हिंदी फ़िल्म अभिनेता व निर्देशक गुरु दत्त व संजीव कुमार का जन्‍म और चैतन्य महाप्रभु का निधन हुआ था आज

9 जुलाई का इतिहास

 देश विदेश में आज के दिन क्या हुआ था आज के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएँ, 9 जुलाई को हुए महत्वपूर्ण लोगों के जन्मदिवस, मृत्यु दिवस और रोमांचक घटनाएँ जिसे पढ़कर आपका ज्ञान और बढ़ेंगा।

9 July History

  • अमेरिका में पहले प्राकृतिक गैस के कुएं की खोज 1815 में की गई।
  • दक्षिणी अमेरिकी देश अर्जेटीना ने 1816 में स्पेन से स्वतंत्रता हासिल की।
  • कनाडा के मांट्रियल शहर में 1852 को 1100 निर्माणाधीन स्थल भयानक आग की चपेट में आने से खाक हो गये।
  • भारत देश का पहला स्टॉक एक्सचेंज बम्बई स्टाॅक एक्सचेंज की स्थापना 1875 में हुई।
  • पहली विंबल्डन टेनिस प्रतियोगिता का आयोजन 1877 में हुआ।
  • अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल का प्रकाशन 1889 में शुरू हुआ।
  • डेनियल विलियम्स ने 1893 में पहली बार बिना ऐनिस्थिसिया के ओपन हार्ट सर्जरी की।
  • नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी ने 1944 में भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र कराने के लिए आजाद हिंद फ़ौज का नेतृत्व स्वीकार किया था।
  • भारत की प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-56) की शुरुआत 1951 में हुई।
  • वन्यजीव बोर्ड की तरफ से 1969 में शेर को देश का राष्ट्रीय पशु चुना गया।
  • सोवियत संघ ने 1972 में भूमिगत परमाणु परीक्षण किया।
  • ब्रितानी महारानी के प्रतिनिधि के रूप में राजकुमार चार्ल्स ने 1973 में 300 साल पुराने उपनिवेश बहामास में आख़िरी रात बिताई।
  • माग्रेट थैचर ने 09 जुलाई 1982 में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल की शुरूआत की।
  • लंदन में भारत के खिलाफ तीसरे टेस्ट मैच में इंग्लैंड के ऑलराउंडर इयान बॉथम ने अपने करियर का सर्वोच्च स्कोर 208 रन बनाया। यह मैच ड्रॉ समाप्त हुआ।
  • दक्षिण अफ्रीका को ओलंपिक खेलों में दोबारा भाग लेने की अनुमति 1991 में मिली।
  • फिजी में 2000 को जार्ज स्पीट तथा सैन्य नेताओं के मध्य समझौता सम्पन्न।
  • भारत द्वारा पाक सीमा पर दो चौकियां स्थापित करने की घोषणा 2001 में की।
  • आर्गेनाइजेशन आफ़ अफ़्रीकन यूनिटी का नाम 2002 में बदलकर अफ़्रीकन यूनियन किया गया।
  • इथोपिया की राजधानी आदिस अबाबा में अफ्रीकी संघ की स्थापना 2002 में हुई।
  • दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति थाबो म्बेकी इसके पहले 2002 में अध्यक्ष बने।
  • एशियाई विकास बैंक ने 2004 में आतंकवाद से लड़ने हेतु अपने 42 सदस्य देशों के लिए एक कोष बनाया।
  • साइबेरिया के इरकुर्त्सक हवाई अड्डे के रनवे पर 2006 को शिबिर एयरलाइंस ए 310 के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से कम से कम 122 लोगों की मौत।
  • भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक हिमांशु जैन को ग्लास साइंस के क्षेत्र में ध्यातत्व कार्य हेतु ओट्टो स्कॉट रिसर्च पुरस्कार 2007 में प्रदान किया गया।
  • ईरान ने 2008 में लम्बी एवं मध्यम दूरी तक प्रहार क्षमता वाले नौ प्रक्षेपास्त्रों का परीक्षण किया।
  • अफ्रीका का सूडान 2011 में दो हिस्सों में बंट गया। दक्षिणी हिस्सा रिपब्लिक ऑफ साउथ सूडान बना।

9 जुलाई को जन्मे व्यक्ति

  • सिलाई मशीन के आविष्‍कारक एलायस हाउ का जन्‍म 1819 में हुआ था।
  • 1905 से 1910 ई. तक भारत का वाइसराय तथा गवर्नर-जनरल रहे लॉर्ड मिण्टो द्वितीय का जन्म 1845 में हुआ।
  • राष्ट्रीय कांग्रेस’ के राजनेता, संसदीय मामलों के मंत्री तथा मध्य प्रदेश के भूतपूर्व राज्यपाल सत्य नारायण सिन्हा का जन्‍म 1900 में हुआ था।
  • प्रसिद्ध अभिनेता एवं निर्देशक हिंदी फ़िल्मों में गुरु दत्त के नाम से प्रसिद्द वसंतकुमार शिवशंकर पादुकोण का जन्‍म 1925 में हुआ था।गुरु दत्त (वास्तविक नाम: वसन्त कुमार शिवशंकर पादुकोणे, जन्म: 9 जुलाई1925 बैंगलौर, निधन: 10 अक्टूबर1964 बम्बई) हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता,निर्देशक एवं फ़िल्म निर्माता थे। उन्होंने 1950वें और 1960वें दशक में कई उत्कृष्ट फ़िल्में बनाईं जैसे प्यासा,कागज़ के फूल,साहिब बीबी और ग़ुलाम और चौदहवीं का चाँदImage result for https://www.google.co.in/search?q=गुरुदत्तविशेष रूप से, प्यासा और काग़ज़ के फूल को टाइम पत्रिका के 100 सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों की सूचि में शामिल किया गया है और साइट एन्ड साउंड आलोचकों और निर्देशकों के सर्वेक्षण द्वारा, दत्त खुद भी सबसे बड़े फ़िल्म निर्देशकों की सूचि में शामिल हैं। उन्हें कभी कभी “भारत का ऑर्सन वेल्स” (Orson Welles) ‍‍ भी कहा जाता है। 2010 में, उनका नाम सीएनएन के “सर्व श्रेष्ठ 25 एशियाई अभिनेताओं” के सूचि में भी शामिल किया गया। गुरु दत्त 1950वें दशक के लोकप्रिय सिनेमा के प्रसंग में, काव्यात्मक और कलात्मक फ़िल्मों के व्यावसायिक चलन को विकसित करने के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी फ़िल्मों को जर्मनी, फ्रांस और जापान में अब भी प्रकाशित करने पर सराहा जाता है।

    प्रारम्भिक जीवन व पारिवारिक पृष्ठभूमि

    गुरु दत्त का जन्म 9 जुलाई 1925 को बंगलौर में शिवशंकर राव पादुकोणे व वसन्ती पादुकोणे के यहाँ हुआ था। उनके माता पिता कोंकण के चित्रपुर सारस्वत ब्राह्मण थे। उनके पिता शुरुआत के दिनों एक विद्यालय के हेडमास्टर थे जो बाद में एक बैंक के मुलाजिम हो गये। माँ एक साधारण गृहिणीं थीं जो बाद में एक स्कूल में अध्यापिका बन गयीं। गुरु दत्त जब पैदा हुए उनकी माँ की आयु सोलह वर्ष थी। वसन्ती घर पर प्राइवेट ट्यूशन के अलावा लघुकथाएँ लिखतीं थीं और बंगाली उपन्यासों का कन्नड़ भाषा में अनुवाद भी करती थीं।

    गुरु दत्त ने अपने बचपन के प्रारम्भिक दिन कलकत्ता के भवानीपुर इलाके में गुजारे जिसका उनपर बौधिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव पड़ा। उनका बचपन वित्तीय कठिनाइयों और अपने माता पिता के तनावपूर्ण रिश्ते से प्रभावित था। उन पर बंगाली संस्कृति की इतनी गहरी छाप पड़ी कि उन्होंने अपने बचपन का नाम वसन्त कुमार शिवशंकर पादुकोणे से बदलकर गुरु दत्त रख लिया।

    प्रारम्भिक प्रेरणा

    गुरु दत्त की दादी नित्य शाम को दिया जलाकर आरती करतीं और चौदह वर्षीय गुरु दत्त दिये की रौशनी में दीवार पर अपनी उँगलियों की विभिन्न मुद्राओं से तरह तरह के चित्र बनाते रहते। यहीं से उनके मन में कला के प्रति संस्कार जागृत हुए। हालांकि वे अप्रशिक्षित थे, गुरु दत्त प्रेरित आवर्तनों का उत्पादन कर पाते और इसी तरह उन्होंने अपने उसे उत्तरार्द्ध से एक पेंटिंग पर आधारित है, एक साँप नृत्य प्रदर्शन फोटोग्राफ, उनके चाचा, बी बी बेनेगल राजी जब वह था के रूप में , वह कर सकता.उनकी यह कला परवान चढ़ी और उन्हें सारस्वत ब्राह्मणों के एक सामाजिक कार्यक्रम में पाँच रुपये का नकद पारितोषक प्राप्त हुआ।

    जब गुरु दत्त 16 वर्ष के थे उन्होंने 1941 में पूरे पाँच साल के लिये 75 रुपये वार्षिक छात्रवृत्ति पर अल्मोड़ा जाकर नृत्य, नाटक व संगीत की तालीम लेनी शुरू। 1944 में जब द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण उदय शंकर इण्डिया कल्चर सेण्टर बन्द हो गया गुरु दत्त वापस अपने घर लौट आये।

    यद्यपि आर्थिक कठिनाइयों के कारण वे स्कूल जाकर अध्ययन तो न कर सके परन्तु रवि शंकर के अग्रज उदय शंकर की संगत में रहकर कला व संगीत के कई गुण अवश्य सीख लिये। यही गुण आगे चलकर कलात्मक फ़िल्मों के निर्माण में उनके लिये सहायक सिद्ध हुए।

    फिल्मी सफर

    गुरु दत्त ने पहले कुछ समय कलकत्ता जाकर लीवर ब्रदर्स फैक्ट्री में टेलीफोन ऑपरेटर की नौकरी की लेकिन जल्द ही वे वहाँ से इस्तीफा देकर 1944 में अपने माता पिता के पास बम्बई लौट आये।

    उनके चाचा ने उन्हें प्रभात फ़िल्म कम्पनी पूना तीन साल के अनुबन्ध के तहत फ़िल्म में काम करने भेज दिया। वहीं सुप्रसिद्ध फ़िल्म निर्माता वी० शान्ताराम ने कला मन्दिर के नाम से अपना स्टूडियो खोल रक्खा था। यहीं रहते हुए गुरु दत्त की मुलाकात फ़िल्म अभिनेता रहमान और देव आनन्द से हुई जो आगे जाकर उनके बहुत अच्छे मित्र बन गये।

    उन्हें पूना में सबसे पहले 1944 में चाँद नामक फ़िल्म में श्रीकृष्ण की एक छोटी सी भूमिका मिली। 1945 में अभिनय के साथ ही फ़िल्म निर्देशक विश्राम बेडेकर के सहायक का काम भी देखते थे। 1946 में उन्होंने एक अन्य सहायक निर्देशक पी० एल० संतोषी की फ़िल्म हम एक हैं के लिये नृत्य निर्देशन का काम किया।

    यह अनुबन्ध 1947 में खत्म हो गया। उसके बाद उनकी माँ ने बाबूराव पै, जो प्रभात फ़िल्म कम्पनी व स्टूडियो के सी०ई०ओ० थे, के साथ एक स्वतन्त्र सहायक के रूप में फिर से नौकरी दिलवा दी। वह नौकरी भी छूट गयी तो लगभग दस महीने तक गुरु दत्त बेरोजगारी की हालत में माटुंगा बम्बई में अपने परिवार के साथ रहते रहे। इसी दौरान, उन्होंने अंग्रेजी में लिखने की क्षमता विकसित की और इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इण्डिया नामक एक स्थानीय अंग्रेजी साप्ताहिक पत्रिका के लिये लघु कथाएँ लिखने लगे।.

    देखा जाये तो उनके संघर्ष का यही वह समय था जब उन्होंने लगभग आत्मकथात्मक शैली में प्यासा फ़िल्म की पटकथा लिखी। मूल रूप से यह पटकथा कश्मकश के नाम से लिखी गयी थी जिसका हिन्दी में अर्थ संघर्ष होता है। बाद में इसी पटकथा को उन्होंने प्यासा के नाम में बदल दिया। यह पटकथा उन्होंने माटुंगा में अपने घर पर रहते हुए लिखी थी।.

    यही वह समय था जब गुरु दत्त ने दो बार शादी भी की; पहली बार विजया नाम की एक लड़की से, जिसे वे पूना से लाये थे वह चली गयी तो दूसरी बार अपने माता पिता के कहने पर अपने ही रिश्ते की एक भानजी सुवर्णा से, जो हैदराबाद की रहने वाली थी।Image result for https://www.google.co.in/search?q=गुरुदत्त

    कोरियोग्राफर से लेकर अभिनेता निर्देशक तक

    गुरु दत्त को प्रभात फ़िल्म कम्पनी ने बतौर एक कोरियोग्राफर के रूप में काम पर रखा था लेकिन उन पर जल्द ही एक अभिनेता के रूप में काम करने का दवाव डाला गया। और केवल यही नहीं, एक सहायक निर्देशकके रूप में भी उनसे काम लिया गया। प्रभात में काम करते हुए उन्होंने देव आनन्द और रहमान से अपने सम्बन्ध बना लिये जो दोनों ही आगे चलकर अच्छे सितारों के रूप में मशहूर हुए। उन दोनों की दोस्ती ने गुरु दत्त को फ़िल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाने में काफी मदद की।

    प्रभात के 1947 में विफल हो जाने के बाद गुरु दत्त बम्बई आ गये। वहाँ उन्होंने अमिय चक्रवर्ती व ज्ञान मुखर्जी नामक अपने समय के दो अग्रणी निर्देशकों के साथ काम किया। अमिय चक्रवर्ती की फ़िल्म गर्ल्स स्कूलमें और ज्ञान मुखर्जी के साथ बॉम्बे टॉकीज की फ़िल्म संग्राम में। बम्बई में ही उन्हें देव आनन्द की पहली फ़िल्म के लिये निर्देशक के रूप में काम करने की पेशकश की गयी। देव आनन्द ने उन्हें अपनी नई कम्पनी नवकेतन में एक निर्देशक के रूप में अवसर दिया था किन्तु दुर्भाग्य से यह फ़िल्म फ्लॉप हो गयी। इस प्रकार गुरु दत्त द्वारा निर्देशित पहली फिल्म थी नवकेतन के बैनर तले बनी बाज़ी जो 1951 में प्रदर्शित हुई।

    प्रमुख फिल्में

    वर्ष फ़िल्म चरित्र टिप्पणी
    1964 सुहागन विजय कुमार
    1963 भरोसा बंसी
    1962 साहिब बीबी और ग़ुलाम अतुल्य चक्रवर्ती उर्फ़ भूतनाथ
    1960 चौदहवीं का चाँद असलम
    1960 काला बाज़ार
    1959 कागज़ के फूल सुरेश सिन्हा
    1957 प्यासा विजय
    1955 मिस्टर एंड मिसेज़ 55
    1946 हम एक हैं

    बतौर लेखक

    वर्ष फ़िल्म टिप्पणी
    1952 जाल

     बतौर निर्देशक

    वर्ष फ़िल्म टिप्पणी
    1959 कागज़ के फूल
    1957 प्यासा
    1955 मिस्टर एंड मिसेज़ 55
    1953 बाज़
    1952 जाल
    1951 बाज़ी

    मृत्यु

    10 अक्टूबर 1964 की सुबह को गुरु दत्त पेढर रोड बॉम्बे में अपने बेड रूम में मृत पाये गये। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने पहले खूब शराब पी ! उसके बाद ढेर सारी नींद की गोलियाँ खा लीं। यही  उनकी मौत का कारण बनी। इससे पूर्व भी उन्होंने दो बार आत्महत्या का प्रयास किया था। आखिरकार तीसरे प्रयास ने उनकी जान ले ली।

    पुरस्कार

    गुरु दत्त की फ़िल्म प्यासा को टाइम मैगज़ीन ने विश्व की 100 सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों में स्थान दिया। 2002 में साइट और साउंड के क्रिटिक्स और डायरेक्टर्स के पोल में गुरु दत्त की दो फ़िल्मों- प्यासा और कागज़ के फूल को सर्वकालिक 160 महानतम फ़िल्मों में चुना गया।

  • फ़िल्म निर्माता निर्देशक और पटकथा लेखक के. बालाचंदर का जन्‍म 1930 में हुआ था।
  • प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता संजीव कुमार का जन्म का जन्‍म 1938 में हुआ था।संजीव कुमार (मूल नाम : हरीभाई जरीवाला; जन्म: 9 जुलाई 1938, मृत्यु: 6 नवम्बर 1985) हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे। उनका पूरा नाम हरीभाई जरीवाला था। वे मूल रूप से गुजराती थे। इस महान कलाकार का नाम फ़िल्मजगत की आकाशगंगा में एक ऐसे धुव्रतारे की तरह याद किया जाता है जिनके बेमिसाल अभिनय से सुसज्जित फ़िल्मों की रोशनी से बॉलीवुड हमेशा जगमगाता रहेगा। उन्होंने नया दिन नयी रात फ़िल्म में नौ रोल किये थे। कोशिश फ़िल्म में उन्होंने गूँगे बहरे व्यक्ति का शानदार अभिनय किया था। शोले फ़िल्म में ठाकुर का चरित्र उनके अभिनय से अमर हो गया।उन्हें श्रेष्ठ अभिनेता के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार के अलावा फ़िल्मफ़ेयर क सर्वश्रेष्ठ अभिनेता व सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार दिया गया। वे आजीवन कुँवारे रहे और मात्र 47 वर्ष की आयु में सन् 1984 में हृदय गति रुक जाने से बम्बई में उनकी मृत्यु हो गयी। 1960 से 1984 तक पूरे पच्चीस साल तक वे लगातार फ़िल्मों में सक्रिय रहे।

    उन्हें उनके शिष्ट व्यवहार व विशिष्ट अभिनय शैली के लिये फ़िल्मजगत में हमेशा याद किया जायेगा।

    संजीव कुमार का जन्म सूरत में 9 जुलाई 1938 को जेठालाल जरीवाला के एक मध्यमवर्गीय गुजराती परिवार में हुआ था। उनका जन्म का नाम हरिहर जरीवाला था किन्तु प्यार से सभी कुटुम्बी और सम्बन्धी उन्हें हरीभाई जरीवाला ही कहते थे। यद्यपि उनका पैतृक निवास सूरत में था परन्तु फ़िल्मजगत की चाह उन्हें मायानगरी मुंबई खींच लायी। यह शौक उन्हें बचपन से ही था।

    फ़िल्मों में बतौर अभिनेता काम करने का सपना देखने वाले हरीभाई भारतीय फिल्म उद्योग में आकर संजीव कुमार हो गये। अपने जीवन के शुरूआती दौर में पहले वे रंगमंच से जुड़े परन्तु बाद में उन्होंने फ़िल्मालय के एक्टिंग स्कूल में दाखिला लिया। इसी दौरान वर्ष 1960 में उन्हें फ़िल्मालय बैनर की फ़िल्म हम हिन्दुस्तानी में एक छोटी सी भूमिका निभाने का मौका मिला। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक फ़िल्मों में अपने शानदार अभिनय से वे एक प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता बने।

    संजीव कुमार ने विवाह नहीं किया परन्तु प्रेम कई बार किया था। उन्हें यह अन्धविश्वास था की इनके परिवार में बड़े पुत्र के 10 वर्ष का होने पर पिता की मृत्यु हो जाती है। इनके दादा, पिता और भाई सभी के साथ यह हो चुका था। संजीव कुमार ने अपने दिवंगत भाई के बेटे को गोद लिया और उसके दस वर्ष का होने पर उनकी मृत्यु हो गयी! संजीव कुमार लज़ीज भोजन के बहुत शौक़ीन थे।

    बीस वर्ष की आयु में गरीब मध्यम वर्ग के इस युवा ने कभी भी छोटी भूमिकाओं से कोई परहेज नहीं किया। ‘संघर्ष‘ फ़िल्म में दिलीप कुमार की बाँहों में दम तोड़ने का दृश्य इतना शानदार किया कि खुद दिलीप कुमार भी सकते में आ गये। स्टार कलाकार हो जाने के बावजूद भी उन्होंने कभी नखरे नहीं किये। उन्होने जया बच्चन के स्वसुर, प्रेमी, पिता और पति की भूमिकाएँ भी निभायीं। जब लेखक सलीम ख़ान ने इनसे त्रिशूल में अपने समकालीन अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के पिता की भूमिका निभाने का आग्रह किया तो उन्होंने बेझिझक यह भूमिका स्वीकार कर ली और इतने शानदार ढँग से निभायी कि उन्हें ही केन्द्रीय करेक्टर मान लिया गया। हरीभाई ने बीस वर्ष की आयु में एक वृद्ध आदमी का ऐसा जीवन्त अभिनय किया था कि उसे देखकर पृथ्वीराज कपूर भी दंग रह गये।

    फिल्मी सफर

    संजीव कुमार ने अपने फ़िल्मी कैरियर की शुरुआत 1960 में हम हिन्दुस्तानी फ़िल्म में मात्र दो मिनट की छोटी-सी भूमिका से की। वर्ष 1962 में राजश्री प्रोडक्शन की आरती के लिए उन्होंने स्क्रीन टेस्ट दिया जिसमें वह पास नहीं हो सके। इसके बाद उन्हें कई बी-ग्रेड फ़िल्में मिली। इन महत्वहीन फ़िल्मों के बावजूद अपने अभिनय के जरिये उन्होंने सबका ध्यान आकर्षित किया। सर्वप्रथम मुख्य अभिनेता के रूप में संजीव कुमार को वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म निशान में काम करने का मौका मिला। वर्ष 1960 से वर्ष 1968 तक संजीव कुमार फ़िल्म इण्डस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिये संघर्ष करते रहे। फ़िल्म हम हिन्दुस्तानी के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गये। इस बीच उन्होंने स्मगलर, पति-पत्नी, हुस्न और इश्क, बादल, नौनिहाल और गुनहगार जैसी कई फ़िल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।

    वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म शिकार में वह पुलिस ऑफिसर की भूमिका में दिखायी दिये। यह फ़िल्म पूरी तरह अभिनेता धर्मेन्द्र पर केन्द्रित थी फिर भी संजीव कुमार धर्मेन्द्र जैसे अभिनेता की उपस्थिति में भी अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म में उनके दमदार अभिनय के लिये उन्हें सहायक अभिनेता का फ़िल्मफेयर अवार्ड भी मिला।

    वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म संघर्ष में उनके सामने हिन्दी फ़िल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन संजीव कुमार ने अपनी छोटी-सी भूमिका के बावजूद दर्शकों की वाहवाही लूट ली। इसके बाद आशीर्वाद, राजा और रंक, सत्यकाम और अनोखी रात जैसी फ़िल्मों में मिली कामयाबी से संजीव कुमार दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुँच गये जहाँ वे फ़िल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। Image result for गुरुदत्त एवं अभिनेता संजीव कुमारवर्ष 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म खिलौना की जबर्दस्त कामयाबी के बाद संजीव कुमार ने बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। वर्ष 1970 में ही प्रदर्शित फ़िल्म दस्तक में उनके लाजवाब अभिनय के लिये सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वर्ष 1972 में प्रदर्शित फ़िल्म कोशिश में उनके अभिनय का नया आयाम दर्शकों को देखने को मिला। फ़िल्म कोशिश में गूँगे की भूमिका निभाना किसी भी अभिनेता के लिये बहुत बड़ी चुनौती थी। बगैर संवाद बोले सिर्फ आँखों और चेहरे के भाव से दर्शकों को सब कुछ बता देना संजीव कुमार की अभिनय प्रतिभा का ऐसा उदाहरण था जिसे शायद ही कोई अभिनेता दोहरा पाये। इन्होंने दिलीप कुमार के साथ संघर्ष में काम किया। फ़िल्म खिलौना ने इन्हें स्टार का दर्जा दिलाया। इसके बाद इनकी हिट फ़िल्म सीता और गीता और मनचली प्रदर्शित हुईं। 70 के दशक में उन्होने गुलज़ार जैसे दिग्दर्शक के साथ काम किया। Image result for गुरुदत्त एवं अभिनेता संजीव कुमारउन्होने गुलज़ार के साथ कुल 9 फ़िल्में कीं जिनमे आंधी (1975), मौसम (1975), अंगूर (1982), नमकीन (1982) प्रमुख है। इनके कुछ प्रशंसक इन फ़िल्मों को इनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मो में से मानते हैं। फ़िल्म शोले (1975) में उनके द्वारा अभिनीत पात्र ठाकुर आज भी लोगों के दिलों में ज़िन्दा है। जो मिमिक्री कलाकारों के लिये एक मसाला है। संजीव कुमार के दौर में राजेश खन्नाअमिताभ बच्चनधर्मेन्द्रशम्मी कपूरदिलीप कुमार जैसे अभिनेता छाये हुए थे, फिर भी अपने सशक्त अभिनय से उन सबके बीच काम करते हुए उन्होंने फ़िल्मजगत में अपना स्थान बनाया।

    प्रमुख फिल्में

    वर्ष फ़िल्म चरित्र टिप्पणी
    1993 प्रोफेसर की पड़ोसन प्रोफेसर विद्याधर रिलीज़ मृत्यु के बाद
    1987 राही डॉक्टर प्रभात कुमार
    1986 कत्ल राकेश
    1986 काँच की दीवार जसवंत सिंह/दुर्जन सिंह
    1986 लव एंड गॉड कैस-ए-आमरी (मजनू) रिलीज़ मृत्यु के बाद
    1986 हाथों की लकीरें डॉक्टर साब
    1986 बात बन जाये सूरज सिंह
    1985 राम तेरे कितने नाम राम कु्मार
    1985 ज़बरदस्त रतन कु्मार
    1984 लाखों की बात एडवोकेट प्रेम सागर
    1984 मेरा दोस्त मेरा दुश्मन गोली चाचा
    1984 पाखंडी
    1984 बद और बदनाम
    1984 यादगार राय कल्पनाथ राय
    1983 हीरो दामोदर माथुर
    1982 अंगूर अशोक दोहरी भूमिका
    1982 सवाल धनपतराय मेहता
    1982 सुराग
    1982 हथकड़ी हरिमोहन/साकिया/गोपालदास मित्तल
    1982 अय्याश जसवंत सिंह
    1982 खुद्दार हरी श्रीवास्तव
    1982 लोग क्या कहेंगे
    1982 नमकीन गेरूलाल
    1982 श्रीमान श्रीमती शंकरलाल
    1982 सिंदूर बने ज्वाला
    1982 विधाता अबु बाबा
    1981 दासी आनंद
    1981 इतनी सी बात राजा
    1981 बीवी ओ बीवी कर्नल मंगल सिंह/शंकर
    1981 चेहरे पे चेहरा डॉक्टर विल्सन/ब्लैकस्टोन
    1981 लेडीज़ टेलर महबूब
    1981 वक्त की दीवार विक्रम
    1981 सिलसिला डॉक्टर वी के आनन्द
    1980 हम पाँच कृष्ण
    1980 ज्योति बने ज्वाला अतिथि पात्र
    1980 अब्दुल्ला अमीर
    1980 बेरहम पुलिस कमिश्नर कुमार आनंद
    1980 फ़ौजी चाचा फ़ौजी चाचा पंजाबी फ़िल्म
    1980 पत्थर से टक्कर बिंद्रा
    1980 स्वयंवर राम
    1980 टक्कर सूरज/किशन
    1979 काला पत्थर डॉक्टर रोमेश
    1979 गृह प्रवेश अमर
    1979 हमारे तुम्हारे जयराज वर्मा
    1979 बॉम्बे एट नाइट
    1979 घर की लाज
    1979 जानी दुश्मन ठाकुर
    1979 मान अपमान शंकर
    1978 त्रिशूल राज कुमार ‘आर के’ गुप्ता
    1978 देवता टोनी/तरुण कुमार
    1978 मुकद्दर
    1978 पति पत्नी और वो रंजीत चड्ढा
    1978 सावन के गीत
    1978 स्वर्ग नर्क पंडित सोहनलाल त्रिपाठी
    1978 तृष्णा डॉक्टर सुनील गुप्ता
    1978 तुम्हारे लिये प्रकाश/गंगाधर उपाध्याय
    1977 मुक्ति रतन
    1977 शतरंज के खिलाड़ी मिर्ज़ा सज्जाद अली
    1977 यही है ज़िन्दगी आनंद नारायण
    1977 ईमान धर्म कबीरदास
    1977 आलाप राजा बहादुर अतिथि पात्र
    1977 अंगारे
    1977 अपनापन राजन रशपाल सिंह
    1977 धूप छाँव डॉक्टर पारस
    1977 दिल और पत्थर
    1977 पापी अशोक रॉय
    1977 विश्वासघात महेश/राजा
    1976 ज़िन्दगी रघु शुक्ला
    1976 अर्जुन पंडित
    1976 दो लड़कियाँ
    1975 मौसम डॉक्टर अमरनाथ गिल
    1975 फ़रार इंस्पेक्टर संजय
    1975 शोले ठाकुर बलदेव सिंह (ठाकुर साहब)
    1975 आक्रमण मेजर अजय वर्मा
    1975 आँधी जे के
    1975 अपने दुश्मन डॉक्टर
    1975 अपने रंग हज़ार
    1975 धोती लोटा और चौपाटी इंस्पेक्टर वागले
    1975 उलझन आनंद
    1974 कुँवारा बाप डॉक्टर
    1974 आप की कसम मोहन
    1974 मनोरंजन हवलदार रतन/शेरू
    1974 अर्चना
    1974 चरित्रहीन
    1974 चौकीदार डॉक्टर श्याम
    1974 दावत
    1974 ईमान
    1974 नया दिन नई रात १० विभिन्न पात्र निभाए (नायक सहित)
    1974 शानदार राजन
    1973 अनहोनी सुनील
    1973 अग्नि रेखा
    1973 अनामिका देवेंद्र दत्त
    1973 दूर नहीं मंज़िल
    1973 मनचली सुशील कुमार
    1973 सूरज और चंदा
    1972 परिचय नीलेश अतिथि पात्र
    1972 कोशिश हरिचरण माथुर
    1972 रिवाज़ शेखर
    1972 सबसे बड़ा सुख कथा वाचक
    1972 सीता और गीता रवि
    1972 सुबह ओ श्याम नसीर
    1971 अनुभव अमर सेन
    1971 एक पहेली पुलिस इंस्पेक्टर
    1971 कंगन डॉक्टर सुनील ‘सोनू’
    1971 मन मन्दिर दीपक
    1971 पारस धरम सिंह
    1970 बचपन काशीराम ‘काशी’
    1970 दस्तक हामिद
    1970 देवी डाक्टर ए एन शेखर
    1970 गुनाह और कानून
    1970 इंसान और शैतान
    1970 खिलौना विजयकमल एस सिंह
    1970 माँ का आँचल
    1970 प्रिया
    1969 बंधन वकील रवि शर्मा
    1969 चंदा और बिजली
    1969 धरती कहे पुकार के
    1969 ग़ुस्ताखी माफ़
    1969 इन्साफ का मन्दिर
    1969 जीने की राह मनोहारी
    1969 ज्योति
    1969 सच्चाई किशोर दयाल
    1969 सत्यकाम नरेंद्र शर्मा (नरेन)
    1968 गौरी संजीव
    1968 अनोखी रात बल्देव सिंह
    1968 राजा और रंक सुधीर
    1968 आशीर्वाद डाक्टर बीरेन
    1968 संघर्ष द्वारका प्रसाद
    1968 शिकार पुलिस इंस्पेक्टर
    1968 साथी अशोक अतिथी पात्र
    1966 हुस्न और इश्क आशिक हुसैन
    1966 बादल
    1966 कालपी राजकुमार सूरसिंहजी तख्तासिंहजी गोहिल
    1966 स्मगलर मोहन
    1966 पति पत्नी अमर

    नामांकन और पुरस्कार

9 जुलाई को हुए निधन

  • धार्मिक उपदेशक चैतन्य देव का निधन 1533 में हुआ था।Image result for चैतन्य महाप्रभुचैतन्य महाप्रभु (१८ फरवरी१४८६-१५३४वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। इन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी, भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया तथा राजनैतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू-मुस्लिम एकता की सद्भावना को बल दिया, जाति-पांत, ऊंच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा दी तथा विलुप्त वृंदावन को फिर से बसाया और अपने जीवन का अंतिम भाग वहीं व्यतीत किया। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए महामंत्र नाम संकीर्तन का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव आज पश्चिमी जगत तक में है। यह भी कहा जाता है, कि यदि गौरांग ना होते तो वृंदावन आज तक एक मिथक ही होता। वैष्णव लोग तो इन्हें श्रीकृष्ण का राधा रानी के संयोग का अवतार मानते हैं। गौरांग के ऊपर बहुत से ग्रंथ लिखे गए हैं, जिनमें से प्रमुख है श्री कृष्णदास कविराज गोस्वामी विरचित चैतन्य चरितामृत। इसके अलावा श्री वृंदावन दास ठाकुर रचित चैतन्य भागवत तथा लोचनदास ठाकुर का चैतन्य मंगल भी हैं।Image result for चैतन्य महाप्रभुचैतन्य चरितामृत के अनुसार चैतन्य महाप्रभु का जन्म सन १४८६ की फाल्गुन शुक्ला पूर्णिमा को पश्चिम बंगाल के नवद्वीप (नादिया) नामक गांव में हुआ, जिसे अब मायापुर कहा जाता है। इनका जन्म संध्याकाल में सिंह लग्न में चंद्र ग्रहण के समय हुआ था। उस समय बहुत से लोग शुद्धि की कामना से हरिनाम जपते हुए गंगा स्नान को जा रहे थे। तब विद्वान ब्राह्मणों ने उनकी जन्मकुण्डली के ग्रहों और उस समय उपस्थित शगुन का फलादेश करते हुए यह भविष्यवाणी की, कि यह बालक जीवन पर्यन्त हरिनाम का प्रचार करेगा। यद्यपि बाल्यावस्था में इनका नाम विश्वंभर था, परंतु सभी इन्हें निमाई कहकर पुकारते थे, क्योंकि कहते हैं, कि ये नीम के पेड़ के नीचे मिले थे। गौरवर्ण का होने के कारण लोग इन्हें गौरांग, गौर हरि, गौर सुंदर आदि भी कहते थे।

    इनके पिता का नाम जगन्नाथ मिश्र व मां का नाम शचि देवी था। निमाई बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा संपन्न थे। साथ ही, अत्यंत सरल, सुंदर व भावुक भी थे। इनके द्वारा की गई लीलाओं को देखकर हर कोई हतप्रभ हो जाता था। बहुत कम आयु में ही निमाई न्याय व व्याकरण में पारंगत हो गए थे। इन्होंने कुछ समय तक नादिया में स्कूल स्थापित करके अध्यापन कार्य भी किया। निमाई बाल्यावस्था से ही भगवद्चिंतन में लीन रहकर राम व कृष्ण का स्तुति गान करने लगे थे। १५-१६ वर्ष की अवस्था में इनका विवाह लक्ष्मीप्रिया के साथ हुआ। सन १५०५ में सर्प दंश से पत्नी की मृत्यु हो गई। वंश चलाने की विवशता के कारण इनका दूसरा विवाह नवद्वीप के राजपंडित सनातन की पुत्री विष्णुप्रिया के साथ हुआ। जब ये किशोरावस्था में थे, तभी इनके पिता का निधन हो गया।

    सन १५०९ में जब ये अपने पिता का श्राद्ध करने गया गए, तब वहां इनकी भेंट ईश्वरपुरी नामक संत से हुई। उन्होंने निमाई से कृष्ण-कृष्ण रटने को कहा। तभी से इनका सारा जीवन बदल गया और ये हर समय भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहने लगे। भगवान श्रीकृष्ण के प्रति इनकी अनन्य निष्ठा व विश्वास के कारण इनके असंख्य अनुयायी हो गए। सर्वप्रथम नित्यानंद प्रभु व अद्वैताचार्य महाराज इनके शिष्य बने।

     

    गौरांग की मायापुर में एक मंदिर में स्थित प्रतिमा

    यह अठारह शब्दीय (३२ अक्षरीय) कीर्तन महामंत्र निमाई की ही देन है। इसे तारकब्रह्ममहामंत्र कहा गया, व कलियुग में जीवात्माओं के उद्धार हेतु प्रचारित किया गया था। जब ये कीर्तन करते थे, तो लगता था मानो ईश्वर का आह्वान कर रहे हैं। सन १५१० में संत प्रवर श्री पाद केशव भारती से संन्यास की दीक्षा लेने के बाद निमाई का नाम कृष्ण चैतन्य देव हो गया। मात्र २४ वर्ष की आयु में ही इन्होंने गृहस्थ आश्रम का त्याग कर सन्यास ग्रहण किया। बाद में ये चैतन्य महाप्रभु के नाम से प्रख्यात हुए। सन्यास लेने के बाद जब गौरांग पहली बार जगन्नाथ मंदिर पहुंचे, तब भगवान की मूर्ति देखकर ये इतने भाव-विभोर हो गए, कि उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे, व मूर्छित हो गए। संयोग से तब वहां उपस्थित प्रकाण्ड पण्डित सार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभु की प्रेम-भक्ति से प्रभावित होकर उन्हें अपने घर ले गए। घर पर शास्त्र-चर्चा आरंभ हुई, जिसमें सार्वभौम अपने पाण्डित्य का प्रदर्शन करने लगे, तब श्रीगौरांग ने भक्ति का महत्त्व ज्ञान से कहीं ऊपर सिद्ध किया व उन्हें अपने षड्भुजरूपका दर्शन कराया। सार्वभौम तभी से गौरांग महाप्रभु के शिष्य हो गए और वह अन्त समय तक उनके साथ रहे। पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य ने गौरांक की शत-श्लोकी स्तुति रची जिसे आज चैतन्य शतक नाम से जाना जाता है।उड़ीसा के सूर्यवंशी सम्राट, गजपति महाराज प्रताप रुद्रदेव ने इन्हें श्रीकृष्ण का अवतार माना और इनका अनन्य भक्त बन गया।

    चैतन्य महाप्रभु संन्यास लेने के बाद नीलांचल चले गए। इसके बाद दक्षिण भारत के श्रीरंग क्षेत्र व सेतु बंध आदि स्थानों पर भी रहे। इन्होंने देश के कोने-कोने में जाकर हरिनाम की महत्ता का प्रचार किया। सन १५१५ में विजयादशमी के दिन वृंदावन के लिए प्रस्थान किया। ये वन के रास्ते ही वृंदावन को चले। कहते हैं, कि इनके हरिनाम उच्चारण से उन्मत्त हो कर जंगल के जानवर भी इनके साथ नाचने लगते थे। बड़े बड़े जंगली जानवर जैसे शेर, बाघ और हाथी आदि भी इनके आगे नतमस्तक हो प्रेमभाव से नृत्य करते चलते थे। कार्तिक पूर्णिमा को ये वृंदावन पहुंचे। वृंदावन में आज भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन गौरांग का आगमनोत्सव मनाया जाता है। यहां इन्होंने इमली तला और अक्रूर घाट पर निवास किया। वृंदावन में रहकर इन्होंने प्राचीन श्रीधाम वृंदावन की महत्ता प्रतिपादित कर लोगों की सुप्त भक्ति भावना को जागृत किया। यहां से फिर ये प्रयाग चले गए। इन्होंने काशीहरिद्वारशृंगेरी (कर्नाटक), कामकोटि पीठ (तमिलनाडु), द्वारिकामथुरा आदि स्थानों पर रहकर भगवद्नाम संकीर्तन का प्रचार-प्रसार किया। चैतन्य महाप्रभु ने अपने जीवन के अंतिम वर्ष जगन्नाथ पुरी में रहकर बिताएं। यहीं पर सन १५३३ में ४७ वर्ष की अल्पायु में रथयात्रा के दिन उन्होंने श्रीकृष्ण के परम धाम को प्रस्थान किया। कहते हैं कि उनकी अद्भुत भगवद्भक्ति देखकर जगन्नाथ पुरी के राजा तक उनके श्रीचरणों में नत हो जाते थे। बंगाल के एक शासक के मंत्री रूपगोस्वामी तो मंत्री पद त्यागकर चैतन्य महाप्रभु के शरणागत हो गए थे। उन्होंने कुष्ठ रोगियों व दलितों आदि को अपने गले लगाकर उनकी अनन्य सेवा की।

  • सुप्रसिद्ध शायर शेरी भोपाली का निधन 1991 में हुआ था।

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