया। उसने सावधानीपूर्वक नमक बनाने और कच्चा लोहा निकालने की स्थानीय पद्धतियों का निरीक्षण किया।
जब बुकानन किसी भूदृश्य के बारे में लिखता था तो वह अकसर इतना ही नहीं लिखता था कि उसने क्या देखा है और भूदृश्य कैसा था, बल्कि यह भी लिखता था कि उसमें फ़ेरबदल कर उसे अधिक उत्पादक कैसे बनाया जा सकता है। कौन-सी फ़सलें बोई जा सकती हैं,कौन-से पेड़ काटे जा सकते हैं और कौन-से उगाए जा सकते हैं। यह भी याद रखें कि उसकी सूक्ष्म दृष्टि और प्राथमिकताएँ स्थानीय निवासियों से भिन्न होती थीं: क्या आवश्यक है इस बारे में उसका आकलन कंपनी के वाणिज्यिक सरोकारों और प्रगति के संबंध में आधुनिक पाश्चात्य विचारधारा से निर्धारित था। वह अनिवार्य रूप से वनवासियों की जीवन-शैली का आलोचक था और यह महसूस करता था कि वनों को कॄषि भूमि में बदलना ही होगा।

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