आपात काल में आज ही लगे थे प्रेस प्रतिबंध,327 पत्रकारों को जेल

विरोध में इंडियन एक्सप्रेस ने संपादकीय छोड़ दिया था खाली
28 जून का इतिहास: 1975 में आज ही के दिन आजाद भारत में पहली बार प्रेस पर लगा प्रतिबंध, MISA के तहत 327 पत्रकारों को जेलों में डाल दिया गया
देश में आपातकाल लगाने और प्रेस पर सेंसरशिप के खिलाफ इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने अपने संपादकीय कॉलम को खाली छोड़ दिया था। (इंडियन एक्सप्रेस आर्काइव)
28 जून के महीने को भारत के राजनीतिक इतिहास में आपातकाल के लिए सदियों तक याद रखा जाएगा। आपातकाल की घोषणा के दो दिन के भीतर ही राजनीतिक विरोधियों और आंदोलनकारियों की गतिविधियों पर तो पहरा बिठा ही दिया गया,साथ ही आजाद भारत में ऐसा पहली ऐसा हुआ,जब सरकार ने प्रेस पर प्रतिबंध लगाये।
आलम यह था कि समाचार पत्रों में छपने वाली खबरों को सेंसर किया जाने लगा और अखबार छापने से पहले सरकार की अनुमति लेने की बंदिश लगा दी गई। आपातकाल के दौरान 3801 समाचार-पत्रों के डिक्लेरेशन जब्त कर लिए गए। 327 पत्रकारों को मीसा में बंद कर दिया गया और 290 अखबारों के विज्ञापन बंद कर दिए गए।
हालात इस कदर बिगड़े कि टाइम और गार्जियन अखबारों के समाचार-प्रतिनिधियों को भारत से जाने को कह दिया गया। रॉयटर सहित अन्य एजेंसियों के टेलेक्स और टेलीफोन काट दिए गए।
आपातकाल का काला अध्याय भारत की जनता के लिए बहुत बड़ा सबक है
आपातकाल लगाने के एक दिन बाद, सभी मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया. विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया और मीडिया पर पूरी तरह से नकेल लगा दी गई थी. क्या हम आज वो दिन देखना चाहेंगे?
आज भी जब कोई 43 साल पहले भारत में लगे आपातकाल को याद करता है तो उसकी रूह कांप उठती है.कुछ ही मिनटों में तत्कालीन केंद्र सरकार ने लगभग भारतीय संविधान का अपहरण ही कर लिया था.नागरिकों के मौलिक अधिकारों सहित सभी संवैधानिक अधिकारों को जबरन हटा दिया गया था.विपक्षी नेता और सिविल सोसाइटी के लोग 25 जून,1975 के उस काले दिन को नहीं भूल सकते जब इंदिरा गांधी ने घोषणा की थी कि राष्ट्रपति ने देश में आपातकाल घोषित कर दिया है.
हो सकता है कि कांग्रेस पार्टी के पास आपातकाल घोषित करने के कई कारण हों.लेकिन ये न तो जरुरी था और न ही इसके लिए कोई वैध कारण थे.सिर्फ इस बात की आशंका पर कि विपक्ष देश में अशांति पैदा कर सकती है आपातकाल लागू करने का कोई आधार नहीं बनता है.बेशक,उस समय सरकार की विफलता को लेकर व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे,लेकिन फिर ये असंतोष और विरोध ही तो एक स्वस्थ लोकतंत्र के आवश्यक तत्व हैं.यह आपातकाल लगाने के लिए आधार नहीं हो सकता है.

26 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा होने के बाद दि हिंदू का पहला पन्ना

राजनीति के जानकारों का मानना है कि अगर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द नहीं किया होता,देश को आपातकाल जैसे काले दिन को नहीं देखना पड़ता.12 जून,1975 को,इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को चुनाव में कदाचार के लिए दोषी मानते हुए उन्हें उस श्रेणी में किसी भी निर्वाचित पद को रखने से वंचित कर दिया था.माना जाता है कि 25 जून, 1975 को भारत में आपातकाल लगने के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा का यही फैसला था.
1971 में इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश में रायबरेली से लोकसभा चुनाव जीता था.इस चुनाव में उन्होंने समाजवादी नेता राज नारायण को बड़ी ही आसानी से हरा दिया था. राज नारायण ने ही बाद में चुनावी कदाचार और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम,1951 का उल्लंघन करने का आरोप लगाकर इंदिरा की जीत को चैलेंज किया था.
आरोप लगाया गया था कि उनके चुनाव एजेंट यशपाल कपूर एक सरकारी कर्मचारी थे और उन्होंने व्यक्तिगत चुनाव से संबंधित काम के लिए सरकारी अधिकारियों का इस्तेमाल किया था.चुनावी कदाचार को इंदिरा गांधी को दोषी ठहराते हुए न्यायमूर्ति सिन्हा ने उन्हें संसद से अयोग्य घोषित कर दिया था और उन पर किसी भी चुने हुए पद को रखने से छह साल के प्रतिबंध लगा दिया था.

इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री का पद नहीं छोड़ने की ठान ली थी

अदालत के फैसले के बावजूद इंदिरा गांधी प्रधान मंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं थी. विपक्षी नेताओं के पास इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली इस सरकार के असंगत रवैये के खिलाफ सड़कों पर उतरने और विरोध करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था. इस कड़वाहट को कम करने और इस मुसीबत से बाहर निकलने के लिए इंदिरा गांधी कानूनी रास्ता अपना सकती थी और राजनीतिक रूप से इसे लड़ सकती थी. लेकिन इसके बजाय, देश के लोगों को आपातकाल मिला. एक ऐसा कदम जो लोकतंत्र के बिल्कुल उलट और विरोधी है.
दिलचस्प बात यह है कि आपातकाल लगाने के एक दिन बाद,सभी मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया. विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया गया और मीडिया पर पूरी तरह से नकेल लगा दी गई.उनके कुछ भरोसेमंद सरकारी अधिकारियों की मंजूरी के बिना कोई खबर नहीं छापी जा सकती थी.भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को बलपूर्वक छीन लिया गया था.उस समय देश में संसद और विपक्षी कार्यवाही नहीं थी.

आज की बात करें तो क्या हम इस तरह के तानाशाही नियम को स्वीकार कर सकते हैं?

आपातकाल के काले दिनों को याद करते हुए, इसे सिर्फ “दुःस्वप्न या फिर बुरा सपना” भर कहकर इसकी आलोचना करना ही पर्याप्त नहीं है. हमें एक संकल्प लेना होगा कि हम भारत को फिर से ऐसा कोई काला दिन नहीं देखने देंगे. हमें अपने वैधानिक अधिकारों से अवगत होना चाहिए ताकि कोई भी आप पर आपातकालीन प्रतिबंधों को लागू न कर सके.
आज नहीं, कल नहीं, कभी भी नहीं.
देश दुनिया के इतिहास में 28 जून की तारीख पर दर्ज अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा इस प्रकार है:-
1651: पोलैंड और यूक्रेन के बीच बेरेस्तेको युद्ध शुरू।
1776: अमेरिकी क्रांति: अमेरिकी की जीत के साथ सुलीवन द्वीप युद्ध समाप्त।
1787: ब्रिटिश-भारतीय सेना का नेतृत्व करने वाले सर हेनरी जी. डब्ल्यू. स्मिथ का जन्म।
1838 : बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म।
1838: विक्टोरिया इंग्लैंड की महारानी बनीं।
1846: एडोल्फ सैक्स ने वाद्य यंत्र सेक्सोफोन को पेटेंट कराया।
1857: नाना साहेब ने बिठूर में स्वयं को पेशवा घोषित किया, अंग्रेजों को भारत से उखाड़ फेंकने का आह्वान किया।
1894: श्रम दिवस पर अमेरिका में आधिकारिक अवकाश घोषित।
1902: अमेरिकी संसद ने स्पूनर कानून पारित कर राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट को कोलंबिया से पनामा नहर के अधिग्रहण का अधिकार दिया।
1914: आस्ट्रिया के आर्कड्यूक फ्रांज र्फिडनेंड और उनकी पत्नी सोफी की साराजेवो में हत्या, यह प्रथम विश्वयुद्ध का तात्कालिक कारण बना।
1919: वारसा की संधि पर हस्ताक्षर।
1921: भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव का जन्म।
1926: गोत्तलिब डैमलर और कार्ल बेन्ज ने दो कंपनियों का विलय कर र्मिसडिज-बेन्ज की शुरूआत की।
1940: बांग्लादेशी अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मोहम्मद युनुस का जन्म।
1950: कोरिया युद्ध: वामपंथियों के प्रति नरम रूख रखने के संदेह में करीब एक से दो लाख लोगों की ‘बोडो लीग नरसंहार’ में हत्या।
1975: भारत में आपातकाल के दौरान सरकार विरोधी प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में केन्द्र ने स्वतंत्रता के बाद सबसे कठोर प्रेस सेंसरशिप लागू किया।
1981 : चीन ने कैलाश और मानसरोवर का रास्ता खोला।
1981: तेहरान में भीषण बम विस्फोट, इस्लामिक रिपब्लिकन पार्टी के 73 पदाधिकारी मारे गये।
1986: मिजो नेशनल फ्रंट के साथ समझौता, लाल डेंगा मिजोरम के मुख्यमंत्री बने।
1986: केन्द्र सरकार ने अविवाहित लड़कियों को भी मातृत्व अवकाश देने का कानून बनाया।
1995: बाघों को शिकारियों से बचाने और उन्हें आश्रय देने के लिए मध्यप्रदेश को ‘टाइगर स्टेट’ घोषित किया गया।
1996: भारत ने फलस्तीनी नियंत्रण वाले गाजा सिटी में अपना मिशन खोला।

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