हिंदी सिनेमा के अभिनेता मोतीलाल राजवंश का जन्‍म दिन और भारतीय नौसेना दिवस है आज

04 दिसंबर का इतिहासHere s what history says December 4

04 दिसंबर के दिन विश्‍व भर में कई घटनायें घटित हुई, कई महान व्‍यक्तियों ने जन्‍म लिया और कई महान लोगों ने इस दुनिया का अलविदा किया है अगर आप कम्पटीशन की तैयारी कर रहे हैं तो आपको जानना जरूरी है कि 04 दिसंबर के दिन को क्‍या-क्‍या हुआ था, आईये जानते हैं 04 दिसंबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, 04 दिसंबर को जन्मे व्यक्ति,  04 दिसंबर को हुए निधन और 04 दिसंबर के महत्वपूर्ण दिवस –
  • 1829 – वायसराय लार्ड विलियम बेंटिक ने सती प्रथा समाप्त की
  • 1967 – देश के पहले रॉकेट ‘रोहिणी आरएच 75’ का थुम्बा से प्रक्षेपण हुआ

    1977 – मिस्र के विरुद्ध अरब मोर्चा गठित।

    1995 – सं.रा. अमेरिका डेविस कप चैंपियन बना।

    1996 – अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने मंगल ग्रह के लिए एक और अंतरिक्ष यान ‘मार्स पाथफ़ाउंडर’ प्रक्षेपित किया।

    1999 – सं.रा. अमेरिका के अड़ियल रुख़ के कारण सिएटल वार्ता विफल, अगला दौर जिनेवा में कराने की घोषणा, रूसी सेनाओं ने ग्रोज्री के अनगुन शहर पर कब्ज़ा किया।

    2004 – पेरू की मारिया जूलिया मांतिला गार्शिया को मिस वर्ल्ड 2004 चुना गया।

    2006 – फिलीपींस के एक गाँव में तूफ़ान के बाद ज़मीन धंसने से लगभग एक हज़ार लोगों की मौत।

    2008 – प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर को क्लूज सम्मान के लिये चुना गया।

  • 1952 – इंग्लैंड में स्मॉग की घनी परत के छा जाने के कारण हजारों लोगों की जान चली गई थी
  • 1996 – अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने मंगल ग्रह के लिए एक और अंतरिक्ष यान ‘मार्स पाथफ़ाउंडर’ प्रक्षेपित किया
  • 2012 – सीरिया में मोर्टार हमले में 29 लोगों की मौत

04 दिसंबर को जन्मे व्यक्ति 

  • 1910 – रामस्वामी वेंकटरमण, भारत के आठवें राष्ट्रपति

    1919 – इन्द्र कुमार गुजराल – भारत के बारहवें प्रधानमंत्री

    1910 – मोतीलालImage result for मोतीलाल – हिंदी सिनेमा के अभिनेता – हिंदी सिनेमा के अभिनेता

    मोतीलाल राजवंश हिन्दी फ़िल्मों के एक अभिनेता थे। उनको हिंदी सिनेमा के पहले सहज अभिनेता होने का श्रेय दिया जाता है। उनको फ़िल्म देवदास और परख के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला।

    4 दिसंबर, 1910 को शिमला में एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे मोतीलाल के पिता एक प्रख्यात शिक्षाविद थे। मोतीलाल को शिक्षा के लिए शिमला में एक अंग्रेजी स्कूल और फ़िर उत्तर प्रदेश में भेजा गया। बाद में वह दिल्ली चले गए जहां उन्होने अपनी स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई जारी रखी।

    मोतीलाल (अंग्रेज़ीMotilal, जन्म: 4 दिसम्बर1910 – मृत्यु: 1965हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता  मोतीलाल ने अपने जादू से नायक और चरित्र अभिनेता के रूप में दो दशक तक दर्शकों के दिलों पर राज किया। उन्होंने हिंदी फ़िल्मों को मेलोड्रामाई संवाद अदायगी और अदाकारी की तंग गलियों से निकालकर खुले मैदान की ताजी हवा में खड़ा किया।

    जीवन परिचय

    शिमला में 4 दिसंबर 1910 को जन्मे मोतीलाल राजवंश जब एक साल के थे, तभी पिता का साया सिर से उठ गया। चाचा ने परवरिश की, जो उत्तर प्रदेश में सिविल सर्जन थे। चाचा ने मोती को बचपन से जीवन को बिंदास अंदाज में जीने और उदारवादी सोच का नजरिया दिया। शिमला के अंग्रेज़ी स्कूल में शुरूआती पढ़ाई के बाद उत्तर प्रदेश और फिर दिल्ली में उच्च शिक्षा हासिल की। अपने कॉलेज के दिनों में वे हरफनमौला विद्यार्थी थे। नौसेना में शामिल होने के इरादे से मुंबई आए थे। अचानक बीमार हो गए, तो प्रवेश परीक्षा नहीं दे पाए। शानदार ड्रेस पहनकर सागर स्टूडियो में शूटिंग देखने जा पहुंचे। वहां निर्देशक कालीप्रसाद घोष एक सामाजिक फ़िल्म की शूटिंग कर रहे थे। अपने सामने स्मार्ट यंगमैन मोतीलाल को देखा, तो उनकी आंखें खुली रह गई। उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए ऐसे ही हीरो की तलाश थी, जो बगैर बुलाए मेहमान की तरह सामने खड़ा था। उन्होंने अगली फ़िल्म ‘शहर का जादू’ (1934) में सविता देवी के साथ मोतीलाल को नायक बना दिया। तब तक पार्श्वगायन प्रचलन में नहीं आया था। लिहाजा मोतीलाल ने के. सी. डे के संगीत निर्देशन में अपने गीत खुद गाए थे। इनमें ‘हमसे सुंदर कोई नहीं है, कोई नहीं हो सकता’ गीत लोकप्रिय भी हुआ। सागर मूवीटोन उस जमाने में कलाकारों की नर्सरी थी। सुरेंद्र, बिब्बो, याकूब, माया बनर्जी, कुमार और रोज जैसे कलाकार वहां कार्यरत थे। निर्देशकों में महबूब ख़ान, सर्वोत्तम बदामी, चिमनलाल लोहार अपनी सेवाएं दे रहे थे। मोतीलाल ने अपनी शालीन कॉमेडी, मैनरिज्म और स्वाभाविक संवाद अदायगी के जरिए तमाम नायकों को पीछे छोड़ते हुए नया इतिहास रचा। परदे पर वे अभिनय करते कभी नजर नहीं आए। मानो उसी किरदार को साकार रहे हो।Image result for मोतीलाल – हिंदी सिनेमा के अभिनेता

    प्रसिद्धि

    वर्ष 1937 में मोतीलाल ने सागर मूवीटोन छोडकर रणजीत स्टूडियो में शामिल हुए। इस बैनर की फ़िल्मों में उन्होंने ‘दीवाली’ से ‘होली’ के रंगों तक, ब्राह्मण से अछूत तक, देहाती से शहरी छैला बाबू तक के बहुरंगी रोल से अपने प्रशंसकों का भरपूर मनोरंजन किया। उस दौर की लोकप्रिय गायिका-नायिका खुर्शीद के साथ उनकी फ़िल्म ‘शादी’ सुपर हिट रही थी। रणजीत स्टूडियो में काम करते हुए मोतीलाल की कई जगमगाती फ़िल्में आई- ‘परदेसी’, ‘अरमान’, ‘ससुराल’ और ‘मूर्ति’। बॉम्बे टॉकीज ने गांधीजी से प्रेरित होकर फ़िल्म ‘अछूत कन्या’ बनाई थी। रणजीत ने मोतीलाल- गौहर मामाजीवाला की जोडी को लेकर ‘अछूत’ फ़िल्म बनाई। फ़िल्म का नायक बचपन की सखी का हाथ थामता है, जो अछूत है। नायक ही मंदिर के द्वार सबके लिए खुलवाता है। इस फ़िल्म को गांधीजी और सरदार पटेल का आशीर्वाद मिला था। 1939 में इन इंडियन फ़िल्म्स नाम से ऑल इंडिया रेडियो ने फ़िल्म कलाकारों से साक्षातकार की एक शृंखला प्रसारित की थी। इसमें ‘अछूत’ का विशेष उल्लेख इसलिए किया गया था कि फ़िल्म में गांधीजी के अछूत उद्घार के संदेश को सही तरीके से उठाया गया था। नायकों में सर्वाधिक वेतन पाने वाले थे उस जमाने के लोकप्रिय अभिनेता मोतीलाल, उन्हें ढाई हजार रुपये मासिक वेतन के रूप में मिलते थे। फ़िल्मी कलाकारों से मिलने के लियए उस जमाने में भी लोग लालायित रहते थे।

    अद्भुत अभिनय प्रतिभा

    मोतीलाल की अदाकारी के अनेक पहलू हैं। कॉमेडी रोल से वे दर्शकों को गुदगुदाते थे, तो ‘दोस्त’ और ‘गजरे’ जैसी फ़िल्मों में अपनी संजीदा अदाकारी से लोगों की आंखों में आंसू भी भर देते थे। वर्ष 1950 के बाद मोतीलाल ने चरित्र नायक का चोला धारणकर अपने अद्भुत अभिनय की मिसाल पेश की। विमल राय की फ़िल्म ‘देवदास’ (1955) में देवदास के शराबी दोस्त चुन्नीबाबू के रोल को उन्होंने लार्जर देन लाइफ का दर्जा दिलाया। दर्शकों के दिमाग में वह सीन याद होगा, जब नशे में चूर चुन्नीबाबू घर लौटते हैं, तो दीवार पर पड़ रही खूंटी की छाया में अपनी छड़ी को बार-बार लटकाने की नाकाम कोशिश करते हैं। ‘देवदास’ का यह क्लासिक सीन है। राज कपूर निर्मित और शंभू मित्रा-अमित मोइत्रा निर्देशित फ़िल्म ‘जागते रहो’ (1956) के उस शराबी को याद कीजिए, जो रात को सुनसान सडक पर नशे में झूमता-लडखडाता गाता है- ‘ज़िंदगी ख्वाब है’।

    मोतीलाल की जूता पॉलिश

    कहा जाता है कि मोती अभिनय नहीं करते थे, अभिनय की भूमिका को अपने में आत्मसात कर जाते थे वह। इसी से आप उनकी किसी भी फ़िल्म को याद कीजिए, आपको ऐसा लगेगा जैसे उस कहानी का जीवित पात्र आपकी आंखों के सम्मुख आकर उपस्थित हो गया हो। मोती स्वयं इसका कारण नहीं समझ पाते थे – या शायद यह फिर उनकी विनम्रता रही हो। अपने अभिनय जीवन के प्रारंभ की उस घटना को आजीवन विस्मृत नहीं कर पाये थे। फ़िल्म का नाम भी नहीं याद रह पाया था उनको, न उसके निर्माता-निर्देशक का अता-पता, लेकिन उस फ़िल्म के निर्माण के मध्य जिस छोटी सी घटना के माध्यम से उन्हें जीवन के सबसे बड़े सन्तोष की प्राप्ति हुर्इ थी वह जीवन के अंत तक उनकी आंखों में तैरती रही। कोशिश करने पर भी उसे भूल सकना शायद उनके लिये संभव ही नहीं हो पाया।

    बम्बर्इ के बोरीबन्दर के सम्मुख वह उस दृश्य की शूटिंग कर रहे थे। भूमिका थी जूतों पर पालिश करने वाले एक आदमी की। फटे-पुराने कपड़े, बढ़ी हुर्इ डाढ़ी-मूंछें, धूलधूसरित हाथ-पैर और आंखों में एक दारूण दैन्य। पालिश करने वाले उस पात्र का जैसे पूरा रूप उजागर हो गया हो उनके माध्यम से। तभी उनको एक परिचित वृद्ध दिखायी दे गये और यह जानते हुए भी कि वह मात्र अभिनय है, मोती के लिये उनकी आंखों से आंख मिला पाना मुमकिन नहीं हो पाया उस वक्त। लेकिन वह सज्जन मोती के पास पहुंच चुके थे और तब मोती को उनकी ओर मुखातिब ही होना पड़ा। देखा, उन बुज़ुर्ग की आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे और अपने उन्हीं आंसुओं के मध्य वह मोती से कहते जा रहे थे, अभी तो मैं ज़िंदा हूँ बेटा, मेरे पास तुम क्यों नहीं आये आखिर – जैसे भी होता हम लोग मिलजुल कर अपना पेट पाल लेते, यह नौबत आने ही क्यों दी तुमने? …… और मोती कुछ भी नहीं बोल पाये थे उस वक्त। अपनी सफ़ार्इ दे पाना भी संभव नहीं लग रहा था उनको। लेकिन उस घटना को मोती आजीवन अपनी अभिनय-प्रतिभा का सबसे बड़ा प्रमाणपत्र मानते रहे, और जब कभी उसकी याद उनको आती थी उनकी आंखों से झरझर आंसू बहने लगते थे।

    प्रसिद्ध फ़िल्में

    वर्ष फ़िल्म विशेष टिप्पणी
    1966 ये ज़िन्दगी कितनी हसीन है
    1965 वक्त
    1964 लीडर
    1963 ये रास्ते हैं प्यार के
    1960 परख फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार
    1959 अनाड़ी
    1959 पैग़ाम
    1956 जागते रहो
    1955 देवदास फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार
    1953 धुन
    1950 हँसते आँसू
    1946 फूलवरी

    एक सिगरेट के कारण छोड़ी फ़िल्म

    पहले के दिग्गज फ़िल्म निर्देशकों को अपने पर पूरा विश्वास और भरोसा होता था। उनके नाम और प्रोडक्शन की बनी फ़िल्म का लोग इंतज़ार करते थे। उसमें कौन काम कर रहा है यह बात उतने मायने नहीं रखती थी। कसी हुई पटकथा और सधे निर्देशन से उनकी फ़िल्में सदा धूम मचाती रहती थीं। अपनी कला पर पूर्ण विश्वास होने के कारण ऐसे निर्देशक कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं करते थे। ऐसे ही फ़िल्म निर्देशक थे वही। शांताराम। उन्हीं से जुड़ी एक घटना का ज़िक्र है :-

    उन दिनों शांताराम जी डॉ. कोटनीस पर एक फ़िल्म बना रहे थे “डॉ. कोटनीस की अमर कहानी” जिसमें उन दिनों के दिग्गज तथा प्रथम श्रेणी के नायक मोतीलाल को लेना तय किया गया था। मोतीलाल ने उनका प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया था। शांतारामजी ने उन्हें मुंहमांगी रकम भी दे दी थी। पहले दिन जब सारी बातें तय हो गयीं तो मोतीलाल ने अपने सिगरेट केस से सिगरेट निकाली और वहीं पीने लगे। शांतारामजी बहुत अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। उनका नियम था कि स्टुडियो में कोई धूम्रपान नहीं करेगा। उन्होंने यह बात मोतीलाल को बताई और उनसे ऐसा ना करने को कहा। मोतीलाल को यह बात खल गयी, उन्होंने कहा कि सिगरेट तो मैं यहीं पिऊंगा। शांतारामजी ने उसी समय सारे अनुबंध खत्म कर डाले और मोतीलाल को फ़िल्म से अलग कर दिया। फिर खुद ही कोटनीस की भूमिका निभायी।

    सम्मान और पुरस्कार

    • 1961 – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार – परख
    • 1957 – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार – देवदास

    अंतिम समय

    उन्होंने अपने जीवन के उत्तरार्द्घ में राजवंश प्रोडक्शन क़ायम करके फ़िल्म ‘छोटी-छोटी बातें’ बनाई थी। फ़िल्म को राष्ट्रपति का सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट ज़रूर मिला, पर मोतीलाल दिवालिया हो गए। फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ शैलेंद्र के जीवन के लिए भारी साबित हुई थी। मोतीलाल का यही हाल ‘छोटी छोटी बातें’ कर गई।

    प्रमुख फिल्में

    वर्ष फ़िल्म चरित्र टिप्पणी
    1966 ये ज़िन्दगी कितनी हसीन है
    1965 वक्त
    1964 लीडर
    1963 ये रास्ते हैं प्यार के
    1960 परख हरधन / सर जगदीश चन्द्र रॉय
    1959 अनाड़ी
    1959 पैग़ाम
    1956 जागते रहो
    1955 देवदास
    1953 धुन
    1950 हँसते आँसू
    1946 फुलवारी

    नामांकन और पुरस्कार

    फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार

    1898 – कार्यमाणिवकम श्रीनिवास कृष्णन – प्रसिद्ध भारतीय भौतिक वैज्ञानिक।

    1979 – सुनीता रानी- प्रसिद्ध भारतीय महिला खिलाड़ी।

    1892 – विद्याभूषण विभु – प्रसिद्ध साहित्यकारों में से एक थे।

    1व्यक्तिगत जीवन2फिल्मी सफर3प्रमुख फिल्में4नामांकन और पुरस्कार5सन्दर्भ6बाहरी कड़ियाँ

  • 1979 – प्रसिद्ध भारतीय महिला खिलाड़ी सुनीता रानी

04 दिसंबर को हुए निधन 

  • 1962 – अन्नपूर्णानन्द – हिन्दी में शिष्ट हास्य लिखने वाले कलाकारों में अग्रणी लेखक।
  • 2017 – शशि कपूर हिन्‍दी फिल्‍मों के मशहूर अभिनेता  

04 दिसंबर के महत्वपूर्ण दिवस

    • नौसेना का नीति वाक्य है शं नो वरुण:। इसका मतलब है कि जल के देवता वरुण हमारे लिए मंगलकारी रहें।
    • आजादी के बाद से नौसेना ने अपनी शक्तियों में लगातार इजाफा किया है। हमारे युद्धपोत और मिसाइलें समुद्र के नीचे, समुद्र के ऊपर और समुद्री सतह पर लक्ष्य भेद कर सकती हैं।
    • न सिर्फ तटों की रक्षा बल्कि नई तकनीक तैयार करने और आपदा के समय राहत कार्यों में भी नौसेना हमेशा आगे रहती है।
    • तीनों सेनाओं में मेक इन इंडिया का सिद्धांत सबसे पहले नौसेना ने ही शुरू किया। थल सेना व वायु सेना के मुकाबले नौसेना में अधिक स्वदेशी लड़ाकू उपकरण हैं।
    • भारतीय नौसेना आस्ट्रेलिया, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, फ्रांस, इंडोनेशिया, म्यांमार, रूस, सिंगापुर, श्रीलंका, थाईलैंड, ब्रिटेन, अमेरिका व जापान के साथ युद्धाभ्यास करती है।
    • जापान और अमेरिका के साथ इस साल जुलाई में दक्षिण चीन सागर में किए गए मालाबार युद्धाभ्यास ने चीन की नींद उड़ा दी। यह भारतीय नौसेना की शक्ति का प्रतीक है।भारतीय नौसेना दिवस ! 4 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान हमारी नौसेना ने ऑपरेशन ट्राइडेंट के तहत कराची बंदरगाह पर एक ही रात में उनकी तीन जलपोतों को नेस्तनाबूद कर डुबो दिया था। इस युद्ध में पाकिस्तान के 500 से ज्यादा नौसैनिक मारे गए थे। इस ऑपरेशन में पहली बार नौसेना की मिसाइल बोट्स का प्रयोग किया गया। इस सफल अभियान की याद में हर साल चार दिसंबर को नौ सेना दिवस के रूप में मनाया जाता है।शक्ति के साथ सामर्थ्य भी

    जहाजों का बेड़ा

    भारतीय नौसेना ने अपनी स्थापना से अब तक खुद को सभी दिशाओं में विस्तार दिया है। द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत में नौसेना के पास महज आठ युद्धपोत थे। आज नौसेना के पास लड़ाकू विमान ले जाने वाला युद्धपोत आइएनएस विक्रमादित्य है। 11 विध्वंसक, 14 फ्रिगेट, 24 लड़ाकू जलपोत, 29 पहरा देने वाले जहाज, दो परमाणु पनडुब्बियों सहित 13 अन्य पनडुब्बियों और अन्य कई जलयानों की बड़ी फौज है।

     ऑपरेशन ट्राइडेंट

    नौसेना प्रमुख एडमिरल एसएम नंदा के नेतृत्व में ऑपरेशन ट्राइडेंट का प्लान बनाया गया था। ट्राइडेंट का मतलब होता है ‘त्रिशूल’। त्रिशूल यानी शिव का संहारक हथियार। इस टास्क की जिम्मेदारी 25वीं स्क्वॉर्डन के कमांडर बबरू भान यादव को दी गई थी। 4 दिसंबर, 1971 को नौसेना ने कराची स्थित पाकिस्तान नौसेना हेडक्वार्टर पर पहला हमला किया था। एम्‍यूनिशन सप्‍लाई शिप समेत कई जहाज नेस्‍तनाबूद कर दिए गए थे। इस दौरान पाक के ऑयल टैंकर भी तबाह हो गए। इस युद्ध में पहली बार जहाज पर मार करने वाली एंटी शिप मिसाइल से हमला किया गया था।

    पीएनएस गाजी का भारतीय जलसीमा में घुसना

    इसी दौरान भारतीय नौसेना की पनडुब्‍बी को सोनार पर पाकिस्‍तान की एक पनडुब्‍बी के भारतीय जलसीमा में होने का संकेत मिला, जिसका नाम था ‘गाजी’। जिस नाम से इसको ट्रैक किया गया उसका कोड था ‘काली देवी’। पूर्वी नेवल कमांड के वाइस एडमिरल नीलकंत कृष्‍नन का मानना था कि पाकिस्तान द्वारा इस सबमरीन को बंगाल की खाड़ी में तैनात करने के पीछे मकसद आईएनएस विक्रांत को नष्‍ट करना था। खतरे को भांपते हुए आईएनएस विक्रांत को तुरंत अंडमान निकोबार रवाना कर दिया गया और इसकी जगह रिटायर हो चुके आईएनएस राजपूत को तैनात कर दिया गया। इस पूरे मिशन को पोर्ट एक्‍स-रे का नाम दिया गया था। इसी बीच गाजी को ऑक्‍सीजन के लिए समुद्री सतह पर आना पड़ा और यह आर्इ्एनएस राजपूत के राडार पर दिखाई दे गई। इसके बाद समुद्र के अंदर मौजूदा भारतीय सबमरीन आईएनएस करंज और गाजी के बीच जंग शुरू हुई, जिसमें गाजी को नष्‍ट कर दिया गया।

    चीन से मुकाबला

    हिंद महासागर में चीन से वर्चस्व की लड़ाई लड़ रहा भारत नौसैन्य ताकत में भले ही चीन से अभी पीछे हो, लेकिन अपनी इस ताकत को वह तेजी से बढ़ाने में जुटा हुआ है। पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार के बंदरगाहों पर चीन सामरिक रणनीति के तहत स्ट्रिंग आफ पर्ल का निर्माण कर रहा है। चीन का इरादा इस कदम के जरिये भारत को घेरना है। चीन के इस इरादे को भांप भारत ने भी ईरान में चाबहार पोर्ट विकसित करने सहित इंडोनेशिया के साबांग द्वीप पर पोर्ट विकसित करने की सहमति दी है।

    मारकोस

    मैरीन कमांडो फोर्स (मारकोस) भारतीय नौसेना की एक विशेष कमांडो फोर्स है। इसका गठन खास ऑपरेशन और बचाव कार्य के लिए किया गया है।

    मील के पत्थर

    • 1612 ईस्ट इंडिया कंपनी की युद्धकारिणी सेना के रूप में गठन
    • 1685 नामकरण बंबई मेरीन हुआ
    • 1934 भारतीय नौसेना अनुशासन अधिनियम पारित किया और इसका नाम रॉयल इंडियन नेवी हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय नौसेना का विस्तार हुआ
    • और बेड़े में आधुनिक जहाज शामिल किए गए

    अहम अभियान

    • 1961 ऑपरेशन विजय पुर्तगालियों से गोवा मुक्ति अभियान में पहली बार नौसेना का इस्तेमाल
    • 1971 ऑपरेशन ट्राइडेंट भारत पाकिस्तान युद्ध
    • 1988 ऑपरेशन कैक्टस वायुसेना के साथ मिलकर मालदीव संकट का समाधान
    • 1999 ऑपरेशन तलवार कारगिल युद्ध के दौरान सहयोग
    • 2004 सुनामी संकट हिंद महासागर में सुनामी से मची तबाही में आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु के अलावा इंडोनेशिया, श्रीलंका, मालदीव के राहत एवं पुनर्वास कार्यक्रम में सहयोग
    • 2006 ऑपरेशन सुकून इजरायल- लेबनान संघर्ष के दौरान लेबनान में फंसे भारतीय, श्रीलंका और नेपाल के नागरिकों को निकालने में सहायता
    • 2011 ऑपरेशन सेफ होमकमिंग युद्धग्रस्त लीबिया से भारतीयों को बचाने में अहम भूमिका निभाई
    • 2015 ऑपरेशन राहत यमन संकट के दौरान वहां फंसे 3,074 नागरिकों को बचाने में अहम भूमिका
    • 2018 ऑपरेशन निस्तर चक्रवात के कारण यमन के सोकोट्रा द्वीप पर फंसे 38 भारतीयों को सुरक्षित निकाला गया

    महाशक्ति बनने की तैयारी

    रूस में निर्मित परमाणु पनडुब्बी आइएनएस चक्र को 2021 तक भारतीय नौसेना में शामिल किया जाएगा। 2027 के अंत तक भारतीय नौसेना में 150 पोत और 500 एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर शामिल होने का अनुमान है।

    भारतीय नौसेना(अंग्रेज़ीIndian Navyभारतीय सेना का सामुद्रिक अंग है जो कि ५६०० वर्षों के अपने गौरवशाली इतिहास के साथ न केवल भारतीय सामुद्रिक सीमाओं अपितु भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की भी रक्षक है। ५५,००० नौसेनिकों से लैस यह विश्व की पाँचवी सबसे बड़ी नौसेना भारतीय सीमा की सुरक्षा को प्रमुखता से निभाते हुए विश्व के अन्य प्रमुख मित्र राष्ट्रों के साथ सैन्य अभ्यास में भी सम्मिलित होती है। पिछले कुछ वर्षों से लागातार आधुनिकीकरण के अपने प्रयास से यह विश्व की एक प्रमुख शक्ति बनने की भारत की महत्त्वाकांक्षा को सफल बनाने की दिशा में है।

    इतिहास

    ब्रिटिश भारत

    भारतीय नौसेना का ध्वज

    भारतीय नौसेना का ध्वज, 2001 से 2004 तक

    भारतीय नौसेना का ध्वज, 1950 से 2001 तक

    भारतीय नौसेना सन् 1613 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी की युद्धकारिणी सेना के रूप में इंडियन मेरीन संगठित की गई। 1685 ई. में इसका नामकरण “बंबई मेरीन” हुआ, जो 1830 ई. तक चला। 8 सितंबर 1934 ई. को भारतीय विधानपरिषद् ने भारतीय नौसेना अनुशासन अधिनियम पारित किया और रॉयल इंडियन नेवी का प्रादुर्भाव हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय नौसेना का विस्तार हुआ और अधिकारी तथा सैनिकों की संख्या 2,000 से बढ़कर 30,000 हो गई एवं बेड़े में आधुनिक जहाजों की संख्या बढ़ने लगी।

    स्वतंत्रता पश्चात्

    स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत की नौसेना नाम मात्र की थी। विभाजन की शर्तों के अनुसार लगभग एक तिहाई सेना पाकिस्तान को चली गई। कुछ अतिशय महत्व के नौसैनिक संस्थान भी पाकिस्तान के हो गए। भारत सरकार ने नौसेना के विस्तार की तत्काल योजना बनाई और एक वर्ष बीतने के पहले ही ग्रेट ब्रिटेन से 7, 030 टन का क्रूजर “ दिल्ली” खरीदा। इसके बाद ध्वंसक “ राजपूत“, “ राणा“, “ रणजीत“, “ गोदावरी“, “ गंगा” और “ गोमती” खरीदे गए। इसके बाद आठ हजार टन का क्रूजर खरीदा गया। इसका नामकरण “ मैसूर” हुआ। 1964 ई. तक भारतीय बेड़े में वायुयानवाहक, “ विक्रांत” (नौसेना का ध्वजपोत), क्रूजर “दिल्ली” एवं “मैसूर” दो ध्वंसक स्क्वाड्रन तथा अनेक फ्रिगेट स्कवाड्रन थे, जिनमें कुछ अति आधुनिक पनडुब्बीनाशक तथा वायुयाननाशक फ्रिगेट सम्मिलित किए जा चुके थे। “ ब्रह्मपुत्र“, “ व्यास“, “ बेतवा “, “ खुखरी,” “ कृपाण“, “ तलवार” तथा “ त्रिशूल” नए फ्रिगेट हैं, जिनका निर्माण विशेष रीति से हुआ है। “ कावेरी“, “ कृष्ण” और “ तीर” पुराने फ्रिगेट हैं जिनका उपयोग प्रशिक्षण देने में होता है। “कोंकण“, “कारवार“, “काकीनाडा” “कणानूर”, “कडलूर“, “बसीन” तथा “बिमलीपट्टम” से सुंरग हटानेवाले तीन स्क्वाड्रन तैयार किए गए हैं। छोटे नौसैनिक जहाजों के नवनिर्माण का कार्य प्रारंभ हो चुका है और तीन सागरमुख प्रतिरक्षा नौकाएँ, “अजय”, “अक्षय” तथा “अभय” और एक नौबंध “ध्रुवक” तैयार हो चुके हैं। कोचीन, लोणावला, तथा जामनगर में भारतीय नौसेना के प्रशिक्षण संस्थान हैं। आई एन एस अरिहन्त भारत की नाभिकीय उर्जा पनडुब्बी है।

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