हिन्दी आलोचक डॉ. नगेन्द्र का जन्म और भाषाविज्ञानी जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन का निधन हुआ था आज

9 मार्च का इतिहास

देश और दुनिया के इतिहास में आज के दिन कई घटनाएं हुईं, जानते हैं आज के दिन यानि 9 मार्च के इतिहास के बारे में –

9 March History अर्थशास्त्र पर एडम स्मिथ की मशहूर पुस्तक ‘द वेल्थ ऑफ नेशन्स’ का 1776 में प्रकाशन।

  • चार्ल्स एग ग्राहम ने 1822 में पहली बार नकली दांतो का पेटेंट कराया।
  • जापान ने 1860 में पहली बार अमेरिका में अपना राजदूत नियुक्त किया।
  • 50, 100  1000 डॉलर की मुद्रा को 1861 में शामिल किया गया।
  • जर्मनी ने 1916 में पुर्तगाल के खिलाफ युद्ध की घोषणा की।
  • रूसी बोल्शेविक पार्टी 1918 में कम्युनिट पार्टी बनी।
  • दुनिया में सबसे ज्‍यादा पसंद की जाने वाली बार्बी डॉल ने 1959 में न्‍यूयार्क के अमेरिकन टॉय फेयर में अपनी जिंदगी शुरू की थी।
  • प्रसिद्ध भारतीय अभिनेत्री देविका रानी का 1994 में निधन।
  • भारतीय मूल के, ब्रिटिश आधारित दिग्गज उद्योगपति स्वराज पॉल को 1999 में सेंट्रल बर्मिघम विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की गयी।
  • पाकिस्तान ने 2004 में 2000 किमी मारक क्षमता वाले सतह तक मार करने वाले ‘शाहीन-2’ (हत्फ-6) प्रक्षेपास्त्र का सफल परीक्षण किया।
  • थाक्सिन शिनवात्रा 2005 में दूसरे कार्यकाल के लिए थाइलैंड के प्रधानमंत्री चुने गये।
  • ब्रिटेन में भारतीय डॉक्टरों को भेदभाव वाले प्रवासी नियमों पर 2007 में क़ानूनी कामयाबी मिली।
  • गोवा के राज्यपाल एस.सी.जमीर ने 2008 में महाराष्ट्र के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार ग्रहण किया।

9 मार्च को जन्मे व्यक्ति

  • भारत के प्रसिद्ध हिन्दी आलोचक साहित्यकार डॉ. नगेन्द्र Image result for डॉ. नगेन्द्रका 1915 में जन्म।डॉ॰ नगेन्द्र (जन्म: 9 मार्च 1915 अलीगढ़, मृत्यु: 27 अक्टूबर 1999 नई दिल्ली) हिन्दी के प्रमुख आधुनिक आलोचकों में थे। वे एक सुलझे हुए विचारक और गहरे विश्लेषक थे।अपनी सूझ-बूझ तथा पकड़ के कारण वे गहराई में पैठकर केवल विश्लेषण ही नहीं करते, बल्कि नयी उद्भावनाओं से अपने विवेचन को विचारोत्तेजक भी बना देते थे। उलझन उनमें कहीं नहीं थी। ‘साधारणीकरण’ सम्बन्धी उनकी उद्भावनाओं से लोग असहमत भले ही रहे हों, पर उसके कारण लोगों को उस सम्बन्ध में नये ढंग से विचार अवश्य करना पड़ा है। ‘भारतीय काव्य-शास्त्र’ (1955ई.) की विद्वत्तापूर्ण भूमिका प्रस्तुत करके उन्होंने हिन्दी में एक बड़े अभाव की पूर्ति की। उन्होंने ‘पाश्चात्य काव्यशास्त्र : सिद्धांत और वाद’ नामक आलोचनात्मक कृति में अपनी सूक्ष्म विवेचन-क्षमता का परिचय भी दिया। अरस्तू के काव्यशास्त्र की भूमिका-अंश उनका सूक्ष्म पकड़, बारीक विश्लेषण और अध्यवसाय का परिचायक है। बीच-बीच में भारतीय काव्य-शास्त्र से तुलना करके उन्होंने उसे और भी उपयोगी बना दिया है। उन्होंने हिंदी मिथक को भी परिभाषित किया है।उनका जन्म मार्च, 1915 ई. में अतरौली (अलीगढ़) में हुआ था। उन्होंने अंग्रेज़ी और -हिन्दी में एम.ए. करने के बाद हिंदी में डी.लिट. की उपाधि भी ली।Image result for डॉ. नगेन्द्र

    कार्यक्षेत्र

    डा नगेंद्र का साहित्यिक जीवन कवि के रूप में आरंभ होता है। सन 1937 ई. में उनका पहला काव्य संग्रह ‘वनबाला’ प्रकाशित हुआ। इसमें विद्यार्थीकाल की गीति-कविताएँ संग्रहीत हैं। एम.ए. करने के बाद वे दस वर्ष तक दिल्ली के कामर्स कॉलेज में अंग्रेज़ी के अध्यापक रहे। पाँच वर्ष तक ‘आल इंडिया रेडियो’ में भी कार्य किया। बाद में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अध्यक्ष पद से निवृत्त होकर वहीं रहने लगे थे।27 अक्टूबर 1999 को नई दिल्ली में उनका निधन हुआ।

    समालोचना

    डा नगेंद्र की शैली तर्कपूर्ण, विश्लेषणात्मक तथा प्रत्यायक है। यह सब होते हुए भी उसमें सर्वत्र एक प्रकार की अनुभूत्यात्मक सरसता मिलती है। वे अपने निबंधों और प्रबंधों को जब तक अपनी अनुभूति का अंग नहीं बना लेते तब तक उन्हें अभिव्यक्ति नहीं देते। अतः उनकी समीक्षाओं में विशेषरूप से निबंधों में भी सर्जना का समावेश रहता है।

    ‘साहित्य-संदेश’ में प्रकाशित उनके लेखों ने उनकी ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। उनकी तीन आलोचनात्मक कृतियाँ प्रकाशित हुईं – ‘सुमित्रानंदन पंत'(1938ई.), ‘साकेत- एक अध्ययन'(1939ई.) और ‘आधुनिक हिंदी नाटक'(1940ई.)। पहली पुस्तक का पाठकों और आलोचकों के बीच खूब स्वागत हुआ। वे अंग्रेज़ी के श्रेष्ठ आलोचकों की कृतियों से प्रभावित थे और उन कृतियों की तरह ही वे उच्चस्तरीय समीक्षा-पुस्तक प्रस्तुत करना चाहते थे। ‘साकेत-एक अध्ययन’ पर इस मनोवृत्ति का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है।

    ‘आधुनिक हिंदी नाटक’ में उनके आलोचक स्वरूप ने एक नया मोड़ लिया और वे फ्रायडीय मनोविज्ञान के क्षेत्र में आ गए। उन्होंने फ्रायड के मनोविश्लेषण शास्त्र के आधार पर नाटक और नाटककारों की आलोचनाएँ लिखीं। बाद में क्रोचे आदि के अध्ययन के फलस्वरूप उनका झुकाव सैद्धांतिक आलोचना की ओर हुआ। ‘रीति-काव्य की भूमिका’ तथा ‘देव और उनकी कविता’ (1949 ई. – शोध ग्रंथ) के भूमिका भाग में भारतीय काव्य-शास्त्र पर विचार किया गया है, जिसमें उनके मनोविश्लेषण-शास्त्र के अध्ययन से काफ़ी सहायता मिली है।

    नगेंद्र मूलतः रसवादी आलोचक हैं, रस सिद्धांत में उनकी गहरी आस्था है। फ्रायड के मनोविश्लेषण-शास्त्र को उन्होंने एक उपकरण के रूप में ग्रहण किया है, जो रस सिद्धांत के विश्लेषण में पोषक की सिद्ध हुआ है। हिंदी की आलोचना पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल का गहरा प्रभाव पड़ा है और सच पूछिए तो आज की हिंदी- आलोचना शुक्ल जी के सिद्धांतों का अगला कदम ही है। नगेंद्र पर भी शुक्ल जी का प्रभाव पड़ा। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि रस-सिद्धांतों की ओर उनके झुकाव के मूल में शुक्ल जी का ही प्रभाव है। नगेंद्र जी काव्य में रस-सिद्धांत को अंतिम मानते हैं। इसके बाहर न तो वे काव्य की गति मानते है और न सार्थकता।

    पौरस्त्य आचार्यों में वे भट्टनायक और अभिनवगुप्त से विशेष प्रभावित हैं और पाश्चात्य आलोचकों में क्रोचे और आई.ए. रिचर्डस से। उन्होंने भारतीय तथा पाश्चात्य काव्य-शास्त्र दोनों का गहरा आलोकन किया है। दोनों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर उनका कहना है कि सैद्धांतिक आलोचना के क्षेत्र में भारतीय-काव्य शास्त्र पश्चिमी काव्य-शास्त्र से कहीं आगे बढ़ा हुआ है।

    भारतीय और पाश्चात्य आचार्यों ने काव्य-बोध के संबंध में अलग-अलग पद्धतियाँ अपनाई हैं। भारतीय आचार्यों ने काव्य-चर्चा करते समय सह्रदय को विवेचन का केंद्रीय विषय माना है तो पाश्चात्य आचार्यों ने कवि को केंद्रीय विषय मानकर सृजन-प्रक्रिया की व्याख्या की है। ये दोनों दृष्टियाँ एक दूसरे की पूरक हैं, अपने आप में प्रत्येक एकांगी ही रह जाती हैं। नगेंद्र ने इन दोनों पद्धतियों के समन्वय का प्रयास किया है।

    प्रमुख कृतियाँ

    आपकी अन्य मौलिक रचनाओं में ‘विचार और विवेचन’ (1944), ‘विचार और अनुभूति’ (1949), ‘आधुनिक हिंदी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ (1951), ‘विचार और विश्लेषण'(1955), ‘अरस्तू का काव्यशास्त्र’ (1957), ‘अनुसंधान और आलोचना’ (1961), ‘रस-सिद्धांत (1964), ‘आलोचक की आस्था’ (1966), ‘आस्था के चरण’ (1969), ‘नयी समीक्षाः नये संदर्भ (1970), ‘समस्या और समाधान’ (1971) प्रमुख हैं।

  • विख्यात भारतीय विधिवेत्ता और भारत के पूर्व महान्यायवादी सोली जहांगीर सोराबजी का 1930 में जन्म।
  • भारतीय राजनेता और लेखक कर्ण सिंह का 1931 में जन्म।
  • रूसी सोवियत पायलट और कॉस्‍मोनॉट यूरी गैगरिन का 1934 में जन्‍म हुआ था।
  • प्रसिद्ध बाल साहित्यकार एवं संपादक हरिकृष्ण देवसरे का 1938 में जन्म।
  • मशहूर तबला वादक उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का 1951 में जन्म।
  • भारतीय लेखक शशि थरूर का 1956 में जन्म।
  • भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी पार्थिव पटेल का 1985 में जन्म।
  • भारतीय बाल कलाकार दरशील सफ़ारी का 1996 में जन्म।

9 मार्च को हुए निधन

  • प्रसिद्ध भाषाविज्ञानी,इतिहासकार, अंग्रेज़ी साहित्यकार जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन का 1941 में निधन।जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (1851-1941) अंग्रेजों के जमाने में “इंडियन सिविल सर्विस” के कर्मचारी थे। भारतीय विद्याविशारदों में, विशेषत: भाषाविज्ञान के क्षेत्र में, उनका स्थान अमर है। सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन “लिंग्विस्टिक सर्वे ऑव इंडिया” के प्रणेता के रूप में अमर हैं। ग्रियर्सन को भारतीय संस्कृति और यहाँ के निवासियों के प्रति अगाध प्रेम था। भारतीय भाषाविज्ञान के वे महान उन्नायक थे। नव्य भारतीय आर्यभाषाओं के अध्ययन की दृष्टि से उन्हें बीम्स, भांडारकर और हार्नली के समकक्ष रखा जा सकता है। एक सहृदय व्यक्ति के रूप में भी वे भारतवासियों की श्रद्धा के पात्र बने।

    जीवनी

    ग्रियर्सन का जन्म डब्लिन के निकट 7 जनवरी 1851 को हुआ था। उनके पिता आयरलैंड में क्वींस प्रिंटर थे। 1868 से डब्लिन में ही उन्होंने संस्कृत और हिंदुस्तानी का अध्ययन प्रारंभ कर दिया था। बीज़ (Bee’s) स्कूल श्यूजबरी, ट्रिनटी कालेज, डब्लिन और केंब्रिज तथा हले (Halle) (जर्मनी) में शिक्षा ग्रहण कर 1873 में वे इंडियन सिविल सर्विस के कर्मचारी के रूप में बंगाल आए और प्रारंभ से ही भारतीय आर्य तथा अन्य भारतीय भाषाओं के अध्ययन की ओर रुचि प्रकट की। 1880 में इंस्पेक्टर ऑव स्कूल्स, बिहार और 1869 तक पटना के ऐडिशनल कमिश्नर और औपियम एज़ेंट, बिहार के रूप में उन्होंने कार्य किया। सरकारी कामों से छुट्टी पाने के बाद वे अपना अतिरिक्त समय संस्कृत, प्राकृत, पुरानी हिंदी, बिहारी और बंगला भाषाओं और साहित्यों के अध्ययन में लगाते थे। जहाँ भी उनकी नियुक्ति होती थी वहीं की भाषा, बोली, साहित्य और लोकजीवन की ओर उनका ध्यान आकृष्ट होता था।

    कार्य

    1873 और 1869 के कार्यकाल में ग्रियर्सन ने अपने महत्वपूर्ण खोज कार्य किए।Image result for जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन

    • उत्तरी बंगाल के लोकगीत, कविता और रंगपुर की बँगला बोली – जर्नल ऑव दि एशियाटिक सोसायटी ऑव बंगाल, 1877, जि. 1 सं. 3, पृ. 186-226Image result for जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन
    • राजा गोपीचंद की कथा; वही, 1878, जि. 1 सं. 3 पृ. 135-238
    • मैथिली ग्रामर (1880)Image result for जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सनImage result for जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन
    • सेवेन ग्रामर्स आव दि डायलेक्ट्स ऑव दि बिहारी लैंग्वेज (1883-1887)
    • इंट्रोडक्शन टु दि मैथिली लैंग्वेज;
    • ए हैंड बुक टु दि कैथी कैरेक्टर,Image result for जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन
    • बिहार पेजेंट लाइफ,Image result for जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन
    • बीइग डेस्क्रिप्टिव कैटेलाग ऑव दि सराउंडिंग्ज ऑव दि वर्नाक्युलर्स, जर्नल ऑव दि जर्मन ओरिएंटल सोसाइटी (1895-96),
    • कश्मीरी व्याकरण और कोश,Image result for जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन
    • कश्मीरी मैनुएल,
    • पद्मावती का संपादन (1902) महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी की सहकारिता में,
    • बिहारीकृत सतसई (लल्लूलालकृत टीका सहित) का संपादन,
    • नोट्स ऑन तुलसीदास,
    • दि माडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑव हिंदुस्तान (1889)Image result for जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सनImage result for जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन

    आदि उनकी कुछ महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं।

    उनकी ख्याति का प्रधान स्तंभ लिंग्विस्टिक सर्वे ऑव इंडिया Image result for जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सनही है। 1885 में प्राच्य विद्याविशारदों की अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस ने विएना अधिवेशन में भारतवर्ष के भाषा सर्वेक्षण की आवश्यकता का अनुभव करते हुए भारतीय सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया। फलत: भारतीय सरकार ने 1888 में ग्रियर्सन की अध्यक्षता में सर्वेक्षण कार्य प्रारंभ किया। 1888 से 1903 तक उन्होंने इस कार्य के लिये सामग्री संकलित की। 1902 में नौकरी से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् 1903 में जब उन्होंने भारत छोड़ा, सर्वे के विभिन्न खंड क्रमश: प्रकाशित होने लगे। वह 21 जिल्दों में है और उसमें भारत की 179 भाषाओं और 544 बोलियों का सविस्तार सर्वेक्षण है। साथ ही भाषाविज्ञान और व्याकरण संबंधी सामग्री से भी वह पूर्ण है। ग्रियर्सन कृत सर्वे अपने ढंग का एक विशिष्ट ग्रंथ है। उसमें हमें भारतवर्ष का भाषा संबंधी मानचित्र मिलता है और उसका अत्यधिक सांस्कृतिक महत्व है। दैनिक जीवन में व्यवहृत भाषाओं और बोलियों का इतना सूक्ष्म अध्ययन पहले कभी नहीं हुआ था। बुद्ध और अशोक की धर्मलिपि के बाद ग्रियर्सन कृत सर्वे ही एक ऐसा पहला ग्रंथ है जिसमें दैनिक जीवन में बोली जानेवाली भाषाओं और बोलियों का दिग्दर्शन प्राप्त होता है।

    इन्हें सरकार की ओर से 1894 में सी.आई.ई. और 1912 में “सर” की उपाधि दी गई। अवकाश ग्रहण करने के पश्चात् ये कैंबले में रहते थे। आधुनिक भारतीय भाषाओं के अध्ययन क्षेत्र में सभी विद्वान् उनका आभार स्वीकार करते थे। 1876 से ही वे बंगाल की रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के सदस्य थे। उनकी रचनाएँ प्रधानत: सोसायटी के जर्नल में ही प्रकाशित हुईं। 1893 में वे मंत्री के रूप में सोसाइटी की कौंसिल के सदस्य और 1904 में आनरेरी फेलो मनोनीत हुए। 1894 में उन्होंने हले से पी.एच.डी. और 1902 में ट्रिनिटी कालेज डब्लिन से डी.लिट्. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। वे रॉयल एशियाटिक सोसायटी के भी सदस्य थे। उनकी मृत्यु 1941 में हुई।

  • भारत के प्रसिद्ध साहित्यकार, कवि, लेखक, व्यंग्यकार और पत्रकार हरिशंकर शर्मा का 1968 में निधन।
  • टाटा समूह और भारत के एक प्रशासक के साथ जुड़े एक प्रख्यात पारसी व्यापारी हारमसजी पेरोशा मोदी का 1969 में निधन।
  • प्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता-निर्देशक के. आसिफ़ का 1971 में निधन।
  • भारतीय अभिनेत्री देविका रानी का 1994 में निधन।
  • मद्रास विधान सभा के सदस्य बी. जी. रेड्डी का 1997 में निधन।
  • हिन्दी फ़िल्मों के मशहूर अभिनेता और निर्माता -निर्देशक जॉय मुखर्जी का 2012 में निधन।

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