2019  विपक्षी रणनीति:  मोदी को निशाने पर रखा तो भाजपा को लाभ 

 अगला आम चुनाव 2014 जैसा नहीं होगा। प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी इस बार सत्ता में हैं। वह चैलेंजर नहीं हैं। अपनी क्षमता साबित करना और ‘उपलब्धियों’ की मार्केटिंग करना सत्ता में मौजूद लोगों पर सवाल उठाने के मुकाबले मुश्किल काम है। 2019 में होने वाला आम चुनाव यह भी दिखा देगा कि गठबंधनों का दौर खत्म हो गया या नहीं। 1980 के लोकसभा चुनाव ने साबित किया था कि 1977 में इंदिरा गांधी की बहुत बड़ी हार के बावजूद एक दल का दबदबा रहने का दौर खत्म नहीं हुआ है। उसी तरह सालभर में हमें पता चल जाएगा कि 2014 भारतीय राजनीति और चुनावी इतिहास में ‘अपवाद’ था या टर्निंग प्वाइंट।  पिछले महीने से सामने आ रहा घटनाक्रम बदलती हवा का संकेत दे रहा है। उप चुनाव के नतीजे भारतीय जनता पार्टी   के खिलाफ गए, वहीं केंद्र सरकार को कई विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा है। 2014 में विकास और बदलाव के वादों पर भरोसा कर जिन सामाजिक-आर्थिक समूहों और युवाओं ने मोदी का पुरजोर समर्थन किया था, उस वोट बैंक में दरारें दिखने लगी हैं।

नौकरियों का वादा छलावा बन गया है और युवाओं में असंतोष घर कर रहा है। कृषि क्षेत्र के लिए किए गए वादे भी हकीकत नहीं बन सके हैं और खेती अब भी ‘अलाभकारी’ बनी हुई है। हालांकि इससे भी अहम बात यह है कि जिस सामाजिक गठजोड़ ने भाजपा को लोगों को जातियों से परे हिंदू के रूप में एकजुट करने में मदद की थी, वह बिखरता नजर आ रहा है।अनुसूचित जाति /अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक ) अधिनियम एससी-एसटी एक्ट (प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज) एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद शुरू हुई बहस और विरोध प्रदर्शनों से आरक्षण पर कई दशकों से चली आ रही सुलह दरकने लगी है। 2014 के बाद से विधानसभा चुनावों में किसी अखिल भारतीय दलित पहचान का उभार नहीं दिखा था। भाजपा ने विभिन्न चुनावों में दलितों की उन उप-जातियों को अपने पाले में गोलबंद किया, जो पीछे चल रही थीं। ऐसा खासतौर से पिछले साल उत्तर प्रदेश चुनाव में हुआ था। हालांकि कथित सवर्ण समुदाय दलितों के उभार को पचा नहीं पा रहा है। वहीं दलित समुदाय मोटर साइकिलों या घोड़ों की सवारी करने, मूंछें उमेठने या पद्मावत फिल्म के घूमर गीत पर डांस करने जैसे तरीकों को संपन्नता के प्रतीकों के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। ऐसी स्थिति एक जाति समूह को दूसरे के खिलाफ खड़ा कर सकती है और इससे राजनीतिक तौर पर सबको गोलबंद करना मुश्किल हो सकता है। समुदाय के रूप में इन दोनों ने ही भाजपा को सपोर्ट किया था, लेकिन बदले हालात सत्ता में नरेंद्र मोदी की वापसी की राह मुश्किल बना सकते हैं। हालांकि भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों की एकजुटता को लेकर उत्साह भ्रम पैदा कर सकता है। 1971 में जब इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को सबसे बड़ी चुनावी जीत दिलाई थी, तो उनके सामने राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय दलों का एक महागठबंधन था। उन्होंने कागज पर अजेय दिख रहे इस चुनावी गठबंधन को महज एक नारे से ध्वस्त कर दिया था और वह नारा था, ‘वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ।’

भाजपा को हराने के उत्साह में विपक्षी नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह मौका दे रहे हैं कि वह अगले चुनाव को अपने बारे में जनमत संग्रह में बदल दें। जुमलेबाजों को यह नारा देने में बहुत मजा आएगा कि ‘राहुल (आप अपनी पसंद के विपक्षी नेता का नाम यहां रख सकते हैं) का वादा, मोदी मुक्त भारत।’ कांग्रेस अध्यक्ष के यह कहने से कोई बड़ी बात नहीं बन रही कि नरेंद्र मोदी वाराणसी में भी हार सकते हैं। नरेंद्र मोदी की निजी हार एक साइड स्टोरी से ज्यादा कुछ नहीं है। नरेंद्र मोदी विरोधी कैंपेन तेज होने पर भाजपा के लिए अपने कैंपेन को यश चोपड़ा की फिल्म दीवार के सेंटीमेंट से जोड़ने में आसानी होगी यानी भाजपा कह सकती है, मेरे पास मोदी है। निजी लोकप्रियता के लिहाज से नरेंद्र मोदी सबसे आगे चल रहे हैं, लिहाजा चुनाव को व्यक्तिगत आरोप वाले कैंपेन में बदलने से बात नहीं बनेगी।

—-लेखक नीलांजन मुखोपाध्यायImage result for नीलांजन मुखोपाध्याय Image result for नीलांजन मुखोपाध्यायImage result for नीलांजन मुखोपाध्यायजैसी पुस्तकों के रचियता

पत्रकार हैं

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