राणा साँगा को हरा चंदेरी क़िला कब्ज़ाया था बाबर ने,महाराणा प्रताप का निधन भी हुआ था आज,

29 जनवरी का इतिहास

इतिहास में वर्णित बहुत सी ऐसी घटनाएँ हैं जो हमें हमारे जीवन के लिए कुछ सीख और उपदेश देती है। तो आइए आज जानते हैं 29 जनवरी के इतिहास के कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के बारें मे, उन लोगों के जन्मदिन के बारे में जिन्होंने दुनिया में आकर बहुत बड़ा नाम किया साथ ही उन मशहूर लोगों के बारें मे जो इस दुनिया से चले गए।

29 January History

  • मुग़ल साम्राज्य वंश के संस्थापक बाबर à¤¬à¤¾à¤¬à¤° ने 1528 में मेवाड़ के राजा राणा साँगा के लिए इमेज परिणामने 1528 में मेवाड़ के राजा राणा साँगा को हराकर चंदेरी के क़िले पर कब्ज़ा किया।राणा सांगा (राणा संग्राम सिंह) (१२ अप्रैल १४८४ – १७ मार्च १५२७) (राज 1509-1528) उदयपुर में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे तथा राणा रायमल के सबसे छोटे पुत्र थे |राणा रायमल के तीनों पुत्रों ( कुंवर पृथ्वीराज, जगमाल तथा राणा सांगा ) में मेवाड़ के सिंहासन के लिए संघर्ष प्रारंभ हो गया | एक भविष्यकर्त्ता के अनुसार सांगा को मेवाड़ का शासक बताया जाता है ऐसी स्थिति में कुंवर पृथ्वीराज व जगमाल अपने भाई राणा सांगा को मौत के घाट उतारना चाहते थे परंतु सांगा किसी प्रकार यहाँ से बचकर अजमेर पलायन कर गएं!  तब सन् 1509 में अजमेर के कर्मचन्द पंवार की सहायता से राणा सांगा मेवाड़ राज्य प्राप्त हुुुआ | महाराणा सांगा ने सभी राजपूत राज्यो को संगठित किया और सभी राजपूत राज्य को एक छत्र के नीचे लाएं। उन्होंने सभी राजपूत राज्यो संधि की और इस प्रकार महाराणा सांगा ने अपना साम्राज्य उत्तर में पंजाब सतलुज नदी से लेकर दक्षिण में मालवा को जीतकर नर्मदा नदी तक कर दिया। पश्चिम में में सिंधु नदी से लेकर पूर्व में बयाना भरतपुर ग्वालियर तक अपना राज्य विस्तार किया ! इस प्रकार मुस्लिम सुल्तानों की डेढ़ सौ वर्ष की सत्ता के पश्चात इतने बड़े क्षेत्रफल हिंदू साम्राज्य कायम हुआ ! इतने बड़े क्षेत्र वाला हिंदू सम्राज्य दक्षिण में विजयनगर सम्राज्य ही था। महाराणा सांगा ने मालवा के मुस्लिम सुल्तान को युद्ध में हराया और 6 महीने तक अपनी कैद में रखा फिर उसके घाव ठीक होने पर उसे वापस छोड़ दिया और दिल्ली सुल्तान इब्राहिम लोदी को 17 बार युद्ध में परास्त किया और गुजरात के सुल्तान को मेवाड़ की तरफ बढ़ने से रोक दिया। बाबर को बयाना का युद्ध में पूरी तरह परास्त किया और बाबर से बयाना का दुर्ग जीत लिया। इस प्रकार इस हिंदू राजा ने भारतीय इतिहास पर एक अमित छाप छोड़ दी।*80 जख्मों से मशहूर हुए, हालांकि ग्रन्थों में 84 जख्म दर्ज हैं, इनमें से एक आँख कुंवर पृथ्वीराज ने फोड़ी*बाबर ने 1528 में मेवाड़ के राजा राणा साँगा के लिए इमेज परिणाम

    *वीर सपूतों की भूमि राजस्थान*

    राजस्थान की इस पावन प्रसूता धरा के कण कण में वीर योद्धाओं की आत्मा बसी हुई है। राजा रजवाड़ों की इस भूमि से अनेक वीर योद्धाओं क्रांतिकारियों ने अपनी शक्तियों और वीरता के कौशल से अपने पराक्रम के बल पर अपने शत्रुओं को नाकों चने चबवाए हैं ।अपनी मातृभूमि की आबरु बचाने के लिए अपना सर्वस्व त्याग कर अपने प्राणों की आहुति  यहां के योद्धाओं ने दी है ।

    इस मिट्टी के बारे में जानने के लिए महान कवि रामधारी सिंह दिनकर की यह पंक्तियां पढ़ें…..

    *”जब जब में राजस्थान की धरती पर आता हूं तो मेरी रूह यह सोचकर कांप उठती है कि कहीं मेरे पैर के नीचे किसी  वीर की समाधि तो नहीं है, किसी विरांगना का थान तो नहीं है ,जिससे कि उसका अपमान हो जाए “*

    रुडयार्ड किपलिंग का यह कथन राजस्थान के बारे में सब कुछ बयां करता है–

    *शेरों की हड्डियां यहां के मार्ग की धूल बनती है*

    इसी कड़ी में ऐसा योधा हुआ जिसकी वीरता युद्ध कौशल का बखान सदियों से चला आ रहा है और युगों-युगों तक चलता रहेगा हम बात कर रहे हैं मेवाड़ राजवंश के उस महान योद्धा राणा सांगा की जिन्होंने विदेशियों से मुक्त भारत में एक हिंदू छत्र भारत का सपना देखा।

    परिचय

    महाराणा संग्राम सिंह, महाराणा कुंभा के बाद, कहानी के नाम से प्रसिद्ध हैं। मेवाड़ में सबसे महत्वपूर्ण शासक। उसने अपनी शक्ति के बल पर मेवाड़ साम्राज्य का विस्तार किया और उसके तहत राजपूताना के सभी राजाओं को संगठित किया। रायमल की मृत्यु के बाद, 1509 में, राणा सांगा मेवाड़ के महाराणा बन गए। सांगा ने अन्य राजपूत सरदारों के साथ सत्ता का आयोजन किया।
    

    राणा सांगा ने मेवाड़ में 1509 से 1528 तक शासन किया, जो आज भारत के राजस्थान प्रदेश के रेगिस्थान में स्थित है। राणा सांगा ने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध सभी राजपूतों को एकजुट किया। राणा सांगा सही मायनों में एक बहादुर योद्धा व शासक थे जो अपनी वीरता और उदारता के लिये प्रसिद्ध हुये।इन्होंने दिल्ली, गुजरात, व मालवा मुगल बादशाहों के आक्रमणों से अपने राज्य की बहादुरी से ऱक्षा की। उस समय के वह सबसे शक्तिशाली हिन्दू राजा थे।फरवरी 1527 ई. में खानवा केे युद्ध से पूर्व बयाना केे युद्ध में राणा सांगा ने मुगल सम्राट बाबर की सेना को परास्त कर बयाना का किला जीता | इस युद्ध में राणा सांगा केे कहने पर राजपूत राजाओं ने पाती पेेरवन परम्परा का निर्वाहन किया|बाबर ने 1528 में मेवाड़ के राजा राणा साँगा के लिए इमेज परिणाम

    *राणा सांगा ने अपनी  पाती पेरवन की राजपूत परम्परा को पुनर्जीवित करके प्रत्येक सरदार को अपनी ओर से युद्ध में शामिल होने का निमंत्रण भेजा ।**मारवाड़ के राव गंगा एवं मालदेव, आमेर का राजा पृथ्वीराज , ईडर का राजा भारमल, विरमदेव मेड़तिया , वागड़ ( डूंगरपुर )का राव उदय सिंह व खेतसिंह ,  देवलिया का रावत बाघसिंह ,. नरबद हाड़ा , चंदेरी का मेदिनराय,  वीर सिंह देव बीकानेर की राव जैतसी के पुत्र कुंवर कल्याणमल झाला अज्जा आदि कई राजपूत राणा सांगा के साथ थे*।खानवा के युद्ध में शायद ही राजपूतों की कोई ऐसी शाखा रही जिससे कोई न कोई प्रसिद्ध व्यक्ति इस युद्ध में काम न आया हो।सांग अंतिम हिंदू राजा थे उनके नेतृत्व में सभी राजपूत जातियां विदेशियों को बाहर निकालने के लिए एक साथ आयी।
    सांगा राजपूताने की सेना के सेनापति बने थे इस  दौरान राणा सांगा के सिर पर एक तीर लगा जिससे वो मुर्छित हो गये।तब *झाला अज्जा* सब  राज्य चिन्ह के साथ महाराणा के हाथी पर सवार किया और उसके अध्यक्षता में सारी सेना लड़ने लगी।
    झाला अज्जा ने इस युद्ध संचालन में अपने प्राण दिए ।थोड़ी ही देर में महाराणा के न होने की खबर सेना में फैल गई वह इसे सेना का मनोबल टूट गया ।बाबर युद्ध में विजय हुआ । उनके साहस की तो उनके दुश्मन भी तारीफ करते थे। *बाबर ने खुद लिखा है कि “खानवा की लड़ाई से पहले उसके सैनिक राणा सांगा की सेना से घबराए हुए थे”* जिसकी वीरता के बारे में कहा जाता था कि वह अंतिम सांस तक लड़ती रहती है.।मुर्छित महाराणा को राजपूत राजा *बसवा गांव*  ले गये। खानवा के युद्ध में *राणा सांगा के पराजय का मुख्य कारण राणा सांगा की प्रथम विजय  के बाद तुरंत ही युद्ध न  करके बाबर को तैयारी करने का समय देना था ।* राजपूतो की  तकनीक भी पुरानी थी और भी *बाबर की युद्ध की नवीन व्यूह रचना तुलुगमा पद्धति* से अनभिज्ञ थे।बाबर की सेना के पास तोपें और बंदूकें थी जिसे राजपूत सेना की बड़ी हानि हुई ।

    *खानवा युद्ध के परिणाम*

    १. भारतवर्ष में मुगलों का राज्य स्थायी हो गया तथा बाबर स्थिर रूप से भारत वर्ष का बादशाह बना।
    २.  इसे राजसत्ता राजपूतों के हाथ से निकल कर मुगलों के हाथ में आ गई जो लगभग 200 वर्षों से अधिक समय तक के उनके पास बनी रही।
    ३.  राज्य में राजपूतों का प्रताप महाराणा कुंभा के समय में बहुत बढ़ा और अपने शिखर पर पहुंच चुका था एकदम कम हो गया इसे भारत की राजनीतिक स्थिति में  राजपूतों का वह उच्च स्थान न रहा ।
    ४. मेवाड़ की प्रतिष्ठा और शक्ति के कारण राजपूतों का जो संगठन हुआ था, वह टूट गया ।

      *अन्तिम समय हार न मानना *

    मुर्छित महाराणा को लेकर राजपूत जब  बसवा गांव पहुंचे तब महाराणा सचेत हुए और उन्होंने युद्ध के बारे में पूछा राजपूतों से सारा वृत्तांत सुनने के बाद राणा सांगा बहुत उदास हुए ।बाद में सांगा बसवा से रणथंभोर चले गए।बाद में बाबर   राजपूतो पर आक्रमण कर उनकी शक्ति को नष्ट करने के विचार से 19 जनवरी 1528 को चंदेरी पहुंचा। चंदेरी के मदन राय की सहायता करने तथा बाबर से बदला लेने के लिए सांगा चंदेरी की ओर प्रस्थान किया और *कालपी  से कुछ दूर ईरिच गांव में डेरा डाला* जहां उसके साथी राजपूतों ने जो नए युद्ध के विरोधी थे उसको फिर से  युद्ध में प्रविष्ट देखकर विष दे दिया ।*कालपी नामक स्थान पर 30 जनवरी 1528 को राणा सांगा का स्वर्गवास हो गया ।*उनको मांडलगढ़ लाया गया जहां उनकी समाधि है ।

    *महाराणा सांगा वीर , उदार, कृतज्ञ, बुद्धिमान और न्याय प्रिय शासक थे।*
    मेवाड़ के ही नहीं सारे भारतवर्ष के इतिहास में महाराणा सांगा संग्राम सिंह का विशिष्ट स्थान  है उनके राज्य काल में मेवाड़ा अपने गौरव वैभव के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गया था परंतु दुर्भाग्यवश उन्हीं के शासनकाल में मेवाड़ का पतन प्रारंभ हुआ।

    राणा संग्राम सिंह के साथ ही भारत की राजनीतिक रंग मंच पर हिंदू साम्राज्य का अंतिम दृश्य भी पूर्ण हो गया इसलिए उन्हें अंतिम भारतीय हिंदू सम्राट के रूप में स्मरण किया जाता है।बयाना के युद्ध के पश्चात् 17 मार्च,1527 ई. में खानवा के मैैैदान में ही राणा साांगा जब घायल हो गए, युद्ध क्षेत्र में राणा सांगा घायल हुए, पर किसी तरह बाहर निकलने में कछवाह वंश के पृथ्वीराज कछवाह नेे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा पृथ्वीराज कछवाह द्वारा ही राणा सांगा को घायल अवस्था में काल्पी ( मेवाड़ ) नामक स्थान पर पहुँचाने में मदद दी गई, लेेेकिन असंंतुुष्ट सरदारों ने इसी स्थान राणा सांगा को जहर दे दिया | ऐसी अवस्था में राणा सांगा पुनः बसवा आए जहाँ सांगा की 30 जनवरी,1528 को मृत्यु हो गयी, लेकिन राणा सांगा का विधि विधान से अन्तिम संस्कार माण्डलगढ ( भीलवाड़ा ) में हुआ, वहाँ आज भी हम राणा सांगा का समाधि स्थल देखते हैंं |

    एक विश्वासघाती के कारण वह बाबर से युद्ध हारे लेकिन उन्होंने अपने शौर्य से दूसरों को प्रेरित किया। इनके शासनकाल में मेवाड़ अपनी समृद्धि की सर्वोच्च ऊँचाई पर था। एक आदर्श राजा की तरह इन्होंने अपने राज्य की ‍रक्षा तथा उन्नति की।राणा सांगा अदम्य साहसी थे। एक भुजा, एक आँख खोने व अनगिनत ज़ख्मों के बावजूद उन्होंने अपना महान पराक्रम नहीं खोया, सुलतान मोहम्मद शासक माण्डु को युद्ध में हराने व बन्दी बनाने के बाद उन्हें उनका राज्य पुनः उदारता के साथ सौंप दिया, यह उनकी बहादुरी को दर्शाता है।

    मेवाड़ के सिसोदिया राजपूत
    (1326–1884)
    राणा हम्मीर सिंह (1326–1364)
    राणा क्षेत्र सिंह (1364–1382)
    राणा लखा (1382–1421)
    राणा मोकल (1421–1433)
    राणा कुम्भ (1433–1468)
    उदयसिंह प्रथम (1468–1473)
    राणा रायमल (1473–1508)
    राणा सांगा (1508–1527)
    रतन सिंह द्वितीय (1528–1531)
    राणा विक्रमादित्य सिंह (1531–1536)
    बनवीर सिंह (1536–1540)
    उदयसिंह द्वितीय (1540–1572)
    महाराणा प्रताप (1572–1597)
    अमर सिंह प्रथम (1597–1620)
    करण सिंह द्वितीय (1620–1628)
    जगत सिंह प्रथम (1628–1652)
    राज सिंह प्रथम (1652–1680)
    जय सिंह (1680–1698)
    अमर सिंह द्वितीय (1698–1710)
    संग्राम सिंह द्वितीय (1710–1734)
    जगत सिंह द्वितीय (1734–1751)
    प्रताप सिंह द्वितीय (1751–1754)
    राज सिंह द्वितीय (1754–1762)
    अरी सिंह द्वितीय (1762–1772)
    हम्मीर सिंह द्वितीय (1772–1778)
    भीम सिंह (1778–1828)
    जवान सिंह (1828–1838)
    सरदार सिंह (1828–1842)
    स्वरूप सिंह (1842–1861)
    शम्भू सिंह (1861–1874)
    उदयपुर के सज्जन सिंह (1874–1884)
    फतेह सिंह (1884–1930)
    भूपाल सिंह (1930–1947)
  • ‘थियोडोर तृतीय’ 1676 में रूस के ज़ार बने।
  • देश के पहले समाचार पत्र ‘हिक्की गजट’ या ‘बंगाल गजट’ या कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर का कोलकाता से 1780 में प्रकाशन आरंभ हुआ।
  • ‘प्रथम विश्व युद्ध’ में फ़्रांस पर जर्मनी ने 1916 में पहली बार हमला किया।
  • ब्रिटेन ने 1949 में इज़रायल को मान्यता दी।
  • संगीत नाटक अकादमी की स्थापना 1953 में हुई।
  • सोवियत संघ अंगोला में राजनीतिक समझौते के लिए 1976 में सहमत हुआ।
  • 1978 में वायुमंडल की ओजोन परत पर होने वाले दुष्प्रभाव के कारण एयरोसोल स्प्रे को प्रतिबंधित करने वाला पहला देशस्वीडन बना था।
  • सीरिया और ईरान ने लेबनान में संघर्ष रोकने के लिए 1989 में समझौता किया।
  • भारत 1992 में आशियान का क्षेत्रीय सहयोगी बना।
  • किक्रेटर विनोद कांबली का 1993 में टेस्ट में पदार्पण।
  • भारत सरकार ने ‘एयर कार्पोरेशन एक्ट’ 1953 को 1994 में रद्द किया।
  • फ़्रांस के राष्ट्रपति जैक्स शिराक ने 1996 में भविष्य में परमाणु परीक्षण पर रोक लगाने की घोषणा की।
  • हिमाचल विधानसभा 2003 में भंग कर दी गई।
  • सेरेना विलियम्स ने 2005 में आस्ट्रेलियाई ओपन का महिला ख़िताब जीता।
  • भारत के तेंज इरफ़ान पठान 2006 में टेस्ट क्रिकेट में पहले ओवर में हैट्रिक लेने वाले विश्व के पहले गेंदबाज बने।
  • अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी 2007 में ज़मीन जैक्सन को हराकर लंदन के चैनल-4 के रियालिटी शो में ‘बिग ब्रदर’ चैम्पियन बनीं।

29 जनवरी को जन्मे व्यक्ति 

  • 1896 में भारत सेवा आश्रम संघ के संस्थापक स्वामी प्रणबानंद महाराज का जन्म।
  • 1970 में शूटिंग में ओलम्पिक-2004 रजत पदक जीतने वाले कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौड़ का जन्म।

29 जनवरी को हुए निधन

  • 1597 में उदयपुर, मेवाड़ में  सिसोदिया  राजवंश के राजा महाराणा प्रताप का निधन।महाराणा प्रताप सिंह ( ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत १५९७ तदानुसार ९ मई १५४०–2९ जनवरी १५९७) उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। उनका जन्म राजस्थान के कुम्भलगढ़ में महाराणा उदयसिंह एवं माता राणी जयवंत कँवर के घर हुआ था। लेखक विजय नाहर के अनुसार महाराणा प्रताप की जन्मकुंडली और उस काल की परिस्थितियां एवं राजपूत समाज की परंपरा के आधार पर महाराणा प्रताप का जन्म उनके ननिहाल पाली मारवाड़ में हुआ। १५७६ के हल्दीघाटी युद्ध में २०,००० राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के ८०,००० की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने आपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। प्रिय अश्व चेतक à¤®à¤¹à¤¾à¤°à¤¾à¤£à¤¾ प्रताप सिंह के लिए इमेज परिणामकी भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें १७,००० लोग मारे गए। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती चली गई । २५,००० राजपूतों को १२ साल तक चले उतना अनुदान देकर भामाशाह भी अमर हुआ।

    जीवन

    चेतक पर सवार राणा प्रताप की प्रतिमा (महाराणा प्रताप स्मारक समिति, मोती मगरी , उदयपुर)
    बिरला मंदिर, दिल्ली में महाराणा प्रताप का शैल चित्र

    महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था। महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवंता बाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था।

    राणा उदयसिंह केे दूसरी रानी धीरबाई जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी | प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला जाता है |

    महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक मेंं 28 फरवरी, 1572 में गोगुन्दा में होता हैै, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही कुुंभलगढ़़ दुुर्ग में हुआ, दूूूसरे राज्याभिषेक में जोधपुर का राठौड़ शासक राव चन्द्रसेेन भी उपस्थित थे |

    राणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल ११ शादियाँ की थी उनके पत्नियों और उनसे प्राप्त उनके पुत्रों पुत्रियों के नाम है:-

    1. महारानी अजब्धे पंवार :- अमरसिंह और भगवानदास
    2. अमरबाई राठौर :- नत्था
    3. शहमति बाई हाडा :-पुरा
    4. अलमदेबाई चौहान:- जसवंत सिंह
    5. रत्नावती बाई परमार :-माल,गज,क्लिंगु
    6. लखाबाई :- रायभाना
    7. जसोबाई चौहान :-कल्याणदास
    8. चंपाबाई जंथी :- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह
    9. सोलनखिनीपुर बाई :- साशा और गोपाल
    10. फूलबाई राठौर :-चंदा और शिखा
    11. खीचर आशाबाई :- हत्थी और राम सिंह

    महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गया, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और हमें हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला |

    हल्दीघाटी का युद्ध

    यह युद्ध १८ जून १५७६ ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी।

    इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया। इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश ‘राजा रामशाह तोमर’ भी अपने तीन पुत्रों ‘कुँवर शालीवाहन’, ‘कुँवर भवानी सिंह ‘कुँवर प्रताप सिंह’ और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गया। ,

    इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजय नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर एेसा कुछ नहीं हुआ, ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।

    दिवेेेेर का युुद्ध

    राजस्थान के इतिहास 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को “मेवाड़ का मैराथन” कहा |

    सफलता और अवसान

    .पू. 1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उल्झा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने ई.पू. 1585 में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को और भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया , उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था , पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत ई.पू. 1585 में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए,परंतु दुर्भाग्य से उसके 1 1वर्ष के बाद ही 29 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई।

    महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधरने के बाद अागरा ले आया।

    एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।

    महाराणा प्रताप सिंह के मृत्यु पर अकबर की प्रतिक्रिया

    अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था, पर उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं थी, हालांकि अपने सिद्धांतों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक वह था जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था , जब की एक तरफ ये थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जनता था की महाराणा जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए।

    महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है। अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-

    अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी

    गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी

    नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली

    न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली

    गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी

    निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी

    अर्थात्

    हे गेहलोत राणा प्रतापसिंघ तेरी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धुरे को बांए कंधे से ही चलाता रहा। तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया। तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया।

    अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप औरनके स्वामिभक्त अश्व चेतक को शत-शत कोटि-कोटि प्रणाम।

    फिल्म एवं साहित्य में

    पहले पहल 1946 में जयंत देसाई के निर्देशन में महाराणा प्रताप नाम से श्वेत-श्याम फिल्म बनी थी। 2013 में सोनी टीवी ने ‘भारत का वीर पुत्र – महाराणा प्रताप’ नाम से धारावाहिक प्रसारित किया था जिसमें बाल कुंवर प्रताप का पात्र फैसल खान और महाराणा प्रताप का पात्र शरद मल्होत्रा ने निभाया था।

  • 1983 में स्वतंत्र पार्टी के प्रमुख नेता पीलू मोदी की मृत्यु।
  • 2002 में ‘भारतीय प्रशासनिक सेवा’ में भारत की दूसरी महिला अधिकारी तथा मध्य प्रदेश की भूतपूर्व राज्यपाल सरला ग्रेवाल की मृत्यु।

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