हल्दीघाटी युद्ध / 7वीं कक्षा में विजयी हुए थे महाराणा प्रताप, 12वीं में पराजित हो गए थे प्रताप

हार-जीत के यह दोनों ही तथ्य इस बार सिलेबस में नए सिरे से शामिल किए गए

  • नए सिलेबस में महाराणा प्रताप ही हैं महान, बच्चे नहीं पढ़ेंगे अकबर महान, कई चैप्टरों में बदलाव

जयपुर (विनोद मित्तल). हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की हार-जीत को लेकर अलग अलग कक्षाओं में प्रदेश के बच्चे अलग-अलग तथ्य पढेंगे। 7वीं में पढ़ाया जाएगा कि इस युद्ध में प्रताप को विजय मिली थी, जबकि 12वीं के बच्चे पढ़ेंगे कि प्रताप को पराजय का मुंह देखना पड़ा था। हार-जीत के यह दोनों ही तथ्य इस बार सिलेबस में नए सिरे से शामिल किए गए हैं।

महाराणा प्रताप और अकबर में से एक को महान मानने को लेकर प्रदेश में पहले भी कई बार कांग्रेस-भाजपा आमने सामने हो चुकी है। हालांकि नए सिलेबस में प्रदेश के स्कूली बच्चे अब महाराणा प्रताप महान ही पढेंगे। प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनने के बाद अकबर और प्रताप में कौन महान, इसे लेकर बहस छिड़ गई थी। तब से ही निगाहें नए सिलेबस पर टिकी हुई थी।
यह विसंगति भी :  नए सिलेबस में दसवीं कक्षा में अकबर के चैप्टर में कुछ बदलाव किया है। पहले लिखा था कि 1562 में अकबर ने बाज बहादुर से मालवा चुनार का किला गोडवाना का किला जीता था। अब नए सिलेबस में इसको बदलकर 1516 कर दिया गया है। इसके हिसाब से देखा जाए तो अकबर ने जन्म से पहले ही यह किला जीत लिया था। क्योंकि अकबर का जन्म ही 1542 में हुआ था।

7वीं कक्षा में है- मेवाड़ के अभिलेखों में प्रताप की जीत
सातवीं कक्षा की सामाजिक के चेप्टर-20 राजस्थान के राजवंश एवं मुगल में महाराणा को वीर शिरोमणि प्रताप महान लिखा गया है। इसमें नए सिरे से जोड़े गए तथ्य में कहा गया है कि मुगल इतिहास ने हल्दीघाटी के युद्ध में अकबर को विजयी बताया है, जबकि मेवाड़ के अभिलेखों में प्रताप की विजय होना लिखा है। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि अकबर अपने एक भी उद्देश्य में सफल नहीं हुआ था। इसमें प्रताप को जननायक बताते हुए लिखा है कि उन्होंने अंतिम समय तक मातृभूमि के लिए मर मिटने वाला आदर्श प्रस्तुत किया।
12वीं में है- हल्दीघाटी के युद्ध में पराजित हो गए थे प्रताप
12वीं कक्षा की इतिहास के चेप्टर-4 मुगल आक्रमण-प्रमाण और प्रभाव में नया तथ्य यह जोड़ा गया है कि हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप की पराजय हुई थी। पराजय के कारण गिनाते हुए लिखा गया है कि प्रताप ने परंपरागत युद्ध शैली अपनाई। प्रतिकूल परिस्थितियों के हिसाब से प्रताप में धैर्य का अभाव था। मेवाड़ सेना मैदान में लड़ने में अधिक सक्षम नहीं थी। पहाड़ी क्षेत्र में हाथियों को काम में लेना उचित सैन्य निर्णय नहीं था। प्रताप के पास अंतिम निर्णायक दौर के लिए सैनिक दस्ता नहीं था।

हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की वीरता और शौर्य के किस्से हर किसी की जुबान पर है. यह मध्यकालीन इतिहास का सबसे चर्चित युद्ध है, जिसमें मेवाड़ के राणा महाराणा प्रताप और मानसिंह के नेतृत्व वाली अकबर की विशाल सेना का आमना-सामना हुआ था. बता दें कि यह लड़ाई आज ही के दिन 442 साल पहले 1576 में लड़ी गई थी.

इस युद्ध के लिए महाराणा प्रताप को याद किया जाता है. कहा जाता है कि इस युद्ध में उनके पास मुगलों की तुलना में आधे सिपाही थे और उनके पास मुगलों की तुलना में आधुनिक हथियार भी नहीं थे, लेकिन वे डटे रहे और मुगलों के दांत खट्टे कर दिए. मुगलों की हालत इस जंग में पतली हो गई थी तभी उन्हें शक्ति सिंह के रूप में महाराणा का भेदिया भाई मिल गया. शक्ति सिंह ने मुगलों के समक्ष महाराणा की सारी सैन्य रणनीति और खुफिया रास्तों का खुलासा कर दिया.

चार घंटे चला था युद्ध

इस बात पर लगातार बहस होती रही है कि इस युद्ध में अकबर की जीत हुई या महाराणा प्रताप ने जीत हासिल की? इस मुद्दे को लेकर कई तथ्य और रिसर्च सामने भी आए हैं. कहा जाता है कि लड़ाई में कुछ भी निष्कर्ष नहीं निकला था. हालांकि आपको बता दें कि यह जंग 18 जून साल 1576 में चार घंटों के लिए चली थी. इस पूरे युद्ध में राजपूतों की सेना मुगलों पर बीस पड़ रही थी और उनकी रणनीति सफल हो रही थी.

मुगलों का हो गया था कब्जा

इस युद्ध के बाद मेवाड़, चित्तौड़, गोगुंडा, कुंभलगढ़ और उदयपुर पर मुगलों का कब्जा हो गया. सारे राजपूत राजा मुगलों के अधीन हो गए और महाराणा को दर-बदर भटकने के लिए छोड़ दिया गया. महाराणा प्रताप हल्दीघाटी के युद्ध में पीछे जरूर हटे थे लेकिन उन्होंने मुगलों के सामने घुटने नहीं टेके. वे फिर से अपनी शक्ति जुटाने लगे.

महाराणा प्रताप के पास कम थी सेना

इतिहासकार बदांयूनी ने लिखा है कि “5,000 सवारों के साथ कूच किया.” दुश्मन को लग सकता था कि 5,000 की सेना है मगर ये असल में सिर्फ घो़ड़ों की गिनती है, पूरी सेना की नहीं. इतिहास में सेनाओं की गिनती के अलग-अलग मत हैं. वहीं ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है कि 22,000 राजपूत 80,000 मुगलों के खिलाफ लड़े थे. ये गिनती इसलिए गलत लगती है क्योंकि अकबर ने जब खुद चित्तौड़ पर हमला किया था तो 60,000 सैनिक थे. ऐसे में वो मान सिंह के साथ अपने से ज्यादा सैनिक कैसे भेज सकता था? साथ ही मेवाड़ की तरफ से तोपों का इस्तेमाल न के बराबर हुआ. खराब पहाड़ी रास्तों से राजपूतों की भारी तोपें नहीं आ सकती थीं. जबकी मुगल सेना के पास ऊंट के ऊपर रखी जा सकने वाली तोपें थीं.

‘प्रताप ने जीता था युद्ध’

उदयपुर के राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के मीरा कन्या महाविधालय के एक प्रोफेसर डाक्टर चंद्रशेखर शर्मा ने एक शोध किया. इस शोध में उन्होंने पाया कि कि हल्दीघाटी की 18 जून 1576 की लड़ाई में महराणा प्रताप ने अकबर को हराया था. डॉ. शर्मा ने अपने रिसर्च में प्रताप की जीत के पक्ष में ताम्र पत्रों के प्रमाण जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय में जमा कराए हैं. शर्मा की खोज के अनुसार युद्ध के बाद अगले एक साल तक महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के आस-पास के गांवों की जमीनों के पट्टे ताम्र पत्र के रूप में बांटे थे जिन पर एकलिंगनाथ के दीवान प्रताप के हस्ताक्षर हैं.

उस समय जमीनों के पट्टे जारी करने का अधिकार सिर्फ राजा को ही होता था. जो साबित करता है कि प्रताप हीं युद्ध जीते थे. डॉ. शर्मा ने शोध किया है कि हल्दीघाटी युद्ध के बाद मुगल सेनापति मान सिंह व आसिफ खां के युद्ध हारने से अकबर नाराज हुए थे. दोनों को छह महीनें तक दरबार में नहीं आने की सजा दी गई थी. शर्मा कहते हैं कि अगर मुगल सेना जीतती तो अकबर अपने प्रिय सेनापतियों को दंडित नहीं करते. इससे साफ जाहिर है कि महराणा ने हल्दीघाटी के युद्ध को संपूर्ण साहस के साथ जीता था.

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