बंगाल की पहली क्रांतिकारी थी ननिबाला देवी,झेले अमानुषिक जुल्म

9🌹🌹🙏एक क्रांतिकारी नारी🙏🌹🌹

🌹🌹🙏🙏ननीबला देवी🙏🙏🌹🌹
🌹🌹🙏🙏52वीं पुण्यतथि🙏🙏🌹🌹

*वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् ! वंदेमातरम् !*
जन्म: *00.00.1888* पुण्यतिथि: *00.00.1967*

निशब्द: *ननिबाला देवी जी*🌹🌹🙏🙏🌹🌹

✍️ आज अगर कोई व्यक्ति क्रांतिकारियों की पूजा करता है, तो मैं अपने 20 – 22 वर्ष के अनुभव व शाैध के आधार पर कह सकता हूँ कि वह 100% सही कर रहा है, क्योंकि कम उम्र में सब कुछ लुटाकर, कम शिक्षित होते हुए भी, अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए लिए, आने वाली नई पीढ़ी के लिए अकथनीय अत्याचार सहते हुए, देश की आज़ादी के लिए मर मिटने वालों को यही सम्मान मिलना चाहिए। साथियों 05 मिनट समय निकालकर पढ़ लीजिए कि इस महिला क्रांतिकारी ने क्या सहा, क्या दिया हमें और हमने इन्हे क्या दिया ? दुर्भाग्य की बात की हम इन्हें जानते तक नहीं। इसके लिए किसे दोषी ठहराएं ? राष्ट्रभक्त साथियों पश्चिम बंगाल की प्रथम क्रांतिकारी मानी जाने वाली महान महिला क्रांतिकारी ननिबाला देवी जी का जन्म बाली, हावड़ा के एक ब्राह्मण सूर्य कांत बैनर्जी के परिवार में सन् 1888 में हुआ था। ननिबाला जी की साधारण शिक्षा घर में हुई और 11 वर्ष की उम्र में उनका विवाह कर दिया गया। किंतु विवाह के मात्र 05 वर्ष के बाद 16 वर्ष की आयु में ही वे विधवा हो गईं। अब उन्होंने अपना ध्यान अध्ययन की ओर लगाया और ईसाई मिशन के स्कूल में अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त की। परंतु विचार-संबंधी मतभेदों के कारण उन्हें मिशन छोड़ना पड़ा। इसी बीच ननिबाला जी के दूर के भतीजे और क्रांतिकारी संगठन युगांतर के प्रमुख नेता अमरेन्द्र नाथ चटर्जी ने इन्हे अपने क्रांतिकारी संगठन से जोड़ लिया। अब ननिबाला भूमिगत रहकर कलकत्ता, चन्द्रनगर व चटगांव आदि नगरों में क्रांतिकारियों को भोजन, आश्रय देने लगीं तथा उनके अस्त्र-शस्त्र रखने एवं दूसरे स्थानों तक पहुंचने लगीं। साथियों ननिबाला कई बार क्रांतिकारियों को सुरक्षित रखने व पुलिस को चकमा देने के लिए किसी क्रांतिकारी की पत्नी का रूप भी धारण करने लगीं। ननिबाला ने एक बार बाघा जतिन को भी आश्रय दिया था। सन् 1915 में तो भूमिगत रहते हुए अमरेन्द्र नाथ चटर्जी को रिष्रा, हावड़ा में दो महीने तक आश्रय दिया। ननिबाला ने एक बार ऐसा साहसिक काम किया जो उन दिनों किसी हिन्दू विधवा के लिए अकल्पनीय था। दरअसल रामचंद्र मजूमदार नाम के एक क्रांतिकारी जेल में बंद थे और गिरफ्तारी से पहले वे अपना रिवाल्वर कहां छिपा गए इसका पता उनके साथियों को नहीं था। ननिबाला ने स्वयं को रामचंद्र मजूमदार की पत्नी बताया, जेल में उनसे भेंट की और रिवाल्वर का पता लगा लिया। परंतु पुलिस को बाद में उनकी गतिविधियों की भनक लग गई और वे उन्हें खोजने लगी। सन् 1917 में वो कोलकाता छोड़कर लाहौर चली आईं। वहां उन्हें हैजा हो गया और तभी पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। क्रांतिकारियों के संबंध में जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से उनके साथ बड़ा ही क्रूर और अमानवीय बर्ताव किया गया। यहां तक कि उनके विभिन्न मार्मिक अंगों (गुप्तांगों में भी) में पिसी हुई मिर्च तक भरी गई। दर्द से कराहती हुई ननिबाला ने महिला पुलिस को जोरदार ठोकर मारी और बेहोश हो गईं। बाद में उन्हें कोलकाता के प्रेसिडेंसी जेल में रखा गया। ननिबाला देवी कलकत्ता जेल में सज़ा काटने वाली प्रथम महिला कैदी तथा सन् 1818 के रेगुलेशन एक्ट III में कलकत्ता जेल (प्रेसीडेंसी) में सज़ा काटने वाली प्रथम क्रांतिकारी थीं। यहां की व्यवस्था के विरोध में उन्होंने 21 दिनों की भूख हड़ताल भी की थी। भूख हड़ताल के दौरान, जब गोल्डी नाम के पुलिस सुपरिडेंट ने उनके लिखित मांग पत्र उनके सामने ही फाड़ कर फेंक दिया तो ननिबाला ने यहां भी पूरी ताकत से एक घूंसा उसके मुंह पर जमा दिया। इस जेल में वो लगभग 02 वर्ष रहीं। सन् 1919 की आम रिहाई में वे गंभीर रूप से तपेदिक (TB) से ग्रस्त हो जेल से बाहर आईं पर घर वालों ने उन्हें शरण देने से मना कर दिया, तब ननिबाला कलकत्ता की एक झुग्गी में बुरे हालत में रहने के मजबूर हुईं। उस दौरान उन्हें एक साधु ने उनका उपचार किया और अंत में ननिबाला ने भी गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया। स्वतंत्र भारत में 1967 में उनका गुमनामी में ही देहांत हो गया।
✍️ राकेश कुमार
*मातृभूमि सेवा संस्था ☎️ 9891960477*
राष्ट्रीय अध्यक्ष: *यशपाल बंसल ☎️ 8800784848*
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इन्ही को लेकर सुनें जगदीश सोनी जलजला की कविता

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