पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ था आज

14 जनवरी का इतिहास

दोस्तों, हमें अक्सर परीक्षाओं में इतिहास बारे में प्रश्न पूछें जाते हैं लेकिन बहुत बार हमें देश विदेश के इतिहास के बारे में पता नहीं होता, यहाँ हमने 14 जनवरी के इतिहास की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में जानकारी दी हैं यह हमारा छोटा सा प्रयास हैं आपको जरुर पसंद आयेंगा14 January History

  • पोप लियो एक्स ने 1514 में दासता के विरुद्ध आदेश पारित किया।
  • यूनाइटेड ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1641 में मलक्का शहर पर विजय प्राप्त की।
  • 1659 में हुए एलवास के युद्ध में पुर्तग़ाल ने स्पेन को पराजित किया।
  • फ्रांसीसी जनरल लेली ने 1760 में पांडिचेरी अंग्रेज़ों के हवाले कर दिया।
    *भारत में मराठा शासकों और अहमदशाह दुर्रानी के बीच 1761 में पानीपत का तीसरा युद्ध हुआ।पानीपत का तृतीय युद्ध अहमद शाह अब्दाली और मराठों के बीच हुआ। पानीपत की तीसरी लड़ाई (95.5 किमी) उत्तर में मराठा साम्राज्य और अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली, दो भारतीय मुस्लिम राजा रोहिला अफगान दोआब और अवध के नवाब शुजाउद्दौला (दिल्ली के सहयोगी दलों) के एक गठबंधन के साथ अहमद शाह अब्दाली के एक उत्तरी अभियान बल के बीच पर 15 जनवरी 1761, पानीपत, के बारे में 60 मील की दूरी पर हुआ। लड़ाई018 वीं सदी में सबसे बड़े, लड़ाई में से एक माना जाता है और एक ही दिन में एक क्लासिक गठन दो सेनाओं के बीच लड़ाई की रिपोर्ट में मौत की शायद सबसे बड़ी संख्या है।आखिर क्यों, कब और किसके बीच लड़ा गया युद्ध!https://assets.roar.media/Hindi/2018/01/Panipat.jpg

    अठारहवीं सदी की शुरुआत हो चुकी थी, औरंगज़ेब की मृत्यु के उपरांत वर्षों से भारत की ज़मीं पर सीना ताने खड़ा मुग़ल साम्राज्य अब घुटनों पर आ चुका था. दूसरी तरफ मराठाओं का भगवा परचम बुलंदी पर लहरा रहा था. पेशवा बाजीराव के नेतृत्व में राजपुताना, मालवा अथवा गुजरात के राजा मराठों के साथ आ मिले थे.

    मराठों के लगातार आक्रमणों ने मुग़ल बादशाहों की हालत बदतर कर दी थी. उत्तर भारत के अधिकांश इलाके, जहां पहले मुग़लों का शासन था, वहां अब मराठों का कब्ज़ा हो चुका था. 1758 में पेशवा बाजीराव के पुत्र बालाजी बाजी राव ने पंजाब पर विजय प्राप्त कर मराठा साम्राज्य को और अधिक विस्तृत कर दिया, किन्तु उनकी जितनी ख्याति बढ़ी, उनके शत्रुओं की संख्या में भी उतनी ही बढोत्तरी हुई.

    इस बार उनका सीधा सामना अफगान नवाब अहमद शाह अब्दाली के साथ था. अब्दाली ने 1759 में पश्तून अथवा बलोच जनजातियों को एकत्रित कर सेना का संगठन किया. साथ ही पंजाब में मैराथन की छोटी-छोटी टुकड़ियों से लड़ते हुए विजय प्राप्त की. इसी तरह अब्दाली अपनी सेना के साथ आगे बढ़ता रहा. अंततः 14 जनवरी 1761 को पानीपत में अब्दाली के नेतृत्व में अफगान सेना व मराठों के मध्य 18वीं सदी का सबसे भयावह युद्ध लड़ा गया.

    मराठा साम्राज्य का विस्तार

    सन 1707 के बाद छत्रपति शिवाजी द्वारा देखा गया सम्पूर्ण भारत पर मराठा साम्राज्य के अधिपत्य का स्वप्न अब पूर्ण होता प्रतीत हो रहा था. 1758 में मराठाओं ने दिल्ली सहित लाहौर पर कब्ज़ा कर लिया तथा तैमुर शाह दुर्रानी को वहां से खदेड़ दिया. अब मराठा साम्राज्य की हदें उत्तर में सिंधु एवं हिमालय तक अथवा दक्षिण में प्रायद्वीप के निकट तक बढ़ गयी थीं.यह मराठों की सर्वोच्च उपलब्धि थी. उन दिनों मराठा साम्राज्य की कमान पेशवा बाजीराव के पुत्र बालाजी बाजीराव के हाथों में थी. बाला जी ने अपने पुत्र विश्वास राव को मुग़ल सिंहासन पर बैठाने का मन बना लिया था. अभी तक नाममात्र के लिए दिल्ली पर मुगलों का शासन था और वे सभी मराठों के विस्तृत होते हुए साम्राज्य को देख कर भयभीत थे.

    अहमद शाह अब्दाली का भारत आगमन

    1758 में पंजाब पर किए गए हमले के बाद लाहौर तक अपना कब्ज़ा करने के बाद मराठों ने तैमूर शाह दुर्रानी को खदेड़ दिया. तैमूर शाह अफगानिस्तान के शासक अहमद शाह अब्दाली का पुत्र था. अब्दाली को यह बात नागवार गुज़री अथवा उसने भारत पर हमले का मन बना लिया. सबसे पहले उसने पंजाब के उन जगहों पर हमला किया, जहाँ मराठा फौजें कम संख्या में थीं. उसके बाद वो अपने लश्कर के साथ आगे बढ़ा.समय के साथ मुग़ल शासक दो भागों में बंट गए थे. एक वो जो भारतीय मुस्लिम थे, अथवा एक वो जो बाहर से आकर यहाँ शासन कर रहे थे. मराठा भारतीय मूल के मुसलमानों के पक्ष में थे. अब बाहरी मुसलमान शासक किसी विदेशी सहायता की प्रतीक्षा में थे, जो उन्हें अहमद शाह अब्दाली के रूप में प्राप्त हुई.अहमद शाह ने पंजाब, कश्मीर अथवा मुल्तान पर कब्ज़ा ज़माने के बाद दिल्ली की राजनीति में अपनी दिलचस्पी दिखाई.

    पानीपत का तृतीय युद्ध 14 जनवरी, 1761 ई. को अफ़ग़ान आक्रमणकारी अहमदशाह अब्दाली और मुग़ल बादशाह शाहआलम द्वितीय के संरक्षक और सहायक मराठों के बीच लड़ा गया था। इस लड़ाई में मराठा सेनापति सदाशिवराव भाऊ अफ़ग़ान सेनापति अब्दाली से लड़ाई के दाँव-पेचों में मात खा गया। पानीपत का तृतीय युद्ध मुख्यतः दो कारणों का परिणाम था – पहला, नादिरशाह की तरह अहमदशाह अब्दाली भी भारत को लूटना चाहता था, दूसरे, मराठे ‘हिन्दूपद पादशाही’ की भावना से ओत-प्रोत होकर दिल्ली को अपने अधिकार में लेना चाहते थे। à¤ªà¤¾à¤¨à¥€à¤ªà¤¤ का तृतीय युद्ध के लिए इमेज परिणाम

    मुग़ल राज का अंत (१६८०-१७७०) में शुरु हो गया था, जब मुगलों के ज्यादातर भू – भागों पर मराठाओं का अधिपत्य हो गया था। गुजरात और मालवा के बाद बाजी राव ने १७३७ में दिल्ली पर मुगलों को हराकर अपने अधीन कर लिया था और दक्षिण दिल्ली के ज्यादातर भागों पर अपने मराठाओं का राज था। बाजी राव के पुत्र बाला जी बाजी राव ने बाद में पंजाब को भी जीतकर अपने अधीन करके मराठाओं की विजय पताका उत्तर भारत में फैला दी थी। पंजाब विजय ने १७५८ में अफगानिस्तान के दुर्रानी शासकों से टकराव को अनिवार्य कर दिया था। १७५९ में दुर्रानी शासक अहमद शाह अब्दाली ने कुछ पसतून कबीलो के सरदारों और भारत में अवध के नवाबों से मिलकर गंगा के दोआब क्षेत्र में मराठाओं से युद्ध के लिए सेना एकत्रित की। इसमें रोहलिआ अफगान ने भी उसकी सहायता की। पानीपत का तीसरा युद्ध इस तरह सम्मिलित इस्लामिक सेना और मराठाओं के बीच लड़ा गया। अवध के नवाब ने इसे इस्लामिक सेना का नाम दिया और बाकी मुसल्मानों को भी इस्लाम के नाम पर इकट्ठा किया। जबकि मराठा सेना ने अन्य हिन्दू राजाओं से सहायता की उम्मीद की थी (राजपूतों और जाटों) जो कि उन्हें न मिल सकी। इस युद्ध में इस्लामिक सेना में ६००००- 100000 सैनिक और मराठाओं के ओर से ४५०००-६०००० सैनिकों ने भाग लिया।

    15 जनवरी 1761 को हुए इस युद्ध में भूखे ही युद्ध में पहुँचे मराठाओं को सुरवती विजय के बाद हार का मुख देखना पड़ा . इस युद्ध में दोनों पक्षों की हानियों के बारे में इतिहासकारों में भारी मतभेद है। फिर भी ये माना जाता है कि इस युद्ध में १२०००० लोगों ने सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था जिसमें अहमद शाह अब्दाली विजय हुई थी

    जिनकी सहायता की… वहीं निकले गद्दार!

    मराठों द्वारा अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ़ जंग का ऐलान किया जाना इतिहास में एक निर्णायक घटना बन गयी. मराठों ने न केवल अब्दाली को पराजित करने की योजना बनाई थी, अपितु उन्होंने बंगाल जाकर बढ़ती जा रही ब्रिटिश ताकतों को रोकने का भी मन बना लिया था.अगर यह सम्भव हो पता तो शायद ब्रिटिश साम्राज्य का अंत उसके उदय से पूर्व ही संभव था. किन्तु अपनी ही कुछ कमियों के कारण मराठा अन्दर ही अन्दर कमज़ोर पड़ते जा रहे थे. कहने के लिए कुछ मुग़ल शासक मराठों के साथ थे, किन्तु उनकी वफ़ादारी हमेशा संदेहपूर्ण रही.दूसरी तरफ छत्रपति शिवाजी के समय मराठों के राजपूतों से बहुत घनिष्ट सम्बन्ध थे, किन्तु 1750 के बाद मराठा राजपूतों के आपसी झगड़ों में हस्तक्षेप कर के किसी एक का पक्ष लेने लगे तथा इस तरह इन्हें दूसरे पक्ष की नाराज़गी झेलनी पड़ी. राजा सूरजमल मराठों के कट्टर समर्थक, किन्तु जब उन्होंने दिल्ली का गवर्नर बनने की इच्छा ज़ाहिर की तब मराठों ने उन्हें छोड़ शुजाउद्दौला को चुन लिया. इस कारण राजा सूरजमल का मोह भंग हो गया.

    शुजाउद्दौला का पक्ष लेने के मराठों के पास दो कारण थे. पहला यह कि उनके पास 50,000 अश्वारोहियों की मजबूत सेना थी. दूसरा यह कि शुजाउद्दौला शिया मुस्लिम थे. वह अफ़गानी सुन्नियों के पक्ष में कभी नहीं जा सकते थे. हालांकि, मराठों का अनुमान उस समय गलत साबित हुआ, जब अब्दाली के इस्लामिक एकता की बात से सहमत होकर शुजाउद्दौला उसके पक्ष में हो गए.

    Shuja-ud-Daula

    दोनों पक्षों को मिली बाहरी सहायता

    14 अप्रैल 1760 को मराठा सेना भाऊ सदाशिव राव के नेतृत्व में पुणे से दिल्ली की ओर प्रस्थान हुई. यहाँ से प्रस्थान करते समय मराठा सैन्यबल में 50,000 पैदल सैनिक थे. आगे के सफ़र में जैसे-जैसे मराठों को अपने सहायकों की मदद मिली, वैसे-वैसे उनकी संख्या बढ़ती गयी. महेंदले, शमशेरबहुर, विंचुरकर, पवार बड़ोदा के गायकवाड़ और मानकेश्वर जैसी अनुभवी सेनाएं ने मराठों की ताक़त को दुगना कर दिया.इब्राहिम खान गर्दी का भी मराठों की ओर से इस युद्ध में विशेष योगदान रहा. गर्दी के फ़्रांस में निर्मित रायफलों के साथ 8000 सैनिक जो फ़्रांसिसी प्रशिक्षण के द्वारा प्रशिक्षित थे, वह मराठों के साथ आ मिलीं. गर्दी के पास 200 उत्कृष्ट बंदूकें तथा युद्ध तोपें भी थीं, जिनका उन दिनों विशेष महत्व था.

    मई और जून के बीच जब मराठा आगरा पहुंचे तब मल्हारराव होलकर तथा जुनकोजी सिंधिया भी अपनी सेनाओं के साथ मराठा सेना में शामिल हो गए. इसी कड़ी में मराठा सेना जब दिल्ली पहुंची, तब उनकी सैन्यशक्ति 2 लाख थी. मुग़ल सम्राट मराठों की सहायता के लिए संधिबद्ध थे. दूसरी तरफ दिल्ली में मराठों के बहुत कम शुभचिंतक थे. असल में वे मराठों के बढ़ते वर्चस्व से खुश नहीं थे.इसका फायदा उठाते हुए नजीब खान जैसे बादशाहों ने तो अब्दाली को विशेष रूप से आमंत्रित किया था. 1739 में भी मुग़ल नेताओं द्वारा नादिर शाह को इसी तरह आमंत्रित किया गया था, किन्तु नादिर शाह ने भारत को लूटते वक़्त हिन्दू मुस्लिम में कोइ भेदभाव नहीं किया. साथ ही मुग़ल सम्राट का मयूर मुकुट अथवा कोहिनूर हीरे सहित लगभग 100 करोड़ की सम्पति भारत से लूट कर ले गया.दिलचस्प बात तो यह थी कि अब्दाली ने केवल लूट के मंसूबे के साथ भारत में कदम नहीं रखे थे, अपितु उसका सपना दिल्ली के सिंहासन को मुगलों के हाथों छीनना था. इसी के तहत उसने उत्तरी दिल्ली में बसे हुए अफगानियों को अपनी तरफ कर लिया, जोकि इस युद्ध में फायदेमंद साबित हुआ.

    Maratha Warrior 

    मकरसंक्रांति के दिन रण में मृत्यु का तांडव!

    14 जनवरी 1761 मकर संक्रांति के दिन पानीपत के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने आयीं. उसके बाद रण में शुरू हुआ मृत्यु का तांडव. इब्राहिम गर्दी की वेशेष बंदूकों अथवा तोपों ने रणभूमि में हाहाकार मचा रखा था. ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मराठा आज नया इतिहास लिखेंगे, किन्तु शाम होते-होते युद्ध की स्थिति पूरी तरह से बदल चुकी थी.दोनों पक्षों के लगभग 40,000 सैनिक काल के ग्रास बन चुके थे. पेशवा के पुत्र भाऊ विश्वासराव, जसवंत राव पवार तथा तुकोजी सिंधिया सहित कितने योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए. इस युद्ध के विनाश का अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि महाराष्ट्र का कोई भी ऐसा परिवार नहीं था, जिनका कम से कम एक सगा-संबंधी इस युद्ध में मारा न गया हो.मराठों की ओर से मरने वाले केवल सैनिक ही नहीं, अपितु आम नागरिक भी थे, जो सेना के साथ तीर्थयात्रा के लिए जा रहे थे. मराठों की हार के बाद अब्दाली ने अपनी सेना के साथ इन नागरिकों को मारते हुए आगे बढ़ना शुरू कर दिया.पुरुषों को मार दिया गया तथा महिलाओं अथवा बच्चों को गुलाम बना लिया गया.

    …इसलिए जीतते-जीतते हार गए मराठा

    अगर आप सोचते हैं कि अब्दाली की सेना ने मराठों को परास्त किया, तो आपका ऐसा सोचना पूर्णरूप से सही नहीं है. मराठों को अब्दाली की सेना ने नहीं, अपितु ठंड ने हराया था. मराठा सेना युद्धस्थल के मौसम से अंजान थी तथा पतली धोती और कुरता पहन कर हथियारों के साथ जंग के मैदान में कूद पड़ी, जिसका परिणाम यह हुआ कि सर्दी से उनकी हालत पस्त हो गयी. जबकि, अब्दाली को इस मौसम का पूरा अनुमान था. उसने अपनी सेना को मौसम के अनुकूल पोशाक पहनाकर युद्ध में उतारा था.

    दूसरी तरफ सदाशिव भाऊ की भावुकता ने मराठों की पराजय पहले ही सुनिश्चित कर दी थी. हुआ यूं था कि युद्ध मैदान में विश्वासराव भाऊ को गोली लग गयी. विश्वासराव भाऊ सदाशिव राव के अत्यंत प्रिय थे. उन्हें इस अवस्था में देखकर सदाशिव राव बिना कुछ सोचे समझे अपने हाथी से उतर कर घोड़े पर सवार होकर विश्वासराव के पास चले गए.इधर, सदाशिव राव भाऊ के हाथी पर उन्हें ना पाकर मराठा सेना भयभीत हो गयी. उन्हें लगा कि भाऊ वीरगति को प्राप्त हो गए. परिणाम स्वरूप हार की ओर बढ़ती अब्दाली की सेना में नया जोश आ गया और वो फिर से उठ खड़े हुए.

    Bhau Sadashiv Rao (Pic : Dattakordeblog)

    इस युद्ध में एक दिन में तकरीबन 40,000 योद्धा मरे गए, जो किसी भी सामान्य युद्ध में मरने वाले योद्धाओं की संख्या से बहुत ज़्यादा थे. भारत की दुर्गति का हमेशा से यही कारण रहा है कि यहाँ राजाओं अथवा बादशाहों ने अपना-अपना फ़ायदा सोचा तथा बाहरी दुश्मनों को पनाह दी.इसके विपरीत अगर शुरुआत से सभी एकजुट हो कर लड़ते, तो शायद आज हमारा देश सबसे शक्तिशाली होता. दौर कोई भी हो लेकिन हमारे देश पर राजनीति हमेशा हावी रही है.पानीपत की लड़ाई और उसके परिणाम से हम यह निष्कर्ष तो निकाल ही सकते हैं. इस बारे में इतिहासकार ‘जे.एन. सरकार’ ने सच ही लिखा है कि –

    महाराष्ट्र में सम्भवतः ही कोई ऐसा परिवार होगा, जिसने कोई न कोई सगा सम्बन्धी न खोया हो, तथा कुछ परिवारों का तो विनाश ही हो गया।’

    पानीपत की लड़ाई में भाग लेने आए सदाशिवराम राजा भाऊ की सेना ने पानीपत से लगभग सात किलोमीटर दूर जाटल रोड पर बसे गांव भादौड़ में पड़ाव डाला था तथा राजा भाऊ ने शिव के चमत्कार से प्रभावित होकर प्रगटेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना की।

    मराठा पराजय के कारण

    पानीपत के इस युद्ध में मराठों की पराजय के महत्त्वपूर्ण कारण इस प्रकार थे-

    1. अहमदशाह अब्दाली की सेना, सदाशिवराव भाऊ की सेना से अधिक थी।
    2. उत्तर भारत की सभी मुसलमान शक्तियाँ अब्दाली के साथ थीं।
    3. इस युद्ध के पूर्व में मराठों ने राजपूतजाट तथा सिक्खों को हर प्रकार से लूटा तथा बरबाद किया था। इसीलिए इन लोगों ने मराठों का साथ नहीं दिया।
    4. मराठा सरदारों के आपसी मतभेद भी काफ़ी हद तक बढ़ चुके थे।
    5. मराठों के सैनिक शिविर में अकाल की स्थिति थी। सैनिकों के लिए पर्याप्त रसद का इंतजाम नहीं था।
    6. सैनिक संगठन की दृष्टि से अब्दाली पूरी तरह से श्रेष्ठ संगठनकर्ता था।

    इतिहासकारों के मत

    पानीपत के तृतीय युद्ध के प्रभाव के बारे में जहाँ एक तरफ़ मराठा इतिहासकारों का मानना है कि, केवल 75,000 सैनिकों की हानि के अतिरिक्त मराठों ने कुछ भी नहीं खोया, वहीं दूसरी ओर ‘जी.एस. सरदेसाई’ का मानना है कि, ‘पानीपत का युद्ध मराठों की अभूतपूर्ण क्षति है।’ पानीपत के तृतीय युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी ‘काशीराज पंडित’ के शब्दों में- ‘पानीपत का तृतीय युद्ध मराठों के लिए प्रलयकारी सिद्ध हुआ।

    विश्लेषण

    वस्तुतः पानीपत के इस युद्ध ने यह निर्णय नहीं दिया, कि भारत पर कौन राज्य करेगा, अपितु यह तय कर दिया, कि भारत पर कौन शासन नहीं करेगा। मराठों की पराजय के बाद ब्रिटिश सत्ता के उदय का रास्ता क़रीब-क़रीब साफ़ हो गया। अप्रत्यक्ष रूप से सिक्खों को भी मराठों की पराजय से फ़ायदा हुआ। इस युद्ध ने मुग़ल सम्राट को लगभग निर्जीव सा कर दिया, जैसा कि बाद के कुछ वर्ष सिद्ध करते हैं। पानीपत के युद्ध के सदमें को न सह पाने के कारण बालाजी बाजीराव की कुछ दिन बाद मृत्यु हो गई। पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठों के पराजय की सूचना बालाजी बाजीराव को एक व्यापारी द्वारा कूट सन्देश के रूप में पहुँचायी गयी थी, जिसमें कहा गया कि, ‘दो माती विलीन हो गये, बाइस सोने की मुहरें लुप्त हो गईं और चांदी तथा तांबे की तो पूरी गणना ही नहीं की जा सकती।’

  • अमरीका ने ब्रिटेन के साथ 1784 में शांति संधि की पुष्टि की।
  • इंग्लैंड और स्पेन ने 1809 में ‘नेपोलियन बोनापार्ट‘ के ख़िलाफ़ गठबंधन किया।
  • नेपोलियन तृतीय की हत्या की साजिश का 1858 में भंडाफोड़ हुआ।
  • पेरू ने स्पेन के ख़िलाफ़ 1867 में जंग का ऐलान किया।
  • 1907 में हुए जमैका में भूकंप से किंगस्टन शहर तबाह हो गया और लगभग 900 से अधिक लोग मारे गये।
  • रेमंड पोंकारे 1912 में फ्रांस के प्रधानमंत्री बने।
  • फ्रांस के पूर्व प्रधानमंत्री जोसेफ कैलाक्स को 1918 में देशद्रोह के आरोप में गिरफ़्तार किया गया।
  • ईरान में मुहम्मद सईद ने 1950 में सरकार का गठन किया।
  • जगदगुरु कृपालु महाराज ने 1954 में 7 दिनों तक 500 से ज्यादा हिन्दू विद्वानों के समक्ष भाषण दिया। उन्हें पाँचवाँ जगदगुरु चुना गया।
  • अल्जीरिया के शहरों में 1962 में हुए आतंकवादी हमलों में 6 लोग मारे गये।
  • इंडोनेशिया ने 1966 में राष्ट्रसंघ स्थित अपना मिशन बंद कर दिया।
  • 1969 में भारत के दक्षिणी राज्य मद्रास का नाम बदलकर तमिलनाडु किया गया।
  • विश्व फुटबाल लीग की स्थापना 1974 में की गयी।
  • सोवियत संघ ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को 1975 में समाप्त किया।
  • श्रीमती इंदिरा गाँधी ने 1982 में 20सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की।
  • ग्वाटेमाला में विनिसियों केरजो 1986 में 6 वर्षों में पहले असैनिक राष्ट्रपति बने।
  • मध्य अमेरिकी देश ग्वाटेमाला में 1986 में संविधान लागू हुआ।
  • 1989 से इलाहबाद में बारह वर्ष बाद कुम्भ का मेला प्रारम्भ हुआ।
  • इज़रायल ने जार्डन के साथ 1992 में शांतिवार्ता शुरू की।
  • यूक्रेन, रूस तथा संयुक्त राज्य अमेरीका द्वारा मास्को में परमाणु अस्त्र कम करने सम्बन्धी समझौते पर 1994 में हस्ताक्षर।
  • भारत का पहला अत्याधुनिक ‘हवाई यातायात परिसर’, दिल्ली राष्ट्र को 1999 में समर्पित किया गया।
  • कम्प्यूटर के बादशाह बिल गेट्स ने 2000 में स्टीव वाल्मर को विश्व की सबसे बड़ी कम्प्यूटर साफ़्टवेयर कम्पनी सौंपी।
  • नेपाल में अंतरिम संविधान को 2007 में मंजूरी मिली।
  • सरकार ने विदेशी पत्रों के फेसीमाइल (प्रति) संस्करणों से शत-प्रतिशत विदेशी निवेश को मंज़ूरी देने की 2009 में घोषणा की।

14 जनवरी को जन्मे व्यक्ति – Born on 14 January

  • 1551 को मुग़ल साम्राज्य में अकबर के नवरत्नों में से एक अबुल फ़जल का जन्म हुआ।
  • 1804 में मशहूर संगीतकार जॉन पार्क का जन्म हुआ।
  • 1886 में समाज सुधारक मंगूराम का जन्म हुआ।
  • 1896 में ब्रिटिश शासन के अधीन आई.सी.एस. अधिकारी और स्वतंत्रता के बाद भारत के तीसरे वित्त मंत्री सी. डी. देशमुख का जन्म हुआ।
  • 1905 में हिन्दी व मराठी फ़िल्मों की प्रसिद्ध अभिनेत्री दुर्गा खोटे का जन्म हुआ।
  • 1918 में पुर्तग़ाली साम्राज्यवादियों से गोवा की मुक्ति के स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख नेता सुधाताई जोशी का जन्म हुआ।
  • 1926 में भारत की सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म हुआ।
  • 1942 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 36वें भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश योगेश कुमार सभरवाल का जन्म हुआ।
  • 1967 में अमेरिकी अभिनेत्री एमिली वॉटसन का जन्म हुआ।
  • 1977 में भारत के एकमात्र फ़ॉरमूला वन चालक नारायण कार्तिकेयन का जन्म हुआ।
14 जनवरी को हुए निधन – Died on 14 January
  • 1742 में एडमंड हैली का निधन हुआ जो एक प्रसिद्ध खगोलशास्त्री थे।
  • 1937 में जयशंकर प्रसाद का निधन हुआ जो हिन्दी साहित्यकार थे।

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