जम्मू कश्मीर:इंटरनेट पाबंदी की हो तुरंत समीक्षा ,यह अभिव्यक्ति का जरिया- सुको

जम्मू कश्मीर में अनुछेद 370 हटाए जाने के बाद लगी पाबंदी पर सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि इंटरनेट पर लगाई गई पाबंदी की तुरंत समीक्षा की जानी चाहिए. कोर्ट ने कहा कि जिन इलाकों में इस पाबंदी को जारी रखने का फैसला हो,वहां हर हफ्ते इसकी समीक्षा होनी चाहिए.J&K पर फैसला सुनाते हुए जब जज ने विक्‍टोरिया युग के महान लेखक का किया जिक्र
जस्टिस रमना ने ब्रिटेन में विक्‍टोरिया युग के अंग्रेजी के मशहूर लेखक चार्ल्‍स डिकेंस की किताब ‘टेल ऑफ टू सिटीज’ (Tale of Two Cities) का जिक्र किया.
नई दिल्‍ली: नई दिल्ली: जम्मू कश्मीर में अनुछेद 370 हटाए जाने के बाद लगी पाबंदी पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम आदेश दिया है. कोर्ट ने वहां इंटरनेट पर लगाई गई पाबंदी की तुरंत समीक्षा करने को कहा है. कोर्ट ने यह भी कहा है कि जिन इलाकों में इस पाबंदी को जारी रखने का फैसला हो, वहां हर हफ्ते इसकी समीक्षा होती रहे. सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि इंटरनेट लोगों के लिए अभिव्यक्ति का ज़रिया है. सरकार को इस पर रोक का आदेश देते वक्त लोगों के मौलिक अधिकार और सुरक्षा चिंताओं में संतुलन बनाना चाहिए.
कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और कश्मीर टाइम्स के संपादक अनुराधा भसीन की याचिका पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना है सरकार के किसी भी फैसले से लोगों को असहमति जताने का अधिकार है. इंटरनेट उस असहमति को व्यक्त करने का एक साधन है. कोर्ट ने यह भी कहा है कि आज के दौर में कई तरह के कारोबार इंटरनेट पर आधारित हैं. ऐसे में इंटरनेट पर रोक संविधान के अनुच्छेद 19 1(g) में दिए रोज़गार और जीवनयापन के मौलिक अधिकार में बाधा डालते हैं. इंटरनेट पर कोई भी रोक सिर्फ उचित कारण से ही लगाई जानी चाहिए.
मामले की सुनवाई करने वाली 3 जजों की बेंच के अध्यक्ष जस्टिस एन वी रमना ने कहा, “जहां पर सुरक्षा का गंभीर खतरा हो, वहां इंटरनेट पर रोक लगाई जा सकती है. लेकिन इसकी भी समय सीमा होनी चाहिए. बिना उचित वजह के और अनिश्चित काल तक लोगों की अभिव्यक्ति बाधित करने को सही नहीं ठहराया जा सकता.”
कोर्ट का आदेश
सरकार इंटरनेट बैन रूल्स के मुताबिक एक कमिटी बनाए जो पाबंदी से जुड़े आदेशों की तुरंत समीक्षा करे
कमिटी के मुताबिक जहां इंटरनेट पर रोक लगाए रखना अभी ज़रूरी हो, वहां हर हफ्ते इसकी समीक्षा होती रहे
जहां इंटरनेट पाबंदी बनी रहेगी, वहां भी इंटरनेट आधारित बुनियादी सरकारी सेवाओं को मुहैया करवाया जाए

सुप्रीम कोर्ट ने बिना वजह का खुलासा किए जगह-जगह धारा 144 के इस्तेमाल को भी गलत बताया. कोर्ट ने कहा, “लोगों को बेवजह कहीं आने-जाने से या एक जगह जमा होने से रोकना सही नहीं है. बहुत ज़रूरी होने पर ही ऐसे कदम उठाने चाहिए. मजिस्ट्रेट रूटीन में धारा 144 लगाने का आदेश नहीं दे सकते. बार बार उसे बेवजह बढ़ाते जाना कानूनी शक्ति का दुरुपयोग है.” कोर्ट ने सरकार से धारा 144 लागू करने के आदेशों की भी समीक्षा करने के लिए कहा है.
इंटरनेट पर बैन और धारा 144 लागू करने के आदेशों को सार्वजनिक न करने पर कोर्ट ने नाराजगी जताई. कोर्ट ने कहा, “इस तरह के सभी आदेश सार्वजनिक होने चाहिए ताकि लोग उन्हें देख सकें. ज़रूरी लगने पर उसे कोर्ट में चुनौती दे सकें. लोगों पर पाबंदी लगाने वाला हर सरकारी आदेश न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है. लोगों को उन्हें कोर्ट में चुनौती देने का हक है.”आर्टिकल 370 (Article 370) हटने के बाद जम्‍मू-कश्‍मीर (Jammu-Kashmir) पर लगी पाबंदियों के खिलाफ दायर अर्जियों पर फैसला सुनाने के दौरान जस्टिस रमना ने ब्रिटेन में विक्‍टोरिया युग के अंग्रेजी के महान लेखक चार्ल्‍स डिकेंस के क्‍लासिक’टेल ऑफ टू सिटीज’ (Tale of Two Cities) का जिक्र किया. जस्टिस रमना ने कहा कि मैं फैसला सुनाने से पहले इस क्‍लासिक की कुछ पंक्तियों का जिक्र करना चाहूंगा’-‘वह सर्वश्रेष्‍ठ दौर था,वह सबसे खराब दौर भी था.वह बुद्धिमत्‍ता का युग था,वह मूर्खता का भी युग था.वह विश्‍वास का युगारंभ था.'(‘It was the best of times, it was the worst of times, It was the age of wisdom, It was age of foolishness, it was the epoch of belief!).
उसके बाद फैसला सुनाते हुए जस्टिस रमना ने कहा कि कश्‍मीर ने बहुत हिंसा देखी है. इंटरनेट पर पाबंदी असीमित समय के लिए नहीं की जा सकती. उन्‍होंने आदेश देते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट पर लगी पाबंदी को हटाने के लिए सरकार स्थिति की तत्‍काल समीक्षा करे. इंटरनेट पर प्रतिबंध की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए. इंटरनेट लोगों का मौलिक अधिकार है. SC ने कहा कि सरकार धारा 144 का इस्तेमाल विचारों की विविधता को दबाने के लिए नहीं कर सकती. इतना ही नहीं सरकार सभी पाबंदी संबंधी आदेश न दिखाने की छूट दिए जाने का दावा भी नहीं कर सकती. इंटरनेट के माध्यम से अभिव्यक्ति संविधान के आर्टिकल 19 में हमारा मौलिक अधिकार है. जस्टिस रमना- इंटरनेट को बंद करने की कार्रवाई आर्टिकल 19(2) के सिद्धांतों के अनुरूप ही होनी चाहिए.
इंटरनेट को बंद करने की कार्रवाई आर्टिकल 19(2) के सिद्धांतों के अनुरूप ही होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर सरकार को पाबंदियों से संबंधित आदेश की समीक्षा एक सप्ताह के भीतर करने का आदेश दिया. इंटरनेट पर अनिश्चित काल के लिए पाबंदी दूरसंचार नियमों का उल्लंघन है. सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी आदेशों को पब्लिक डोमेन में डालने का आदेश दिया जिसमें धारा 144 लगाई गई थी.
इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि कश्‍मीर ने बहुत हिंसा देखी. हम सुरक्षा को ध्‍यान में रखते हुए मानवाधिकारों और स्‍वतंत्रता के बीच संतुलन स्‍थापित करने का प्रयास करेंगे. कोर्ट का ये सुनिश्चित करना दायित्‍व है कि सभी नागरिकों को समान अधिकार और सुरक्षा मिलें. लेकिन ऐसा लगता है कि आजादी और सुरक्षा का मुद्दा कहीं उलझ जाता है.
दरअसल, पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा लिया था. आपको बता दें कि कांग्रेस नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद और कश्मीर टाइम्स की संपादक अनुराधा भसीन सहित कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर लगाई गई पाबंदियों को चुनौती दी थी.
70 लाख लोगों को इस तरह बंद करके नहीं रखा जा सकता- सिब्‍बल
सुनवाई के दौरान गुलाम नबी आजाद की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने नियंत्रण का विरोध करते हुए कहा था कि वह ये समझते हैं कि वहां राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है, लेकिन 70 लाख लोगों को इस तरह बंद करके नहीं रखा जा सकता. यह जीवन के अधिकार का उल्लंघन है. राष्ट्रीय सुरक्षा और जीवन के अधिकार के बीच संतुलन होना चाहिए. कश्मीर टाइम्स की संपादक अनुराधा भसीन की ओर से पेश वकील वृन्दा ग्रोवर ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर में जारी पाबंदियां असंवैधानिक हैं. ऐसे मामलों में संतुलन का ध्यान रखा जाना चाहिए.
तुषार मेहता ने इंटरनेट सेवा पर लगी रोक को जायज ठहराया
जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गत मंगलवार को अनुच्छेद 370 हटने के बाद से राज्य में इंटरनेट सेवा पर लगी रोक को जायज ठहराते हुए कहा था कि ऐसा न होने से अलगाववादी, आतंकी और पाकिस्तानी सेना सोशल मीडिया के जरिए लोगों को जिहाद के नाम पर भड़का सकती है. मेहता ने कहा था कि यहां सिर्फ अंदरूनी शत्रुओं से ही नहीं लड़ना है,बल्कि सीमा पार के दुश्मनों से भी लड़ना है और उन्होंने इस संबंध में कई उदाहरण भी दिए थे.

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